लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |
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Tuesday, 14 July 2026

एकता का रहस्य - कहानी

 एकता का रहस्य

बरसों पुराना एक सुंदर गाँव था—हरितपुर। चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, आम और पीपल के विशाल वृक्ष, चहचहाते पक्षी और मेहनती लोगों से भरा यह गाँव अपनी खुशहाली के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

इसी गाँव में रामप्रसाद का परिवार रहता था। परिवार में उनकी पत्नी सरस्वती, बड़े बेटे मोहन, छोटे बेटे सोहन, बेटी गीता, बहुएँ सीमा और राधा, तथा चार प्यारे-प्यारे बच्चे थे। पूरा परिवार एक ही आँगन में रहता था। सुबह सब मिलकर काम करते, दोपहर में साथ भोजन करते और शाम को हँसी-मज़ाक के बीच दिन समाप्त होता।

गाँव के लोग अक्सर कहते,
"रामप्रसाद का परिवार देखो, जैसे एक माला में पिरोए हुए मोती हों।"

रामप्रसाद मुस्कुराकर कहते,
"घर बड़ा होने से नहीं, दिल बड़ा होने से खुशहाल बनता है।"

बदलती हवा

समय कभी एक जैसा नहीं रहता।

एक वर्ष बारिश बहुत कम हुई। खेतों की फसल आधी रह गई। आमदनी घटने लगी। इसी बीच गाँव में एक नया व्यापारी जगदीश आया। वह बहुत चालाक था। उसकी नज़र रामप्रसाद की उपजाऊ जमीन पर थी।

उसने सोचा,
"जब तक यह परिवार एक है, इनसे जमीन लेना असंभव है। पहले इनके बीच दरार डालनी होगी।"

उसने धीरे-धीरे अपनी योजना शुरू कर दी। एक दिन वह मोहन से मिला।

"मोहन जी, सारी मेहनत तो आप करते हैं। लेकिन कमाई बराबर बाँटी जाती है। यह कहाँ का न्याय है?"

मोहन ने पहले तो बात टाल दी, लेकिन वह बात उसके मन में कहीं बैठ गई।

दूसरे दिन जगदीश सोहन से मिला।

"आप तो पढ़े-लिखे हैं। अगर अलग होकर काम करें तो शहर में बड़ा कारोबार कर सकते हैं।"

धीरे-धीरे संदेह के छोटे-छोटे बीज दोनों भाइयों के मन में अंकुरित होने लगे।

छोटी बात, बड़ा विवाद

एक शाम खेत से लौटते समय मोहन ने कहा,
"इस बार पश्चिम वाले खेत में मैंने अधिक मेहनत की है। उसकी कमाई अलग होनी चाहिए।"

सोहन ने तुरंत उत्तर दिया,
"और मैंने नई सिंचाई की व्यवस्था करवाई थी। उसका क्या?"

बात बढ़ गई। बहुएँ भी अनजाने में अपने-अपने पतियों का पक्ष लेने लगीं।

घर का वातावरण बदल गया। जहाँ पहले हँसी गूँजती थी, अब वहाँ सन्नाटा था।

बच्चे भी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बड़े लोग अब साथ बैठकर बातें क्यों नहीं करते।

रामप्रसाद सब कुछ देख रहे थे, लेकिन वे जानते थे कि समझदारी थोपी नहीं जाती, उसे अनुभव से सीखा जाता है।

पहला झटका

इसी बीच गाँव में तेज़ आँधी और ओलावृष्टि हुई। कई खेत बर्बाद हो गए।

मोहन अकेले अपने खेत को बचाने दौड़ा, लेकिन अकेले वह कुछ नहीं कर पाया।

सोहन भी अपने हिस्से की चिंता में लगा रहा। पहले जहाँ पूरा परिवार मिलकर फसल बचा लेता था, इस बार अलग-अलग प्रयास नाकाम रहे। नुकसान पहले से कहीं अधिक हुआ।

रात को रामप्रसाद ने बस इतना कहा,
"जब हाथ अलग-अलग दिशा में खिंचते हैं, तो ताकत कम हो जाती है।"

लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

अलग होने का निर्णय

कुछ दिनों बाद दोनों भाइयों ने घर बाँटने का फैसला कर लिया। आँगन के बीच में दीवार खड़ी कर दी गई।

रसोई अलग हो गई। गायें बाँट दी गईं। खेती के औज़ार तक बाँट दिए गए। सबसे अधिक दुख बच्चों को हुआ।

जो बच्चे कल तक साथ खेलते थे, अब उन्हें अलग रहने को कहा गया।

छोटी पोती पायल रोते हुए बोली,
"दादा जी, क्या दीवार रिश्तों को भी बाँट देती है?"

रामप्रसाद की आँखें भर आईं।

उन्होंने केवल इतना कहा,
"दीवार ईंटों की नहीं होती बेटा, मन की होती है।"

संकट की दस्तक

कुछ महीनों बाद खबर आई कि पास की नदी का बाँध टूटने वाला है। गाँव में अफरा-तफरी मच गई।

लोग अपना सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। रामप्रसाद का घर भी खतरे में था।

मोहन अपने हिस्से का सामान बचाने लगा। सोहन अपने हिस्से का।

किसी को यह ध्यान ही नहीं रहा कि सबसे पहले बुज़ुर्गों और बच्चों को सुरक्षित निकालना चाहिए।

अचानक तेज़ पानी का बहाव आया। छोटी पायल और उसका भाई चिंटू घर के पिछवाड़े फँस गए।

चारों ओर पानी भर चुका था। महिलाएँ रोने लगीं।

एकता की परीक्षा

उस समय मोहन ने बिना कुछ सोचे पानी में छलाँग लगा दी। लेकिन तेज़ धारा उसे पीछे धकेलने लगी।

तभी सोहन भी दौड़कर आया।

"भैया, अकेले नहीं होगा।"

दोनों भाइयों ने एक लंबी रस्सी बाँधी। गाँव वालों ने दूसरी ओर से रस्सी पकड़ ली।

मोहन आगे बढ़ा। सोहन ने उसका हाथ मज़बूती से थाम रखा था। कई बार दोनों फिसले। कई बार लगा कि वे बह जाएँगे। लेकिन एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा।

