लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 15 July 2026

युद्ध की विभीषिका - एक रचना

 युद्ध की विभीषिका

रणभूमि पर रक्तिम प्रात का विकराल उदय हुआ,
मानवता का निर्मल मुख आज धूल-धूसरित हुआ।
शंखनाद की गर्जना में करुणा का स्वर खो गया,
विजय-पताका की चाह में जीवन का दीप सो गया।

धधक उठीं धरती की साँसें अग्नि के उच्छ्वास से,
काँप उठी अम्बर की सीमा मृत्यु के संत्रास से।
लोहे की वर्षा ने हरित स्वप्नों को चूर किया,
ममता के आँचल को क्षणभर में ही दूर किया।

अश्रु-सरिताएँ बह चलीं उजड़े हुए द्वारों से,
मौन विलाप उठने लगा सूने पड़े परिवारों से।
वीरगति का गौरव भी पीड़ा से भर जाता है,
जब माँ का निर्जन आँगन पुत्र-वियोग सह जाता है।

नन्हे सपनों की किलकारी शस्त्रों में विलीन हुई,
स्नेह-सुगंधित जीवन-वीणा क्षणभर में ही क्षीण हुई।
धुएँ की काली चादर ने नभ का नीलापन हर लिया,
राख बनी आशाओं ने जीवन का आलोक छीन लिया।

सत्ता की क्षणभंगुर इच्छा ने कितना अनर्थ किया,
मानव के अंतर्मन का सारा माधुर्य व्यर्थ किया।
घृणा की ज्वाला जब-जब मानव-हृदय में पलती है,
सभ्यता की हर उपलब्धि पलभर में ही ढहती है।

विजय यदि मानवता खो दे, वह पराजय कहलाती है,
रक्तरंजित उपलब्धि केवल इतिहास रुलाती है।
शांति का श्वेत कपोत ही जीवन का श्रृंगार बने,
विश्वबंधुत्व का पावन संदेश सदा आधार बने।

करुणा के कोमल उपवन फिर से पुष्पित हो जाएँ,
प्रेम-सुधा के निर्झर जग के प्राणों में बह जाएँ।
शस्त्र नहीं, विश्वास सजे हर मानव के हाथों में,
दीप जले सद्भावना के धरती और आकाशों में।

आओ ऐसा विश्व रचें जहाँ वैराग्नि न प्रज्वलित हो,
हर हृदय में प्रेम, दया का नित्य नवीन संचित हो।
युद्ध नहीं, मानवता का हो युग-युग तक अभिनंदन,
यही धरा का धर्म अमर, यही सृष्टि का पावन वंदन।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

Tuesday, 14 July 2026

एकता का रहस्य - कहानी

 एकता का रहस्य

बरसों पुराना एक सुंदर गाँव था—हरितपुर। चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, आम और पीपल के विशाल वृक्ष, चहचहाते पक्षी और मेहनती लोगों से भरा यह गाँव अपनी खुशहाली के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

इसी गाँव में रामप्रसाद का परिवार रहता था। परिवार में उनकी पत्नी सरस्वती, बड़े बेटे मोहन, छोटे बेटे सोहन, बेटी गीता, बहुएँ सीमा और राधा, तथा चार प्यारे-प्यारे बच्चे थे। पूरा परिवार एक ही आँगन में रहता था। सुबह सब मिलकर काम करते, दोपहर में साथ भोजन करते और शाम को हँसी-मज़ाक के बीच दिन समाप्त होता।

गाँव के लोग अक्सर कहते,
"रामप्रसाद का परिवार देखो, जैसे एक माला में पिरोए हुए मोती हों।"

रामप्रसाद मुस्कुराकर कहते,
"घर बड़ा होने से नहीं, दिल बड़ा होने से खुशहाल बनता है।"

बदलती हवा

समय कभी एक जैसा नहीं रहता।

एक वर्ष बारिश बहुत कम हुई। खेतों की फसल आधी रह गई। आमदनी घटने लगी। इसी बीच गाँव में एक नया व्यापारी जगदीश आया। वह बहुत चालाक था। उसकी नज़र रामप्रसाद की उपजाऊ जमीन पर थी।

उसने सोचा,
"जब तक यह परिवार एक है, इनसे जमीन लेना असंभव है। पहले इनके बीच दरार डालनी होगी।"

उसने धीरे-धीरे अपनी योजना शुरू कर दी। एक दिन वह मोहन से मिला।

"मोहन जी, सारी मेहनत तो आप करते हैं। लेकिन कमाई बराबर बाँटी जाती है। यह कहाँ का न्याय है?"

