लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |
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Saturday, 8 July 2023

बस जाओ मेरे मन में

 बस जाओ मेरे मन में , स्वामी होकर हे गिरधारी

बस जाओ मेरे मन में , स्वामी होकर हे गिरधारी
धर्म राह पर ले चल मुझको , हे मुरलीधर हे बनवारी

तुम करुणा के सागर मेरे , बस जाओ मन में त्रिपुरारी
चरण कमल तेरे सब अर्पण , जीवन से तारो बनवारी

निष्ठुर होकर भुला न देना , चरण कमल जाऊं बलिहारी
चरण कमल में ले लो हमको , पुण्य करो जीवन गिरधारी

अभिलाषा बस इतनी मेरी , मुझको दरश दे दो बनवारी
मुश्किल में है नैया मेरी , पार लगा दो हे गिरधारी

हे पावन परमेश्वर मेरे , कर दो मुझको तुम संसारी
रत्नाकर सा ह्रदय हो मेरा , कुछ ऐसा कर दो बनवारी

मैं तेरे चरणों में आकर , हो जाऊं बलिहारी
उपकार तेरा मुझ पर हो इतना , हे मुरलीधर हे गिरधारी

तुझको पाकर जीवन मेरा , खिल जाए हो बनवारी
मुझको जीवन पार लगा दो , हे मुरलीधर हे बनवारी

बस जाओ मेरे मन में , स्वामी होकर हे गिरधारी
धर्म राह पर ले चल मुझको , हे मुरलीधर हे बनवारी

कागज़ की नाव सी, न हो जिन्दगी तेरी

 कागज़ की नाव सी, न हो जिन्दगी तेरी


कागज़ की नाव सी ,न हो जिन्दगी तेरी
मांझी की पतवार सी , हो जिन्दगी तेरी

बंज़र ज़मीं सी ,न हो जिन्दगी तेरी
फूलों की खुशबू की मानिंद ,हो जिन्दगी तेरी

ज़मीं पर यूं ही ,न रहें कदम तेरे
आसमां को छूती ,जिन्दगी हो तेरी

विचारों पर तेरे पाश्चात्य का ,प्रभाव न पड़े
संस्कृति , संस्कारों से, पल्लवित हो जिन्दगी तेरी

किस्सा न हो जाएँ ,सभी प्रयास तेरे
आदर्श मार्ग निर्मित ,हो जिन्दगी तेरी

यूं ही न बीत जाए, जिन्दगी तेरी
दूर सीमा पर देश की ढाल, हो जिन्दगी तेरी

यूं ही सिसक- सिसक कर ,न बीते जिन्दगी तेरी
औरों के ग़मों को ढोती ,हो जिन्दगी तेरी

कागज़ की नाव सी ,न हो जिन्दगी तेरी
मांझी की पतवार सी ,न हो जिन्दगी तेरी

कागज़ की नाव सी ,न हो जिन्दगी तेरी
मांझी की पतवार सी , हो जिन्दगी तेरी

बंज़र ज़मीं सी ,न हो जिन्दगी तेरी
फूलों की खुशबू की मानिंद ,हो जिन्दगी तेरी

फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है

फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है


फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है

भाई अपने भाई से, जुदा हो गया है |

रिश्तों की मर्यादा ने , सीमाएं लांघ दी हैं
इंसानियत का जज़्बा , लहुलुहान हो गया है |

आधुनिकता की अंधी दौड़ में , इंसान गुम हो गया है
सुविधाओं के बवंडर में , मानव कहीं लोप हो गया है |

जीवन अजीब सी दौड़ का , पर्याय हो गया है
धर्म पर राजनीति का , कब्ज़ा हो गया है |

राष्ट्र के प्रति समर्पण , दिखावा हो गया है
राष्ट्र के सपूतों का निरादर , आम हो गया है |

नेताओं की कुटिल चालों से घायल , आमजन हो गया है
झूठ का बोलबाला , सत्य कहीं वीराने में खो गया है |