आख़िरकार दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा। 

सरस्वती बच्चों को सीने से लगाकर रोने लगीं। उस रात पहली बार दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

रामप्रसाद का रहस्य

अगली सुबह रामप्रसाद ने पूरे परिवार को आँगन में बुलाया।

उन्होंने सबको लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर दिया।

"इसे तोड़ो।"

मोहन ने पूरी ताकत लगाई। नहीं टूटा। 

सोहन ने कोशिश की। वह भी असफल रहा।

फिर रामप्रसाद ने वही लकड़ियाँ अलग-अलग कर दीं।

अब हर लकड़ी आसानी से टूट गई।

रामप्रसाद मुस्कुराए।

"यही है एकता का रहस्य।"

उन्होंने आगे कहा,

"कल यदि तुम दोनों अलग-अलग बच्चों को बचाने जाते, तो शायद कोई भी वापस न आता। लेकिन जब तुम एक हुए, तब असंभव भी संभव हो गया।"

"घर केवल दीवारों से नहीं बनता। घर विश्वास, सहयोग, त्याग और प्रेम से बनता है।"

"जिस परिवार में 'मैं' बड़ा हो जाता है, वहाँ 'हम' छोटा पड़ जाता है। और जहाँ 'हम' सबसे बड़ा होता है, वहाँ कोई संकट बड़ा नहीं होता।"

दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बहने लगे।

नई शुरुआत

उसी दिन आँगन की दीवार गिरा दी गई। रसोई फिर एक हो गई।

बच्चे खुशी से उछल पड़े।

पायल बोली,
"अब हम फिर साथ खेलेंगे!"

सीमा और राधा ने मिलकर पहली बार फिर से एक साथ रोटी बनाई। शाम को पूरा परिवार वर्षों बाद एक साथ बैठकर भोजन कर रहा था। गाँव वालों ने भी राहत की साँस ली।

अंतिम चुनौती

कुछ महीनों बाद सरकार ने गाँव में आधुनिक कृषि प्रतियोगिता आयोजित की।

शर्त थी कि जो परिवार सबसे अधिक उत्पादन करेगा और नई तकनीक अपनाएगा, उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा।

कई लोगों ने कहा,
"रामप्रसाद का परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा।"

लेकिन इस बार पूरा परिवार एकजुट था।

मोहन खेती संभालता। सोहन नई तकनीक लागू करता।

सीमा और राधा बीजों की देखभाल करतीं। गीता बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खेतों का हिसाब रखती।

बच्चे पौधों को पानी देते और जैविक खाद तैयार करने में मदद करते।

कुछ ही महीनों में खेत लहलहा उठे। फसल पहले से कहीं अधिक हुई।

प्रतियोगिता में रामप्रसाद का परिवार पूरे जिले में प्रथम आया।

जब मंच पर पुरस्कार दिया गया तो अधिकारी ने पूछा,

"आपकी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?"

रामप्रसाद ने मुस्कुराकर अपने परिवार की ओर देखा और बोले,

"हमारे खेतों की मिट्टी उपजाऊ है, लेकिन उससे भी अधिक उपजाऊ हमारे रिश्ते हैं। जहाँ परिवार एक रहता है, वहाँ मेहनत कई गुना बढ़ जाती है और सफलता स्वयं चलकर आती है।"

पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

शिक्षा

उस दिन हरितपुर के लोगों ने केवल एक परिवार की जीत नहीं देखी, बल्कि एक ऐसा सत्य भी सीखा जिसे समय कभी नहीं बदल सकता—

धन, संपत्ति और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन परिवार की एकता ही जीवन को सच्ची खुशी, सुरक्षा और सम्मान देती है।

एकता का रहस्य किसी जादू में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग, त्याग, क्षमा और प्रेम में छिपा होता है। यही वह शक्ति है जो हर कठिनाई को अवसर और हर संकट को विजय में बदल देती है।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

कहानीकार 

Sunday, 26 April 2026

संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

 संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

बंसीराम जी के घर जब पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने उसका नाम रखा— पारस। बंसीराम खुद एक साधारण किसान थे, लेकिन उनका सपना असाधारण था। पारस बचपन से ही उनकी उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरा। वह न केवल शांत और सुशील था, बल्कि पढ़ाई में भी उसका कोई सानी नहीं था। गाँव के स्कूल में जब पारस अपनी किताबें लेकर बैठता, तो लोग कहते, "बंसीराम का बेटा एक दिन बड़ा अफसर बनेगा।" पारस की आँखों में भी वही चमक थी—एक प्रशासनिक अधिकारी (IAS) बनकर समाज की सेवा करने का सपना।


दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में जिले में प्रथम आने के बाद, पारस शहर चला गया। असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। शहर की चकाचौंध और नए परिवेश में पारस को कुछ ऐसे दोस्त मिले, जिनके लिए पढ़ाई से ज्यादा 'मौज-मस्ती' मायने रखती थी। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई—कभी एक फिल्म देखने जाना, कभी घंटों कैफे में बैठकर फिजूल की बातें करना।

धीरे-धीरे, पारस की मेज पर सजी प्रशासनिक सेवाओं की किताबें धूल फांकने लगीं। वह 'संगत के रंग' में ऐसा रंगा कि उसे अपनी मंजिल धुंधली लगने लगी। बंसीराम गाँव से मेहनत की कमाई भेजते रहे, इस भरोसे में कि उनका बेटा दिल्ली में 'साहब' बनने की तैयारी कर रहा है। लेकिन पारस अब सिगरेट के धुएं और रातों की आवारागर्दी में अपनी मेधा को खो चुका था। तीन साल बीत गए, ग्रेजुएशन जैसे-तैसे पूरी हुई, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में वह प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तक नहीं निकाल पाया।

एक दिन ऐसा आया जब पारस पूरी तरह हताश हो गया। आत्मविश्वास शून्य हो चुका था। उसने खुद को मान लिया था कि वह 'असफल' है। वह अपने दोस्तों के साथ गलत आदतों में इतना गहरा उतर गया कि गाँव जाना भी छोड़ दिया। बंसीराम की चिट्ठियाँ और फोन अब उसे बोझ लगने लगे थे। वह उस पारस का कंकाल मात्र रह गया था, जो कभी अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।


जिंदगी जब सबसे अंधेरे मोड़ पर होती है, तभी कहीं से रोशनी की एक किरण आती है। पारस के जीवन में वह किरण बनकर आए प्रोफेसर आदित्य। प्रोफेसर आदित्य पारस के कॉलेज में नए आए थे और उन्होंने पारस के पुराने रिकॉर्ड्स देखे थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना होनहार छात्र इस कदर टूट सकता है।

एक शाम, जब पारस पार्क के एक कोने में अकेला बैठा अपनी किस्मत को कोस रहा था, प्रोफेसर आदित्य उसके पास आकर बैठ गए। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, बस एक सवाल पूछा:

"पारस, क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता के हाथों की लकीरें मिट्टी से क्यों फटी हुई हैं?"