मोहन ने पहले तो बात टाल दी, लेकिन वह बात उसके मन में कहीं बैठ गई।

दूसरे दिन जगदीश सोहन से मिला।

"आप तो पढ़े-लिखे हैं। अगर अलग होकर काम करें तो शहर में बड़ा कारोबार कर सकते हैं।"

धीरे-धीरे संदेह के छोटे-छोटे बीज दोनों भाइयों के मन में अंकुरित होने लगे।

छोटी बात, बड़ा विवाद

एक शाम खेत से लौटते समय मोहन ने कहा,
"इस बार पश्चिम वाले खेत में मैंने अधिक मेहनत की है। उसकी कमाई अलग होनी चाहिए।"

सोहन ने तुरंत उत्तर दिया,
"और मैंने नई सिंचाई की व्यवस्था करवाई थी। उसका क्या?"

बात बढ़ गई। बहुएँ भी अनजाने में अपने-अपने पतियों का पक्ष लेने लगीं।

घर का वातावरण बदल गया। जहाँ पहले हँसी गूँजती थी, अब वहाँ सन्नाटा था।

बच्चे भी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बड़े लोग अब साथ बैठकर बातें क्यों नहीं करते।

रामप्रसाद सब कुछ देख रहे थे, लेकिन वे जानते थे कि समझदारी थोपी नहीं जाती, उसे अनुभव से सीखा जाता है।

पहला झटका

इसी बीच गाँव में तेज़ आँधी और ओलावृष्टि हुई। कई खेत बर्बाद हो गए।

मोहन अकेले अपने खेत को बचाने दौड़ा, लेकिन अकेले वह कुछ नहीं कर पाया।

सोहन भी अपने हिस्से की चिंता में लगा रहा। पहले जहाँ पूरा परिवार मिलकर फसल बचा लेता था, इस बार अलग-अलग प्रयास नाकाम रहे। नुकसान पहले से कहीं अधिक हुआ।

रात को रामप्रसाद ने बस इतना कहा,
"जब हाथ अलग-अलग दिशा में खिंचते हैं, तो ताकत कम हो जाती है।"

लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

अलग होने का निर्णय

कुछ दिनों बाद दोनों भाइयों ने घर बाँटने का फैसला कर लिया। आँगन के बीच में दीवार खड़ी कर दी गई।

रसोई अलग हो गई। गायें बाँट दी गईं। खेती के औज़ार तक बाँट दिए गए। सबसे अधिक दुख बच्चों को हुआ।

जो बच्चे कल तक साथ खेलते थे, अब उन्हें अलग रहने को कहा गया।

छोटी पोती पायल रोते हुए बोली,
"दादा जी, क्या दीवार रिश्तों को भी बाँट देती है?"

रामप्रसाद की आँखें भर आईं।

उन्होंने केवल इतना कहा,
"दीवार ईंटों की नहीं होती बेटा, मन की होती है।"

संकट की दस्तक

कुछ महीनों बाद खबर आई कि पास की नदी का बाँध टूटने वाला है। गाँव में अफरा-तफरी मच गई।

लोग अपना सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। रामप्रसाद का घर भी खतरे में था।

मोहन अपने हिस्से का सामान बचाने लगा। सोहन अपने हिस्से का।

किसी को यह ध्यान ही नहीं रहा कि सबसे पहले बुज़ुर्गों और बच्चों को सुरक्षित निकालना चाहिए।

अचानक तेज़ पानी का बहाव आया। छोटी पायल और उसका भाई चिंटू घर के पिछवाड़े फँस गए।

चारों ओर पानी भर चुका था। महिलाएँ रोने लगीं।

एकता की परीक्षा

उस समय मोहन ने बिना कुछ सोचे पानी में छलाँग लगा दी। लेकिन तेज़ धारा उसे पीछे धकेलने लगी।

तभी सोहन भी दौड़कर आया।

"भैया, अकेले नहीं होगा।"

दोनों भाइयों ने एक लंबी रस्सी बाँधी। गाँव वालों ने दूसरी ओर से रस्सी पकड़ ली।

मोहन आगे बढ़ा। सोहन ने उसका हाथ मज़बूती से थाम रखा था। कई बार दोनों फिसले। कई बार लगा कि वे बह जाएँगे। लेकिन एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा।

आख़िरकार दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा। 

सरस्वती बच्चों को सीने से लगाकर रोने लगीं। उस रात पहली बार दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

रामप्रसाद का रहस्य

अगली सुबह रामप्रसाद ने पूरे परिवार को आँगन में बुलाया।

उन्होंने सबको लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर दिया।

"इसे तोड़ो।"

मोहन ने पूरी ताकत लगाई। नहीं टूटा। 

सोहन ने कोशिश की। वह भी असफल रहा।

फिर रामप्रसाद ने वही लकड़ियाँ अलग-अलग कर दीं।

अब हर लकड़ी आसानी से टूट गई।

रामप्रसाद मुस्कुराए।

"यही है एकता का रहस्य।"

उन्होंने आगे कहा,

"कल यदि तुम दोनों अलग-अलग बच्चों को बचाने जाते, तो शायद कोई भी वापस न आता। लेकिन जब तुम एक हुए, तब असंभव भी संभव हो गया।"

"घर केवल दीवारों से नहीं बनता। घर विश्वास, सहयोग, त्याग और प्रेम से बनता है।"

"जिस परिवार में 'मैं' बड़ा हो जाता है, वहाँ 'हम' छोटा पड़ जाता है। और जहाँ 'हम' सबसे बड़ा होता है, वहाँ कोई संकट बड़ा नहीं होता।"

दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बहने लगे।

नई शुरुआत

उसी दिन आँगन की दीवार गिरा दी गई। रसोई फिर एक हो गई।

बच्चे खुशी से उछल पड़े।

पायल बोली,
"अब हम फिर साथ खेलेंगे!"

