लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Sunday, 18 October 2020

वक़्त के कैनवास पर

 वक़्त के कैनवास पर     


वक़्त के कैनवास पर जिन्दगी का

एक हसीं कोलाज हो रोशन

 

प्रेम के हवनकुंड में विश्वासरूपी

आहुति से जिन्दगी हो रोशन

 

रिश्तों की मर्यादा से सामाजिक परिवेश का

एक खुशनुमा गुलशन हो रोशन

जिन्दगी का प्रेमराग जिन्दगी के

हर पल को करें रोशन

 

प्रकृति के अलंकरणों से कायनात की

हर एक रूह हो रोशन

 

मुहब्बत की खुशबू से

हर एक आँगन का आँचल हो रोशन

 

वात्सल्य की पावन अनुभूति से

हर एक माँ का आँचल हो रोशन

 

सत्य की राह से जिन्दगी के

मोक्ष की राह हो रोशन


सब यहीं धरा रह जाएगा

                                                    सब यहीं धरा रह जाएगा

 

सब यहीं धरा रह जाएगा

तू साथ क्या ले जाएगा

 

फिर रौब किस बात का

न सिकंदर रहा न अकबर रहा

 

क्या कार क्या मकान क्या

अच्छी चल रही दुकान क्या

 

क्यों भागता तू फिर रहा

आखिर अंत क्या तू पाएगा

 

मन से तू राग द्वेष छोड़

हो सके तो सबको गले लगा

 

चार दिन की जिन्दगी

तू साथ क्या ले जाएगा

 

रिश्तों से पीछा छोड़कर

कहाँ तक तू भाग पायेगा

 

यूं ही अकेला रह जाएगा

यूं ही अकेला मर जाएगा

 

अपनों का दामन छोड़ न

रिश्तों से मुंह तू मोड़ न

 

पीछे जो मुड़कर देख लेगा

हाथ न कुछ आएगा

 

राम क्या अल्लाह क्या

सभी ने हमको एक राह दी

 

तू धर्म के नाम पर लड़ रहा

क्या ख़ाक मोक्ष तू पायेगा

 

क्यूं करे तू हिन्दू मुसलमां

क्यूं करे तू तेरा मेरा

 

रिश्तों की जो लड़ी न बनी तो

बिखर  - बिखर रह जाएगा

 

जो सत्य का आँचल न हो तो

कैसा जीवन तू पायेगा

 

आध्यात्म की जो छाँव न हो

भटक – भटक रह जाएगा

 

पीर दिल की न मिटेगी

तड़प  - तड़प रह जाएगा

 

सोच अपने अस्तित्व की तू

वर्ना यहीं सड़ जाएगा

 