पारस खामोश रहा। प्रोफेसर ने आगे कहा, "वह मिट्टी पारस बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन तुमने खुद को कोयला बना लिया। तुम्हारी हार तुम्हारे दोस्तों की वजह से नहीं, बल्कि तुम्हारी खुद से हार है।"

प्रोफेसर आदित्य ने पारस को अपने संरक्षण में ले लिया। उन्होंने पारस के लिए एक सख्त दिनचर्या बनाई। शुरुआत में पारस का मन विचलित होता, पुराने दोस्त उसे वापस बुलाते, लेकिन इस बार उसके पास एक 'गुरु' का हाथ था।

पारस की नई दिनचर्या:

  • भोर का समय: योग और ध्यान (मानसिक शांति के लिए)।

  • दोपहर: गहन अध्ययन और नोट्स बनाना।

  • शाम: प्रोफेसर के साथ समसामयिक विषयों पर चर्चा।

  • रात: लेखन अभ्यास और आत्म-विश्लेषण।

प्रोफेसर ने उसे सिखाया कि सफलता केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि निरंतरता () से मिलती है। पारस ने अपने फोन से उन सभी नंबरों को हटा दिया जो उसे उसकी मंजिल से दूर ले जाते थे। उसने फिर से शून्य से शुरुआत की।


अगले दो साल पारस के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। एक बार फिर उसने परीक्षा दी। प्रीलिम्स निकला, मेंस भी शानदार रहा, लेकिन इंटरव्यू में वह कुछ अंकों से रह गया। पारस फिर से टूटने लगा। उसे लगा कि शायद अब बहुत देर हो चुकी है। लेकिन प्रोफेसर आदित्य ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मैदान में गिरा हुआ इंसान फिर उठ सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ नहीं। तुम हार के इतने करीब हो कि अगली कोशिश जीत की होगी।"

पारस ने अपनी कमियों पर काम किया। उसने अपनी भाषा, अपने दृष्टिकोण और अपने प्रशासनिक कौशल को निखारा। इस बीच बंसीराम बीमार पड़ गए, घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, लेकिन पारस ने हार नहीं मानी। वह दिन में ट्यूशन पढ़ाता और रात भर पढ़ाई करता।

अंततः, वह दिन आ ही गया जिसका पूरे गाँव को इंतजार था। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का परिणाम घोषित हुआ। पारस ने न केवल परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि पूरे देश में 25वीं रैंक हासिल की।

जब वह लाल बत्ती की गाड़ी (प्रतीकात्मक रूप से अब प्रशासनिक पद) से अपने गाँव पहुँचा, तो पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। बंसीराम की आँखों में खुशी के आँसू थे। पारस सीधे अपने पिता के पास गया और उनके फटे हुए हाथों को चूम लिया। लेकिन उसकी यात्रा यहाँ पूरी नहीं हुई थी। वह तुरंत शहर गया और प्रोफेसर आदित्य के चरणों में गिर पड़ा।

प्रोफेसर ने उसे गले लगाकर बस इतना कहा, "पारस, याद रखना, एक अधिकारी कलम से नहीं, बल्कि अपने चरित्र से बड़ा होता है। जिस भटकाव ने तुम्हें गिराया था, वह तुम्हें दूसरों को उठाने की प्रेरणा देगा।"


कहानी का सार

पारस की कहानी हमें यह सिखाती है कि:

  1. संगत का असर: गलत मित्र आपकी क्षमता को नष्ट कर सकते हैं।

  2. गुरु की महत्ता: एक सही मार्गदर्शक पत्थर को भी हीरा बना सकता है।

  3. आत्म-बोध: अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।

  4. दृढ़ता: सफलता वक्त माँगती है, और जो अंत तक टिका रहता है, वही विजेता बनता है।

आज पारस एक ईमानदार जिलाधिकारी के रूप में जाना जाता है, जो भटके हुए युवाओं को सही राह दिखाने के लिए विशेष कार्यशालाएं चलाता है। उसकी जिंदगी का उतार-चढ़ाव अब हज़ारों युवाओं के लिए एक मशाल बन चुका है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम 

ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

 ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

प्रवेश हमेशा चुप रहता था।
इतना चुप कि कई बार लोग उसके होने या न होने में कोई अंतर ही महसूस नहीं करते थे।
वह न तो ज़्यादा हँसता था, न ग़ुस्सा करता था, न ही अपनी बात किसी से खुलकर कह पाता था। उसकी आँखें बहुत कुछ कहती थीं, पर होंठ जैसे हमेशा किसी अनदेखे डर से सिले रहते थे।
प्रवेश के पिता, शैलेश कुमार, एक साधारण कर्मचारी थे। माँ, मीरा देवी, बेटे को देखकर अक्सर चिंतित हो जातीं। छोटा भाई उत्साही था, बहन चंचल। बस प्रवेश ही था—शांत, संकोची और भीतर सिमटा हुआ।
“यह लड़का कभी बोलेगा भी?”
पिता कभी–कभी झुंझलाकर कह देते।
माँ धीरे से समझातीं—
“इसे डाँटो मत, ये वैसे ही भीतर से सहमा रहता है।”
स्कूल में भी प्रवेश अलग-थलग रहता। शिक्षक उसे मेधावी मानते थे, पर मंच पर बोलने के लिए कहो तो उसके हाथ काँपने लगते। शब्द गले में अटक जाते।
बच्चे कभी–कभी उसका मज़ाक उड़ाते—
“देखो, फिर चुप हो गया!”
प्रवेश सुनता था, लेकिन कुछ कह नहीं पाता था।
रात को जब सब सो जाते, प्रवेश छत पर बैठकर आसमान देखता। उसे लगता, जैसे सितारे उससे बातें कर रहे हों।
उसकी डायरी ही उसकी सबसे अच्छी मित्र थी। उसमें उसने लिखा था—
“मैं बोलना चाहता हूँ, लेकिन जब मुँह खोलता हूँ तो शब्द डर जाते हैं।”
परिवार को उसकी चिंता थी। माँ को डर था कि दुनिया उसकी इस ख़ामोशी का फ़ायदा न उठा ले।
एक दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। बिजली बार–बार चमक रही थी। गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर थी।
रात के लगभग दस बजे अचानक पूरे इलाके की बिजली चली गई।
कुछ देर बाद बाहर से शोर सुनाई दिया—
“बचाओ! कोई है?”
आवाज़ काँपती हुई थी।
प्रवेश की धड़कन तेज़ हो गई।
पिता ने दरवाज़ा खोला। सामने अँधेरे में कुछ लोग भागते दिखे।
“नदी का बाँध टूट गया है!”
“नीचे की बस्ती में पानी घुस रहा है!”
घर में अफ़रातफ़री मच गई।
माँ ने बच्चों को भीतर कर लिया। पिता मदद के लिए बाहर निकलने लगे।
प्रवेश चुपचाप खड़ा सब देख रहा था। उसके मन में कुछ अजीब-सा चल रहा था। डर… और साथ ही कोई अनजानी शक्ति।
बहुत कम लोग जानते थे कि प्रवेश को तैरना आता था—बहुत अच्छा तैरना।
बचपन में उसके नाना उसे नदी में ले जाते थे। पर एक हादसे के बाद नाना नहीं रहे, और प्रवेश ने कभी किसी को इस बारे में बताया ही नहीं।
उस रात नदी का पानी गाँव की ओर बढ़ रहा था।
तभी किसी ने चिल्लाकर कहा—
“बस्ती में एक बच्चा फँस गया है!”
चारों ओर सन्नाटा छा गया।
सब लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
प्रवेश का दिल ज़ोर–ज़ोर से धड़कने लगा।
उसके भीतर वर्षों से दबी आवाज़ अचानक चीख उठी—
“अगर अब नहीं, तो कभी नहीं!”
अचानक वह आगे बढ़ा।
पहली बार उसने ऊँची आवाज़ में कहा—
“मैं जाऊँगा।”
सब चौंक गए।
माँ की आँखें फैल गईं—
“प्रवेश…?”
पिता बोले—
“तुम? लेकिन…”
प्रवेश ने पहली बार किसी की बात बीच में काटी—
“मुझे तैरना आता है।”
अँधेरी, उफनती नदी। तेज़ बारिश। लोग दुआ कर रहे थे।
प्रवेश पानी में उतर गया।
हर सेकंड भारी लग रहा था। कोई नहीं जानता था कि वह ज़िंदा लौटेगा या नहीं।
कुछ लोग बोले—
“ये तो बोलता ही नहीं था, इतना साहस कहाँ से आया?”
पानी का बहाव बहुत तेज़ था। प्रवेश को कई बार लगा कि वह बह जाएगा।
पर उसे उस बच्चे की याद आ रही थी, जो शायद इस समय डर से काँप रहा होगा।
आख़िरकार उसने बच्चे को देखा—एक टूटी छत पर फँसा हुआ।
प्रवेश ने चिल्लाकर कहा—
“डरो मत! मैं आ गया हूँ!”
वह खुद भी चौंक गया—वह बोल पा रहा था।
कुछ ही देर में प्रवेश बच्चे को सुरक्षित लेकर लौट आया।
गाँव में जैसे जान आ गई।
माँ उसे गले लगाकर रो पड़ीं। पिता की आँखों में गर्व था।
उस घटना के बाद प्रवेश वही नहीं रहा।
अब वह कम बोलता था, लेकिन जब बोलता—तो सार्थक।
स्कूल में उसे सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। सबको आश्चर्य हुआ, जब उसने बिना हिचक एक प्रेरक भाषण दिया।
उसने कहा—
“ख़ामोशी कमज़ोरी नहीं होती। कभी–कभी वही हमारी सबसे बड़ी ताक़त होती है।”
आज प्रवेश आपदा प्रबंधन से जुड़ा है। वह बच्चों को तैरना सिखाता है। डर से लड़ना सिखाता है।
जो लड़का अपनी बात कह नहीं पाता था, वह आज दूसरों को आवाज़ देता है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