सीमा और राधा ने मिलकर पहली बार फिर से एक साथ रोटी बनाई। शाम को पूरा परिवार वर्षों बाद एक साथ बैठकर भोजन कर रहा था। गाँव वालों ने भी राहत की साँस ली।

अंतिम चुनौती

कुछ महीनों बाद सरकार ने गाँव में आधुनिक कृषि प्रतियोगिता आयोजित की।

शर्त थी कि जो परिवार सबसे अधिक उत्पादन करेगा और नई तकनीक अपनाएगा, उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा।

कई लोगों ने कहा,
"रामप्रसाद का परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा।"

लेकिन इस बार पूरा परिवार एकजुट था।

मोहन खेती संभालता। सोहन नई तकनीक लागू करता।

सीमा और राधा बीजों की देखभाल करतीं। गीता बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खेतों का हिसाब रखती।

बच्चे पौधों को पानी देते और जैविक खाद तैयार करने में मदद करते।

कुछ ही महीनों में खेत लहलहा उठे। फसल पहले से कहीं अधिक हुई।

प्रतियोगिता में रामप्रसाद का परिवार पूरे जिले में प्रथम आया।

जब मंच पर पुरस्कार दिया गया तो अधिकारी ने पूछा,

"आपकी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?"

रामप्रसाद ने मुस्कुराकर अपने परिवार की ओर देखा और बोले,

"हमारे खेतों की मिट्टी उपजाऊ है, लेकिन उससे भी अधिक उपजाऊ हमारे रिश्ते हैं। जहाँ परिवार एक रहता है, वहाँ मेहनत कई गुना बढ़ जाती है और सफलता स्वयं चलकर आती है।"

पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

शिक्षा

उस दिन हरितपुर के लोगों ने केवल एक परिवार की जीत नहीं देखी, बल्कि एक ऐसा सत्य भी सीखा जिसे समय कभी नहीं बदल सकता—

धन, संपत्ति और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन परिवार की एकता ही जीवन को सच्ची खुशी, सुरक्षा और सम्मान देती है।

एकता का रहस्य किसी जादू में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग, त्याग, क्षमा और प्रेम में छिपा होता है। यही वह शक्ति है जो हर कठिनाई को अवसर और हर संकट को विजय में बदल देती है।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

कहानीकार 

Tuesday, 23 June 2026

भूतिया किताब का रहस्य

 

भूतिया किताब का रहस्य

गाँव हरिपुर में एक लड़का रहता था, जिसका नाम कपिल था। कपिल एक होशियार लड़का था, लेकिन उसे पढ़ाई बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसका मन हमेशा मोबाइल, खेल और दोस्तों के साथ घूमने-फिरने में लगा रहता था।

उसके पिता संदीप एक मेहनती व्यक्ति थे और उसकी माँ मीना अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहती थीं। कपिल की छोटी बहन रीना पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। वह रोज समय पर अपना होमवर्क करती और नई-नई किताबें पढ़ती।

जब भी मीना कपिल से पढ़ने को कहतीं, वह बहाना बना देता।

"माँ, अभी तो बहुत समय है। कल से पढ़ूँगा।"

यह "कल" कभी नहीं आता था।

कपिल के दोस्त रोहन, अर्जुन और विकास भी उसके जैसे ही थे। वे स्कूल के बाद मैदान में खेलते और घंटों मोबाइल पर वीडियो देखते रहते।

एक दिन स्कूल में परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। रीना अपनी कक्षा में प्रथम आई, जबकि कपिल के अंक बहुत कम आए।

प्रधानाचार्य ने कपिल को समझाते हुए कहा,

"बेटा, यदि अभी मेहनत नहीं करोगे तो भविष्य में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।"

लेकिन कपिल ने उनकी बात को भी गंभीरता से नहीं लिया।


पुरानी हवेली का रहस्य

गाँव के बाहर एक पुरानी हवेली थी। लोग कहते थे कि वहाँ रात को अजीब आवाजें आती हैं।

एक दिन रोहन बोला,

"चलो आज शाम उस हवेली में चलते हैं।"

कपिल उत्साहित हो गया।

"हाँ, देखते हैं भूत-प्रेत होते भी हैं या नहीं।"