राह जीवन की संवार तू

वर्ना जंगली हो जाएगा 

Saturday, 29 August 2020

सफ़र खुशियों की तलाश का

 सफ़र खुशियों की तलाश का 


सफ़र खुशियों की तलाश का कभी  ख़त्म ना हो  

जीवन बगिया हरियाली उत्सव , कभी पतझड़ हो जाए 


ख़त्म हो जाए अश्रुओं से सराबोर नेत्रों  की तलाश 

खुशियों का समंदर रोशन हो जिन्दगी रोशन  कर जाए 


आत्मा के उत्सव की इबारतें हों पाकीज़ा 

जिन्दगी का हर पल खुदा की अमानत हो जाए 


जिन्दगी की किताब का कोई पन्ना न हो खाली 

जिन्दगी का हर पल खुशनुमा हो जाए 


जिन्दगी का जश्न हर दिन हर पल बरकरार रहे 

जिन्दगी की हर सुबह - शाम खुदा की अमानत हो जाए 


रिश्तों की खुशबू नगमों की खनक सी हो रोशन 

हर एक शख्स एक दूसरे का मददगार हो जाए 


जिन्दगी  की खुरदुरी सड़क पर न खो जाएँ रिश्ते  

गर रिश्तों को रिश्तों पर एतबार हो जाए 


बीत जाएगा गमे   - दौर एक दिन, ये उन्हें है मालूम 

फिर क्यूं कर जिन्दगी , जिन्दगी पर बोझ हो जाए 











सब कुछ यहीं रह जाएगा

 सब कुछ यहीं रह जाएगा 


सब कुछ यहीं रह जाएगा 

तू साथ क्या ले जाएगा 

जी रहा है भ्रम में क्यूं 

बाद में पछताएगा 


महंगी कारें, महंगी अटारी 

सब कुछ यहीं रह जाएगा 

खुद को जो बस में किया न तूने 

तड़प  - तड़प रह जाएगा 


पाप की गठरी को न ढो 

मिटटी में मिल जाएगा 

क्यूं कर तू खुद को बहलाए  

भ्रम में पडा रह जाएगा 


खुशियों की तलाश के सफ़र का 

अंत नहीं मिल पायेगा 

पल  -  पल गिरेगा 

पल  - पल  मरेगा 


खूब तडपेगा तू 

साथ नहीं कोई जाएगा 

रिश्ते यहीं रह जायेंगे 

साथ कुछ न जाएगा 


क्यूं कर खुशियों का 

अम्बर सजाना चाहता है 

गिरता, उठता और फिर गिरता 

क्या जताना चाहता है 


क्या लाया था जो है खोया  

कुछ न साथ तेरे जाएगा 

तेरे न तेरे साथ होंगे 

अकेला ही तू जाएगा 


नेकियों का लहरा ले परचम 

पाकीजगी को पायेगा 

उस खुदा के दर का एक दिन 

नूर तू कहलायेगा  


जिन्दगी ने एक दिन मुझसे पूछा

 जिन्दगी ने एक दिन मुझसे पूछा 


 जिन्दगी ने एक दिन मुझसे पूछा 

क्या है तेरे होने का मकसद ?

इस प्रश्न  ने 

बहुतेरे प्रश्न  उपजा दिए 

आखिर मुझे मालूम तो 

होना ही चाहिए 

इस धरा पर मेरी 

उपस्थिति का मर्म 

मेरे हर एक कर्म का मर्म 

मेरे हर एक प्रयास की परिणति 


मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं 

मेरे कर्म सुकर्म की भावना से प्रेरित या फिर...............

या यूं ही .........

इस पेट की आग 

और नेत्रों की लालसा में उलझा 

बार  - बार गिरने और 

उठने के प्रयास की विफलता 

या फिर कहें सफलता 

आखिर किसके लिए और क्यों ?


स्वयं, परिवार या सगे सम्बन्धियों के लिए 

आखिर क्या है मेरे होने का मकसद ?

क्या मैंने कभी स्वयं से पूछा 

जीवन का उत्तम मार्ग क्या है ?

या फिर....... 

कौन है वह ...?

जो मुझे इस धरा पर लाया 

क्या मैं उस परम तत्व का अंश हूँ ?

या फिर .....

अनसुलझे प्रश्नों का रहस्य 

गहरा होता जाता है 

जैसे  - जैसे मैं इसके 

भीतर तक प्रवेश करने लगता हूँ 

कौन है वो अदृश्य शक्ति ?

अतिमानवीय शक्ति 

जिसके होने का एहसास /आभास 

मानव रूप में सहज ही हो जाता है 

मेरे चिंतन में कौन विराजे ?

यह एक अति गूढ़ प्रश्न है 

मन चंचल और सोच दुनिया से परे 

बार  - बार दिशा परिवर्तित करने की व्यथा 

बार  - बार असमंजस की स्थिति 

क्यों कर ये भ्रम की स्थिति ?

आखिर स्थिरता का अभाव क्यूं ?


क्यूं कर नहीं हो जाता सब कुछ सामान्य ?

क्यूं  कर पीड़ा का दौर 

समाप्त ही नहीं होता 

क्यूं कर पतन की ओर है 

अग्रसर मानव 

चाहकर भी आध्यात्मिक उत्थान 

जीवन का अभिन्न अंग नहीं रहा 

ऐसा क्या है ?