भूतिया महल - कहानी

 भूतिया महल

गाँव के उत्तर छोर पर, सालों से खड़ा एक जर्जर-सा महल था। टूटी हुई खिड़कियाँ, झूलते दरवाज़े, दीवारों पर उगी काई और हर समय वहाँ पसरा रहने वाला सन्नाटा—इन सबके कारण लोग उसे भूतिया महल कहते थे। शाम ढलते ही उस ओर कोई झाँकने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को डराने के लिए बड़े बस इतना कह देते—“पढ़-लिख लो, वरना भूतिया महल तुम्हें उठा ले जाएगा।”
इसी गाँव में रहता था मोंटू—कामचोरी का जीता-जागता उदाहरण। न पढ़ाई में मन लगता, न घर के किसी काम में। माँ जब कहती, “बेटा, ज़रा किताब खोल लो,” तो मोंटू जम्हाई लेकर कह देता, “अभी तो बहुत समय है।” पिता खेत से थके-हारे लौटते और कहते, “कुछ तो सीख ले,” तो वह कंधे उचका देता। उसे बस दोस्तों के साथ घूमना, गिल्ली-डंडा खेलना और बेवजह हँसना आता था।
मोंटू के दोस्त—गोलू, पिंटू और चीकू—अक्सर उसे चिढ़ाते रहते।
“अरे मोंटू, तू तो पैदा ही आराम करने के लिए हुआ है,” गोलू हँसता।
“कल बड़ा आदमी बनेगा—नींद विशेषज्ञ!” पिंटू ताना मारता।
मोंटू बाहर से हँस देता, पर भीतर कहीं कुछ चुभता था। उसे लगता था कि वह कुछ कर सकता है, पर आलस और डर उसे जकड़े रहते।
एक दिन स्कूल में अध्यापक ने घोषणा की—“अगले महीने वार्षिक परीक्षा है। जो मेहनत नहीं करेगा, वही पछताएगा।” पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया, सिवाय मोंटू के। वह खिड़की से बाहर ताक रहा था—उसी भूतिया महल की ओर।
उसी शाम दोस्तों ने शर्त लगा दी।
“हिम्मत है तो आज रात भूतिया महल के भीतर जाकर आ,” चीकू ने कहा।
“कामचोर कहीं का! डरपोक!” पिंटू ने जोड़ा।
मोंटू का अहंकार जाग उठा। उसने बिना सोचे कहा, “ठीक है, मैं जाऊँगा।”
रात गहरी हो चुकी थी। चाँद बादलों में छिपा-छिपा सा खेल रहा था। मोंटू दिल पर पत्थर रखकर महल के फाटक तक पहुँचा। फाटक चरमराया—किर्र…किर्र…—जैसे किसी ने चेतावनी दी हो। वह काँपा, पर कदम आगे बढ़ा दिए। भीतर घुसते ही ठंडी हवा का झोंका आया और दीपक की लौ थरथरा उठी।
अचानक उसे लगा जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा—“वापस लौट जाओ…”
मोंटू घबरा गया, पर तभी उसे दोस्तों की हँसी याद आई। उसने खुद को संभाला और आगे बढ़ा।
महल के भीतर एक बड़ा-सा हॉल था। बीचोंबीच धूल जमी मेज़ और दीवार पर टंगा एक पुराना चित्र। चित्र में एक युवक था—आँखों में अजीब-सी उदासी। तभी पीछे से भारी आवाज़ गूँजी—
“क्यों आए हो यहाँ?”
मोंटू का कलेजा मुँह को आ गया। वह घूमते हुए बोला, “क…कौन है?”
अंधेरे से एक धुँधली आकृति उभरी। वह भूत नहीं, बल्कि किसी बूढ़े व्यक्ति की छाया थी।
“डरो मत,” आवाज़ नरम थी, “मैं इस महल का रखवाला हूँ… और कभी इस गाँव का सबसे आलसी लड़का था।”
“आलसी?” मोंटू चौंक पड़ा।
“हाँ,” छाया बोली, “मेरा नाम था माधव। मैं भी तुम्हारी तरह काम से भागता था। पढ़ाई को बोझ समझता था। लोग मुझे निकम्मा कहते थे।”
मोंटू को लगा जैसे कोई उसकी कहानी सुना रहा हो।
“फिर?” उसने धीरे से पूछा।
“फिर एक दिन मुझे भी चुनौती मिली। इसी महल में आया। यहाँ मुझे एक रहस्य पता चला—मेरी असली दुश्मन कोई भूत नहीं, बल्कि मेरा आलस था।”
छाया ने दीवार की ओर इशारा किया। वहाँ एक बंद दरवाज़ा था।
“उस दरवाज़े के पीछे मेरी डायरी है। पढ़ो।”
मोंटू काँपते कदमों से दरवाज़ा खोलता है। भीतर एक पुरानी डायरी पड़ी थी। उसने पहला पन्ना खोला—
‘आज फिर मैंने काम टाल दिया। दिल कहता है—कल कर लूँगा। पर हर कल, आज बनकर मुझे चिढ़ा जाता है।’
पन्ने पलटते गए। हर पन्ने पर पछतावे की स्याही थी—अधूरी पढ़ाई, छूटे अवसर, टूटे सपने। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
‘जो समय को नहीं पकड़ता, समय उसे छोड़ देता है।’
मोंटू की आँखें नम हो गईं।
“मैं यही गलती कर रहा हूँ…” वह बुदबुदाया।
तभी छाया बोली—“मोंटू, यह महल भूतिया नहीं, सच का आईना है। यहाँ आने वाले वही देखते हैं, जिससे वे भागते रहते हैं। तुम चाहो तो अभी भी लौट सकते हो—वैसे ही जैसे आए हो। या फिर इस रहस्य को अपनी ताक़त बना सकते हो।”
“मैं… मैं बदलना चाहता हूँ,” मोंटू ने दृढ़ता से कहा।
छाया मुस्कराई। “तो सुनो—डर से नहीं, अनुशासन से आगे बढ़ो। रोज़ थोड़ा-सा काम, पूरे मन से। आलस को टालो, काम को नहीं।”
इतना कहकर छाया धीरे-धीरे हवा में घुल गई। हॉल में सन्नाटा छा गया, पर मोंटू के भीतर एक आवाज़ जाग चुकी थी।
वह महल से बाहर निकला। रात वही थी, पर मोंटू वही नहीं था।
अगली सुबह मोंटू जल्दी उठ गया। माँ ने हैरानी से देखा—“आज सूरज पश्चिम से उगा है क्या?”
मोंटू मुस्कराया, “नहीं माँ, आज मैं खुद से भागना छोड़ रहा हूँ।”
उसने पढ़ाई का छोटा-सा समय-सारिणी बनाई। पहले दिन मुश्किल हुई, पर उसने डायरी का आख़िरी वाक्य याद किया। धीरे-धीरे दिन बदले। दोस्त चिढ़ाने आए तो उसने शांत स्वर में कहा—“हँस लो, पर मैं रुकूँगा नहीं।”
परीक्षा आई। मोंटू ने पूरी तैयारी नहीं की थी, पर जितनी की थी, ईमानदारी से की थी। परिणाम आया—वह अव्वल तो नहीं आया, पर फेल भी नहीं हुआ। उसके चेहरे पर संतोष था—एक नई शुरुआत का।
कुछ महीनों बाद वही दोस्त बोले—
“यार मोंटू, तू बदल गया है।”
मोंटू मुस्कराया—“नहीं, मैं खुद को पहचान गया हूँ।”
भूतिया महल आज भी गाँव के किनारे खड़ा है। लोग अब भी डरते हैं। पर मोंटू जानता है—वहाँ कोई भूत नहीं, बल्कि एक सच्चाई रहती है, जो सही समय पर किसी न किसी को बुला लेती है… और उसकी ज़िन्दगी को नई दिशा दे देती है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