शाम को चारों दोस्त हवेली की ओर निकल पड़े।

हवेली बहुत पुरानी थी। उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी। टूटी खिड़कियों से हवा सीटी जैसी आवाज निकाल रही थी।

जैसे ही वे अंदर गए, अचानक एक ठंडी हवा चली।

विकास डरकर बोला,

"मुझे यहाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा।"

लेकिन कपिल हँस पड़ा।

तभी उन्हें एक कमरे में एक बड़ी पुरानी अलमारी दिखाई दी।

अलमारी खोलने पर उन्हें धूल से भरी एक मोटी किताब मिली।

उस किताब के कवर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

"ज्ञान का रहस्य"

किताब बहुत अजीब लग रही थी।

जैसे ही कपिल ने उसे हाथ में लिया, हवेली के अंदर तेज हवा चलने लगी।

चारों दोस्त डर गए।

"चलो यहाँ से निकलते हैं!" अर्जुन चिल्लाया।

वे किताब लेकर घर लौट आए।


आधी रात की दस्तक

उस रात कपिल ने वह किताब अपने कमरे में रख दी।

रात के लगभग बारह बजे उसे अचानक किसी के फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी।

"कपिल... कपिल..."

वह घबराकर उठ बैठा।

कमरे में कोई नहीं था।

फिर उसकी नजर मेज पर रखी किताब पर गई।

किताब अपने आप खुल रही थी।

कपिल के हाथ-पैर काँपने लगे।

अचानक किताब के पन्नों से नीली रोशनी निकलने लगी।

उस रोशनी में एक धुँधली आकृति दिखाई दी।

वह कोई भूत जैसा लग रहा था।

कपिल चीख पड़ा।

"कौन हो तुम?"

भूत जैसी आकृति गंभीर आवाज में बोली,

"मैं ज्ञान का रक्षक हूँ।"

"तुम... भूत हो?"

"यदि अज्ञान भूत है, तो हाँ।"

कपिल डर से काँप रहा था।

भूत बोला,

"तुम पढ़ाई से भागते हो। इसलिए तुम्हें भविष्य दिखाने आया हूँ।"


भविष्य की भयावह झलक

अचानक कमरा घूमने लगा।

कुछ ही क्षणों में कपिल ने खुद को एक अजीब जगह पर पाया।

वहाँ उसने अपने बड़े रूप को देखा।

वह नौकरी की तलाश में भटक रहा था।

हर जगह उससे प्रश्न पूछे जा रहे थे, लेकिन वह किसी का उत्तर नहीं दे पा रहा था।

लोग उसका मजाक उड़ा रहे थे।

"इतनी साधारण बातें भी नहीं जानते?"

कपिल घबरा गया।

"क्या यह मेरा भविष्य है?"

भूत बोला,

"यदि तुम पढ़ाई से भागते रहे, तो यही होगा।"

कपिल की आँखों में आँसू आ गए।

तभी उसने दूसरी ओर रीना को देखा।

रीना एक बड़े वैज्ञानिक संस्थान में काम कर रही थी।

लोग उसकी प्रशंसा कर रहे थे।

कई छात्र उससे प्रेरणा ले रहे थे।

भूत बोला,

"अंतर केवल मेहनत का है।"


डरावनी लाइब्रेरी

इसके बाद भूत उसे एक विशाल अंधेरी लाइब्रेरी में ले गया।

चारों ओर हजारों किताबें थीं।

लेकिन वहाँ कुछ विचित्र जीव घूम रहे थे।

उनके शरीर धुएँ से बने थे और उनकी आँखें लाल थीं।

कपिल डर गया।

"ये कौन हैं?"

भूत बोला,

"ये भूले हुए सपने हैं।"

"क्या मतलब?"

"जो बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, उनके अधूरे सपने ऐसे ही भटकते रहते हैं।"

अचानक उनमें से एक जीव कपिल के पास आया।

उसने कहा,

"मैं डॉक्टर बनना चाहता था।"

दूसरा बोला,

"मैं वैज्ञानिक बनना चाहता था।"

तीसरा बोला,

"मैं शिक्षक बनना चाहता था।"

लेकिन सबके सपने अधूरे रह गए थे।

उनकी आवाजें सुनकर कपिल का दिल दहल गया।


रीना का साहस

अगले दिन कपिल ने सारी बात रीना को बताई।

रीना ने पहले तो विश्वास नहीं किया।

लेकिन रात को उसने भी किताब देखने की इच्छा जताई।

दोनों भाई-बहन किताब के पास बैठे।

जैसे ही किताब खुली, वही नीली रोशनी दिखाई दी।

इस बार भूत उनके सामने प्रकट हो गया।

रीना ने साहस दिखाते हुए पूछा,

"यदि कोई बच्चा गलती कर चुका हो तो क्या वह बदल सकता है?"

