घरेलू हिंसा पर कविता लिख
इतरा रहा है वो
रोज शाम अपनी बीवी से
मार खा रहा है वो
वह कवि ही क्या जो
अपनी बीवी से न डरे
सुबह हो या शाम
उसे दंडवत न करे
वह कवि ही क्या जो
अपनी बीवी की तारीफ़ में कविता न लिखे
वह कवि ही क्या जो
अपनी पड़ोसन को भाभीजी न कहे\
मेरी रचनाएं मेरी माताजी श्रीमती कांता देवी एवं पिताजी श्री किशन चंद गुप्ता जी को समर्पित
No comments:
Post a Comment