नीली स्क्रीन का साया - कहानी

 नीली स्क्रीन का साया

रात के बारह बज रहे थे।
घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था। बाहर सर्द हवा पेड़ों की सूखी पत्तियों को हिलाकर अजीब-सी सरसराहट पैदा कर रही थी। कमरे में केवल एक चीज़ चमक रही थी—मोबाइल की नीली स्क्रीन।
आरव, सातवीं कक्षा का छात्र, अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी थीं। माँ-पापा सो चुके थे, बहन भी। लेकिन आरव की दुनिया उस छोटे से मोबाइल में कैद थी।
“बस एक रील और… बस एक वीडियो और…”
वह खुद से कहता और उँगलियाँ स्क्रीन पर सरकती जातीं।
अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमक उठी।
एक नया अकाउंट सामने आया—
“नीलाया_1890”
प्रोफाइल फोटो में एक धुँधली-सी लड़की थी, नीली आँखें और बेहद फीकी मुस्कान।
कुछ ही सेकंड में उस अकाउंट से मैसेज आया—
“तुम भी रात में जागते हो?”
आरव चौंक गया।
“हाँ… तुम कौन हो?” उसने टाइप किया।
उत्तर आया—
“मैं भी तुम्हारी तरह अकेली हूँ।”
आरव को अजीब लगा, फिर भी उसे अच्छा लगा कि कोई उससे बात कर रहा है। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती गई। नीलाया को पता था कि आरव कौन-सा गेम खेलता है, कौन-सी क्लास में है, किस स्कूल में पढ़ता है।
“तुम्हें ये सब कैसे पता?” आरव ने पूछा।
मैसेज आया—
“मैं सब देखती हूँ।”
उस रात के बाद नीलाया रोज़ ऑनलाइन आने लगी। आरव स्कूल से आते ही मोबाइल खोल लेता। न होमवर्क, न खेल, न परिवार से बातें।
धीरे-धीरे अजीब बातें होने लगीं।
मोबाइल अपने आप ऑन हो जाता।
रात में नोटिफिकेशन बजता।
कभी-कभी स्क्रीन पर नीली रोशनी फैल जाती, जैसे कोई उसे देख रहा हो।
एक रात नीलाया ने लिखा—
“तुम मुझे मिलना चाहोगे?”
आरव ने उत्सुकता से हाँ कर दी।
“तो कल रात 12 बजे पुराने कुएँ के पास आना।”
वह कुआँ गाँव के बाहर था—जहाँ कोई नहीं जाता था। कहा जाता था कि वहाँ कभी एक लड़की गिरकर मर गई थी।
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पुराने कुएँ की रहस्यमयी रात
अगली रात आरव चुपचाप घर से निकल पड़ा।
कुएँ के पास पहुँचते ही ठंडी हवा चलने लगी। चारों ओर अंधेरा था।
“नीलाया?” उसने काँपती आवाज़ में पुकारा।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट हुई।
वह मुड़ा तो देखा—नीली साड़ी पहने एक लड़की, बेहद पीली त्वचा, और आँखों में अजीब चमक।
“तुम आ गए…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
आरव डर गया, लेकिन उत्सुकता ने उसे रोक लिया।
“तुम… ऑनलाइन वही हो न?”
लड़की मुस्कराई।
“हाँ… मैं वही हूँ।”
तभी अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें पता है, मैं कैसे मरी थी?”
आरव ने सिर हिला दिया।
“मैं भी मोबाइल में ही खोई रहती थी। माँ-पापा बुलाते थे, दोस्त बुलाते थे… लेकिन मैं स्क्रीन में डूबी रहती थी। एक रात यहाँ वीडियो देखते-देखते पैर फिसल गया… और मैं गिर गई।”
कुएँ से ठंडी हवा का झोंका आया।
लड़की की आवाज़ बदलने लगी—
“और अब मैं उन बच्चों को ढूँढती हूँ जो मेरी तरह खो जाते हैं…”
अचानक उसका चेहरा विकृत हो गया।
नीली आँखें चमक उठीं।
“तुम भी मेरे साथ रहोगे!”
वह आरव की ओर बढ़ी।
आरव डरकर पीछे हटा और फिसल गया।
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नीली स्क्रीन का जादू
आरव ने आँखें खोलीं तो खुद को अपने कमरे में पाया।
सब कुछ सामान्य था।
“क्या वह सपना था?” उसने सोचा।
तभी मोबाइल बज उठा।
नीलाया_1890 ऑनलाइन थी।
मैसेज आया—
“आज भी आओगे?”
आरव के हाथ काँप गए।
उसे लगा कोई उसे लगातार देख रहा है।
स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा। दोस्तों ने कहा—
“तू पहले हमारे साथ खेलता था, अब बस फोन देखता रहता है।”
माँ ने डाँटा—
“आरव, पढ़ाई पर ध्यान दो।”
लेकिन वह फिर भी मोबाइल में उलझा रहा।
उस रात मोबाइल की स्क्रीन से नीली रोशनी निकलने लगी।
धीरे-धीरे कमरे में ठंड फैल गई।
एक साया दीवार पर उभरा।
नीलाया का चेहरा सामने था।
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
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सच का सामना
डर के मारे आरव ने मोबाइल फेंक दिया।
वह सीधे माँ-पापा के कमरे में भागा और सब बता दिया।
पापा गंभीर हो गए।
अगले दिन वे उसे उस कुएँ के पास ले गए।
वहाँ एक बूढ़े चौकीदार ने बताया—
“सालों पहले यहाँ एक लड़की गिरकर मर गई थी। वह हमेशा मोबाइल में लगी रहती थी। किसी से बात नहीं करती थी।”
आरव को सिहरन हो गई।
पापा ने समझाया—
“बेटा, मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसका गलत इस्तेमाल खतरनाक है। इससे लोग अपनों से दूर हो जाते हैं।”
माँ ने कहा—
“हमारे साथ समय बिताओ, असली दुनिया देखो।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसे समझ आ गया कि वह धीरे-धीरे उसी राह पर जा रहा था।
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नई शुरुआत
उस दिन के बाद आरव ने मोबाइल का समय कम कर दिया।
वह दोस्तों के साथ खेलने लगा।
माँ-पापा से बातें करने लगा।
किताबें पढ़ने लगा।
एक दिन अचानक मोबाइल में नोटिफिकेशन आया।
नीलाया_1890 ने अंतिम संदेश भेजा—
“तुम बच गए… काश मैं भी बच पाती।”
फिर वह अकाउंट गायब हो गया।
उस रात आरव ने चैन की नींद सोई।