भूत मुस्कुराया।

"ज्ञान का द्वार हमेशा खुला रहता है।"

कपिल ध्यान से उसकी बात सुन रहा था।


दोस्तों की परीक्षा

अगले दिन कपिल अपने दोस्तों के पास गया।

उसने उन्हें सारी बात बताई।

पहले तो सब हँसे।

लेकिन उसी रात रोहन, अर्जुन और विकास ने भी वह किताब देखी।

किताब ने उन्हें भी उनके भविष्य की झलक दिखाई।

किसी को बेरोजगार दिखाया गया, किसी को पछताते हुए।

सुबह चारों दोस्त बहुत गंभीर थे।

रोहन बोला,

"अगर यह सच हुआ तो?"

अर्जुन ने कहा,

"हमें बदलना होगा।"

विकास ने सिर हिलाया।

"हाँ, अब समय बर्बाद नहीं करेंगे।"


रहस्यमयी अंतिम अध्याय

कुछ दिनों बाद कपिल नियमित रूप से पढ़ने लगा।

संदीप और मीना यह देखकर बहुत खुश थे।

एक रात कपिल ने किताब का अंतिम अध्याय खोला।

उसमें लिखा था—

"सच्चा जादू भूतों में नहीं, ज्ञान में छिपा है।"

जैसे ही उसने यह पंक्ति पढ़ी, पूरी किताब चमकने लगी।

भूत अंतिम बार प्रकट हुआ।

"कपिल, तुमने सबसे महत्वपूर्ण पाठ सीख लिया है।"

"कौन-सा पाठ?"

"डर हमें कुछ समय के लिए बदल सकता है, लेकिन ज्ञान हमें जीवन भर मजबूत बनाता है।"

कपिल मुस्कुराया।

"मैं अब पढ़ाई से नहीं भागूँगा।"

भूत धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।

और फिर हमेशा के लिए गायब हो गया।


सुखद अंत

कुछ महीनों बाद स्कूल में वार्षिक परीक्षा हुई।

इस बार कपिल ने पूरी मेहनत से तैयारी की थी।

परिणाम घोषित हुए।

कपिल के अंक पहले से बहुत बेहतर आए।

रीना अपनी कक्षा में फिर प्रथम आई।

रोहन, अर्जुन और विकास के परिणाम भी अच्छे रहे।

संदीप और मीना की खुशी का ठिकाना नहीं था।

एक शाम कपिल ने अपनी मेज पर रखी उस पुरानी किताब को ढूँढना चाहा।

लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

उसकी जगह केवल एक छोटा-सा कागज़ पड़ा था।

उस पर लिखा था—

"जो किताबों से दोस्ती कर लेता है, उसे किसी जादू की आवश्यकता नहीं होती।"

कपिल ने मुस्कुराकर अपनी पाठ्यपुस्तक खोली और पढ़ने लगा।

उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि पढ़ाई कोई बोझ नहीं, बल्कि सपनों तक पहुँचने का रास्ता है।

और तभी से कपिल, रीना और उसके दोस्तों ने एक संकल्प लिया—

"हम रोज कुछ नया सीखेंगे, क्योंकि ज्ञान ही वह प्रकाश है जो जीवन के हर अंधेरे को दूर कर सकता है।"

कहानी की सीख

डरावनी परिस्थितियाँ हमें चेतावनी दे सकती हैं, लेकिन सफलता केवल मेहनत, अनुशासन और पढ़ाई से ही मिलती है। जो बच्चे आज ज्ञान अर्जित करते हैं, वही कल अपने सपनों को साकार करते हैं।

Wednesday, 10 June 2026

राजनीतिक कुटिल चालें - व्यंग्य रचना

 राजनीतिक कुटिल चालें

(व्यंग्य कविता )

नेता जी फिर गाँव में आए, लेकर मीठी बात,
पाँच बरस जो दिखे नहीं थे, अब करते हैं मुलाकात।

हाथ जोड़कर कहते सबको, "आप हमारे प्राण",
जीत गए तो भूल जाएंगे, गली, मोहल्ला, मकान।

कल तक जिनको चोर कहा था, आज बने हैं मित्र,
राजनीति की गंगा में सब, हो जाते पवित्र।

दल बदला तो विचार बदले, बदली पूरी चाल,
कुर्सी के संग बदल गया फिर, सिद्धांतों का जाल।

वादों की बरसात हुई है, सपनों का व्यापार,
कागज़ पर ही बन जाते हैं, सौ-सौ नए द्वार।

सड़क, अस्पताल, स्कूलों की, बातें होती खूब,
लेकिन फाइल के जंगल में, जाते सारे डूब।

जनता को मुद्दों से हटाकर, नई बहस करवाएँ,
रोटी, शिक्षा भूल सभी फिर, झंडों में उलझाएँ।