आँखों में शर्म का , अभाव हो गया है
संस्कार स्वयं के अस्तित्व पर , रो रहा है |

फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है
भाई अपने भाई से, जुदा हो गया है |

देशप्रेम का गाते हैं वो गीत

 देशप्रेम का गाते हैं वो गीत

(व्यंग्य)

देशप्रेम का गाते हैं वो गीत
केवल पैसे से है उनको प्रीत
देते हैं नारा भाईचारे का
जनता को बना देते हैं बेचारे सा
बड़े  - बड़े वादों में ये मशगूल
जनता को बेवकूफ बनाना इनका शगल
घोटालों से रहा इनका नाता
कोई भी शरीफ व्यक्ति इन्हें नहीं भाता
इनकी चालों का है अजब मायाजाल
कुर्सी पाते ही हो जाते हैं निहाल
इनका अपना कोई धर्म नहीं
भाता इनको पराया धर्म नहीं
राष्ट्रवाद का लगाते हैं ये नारा
देशप्रेम से इनका नहीं कोई नाता
इन्हें रहती है केवल अपनी चिंता
तैयार करते है ये अपने दुश्मनों की चिता
इन्हें अपनी राजनीतिक रोटियाँ सकने से है मतलब
इन्हें जनता की परेशानियों से क्या मतलब
लूटते हैं देश को , जनता को करते हैं गुमराह
हर  - पल , हर – क्षण करते हैं ये गुनाह
ये कैसी राजनीति की माया है
जिसे बेचारा वोटर समझ नहीं पाया है
वोटर जिस दिन कूटिल राजनीति का सत्य समझ जाएगा
अपने वोट से गजब का भूचाल लाएगा
रह जायेगी नेताओं की हर चाल धरी
न रहेंगे नेता और न रहेगी उनकी नेतागिरी
देश में वोटर का परचम लहराएगा
देश विकास की राह पर आ जाएगा
निपट जायेंगे सारे अधूरे काम
दुनिया में होगा हमारे देश का नाम

खिलेंगे फूल राहों में

 खिलेंगे फूल राहों में

खिलेंगे फूल राहों में
ज़रा दो कदम तो चल
बिछेंगे फूल राहों में
ज़रा दो कदम तो चल

कौन कहता है सुबह होगी नहीं
हौसलों को तू अपने
आसमां की उड़ान पर लेकर चल

रुकना नहीं है तुझको बीच राह में
मंजिल को अपने जिगर में बसा के चल

खुशबू से महकेगा आँचल
किसी को अपना बना के चल

किस्से जहां में यूं ही एहसास नहीं देते
किसी की राह के कांटे चुरा के चल

बेफिक्री में तू यूं ना जी
किसी के गम अपने जिगर में बसा के चल

तेरा नसीब बुलंदी पाए
दो फूल इंसानियत के खिला के चल

मुझे लोग खुदा का नूर कहें
दो वक़्त की नमाज़ अता कर के चल

खिलेंगे फूल राहों में
ज़रा दो कदम तो चल

बिछेंगे फूल राहों में
ज़रा दो कदम तो चल

खुशकिस्मत है कि तू उस परमात्मा की कृति है

 खुशकिस्मत है कि तू उस परमात्मा की कृति है

खुशकिस्मत है कि तू उस परमात्मा की कृति है
खुशकिस्मत है कि तुझ पर उसके करम का साया है

खुशकिस्मत है तू कि तू उसकी राजा से यहाँ आया है
माँ लेगा जो तू उसकी सत्ता को , तुझ पर उसके करम का साया है