संदेश (बच्चों के लिए)

सोशल मीडिया और मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम उनमें जरूरत से ज्यादा डूब जाएँ, तो हम अपने परिवार, दोस्तों और असली दुनिया से दूर हो जाते हैं। कभी-कभी यह दूरी खतरनाक भी हो सकती है।

मोबाइल का इस्तेमाल करें, लेकिन मोबाइल के गुलाम न बनें।
अपनों के साथ समय बिताएँ, खेलें, सीखें और असली दुनिया को अपनाएँ।

क्योंकि असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
आपके आसपास की दुनिया में है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी

 परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी 

गाँव का नाम था सोनपुर। चारों तरफ हरियाली, पीपल के पेड़, कच्ची गलियाँ और एक पुराना स्कूल—जिसकी दीवारों पर समय की दरारें साफ दिखती थीं। इसी गाँव में रहता था आरव, पाँचवीं कक्षा का छात्र। पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन मोबाइल फोन से उसे कुछ ज़्यादा ही प्यार था।
सुबह उठते ही मोबाइल, सोते समय मोबाइल, खाते समय मोबाइल, पढ़ते समय मोबाइल—आरव की दुनिया मोबाइल में सिमट गई थी।
उसकी माँ अक्सर कहती,
“बेटा, मोबाइल ज़रूरी है, लेकिन ज़िंदगी नहीं।”
पर आरव हँस देता।
एक दिन उसके पापा शहर से नया स्मार्टफोन लेकर आए। बड़ा स्क्रीन, तेज़ इंटरनेट और ढेर सारे ऐप्स। आरव की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
अब वह घंटों रील्स, शॉर्ट वीडियो और गेम्स में खोया रहता।
धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगे—
• पढ़ाई में मन नहीं लगता
• नींद पूरी नहीं होती
• चिड़चिड़ा रहने लगा
• अकेला रहने लगा
• दोस्तों से बात कम हो गई
एक रात, जब पूरा गाँव सो चुका था, आरव अपने कमरे में मोबाइल चला रहा था। अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमकने लगी। एक नया नोटिफिकेशन आया—
प्रोफाइल फोटो में सिर्फ़ काली परछाईं थी।
आरव ने सोचा कोई मज़ाक होगा और बिना सोचे समझे Accept कर लिया।
तुरंत एक मैसेज आया—
“तुम मुझे देख सकते हो… पर मैं तुम्हें देख रहा हूँ।”
आरव को हल्की सिहरन हुई, पर उसने सोचा यह कोई फेक अकाउंट होगा।
उसने जवाब लिखा—
“कौन हो तुम?”
उत्तर आया—
“मैं वही हूँ जो मोबाइल के अंदर रहता है… और बच्चों को अपने साथ ले जाता है।”
अब आरव को डर लगा। उसने मोबाइल बंद कर दिया और सो गया।
पहली परछाईं
अगली रात फिर वही नोटिफिकेशन।
“तुम मुझसे भाग नहीं सकते।”
मोबाइल अपने आप ऑन हो गया। स्क्रीन पर वीडियो चलने लगा।
वीडियो में एक लड़का था—ठीक आरव जैसा दिखने वाला—जो अँधेरे कमरे में मोबाइल पकड़े बैठा था। उसके पीछे एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।
अचानक परछाईं ने लड़के को पकड़ लिया।
आरव डर से चीख पड़ा।
उसी रात उसने सपना देखा—
वह एक अँधेरी दुनिया में है जहाँ हजारों बच्चे मोबाइल पकड़े खड़े हैं। सबकी आँखें नीली रोशनी से चमक रही हैं। उनके पीछे काली परछाइयाँ घूम रही हैं।
एक आवाज़ गूँजी—
“जो बच्चे मोबाइल को अपनी दुनिया बना लेते हैं…
वो हमारी दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।”
आरव की नींद खुल गई। पसीने से पूरा शरीर भीगा था।
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🧓 पुरानी लाइब्रेरी और रहस्य
अगले दिन स्कूल में उसने यह बात अपने दोस्त मोहन को बताई। मोहन ने उसे स्कूल के पीछे बनी पुरानी लाइब्रेरी में चलने को कहा।
वहाँ एक बूढ़े बाबा रहते थे—सब उन्हें “ज्ञान बाबा” कहते थे।
बाबा ने पूरी बात सुनी और गंभीर होकर बोले—
“बेटा, ये कोई साधारण आत्मा नहीं है।
ये डिजिटल आत्मा है।”
आरव हैरान—
“डिजिटल आत्मा?”
बाबा बोले—
“बहुत साल पहले एक बच्चा था—नाम था शिव।
वो मोबाइल और इंटरनेट का इतना आदी था कि उसने दुनिया से रिश्ता तोड़ लिया।
एक रात मोबाइल चलाते-चलाते उसकी मौत हो गई।
उसकी आत्मा मोबाइल की दुनिया में भटकती रह गई।
अब वो बच्चों को सोशल मीडिया, मोबाइल और स्क्रीन की दुनिया में खींच लेता है।”
आरव काँप उठा।
बाबा बोले—
“अगर बचना है, तो तीन काम करने होंगे:
1. मोबाइल से दूरी
2. असली दुनिया से दोस्ती
3. मन से डर को निकालना”