भाषण में विकास दिखाते, जैसे स्वर्ग उतार,
धरती पर सुविधाएँ ढूँढे, जनता बारंबार।

चुनावों के मौसम में फिर, सेवा का अवतार,
जीत मिलते ही हो जाता, जनता से इंकार।

सोशल मीडिया पर चलती, वाह-वाही की रेल,
सच की हालत ऐसी जैसे, बिन पानी की बेल।

हर गलती का दोष विरोधी, हर सफलता अपनी,
राजनीति की इस विद्या पर, दुनिया जाए हँसनी।

युवा जब जागे प्रश्नों लेकर, खुलने लगे हिसाब,
झूठे वादों की दीवारों में, दिखने लगे खराब।

जनता बोली काम बताओ, मत गाओ गुणगान,
लोकतंत्र में सबसे ऊँचा, होता है इंसान।

कुर्सी कोई सिंहासन नहीं, सेवा का आधार,
जो जनता को भूल गया है, उसका बेड़ा पार।

यही व्यंग्य का सार मित्रों, सुन लो मेरे साथ,
जनता जागे तो रुक जाती, छल-कपटों की बात।

"जनसेवा का महान व्यापार" - राजनीतिक कुटिल चालों पर व्यंग्य

"जनसेवा का महान व्यापार" -  राजनीतिक कुटिल चालों पर व्यंग्य

चंपकवन का छलिया राजा - कहानी

 चंपकवन का छलिया राजा - कहानी 

Sunday, 26 April 2026

संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

 संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

बंसीराम जी के घर जब पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने उसका नाम रखा— पारस। बंसीराम खुद एक साधारण किसान थे, लेकिन उनका सपना असाधारण था। पारस बचपन से ही उनकी उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरा। वह न केवल शांत और सुशील था, बल्कि पढ़ाई में भी उसका कोई सानी नहीं था। गाँव के स्कूल में जब पारस अपनी किताबें लेकर बैठता, तो लोग कहते, "बंसीराम का बेटा एक दिन बड़ा अफसर बनेगा।" पारस की आँखों में भी वही चमक थी—एक प्रशासनिक अधिकारी (IAS) बनकर समाज की सेवा करने का सपना।


दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में जिले में प्रथम आने के बाद, पारस शहर चला गया। असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। शहर की चकाचौंध और नए परिवेश में पारस को कुछ ऐसे दोस्त मिले, जिनके लिए पढ़ाई से ज्यादा 'मौज-मस्ती' मायने रखती थी। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई—कभी एक फिल्म देखने जाना, कभी घंटों कैफे में बैठकर फिजूल की बातें करना।

धीरे-धीरे, पारस की मेज पर सजी प्रशासनिक सेवाओं की किताबें धूल फांकने लगीं। वह 'संगत के रंग' में ऐसा रंगा कि उसे अपनी मंजिल धुंधली लगने लगी। बंसीराम गाँव से मेहनत की कमाई भेजते रहे, इस भरोसे में कि उनका बेटा दिल्ली में 'साहब' बनने की तैयारी कर रहा है। लेकिन पारस अब सिगरेट के धुएं और रातों की आवारागर्दी में अपनी मेधा को खो चुका था। तीन साल बीत गए, ग्रेजुएशन जैसे-तैसे पूरी हुई, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में वह प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तक नहीं निकाल पाया।

एक दिन ऐसा आया जब पारस पूरी तरह हताश हो गया। आत्मविश्वास शून्य हो चुका था। उसने खुद को मान लिया था कि वह 'असफल' है। वह अपने दोस्तों के साथ गलत आदतों में इतना गहरा उतर गया कि गाँव जाना भी छोड़ दिया। बंसीराम की चिट्ठियाँ और फोन अब उसे बोझ लगने लगे थे। वह उस पारस का कंकाल मात्र रह गया था, जो कभी अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।


जिंदगी जब सबसे अंधेरे मोड़ पर होती है, तभी कहीं से रोशनी की एक किरण आती है। पारस के जीवन में वह किरण बनकर आए प्रोफेसर आदित्य। प्रोफेसर आदित्य पारस के कॉलेज में नए आए थे और उन्होंने पारस के पुराने रिकॉर्ड्स देखे थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना होनहार छात्र इस कदर टूट सकता है।

एक शाम, जब पारस पार्क के एक कोने में अकेला बैठा अपनी किस्मत को कोस रहा था, प्रोफेसर आदित्य उसके पास आकर बैठ गए। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, बस एक सवाल पूछा:

"पारस, क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता के हाथों की लकीरें मिट्टी से क्यों फटी हुई हैं?"