बनकर फूल तुझको इस जहां में खिलना है
इस चमन का नूर बनकर तुझे यहाँ संवारना है

राहों को आसान कर तुझे मंजिल पाना है
ये जहां तेरी कर्म राह का ठिकाना है

निर्बाध तू बढ़ता जाए इस जहां में
तुझे ही तो आदर्श की गंगा बहाना है

तुझे पीछे चलना नहीं किसी के
तुझे लोगों को अपने पीछे लाना है

कि मौसमे बहार में पतझड़ भी आता है
तुझे सावन बन पतझड़ पार जाना है

किस्सा नहीं बनना तुझको इस जहां में
खींचनी है आदर्शों की रेखा तुझको

कि कुछ तस्वीरें ऐसी तुझे बनानी हैं
जिनमे केवल जीवन ही जीवन रवानी है

कि गिरते हैं वो मुसाफिर जीवन की राह में
जिनकी आँखों का सपना मंजिलें नहीं होतीं

तू वो रचना है उस खुदा की इस जहां में
जिसे नए – नए आयाम स्थापित करके जाना है

कि तू वो सवार नहीं जो ज़रा सी आँधियों से डर जाए
तू तो वो शै है जिसे तूफ़ान को भी हराना है

मस्त चाल से जो तू बढ़ता जाएगा
आसमां भी तेरी कामयाबी पर शरमायेगा

चाँद सितारे देंगे दुआयें तुझको
तेरे प्रयासों से एक और चाँद धरती पर खिल जाएगा

खुशकिस्मत है कि तू उस परमात्मा की कृति है
खुशकिस्मत है कि तुझ पर उसके करम का साया है

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं

 खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं
खुशनुमा – खुशनुमा सा लग रहा है आसमां

चारों तरफ फूल खिलखिलाने लगे हैं
पंक्षी भी मधुर स्वर में गुनगुनाने लगे हैं

खिली – खिली सी लग रही है फिज़ां
आसमां भी मंद – मंद पवन बहाने लगे हैं

पूछते हैं हाल मेरा वो क्यों कर
क्या वो मुझ पर तरस खाने लगे हैं

किनारा कर जो खुश हुए मुझसे
वो आज मुझ पर प्यार क्यों लुटाने लगे हैं

गली में उनकी हमने जाना छोड़ दिया
वो क्यों मेरी गली के चक्कर लगाने लगे हैं

दौलत से कभी हमने मुहब्बत थी ही नहीं
वो आज हम पर अपनी दौलत क्यों लुटाने लगे 

जीने मरने की कसमें खाया करते थे वो
आज वो दूसरों का घर क्यों बसाने लगे हैं 

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं
खुशनुमा – खुशनुमा सा लग रहा है आसमां

चारों तरफ फूल खिलखिलाने लगे हैं
पंक्षी भी मधुर स्वर में गुनगुनाने लगे हैं

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया
हम भी हैं नाखुश , अपनेपन का दौर गया

नाइंसाफी का दौर नया , नाउम्मीदी का शोर नया
नाकाबिल चरित्रों का दौर नया , नफरतों का दौर नया

पी रखी है सभी ने दो घूँट , नाफ़रमानी की
नादानी कर रहे सब , कामचोरों का दौर नया

वसंत आने के पहले पतझड़ का मौसम आया
नामुमकिन को मुमकिन कहने का दौर नया

पसंद है जिन्हें दूसरों पर बेइंसाफी का दौर
इन इंसानियत के तलबगारों का दौर नया

नियाज करते हैं उस खुदा से वो “अनिल”
उस खुदा के चाहने वालों का दौर नया

निस्बत थी उस खुदा से उसके चाहनेवालों की
अब क्या कहें इन दौलत के ठेकेदारों का दौर नया

फुर्सत नहीं है उन्हें दो वक़्त इबादत कर लें
नाशुक्रों का आया है कैसा ये दौर नया

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया
हम भी हैं नाखुश , अपनेपन का दौर गया