जिसने बांधकर रखा है इस जीवन को 

क्या वह है ?

लालसा, अभिलाषा, चाह, अतिमहत्वाकांक्षा , कामना 

वो भी 

केवल भौतिक जगत की 

कब रुकेगा ?

यह जीवन का अनैतिक सफ़र 

कब होगा पूर्ण उत्थान ?

पूर्ण उत्थान वो भी आध्यात्मिक 


आइये 

इस प्रश्न  को अपने जीवन का 

अंतिम सत्य समझ 

बढ़ चलें उस 

सत्य की ओर 

जो हमें 

इस भौतिक जगत से परे 

ले चले उस उन्मुक्त गगन की ओर 

जहां चारों ओर 

आध्यात्मिक सुख की छटा 

राह देख रही है हमारा 


आइये 

उस सुखद अनुभूति की ओर 

बढायें  कुछ कदम 

आखिर 

हम हैं मानव 

और हमारा उत्थान 

हमारी प्रथम प्राथमिकता हो 

यही हमारी इस धरा पर हो 

उपस्थिति का अंतिम सत्य 


तो फिर विलंब कैसा .........?





 








अंदाज़े बयाँ


अंदाज़े  - बयाँ

बेवजह बेसबब आँखें नम  हो जाया नहीं करतीं
कभी ख़ुशी कभी गम के साए तले छलक जाती हैं ये

कभी रिश्तों की बज़्म जिन्दगी , कभी जीवन का उल्लास जिन्दगी
कभी ग़मों के साए में उलझती , कभी खुशियों का विस्तार जिन्दगी

आशियाने में हो हरियाली , दिलों में मुहब्बत जगा के रख
जिन्दगी में हो हरियाली , खुद को खुद से बचा के रख


मेरी आँखों का नम होना , मेरे ग़मों का सैलाब नहीं
कभी  - कभी मेरे आंसू मेरे गम में मरहम हो जाया करते हैं


चोरी करने का शौक है तो किसी के गम चुरा के देख
तेरी जिन्दगी को नसीब होगा उस खुदा का करम


तेरी जिन्दगी में खुशियाँ तेरी जिन्दगी का मकसद हो जाएँ 
किसी के गम तेरी जिन्दगी का मकसदे  - इबादत हो जाए


किसी की राह में कांटे नहीं , फूल बिछाकर देखो
गीत इंतकाम के नहीं , मुहब्बत के गुनगुनाकर देखो


उन्हें मालूम ही न था , उनके जीने का सबब
इंसानियत की राह ने उन्हें मकसदे  - जिन्दगी से कराया रूबरू