पारस खामोश रहा। प्रोफेसर ने आगे कहा, "वह मिट्टी पारस बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन तुमने खुद को कोयला बना लिया। तुम्हारी हार तुम्हारे दोस्तों की वजह से नहीं, बल्कि तुम्हारी खुद से हार है।"

प्रोफेसर आदित्य ने पारस को अपने संरक्षण में ले लिया। उन्होंने पारस के लिए एक सख्त दिनचर्या बनाई। शुरुआत में पारस का मन विचलित होता, पुराने दोस्त उसे वापस बुलाते, लेकिन इस बार उसके पास एक 'गुरु' का हाथ था।

पारस की नई दिनचर्या:

  • भोर का समय: योग और ध्यान (मानसिक शांति के लिए)।

  • दोपहर: गहन अध्ययन और नोट्स बनाना।

  • शाम: प्रोफेसर के साथ समसामयिक विषयों पर चर्चा।

  • रात: लेखन अभ्यास और आत्म-विश्लेषण।

प्रोफेसर ने उसे सिखाया कि सफलता केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि निरंतरता () से मिलती है। पारस ने अपने फोन से उन सभी नंबरों को हटा दिया जो उसे उसकी मंजिल से दूर ले जाते थे। उसने फिर से शून्य से शुरुआत की।


अगले दो साल पारस के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। एक बार फिर उसने परीक्षा दी। प्रीलिम्स निकला, मेंस भी शानदार रहा, लेकिन इंटरव्यू में वह कुछ अंकों से रह गया। पारस फिर से टूटने लगा। उसे लगा कि शायद अब बहुत देर हो चुकी है। लेकिन प्रोफेसर आदित्य ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मैदान में गिरा हुआ इंसान फिर उठ सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ नहीं। तुम हार के इतने करीब हो कि अगली कोशिश जीत की होगी।"

पारस ने अपनी कमियों पर काम किया। उसने अपनी भाषा, अपने दृष्टिकोण और अपने प्रशासनिक कौशल को निखारा। इस बीच बंसीराम बीमार पड़ गए, घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, लेकिन पारस ने हार नहीं मानी। वह दिन में ट्यूशन पढ़ाता और रात भर पढ़ाई करता।

अंततः, वह दिन आ ही गया जिसका पूरे गाँव को इंतजार था। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का परिणाम घोषित हुआ। पारस ने न केवल परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि पूरे देश में 25वीं रैंक हासिल की।

जब वह लाल बत्ती की गाड़ी (प्रतीकात्मक रूप से अब प्रशासनिक पद) से अपने गाँव पहुँचा, तो पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। बंसीराम की आँखों में खुशी के आँसू थे। पारस सीधे अपने पिता के पास गया और उनके फटे हुए हाथों को चूम लिया। लेकिन उसकी यात्रा यहाँ पूरी नहीं हुई थी। वह तुरंत शहर गया और प्रोफेसर आदित्य के चरणों में गिर पड़ा।

प्रोफेसर ने उसे गले लगाकर बस इतना कहा, "पारस, याद रखना, एक अधिकारी कलम से नहीं, बल्कि अपने चरित्र से बड़ा होता है। जिस भटकाव ने तुम्हें गिराया था, वह तुम्हें दूसरों को उठाने की प्रेरणा देगा।"


कहानी का सार

पारस की कहानी हमें यह सिखाती है कि:

  1. संगत का असर: गलत मित्र आपकी क्षमता को नष्ट कर सकते हैं।

  2. गुरु की महत्ता: एक सही मार्गदर्शक पत्थर को भी हीरा बना सकता है।

  3. आत्म-बोध: अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।

  4. दृढ़ता: सफलता वक्त माँगती है, और जो अंत तक टिका रहता है, वही विजेता बनता है।

आज पारस एक ईमानदार जिलाधिकारी के रूप में जाना जाता है, जो भटके हुए युवाओं को सही राह दिखाने के लिए विशेष कार्यशालाएं चलाता है। उसकी जिंदगी का उतार-चढ़ाव अब हज़ारों युवाओं के लिए एक मशाल बन चुका है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम 

ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

 ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

प्रवेश हमेशा चुप रहता था।
इतना चुप कि कई बार लोग उसके होने या न होने में कोई अंतर ही महसूस नहीं करते थे।
वह न तो ज़्यादा हँसता था, न ग़ुस्सा करता था, न ही अपनी बात किसी से खुलकर कह पाता था। उसकी आँखें बहुत कुछ कहती थीं, पर होंठ जैसे हमेशा किसी अनदेखे डर से सिले रहते थे।
प्रवेश के पिता, शैलेश कुमार, एक साधारण कर्मचारी थे। माँ, मीरा देवी, बेटे को देखकर अक्सर चिंतित हो जातीं। छोटा भाई उत्साही था, बहन चंचल। बस प्रवेश ही था—शांत, संकोची और भीतर सिमटा हुआ।
“यह लड़का कभी बोलेगा भी?”
पिता कभी–कभी झुंझलाकर कह देते।
माँ धीरे से समझातीं—
“इसे डाँटो मत, ये वैसे ही भीतर से सहमा रहता है।”
स्कूल में भी प्रवेश अलग-थलग रहता। शिक्षक उसे मेधावी मानते थे, पर मंच पर बोलने के लिए कहो तो उसके हाथ काँपने लगते। शब्द गले में अटक जाते।
बच्चे कभी–कभी उसका मज़ाक उड़ाते—
“देखो, फिर चुप हो गया!”
प्रवेश सुनता था, लेकिन कुछ कह नहीं पाता था।
रात को जब सब सो जाते, प्रवेश छत पर बैठकर आसमान देखता। उसे लगता, जैसे सितारे उससे बातें कर रहे हों।
उसकी डायरी ही उसकी सबसे अच्छी मित्र थी। उसमें उसने लिखा था—
“मैं बोलना चाहता हूँ, लेकिन जब मुँह खोलता हूँ तो शब्द डर जाते हैं।”
परिवार को उसकी चिंता थी। माँ को डर था कि दुनिया उसकी इस ख़ामोशी का फ़ायदा न उठा ले।
एक दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। बिजली बार–बार चमक रही थी। गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर थी।
रात के लगभग दस बजे अचानक पूरे इलाके की बिजली चली गई।
कुछ देर बाद बाहर से शोर सुनाई दिया—
“बचाओ! कोई है?”
आवाज़ काँपती हुई थी।
प्रवेश की धड़कन तेज़ हो गई।
पिता ने दरवाज़ा खोला। सामने अँधेरे में कुछ लोग भागते दिखे।
“नदी का बाँध टूट गया है!”
“नीचे की बस्ती में पानी घुस रहा है!”
घर में अफ़रातफ़री मच गई।
माँ ने बच्चों को भीतर कर लिया। पिता मदद के लिए बाहर निकलने लगे।
प्रवेश चुपचाप खड़ा सब देख रहा था। उसके मन में कुछ अजीब-सा चल रहा था। डर… और साथ ही कोई अनजानी शक्ति।
बहुत कम लोग जानते थे कि प्रवेश को तैरना आता था—बहुत अच्छा तैरना।
बचपन में उसके नाना उसे नदी में ले जाते थे। पर एक हादसे के बाद नाना नहीं रहे, और प्रवेश ने कभी किसी को इस बारे में बताया ही नहीं।
उस रात नदी का पानी गाँव की ओर बढ़ रहा था।
तभी किसी ने चिल्लाकर कहा—
“बस्ती में एक बच्चा फँस गया है!”
चारों ओर सन्नाटा छा गया।
सब लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
प्रवेश का दिल ज़ोर–ज़ोर से धड़कने लगा।
उसके भीतर वर्षों से दबी आवाज़ अचानक चीख उठी—
“अगर अब नहीं, तो कभी नहीं!”
अचानक वह आगे बढ़ा।
पहली बार उसने ऊँची आवाज़ में कहा—
“मैं जाऊँगा।”
सब चौंक गए।
माँ की आँखें फैल गईं—
“प्रवेश…?”
पिता बोले—
“तुम? लेकिन…”
प्रवेश ने पहली बार किसी की बात बीच में काटी—
“मुझे तैरना आता है।”
अँधेरी, उफनती नदी। तेज़ बारिश। लोग दुआ कर रहे थे।
प्रवेश पानी में उतर गया।
हर सेकंड भारी लग रहा था। कोई नहीं जानता था कि वह ज़िंदा लौटेगा या नहीं।
कुछ लोग बोले—
“ये तो बोलता ही नहीं था, इतना साहस कहाँ से आया?”
पानी का बहाव बहुत तेज़ था। प्रवेश को कई बार लगा कि वह बह जाएगा।
पर उसे उस बच्चे की याद आ रही थी, जो शायद इस समय डर से काँप रहा होगा।
आख़िरकार उसने बच्चे को देखा—एक टूटी छत पर फँसा हुआ।
प्रवेश ने चिल्लाकर कहा—
“डरो मत! मैं आ गया हूँ!”
वह खुद भी चौंक गया—वह बोल पा रहा था।
कुछ ही देर में प्रवेश बच्चे को सुरक्षित लेकर लौट आया।
गाँव में जैसे जान आ गई।
माँ उसे गले लगाकर रो पड़ीं। पिता की आँखों में गर्व था।
उस घटना के बाद प्रवेश वही नहीं रहा।
अब वह कम बोलता था, लेकिन जब बोलता—तो सार्थक।
स्कूल में उसे सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। सबको आश्चर्य हुआ, जब उसने बिना हिचक एक प्रेरक भाषण दिया।
उसने कहा—
“ख़ामोशी कमज़ोरी नहीं होती। कभी–कभी वही हमारी सबसे बड़ी ताक़त होती है।”
आज प्रवेश आपदा प्रबंधन से जुड़ा है। वह बच्चों को तैरना सिखाता है। डर से लड़ना सिखाता है।
जो लड़का अपनी बात कह नहीं पाता था, वह आज दूसरों को आवाज़ देता है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”