सत्य से सबका परिचय कराएं आओ कुछ ऐसा करें

सत्य से सबका परिचय कराएं आओ कुछ ऐसा करें

सत्य से सबका परिचय कराएं आओ कुछ ऐसा करें
सिंहासन डोल जाएँ आओ कुछ ऐसा करें

वीरों के लहू का कतरा – कतरा देश काम आए
दिलों में देश प्रेम का ज़ज्बा जगाएं आओ कुछ ऐसा करें

प्रकृति को सुनामी से बचाएं आओ कुछ ऐसा करें
इस धरा को भूकंप से बचाएं आओ कुछ ऐसा करें

आओ निर्माण करें ऊपजाऊ सामाजिक परिदृश्य का
आग्नेयास्त्र से विहीएँ धरा का निर्माण हो आओ कुछ ऐसा करें

आप्राकृतिक कृत्यों से इस धरा को बचाएं आओ कुछ ऐसा करें
आस्तिक चरित्रों का समंदर हो जाए ये समाज आओ कुछ ऐसा करें

मनुष्य इस धरा की अमूल्य निधि हो जाए आओ कुछ ऐसा करें
आदरणीय हो जाएँ सभी चरित्र आओ कुछ ऐसा करें

अनुकरणीय विचारों से सभी हों आमोदित आओ कुछ ऐसा करें
अभिनन्दन हो सभी चरित्रों का आओ कुछ ऐसा करें

अजातशत्रु हो जाएँ सभी इस धरा पर आओ कुछ ऐसा करें
मोक्ष मार्ग प्रस्थित हों सभी आओ कुछ ऐसा करें

सत्य से सबका परिचय कराएं आओ कुछ ऐसा करें
सिंहासन डोल जाएँ आओ कुछ ऐसा करें

कुछ काम करो , कुछ काम करो

 कुछ काम करो , कुछ काम करो

जग में अपना नाम करो
भाग्य भरोसे मत बैठो तुम
कुछ काम करो , कुछ काम करो

आगे बढ़ना नियति तुम्हारी
कर्म राह प्रधान करो तुम
कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में अपना नाम करो

संकट जीवन में जो आए
कभी ना तू उससे घबराए
जीवन को प्रणाम करो तुम
जग में अपना नाम करो तुम

निंदा में तुम यूं ना उलझो
कठोर वचन तुम यूं ना बोलो
सबका तुम सम्मान करो
सत्कर्म मन ध्यान धरो

कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में अपना नाम करो
भाग्य भरोसे मत बैठो तुम