मुक्ति

 मुक्ति 


स्वयं को मुक्त करने का 

उत्तम अवसर तलाश करो 

जिन्दगी का हर एक पल 

एक सुनहरा अवसर  है 

फिर विलम्ब कैसा 


बढ़ चलो उस 

उन्मुक्त गगन की ओर 

छोड़ सभी 

भौतिक सुविधाएं 

ये विलासिताएं 


आध्यात्मिकता की शरण में 

स्वयं को उस 

परम तत्व में 

बींध लें 


पूर्ण समर्पण 

श्रद्धा और विश्वास को 

धरोहर बनाकर 


बढ़ चलें 

उस गगन की ओर 

जो मूक्ति का 

मार्ग प्रशस्त करे 


चलो आओ चलें 




एक मुकम्मल वतन का ख़्वाब

 एक मुकम्मल वतन का ख़्वाब 


एक मुकम्मल वतन का ख़्वाब लिए जी रहा हूँ मैं 

दिल पर पड़ते घावों को सी रहा हूँ मैं 


क्यूं कर की लोगों ने इस वतन से गद्दारी 

जयचंदों की भीड़ में एक भगत सिंह को ढूंढ रहा हूँ मैं 


देश को नोच  - नोच कर खा लेने को बेताब हैं कुर्सी के चाहने वाले 

राजनीति के गलियारे में एक अदद गाँधी की तलाश कर रहा हूँ मैं 


समाज सेवा को कमाई का गोरख धंधा समझने वालों 

तुम्हारी भीड़ में एक अदद मदर टेरेसा की तलाश में भटक रहा हूँ मैं 


शिक्षा को व्यवसायिक पेशे की उपाधि देने वालों 

राधाकृष्णन सा एक हीरा शिक्षा के बाज़ार में खोज रहा हूँ मैं 


भटकती युवा पीढ़ी पर पड़ रहा आधुनिकता का प्रभाव 

एक अदद विवेकानंद की तलाश में भटक रहा हूँ मैं 


भुला दिए हैं जिन्होंने अपनी संस्कृति और संस्कार 

उस खुदा के आदिल श्रवण की खोज में भटक रहा हूँ मैं 


पीर दिल की नासूर बन  कर सता रही है मुझे 

उस खुदा के एक अदद बन्दे की तलाश में दर  - दर भटक रहा हूँ मैं 




Monday, 3 August 2020

वो पालते हैं हमसे दुश्मनी


वो पालते हैं हमसे दुश्मनी

वो पालते हैं हमसे दुश्मनी भी तो नज़ाकत से
देते हैं ग़मों का भर – भर समंदर भी तो नज़ाकत से

चुरा लेते हैं हमारी सारी खुशियाँ भी तो नज़ाकत से
जुदा होने का एहसास भी  नहीं  होने देते नजाकत से

अपना होने का एहसास भी जगाते हैं तो नज़ाकत से
जी  - जी भर आंसू रुलाते हैं भी तो नजाकत से

दिल के करीब होने का एहसास जगाते है न भी तो नज़ाकत से
अगले ही पल नज़रें फेर लेते हैं  भी तो नज़ाकत से

पीर दिल को बढाते हैं भी तो नजाकत से
नज़रों से गिराते है भी तो नज़ाकत से

आहों का एक समंदर भी रोशन कर जाते हैं तो नज़ाकत से
डूबती नाव को देख वो मुस्कराते हैं भी तो नज़ाकत से


पीर दिल की भुला के मुस्करा ए जिन्दगी


पीर दिल की भुला के मुस्करा ए जिन्दगी

गम और खुशियाँ जिन्दगी के पाक दामन के हैं किस्से
पीर दिल की भुला के मुस्करा ए जिन्दगी

क्यूं कर खुद पर एतबार नहीं तुझे ए जिन्दगी
बीच मझधार उम्मीद की लौ जला ए जिन्दगी

क्यूं कर है तुझे खुशियों से है इतनी मुहब्बत
ग़मों के समंदर के बीच खुद को संवार ए जिन्दगी

दीपक की लौ देती है कुछ सिला ए मेरे दोस्त
दूस्रोंन के पाक दामन को खुशियों न से सजा ए जिन्दगी

गिरने  - उठने का खेल ताउम्र है चलता रहता
गिरने के बाद फिर उठ खड़े होने का एहसास जगा ए जिन्दगी

पत्ते को साख से गिरना है एक दिन , ये उसे है मालूम
आंसुओं के समंदर से उम्मीद की आस जगा ए जिन्दगी

क्यूं कर टूट जाए ये रिश्तों की लड़ी
सबके दिलों में मुहब्बत का एहसास जगा ए जिन्दगी

क्यूं कर इंसानियत की राह पर पसर जाए सन्नाटा
गिरतों को उठाने का जज्बा जगा ए जिन्दगी

क्यूं कर पिए जा रहे हैं वो जाम पर जाम
जिन्दगी से मुहब्बत करने का सिला सिखा ए जिन्दगी

क्यूं कर कुदरत से खिलवाड़ को कर लिया उन्होंने अपनी जिन्दगी का सबब
कोरोना के इस दौरे – सुनामी से लोगों को बचा ए जिन्दगी