नीली स्क्रीन का साया
रात के बारह बज रहे थे।
घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था। बाहर सर्द हवा पेड़ों की सूखी पत्तियों को हिलाकर अजीब-सी सरसराहट पैदा कर रही थी। कमरे में केवल एक चीज़ चमक रही थी—मोबाइल की नीली स्क्रीन।
आरव, सातवीं कक्षा का छात्र, अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी थीं। माँ-पापा सो चुके थे, बहन भी। लेकिन आरव की दुनिया उस छोटे से मोबाइल में कैद थी।
“बस एक रील और… बस एक वीडियो और…”
वह खुद से कहता और उँगलियाँ स्क्रीन पर सरकती जातीं।
अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमक उठी।
एक नया अकाउंट सामने आया—
“नीलाया_1890”
प्रोफाइल फोटो में एक धुँधली-सी लड़की थी, नीली आँखें और बेहद फीकी मुस्कान।
कुछ ही सेकंड में उस अकाउंट से मैसेज आया—
“तुम भी रात में जागते हो?”
आरव चौंक गया।
“हाँ… तुम कौन हो?” उसने टाइप किया।
उत्तर आया—
“मैं भी तुम्हारी तरह अकेली हूँ।”
आरव को अजीब लगा, फिर भी उसे अच्छा लगा कि कोई उससे बात कर रहा है। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती गई। नीलाया को पता था कि आरव कौन-सा गेम खेलता है, कौन-सी क्लास में है, किस स्कूल में पढ़ता है।
“तुम्हें ये सब कैसे पता?” आरव ने पूछा।
मैसेज आया—
“मैं सब देखती हूँ।”
उस रात के बाद नीलाया रोज़ ऑनलाइन आने लगी। आरव स्कूल से आते ही मोबाइल खोल लेता। न होमवर्क, न खेल, न परिवार से बातें।
धीरे-धीरे अजीब बातें होने लगीं।
मोबाइल अपने आप ऑन हो जाता।
रात में नोटिफिकेशन बजता।
कभी-कभी स्क्रीन पर नीली रोशनी फैल जाती, जैसे कोई उसे देख रहा हो।
एक रात नीलाया ने लिखा—
“तुम मुझे मिलना चाहोगे?”
आरव ने उत्सुकता से हाँ कर दी।
“तो कल रात 12 बजे पुराने कुएँ के पास आना।”
वह कुआँ गाँव के बाहर था—जहाँ कोई नहीं जाता था। कहा जाता था कि वहाँ कभी एक लड़की गिरकर मर गई थी।
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पुराने कुएँ की रहस्यमयी रात
अगली रात आरव चुपचाप घर से निकल पड़ा।
कुएँ के पास पहुँचते ही ठंडी हवा चलने लगी। चारों ओर अंधेरा था।
“नीलाया?” उसने काँपती आवाज़ में पुकारा।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट हुई।
वह मुड़ा तो देखा—नीली साड़ी पहने एक लड़की, बेहद पीली त्वचा, और आँखों में अजीब चमक।
“तुम आ गए…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
आरव डर गया, लेकिन उत्सुकता ने उसे रोक लिया।
“तुम… ऑनलाइन वही हो न?”
लड़की मुस्कराई।
“हाँ… मैं वही हूँ।”
तभी अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें पता है, मैं कैसे मरी थी?”
आरव ने सिर हिला दिया।
“मैं भी मोबाइल में ही खोई रहती थी। माँ-पापा बुलाते थे, दोस्त बुलाते थे… लेकिन मैं स्क्रीन में डूबी रहती थी। एक रात यहाँ वीडियो देखते-देखते पैर फिसल गया… और मैं गिर गई।”
कुएँ से ठंडी हवा का झोंका आया।
लड़की की आवाज़ बदलने लगी—
“और अब मैं उन बच्चों को ढूँढती हूँ जो मेरी तरह खो जाते हैं…”
अचानक उसका चेहरा विकृत हो गया।
नीली आँखें चमक उठीं।
“तुम भी मेरे साथ रहोगे!”
वह आरव की ओर बढ़ी।
आरव डरकर पीछे हटा और फिसल गया।
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नीली स्क्रीन का जादू
आरव ने आँखें खोलीं तो खुद को अपने कमरे में पाया।
सब कुछ सामान्य था।
“क्या वह सपना था?” उसने सोचा।
तभी मोबाइल बज उठा।
नीलाया_1890 ऑनलाइन थी।
मैसेज आया—
“आज भी आओगे?”
आरव के हाथ काँप गए।
उसे लगा कोई उसे लगातार देख रहा है।
स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा। दोस्तों ने कहा—
“तू पहले हमारे साथ खेलता था, अब बस फोन देखता रहता है।”
माँ ने डाँटा—
“आरव, पढ़ाई पर ध्यान दो।”
लेकिन वह फिर भी मोबाइल में उलझा रहा।
उस रात मोबाइल की स्क्रीन से नीली रोशनी निकलने लगी।
धीरे-धीरे कमरे में ठंड फैल गई।
एक साया दीवार पर उभरा।
नीलाया का चेहरा सामने था।
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
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सच का सामना
डर के मारे आरव ने मोबाइल फेंक दिया।
वह सीधे माँ-पापा के कमरे में भागा और सब बता दिया।
पापा गंभीर हो गए।
अगले दिन वे उसे उस कुएँ के पास ले गए।
वहाँ एक बूढ़े चौकीदार ने बताया—
“सालों पहले यहाँ एक लड़की गिरकर मर गई थी। वह हमेशा मोबाइल में लगी रहती थी। किसी से बात नहीं करती थी।”
आरव को सिहरन हो गई।
पापा ने समझाया—
“बेटा, मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसका गलत इस्तेमाल खतरनाक है। इससे लोग अपनों से दूर हो जाते हैं।”
माँ ने कहा—
“हमारे साथ समय बिताओ, असली दुनिया देखो।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसे समझ आ गया कि वह धीरे-धीरे उसी राह पर जा रहा था।
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नई शुरुआत
उस दिन के बाद आरव ने मोबाइल का समय कम कर दिया।
वह दोस्तों के साथ खेलने लगा।
माँ-पापा से बातें करने लगा।
किताबें पढ़ने लगा।
एक दिन अचानक मोबाइल में नोटिफिकेशन आया।
नीलाया_1890 ने अंतिम संदेश भेजा—
“तुम बच गए… काश मैं भी बच पाती।”
फिर वह अकाउंट गायब हो गया।
उस रात आरव ने चैन की नींद सोई।
संदेश (बच्चों के लिए)
सोशल मीडिया और मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम उनमें जरूरत से ज्यादा डूब जाएँ, तो हम अपने परिवार, दोस्तों और असली दुनिया से दूर हो जाते हैं। कभी-कभी यह दूरी खतरनाक भी हो सकती है।
मोबाइल का इस्तेमाल करें, लेकिन मोबाइल के गुलाम न बनें।
अपनों के साथ समय बिताएँ, खेलें, सीखें और असली दुनिया को अपनाएँ।
क्योंकि असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
आपके आसपास की दुनिया में है।
अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”
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