कुछ काम करो , कुछ काम करो

अपने चरणों की धूलि बना लो

अपने चरणों की धूलि बना लो 

अपने चरणों की धूलि बना लो 
हे त्रिपुरारी हे बनवारी 

अभिलाषा पूरी करो मेरी 
चरण कमल जाऊं बलिहारी 

निर्मल , पावन हो मेरी काया 
अहंकार की पड़े ना छाया 

मेरा भाग्य बनाओ बनवारी
हे त्रिपुरारी हे बनवारी 

सलिला सा पावन हो जीवन 
रत्नाकर सा हो मेरा मन

बैरागी सा हो अंतर्मन 
राग भक्ति का जगाओ गिरिधारी 

शुभचिंतक हो जाऊं सबका 
दास बनूँ मैं तेरे दर का 

सूर्य सा तेज भरो हे मुरारी
हे त्रिपुरारी हे बनवारी 

वायु सा पावन मुझे कर दो 
मुझको ज्ञान का वर दो 

हंसवाहिनी कृपा करे बनवारी 
हे त्रिपुरारी हे बनवारी

Friday, 13 January 2023

नेता


नेता

अपने लिए जिए , जिए तो क्या जिए नेता
जीना है तो जी तू , जनता के लिए

सच के साए में , जीना तू सीख ले
खोल खजाने ,जनता के लिए

क्यूं कर तू चंदा मांगे , पार्टी के लिए
जीना है तो जी तू देश के लिए

क्यूं कर रोज गिरता तू , खुदा की निगाह में
खुद को कर बुलंद , खुदा की निगाह में

क्यूं कर हैं सारी कोशिशें , अमीरों के लिए
कुछ कोशिश कर , तू जनता के लिए

शक्ति के मद में तू, अनुचित न कर
अपराधियों को तू , अपनी शरण में क्यूं रखे

समानता का अधिकार तू , जनता को भी दे
अपने अहंकार में खुद को तू, खुदा न समझ

नेता हो तो , देश सेवा को सर्वोपरि समझो
सत्ता के लोभ में तू, यूं न न फंस

लोगों के दुःख को , अपना दुःख समझ
यूं तू गरीबों की मजबूरी का ,मज़ाक न बना

जीना है तो जी, तू देश के लिए
क्यूं कर तू जाने  - अनजाने अपराध करे

अपने लिए जिए , जिए तो क्या जिए नेता
जीना है तो जी तू , जनता के लिए

पीर दिलों की मिटायें, चलो एक ऐसा नया जहां बसायें

पीर दिलों की मिटायें, चलो एक ऐसा नया जहां बसायें

पीर दिलों की मिटायें, चलो एक ऐसा नया जहां बसायें l
पलती हों जहां खुशियाँ, चलो एक ऐसा आशियाँ सजाएँ ll

हर एक चहरे पर हो मुस्कान, ना हो ग़मों का कोई निशान l
फेहरे जहां संस्कृति, संस्कारों का परचम, चलो एक ऐसा उपवन सजाएँ ll

जहां ना हो कोई कुटिल राजनीति का शिकार, ना ही अंधभक्ति सिर चढ़कर बोले l
सादा हो जीवन, सदविचारों से पुष्पित, चलो एक ऐसा गुलशन सजाएँ ll

जहां ना हो कोई नवजात, कूड़े के ढेर का हिस्सा l
चलो मातृत्व के वात्सल्य से पोषित एक खूबसूरत जहां बसायें ll

भाई को भाई से हो मुहब्बत, रिश्तों में पावनता झलके l
चलो पारिवारिक संस्कृति और संस्कारों का परचम लहरायें ll

हो चहरों पर मुस्कान, दिलों में ना गिला शिकवा हो l
चलो आपसी मुहब्बत से रोशन एक आशियाँ सजाएँ ll

जहां राम ना रहीम को लेकर हो वैमनस्य मन में l
चलो राम और रहीम की पावन छवि से अपना आशियाँ सजाएँ ll

एक ऐसा जहां ना पलती हो राजनीति, ना हो धर्म पर अंधविश्वास l
अपनी इस धरा को, उपवन को एक खूबसूरत उपवन बनाएं ll

पीर दिलों की मिटायें, चलो एक ऐसा नया जहां बसायें l
पलती हों जहां खुशियाँ, चलो ऐसा आशियाँ सजाएँ ll

Friday, 20 May 2022

गैरों की क्या बात करें

 गैरों की क्या बात करें

अपने ही हुए पराये बैठे हैं
कल तक जो बातें करते थे
आज मुंह फुलाए बैठे हैं

हमें देख कभी जो मुस्काते थे
आज मुंह घुमाए बैठे हैं
पीड़ा में जिनकी हम सहभागी थे
वो आज हमारी पीड़ा बन बैठे हैं

जिनके गम में हम साये थे
हमारे ग़मों का समंदर बन बैठे हैं
जिनके सुख – दुःख के हम भागी थे
वे ही दुःख का अम्बर बन बैठे हैं

जिनके लिए हम कल – कल करती सलिला थे
वे ही हमारे जीवन में दलदल का सागर सजा बैठे हैं
उनकी पीर को हम अपनी पीर समझते हैं
हमारी खुशियों पर नज़र गड़ाकर बैठे हैं

किसको समझाएं , कैसे समझाएं
अपने ही पराये हुए बैठे हैं
ऊपर मन से हमें वो अपना कहते
भीतर ही भीतर घात लगाए बैठे हैं