आख़िरी रात
उस रात फिर मैसेज आया—
“आज तुम मेरे साथ आओगे।”
मोबाइल अपने आप चमकने लगा। कमरे की लाइट बंद हो गई। दीवार पर काली परछाईं उभर आई।
पर इस बार आरव डरा नहीं।
उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
माँ-पापा की तस्वीर देखी।
दोस्तों की याद की।
स्कूल, मैदान, पेड़, किताबें—सब याद आया।
वह बोला—
“तुम मेरी ज़िंदगी नहीं हो।
मेरी दुनिया मोबाइल नहीं है।”
परछाईं चिल्लाई—
“तुम झूठ बोलते हो!”
आरव ने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
अचानक सब कुछ शांत हो गया।
कमरा रोशनी से भर गया।
परछाईं गायब हो गई।
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🌞 नई सुबह, नई ज़िंदगी
अगली सुबह आरव जल्दी उठा।
मोबाइल अलमारी में रखा।
स्कूल गया।
दोस्तों के साथ खेला।
माँ की मदद की।
किताबें पढ़ीं।
अब वह मोबाइल का इस्तेमाल करता था—
लेकिन सीमित समय के लिए।
उसने स्कूल में बच्चों को कहानी सुनाई।
टीचर ने कहा—
“डर के साथ सीख—यही सबसे मजबूत शिक्षा होती है।”
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🌈 कहानी का संदेश

बच्चों के लिए सीख:
1. मोबाइल बुरा नहीं है,
लेकिन उसका ज़्यादा इस्तेमाल खतरनाक है
2. सोशल मीडिया दिखावटी दुनिया है
3. असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
रिश्तों में होती है
4. दोस्ती, खेल, किताबें, परिवार—
यही असली दुनिया है
5. जो बच्चे मोबाइल को दुनिया बना लेते हैं,
वो असली दुनिया खो देते हैं

✨ अंतिम पंक्तियाँ

“मोबाइल साधन है, संसार नहीं
स्क्रीन रोशनी है, सूरज नहीं
डिजिटल दुनिया आकर्षक है,
पर असली दुनिया ही जीवन है।”

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम


Friday, 5 December 2025

काली छाया का रहस्य - कहानी

 काली छाया का रहस्य - कहानी

रामगढ़ के लोग अपना जीवन मेहनत करके बहुत ही आराम से गुजार रहे थे | किन्तु इन दिनों एक काली छाया इन लोगों के डर का कारण बनी हुई थी | रामगढ़ गाँव में प्रवेश करने से पहले एक पगडंडी पड़ती थी | जिस पर से गुजरने पर एक काली छाया वहां से गुजरने वालों को दिखाई देती थी | जिसे देखकर लोग बेहोश हो जाते थे | बाद में होश आने पर पता चलता था कि उनके पास जो भी पैसे , कीमती सामान होता था वो सब गायब हो जाता था |

यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा पर किसी को भी काली छाया का रहस्य पता नहीं चला | लोग उस रास्ते से गुजरते और काली छाया का शिकार हो जाते | काली छाया का लोगों के दिलों दिमाग पर यह असर हुआ कि उन्होंने नया रास्ता खोजने का विचार किया ताकि इस काली छाया से कहर से बचा ज सके | नया रास्ता खोजने के बाद शुरू के दिनों में काली छाया का कोई असर नहीं दिखाई दिया किन्तु दो दिन बाद फिर से वही सिलसिला शुरू हो गया | लोग उस रास्ते से गुजरते और काली छाया देखकर बेहोश हो जाते और फिर वही सामान और कीमती चीजें गायब |



अब तो बात इतनी बढ़ गयी कि लोगों का जीना दूभर हो गया | इसी बीच एक दिन उसी रस्ते से साधुओं का एक काफिला निकला और रामगढ़ आ पहुंचा | पर लोगों को यह जानकार आश्चर्य हुआ कि उस साधुओं पर काली छाया का कोई असर नहीं हुआ | वे सोचने लगे कि हो सकता है कि काली छाया पर इस साधुओं की शक्ति का असर हुआ होगा | इसलिए सभी साधू सुरक्षित रामगढ़ पहुँच गए | किन्तु इसके बाद फिर वही सिलसिला शुरू हो गया |

एक दिन शाम होने से पहले रामगढ का ही एक लड़का दौड़ा – दौड़ा गाँव की ओर आया और गाँव के सरपंच को उसने कुछ बताया | सरपंच उस लड़के की बात सुनकर अचंभित रह गया | सरपंच ने तुरंत गाँव के बहुत से लोगों को इकठ्ठा किया और दौड़ चले उस जगह से कुछ दूरी पर जहाँ काली छाया का प्रकोप दिखाई देता था | सभी ने ध्यान से देखा तो पता चला कि काली छाया वाली सड़क के दोनों ओर जो पेड़ लगे थे उन पर कुछ लड़के छिपे बैठे थे | और किसी के वहां से गुजरने का इंतजार कर रहे थे |

इसी बीच सरपंच ने अँधेरा होने पर दो लोगों को सड़क के दूसरी ओर से गाँव की ओर इसी सड़क से जाने को कहा | जैसे ही वे सड़क पर पहुंचे | पेड़ पर बैठे लड़कों में से दो लड़कों ने लेज़र बीम से काली छाया बनाई | जिसे देखकर दोनों लड़के बेहोश होने का नाटक करने लगे | उन्हें बेहोश देख पेड़ से सभी लड़के उतर आये | जैसे ही वे उस दोनों बेहोश लड़कों के पास पहुंचे गाँव के सरपंच और अन्य गाँव वासियों ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें पकड़ लिया | पूछने पर पता चला कि उन्हें नशा करने की आदत थी जिसकी वजह से कोई उन्हें काम नहीं देता था | और नशा करने के लिए उन्हें ये रास्ता सूझा | सभी लुटेरों को पुलिस के हवाले कर दिया गया और जिस लड़के ने उन लुटेरों के बारे में सरपंच को जानकारी दी थी उसे सम्मानित किया गया |

अब रामगढ़ गाँव उस काली छाया के कहर से मुक्त हो चुका था | सारे रामगढ़ वासी ख़ुशी – ख़ुशी रहने लगे |


अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'


Saturday, 15 March 2025

चिम्पू जी की योगा क्लास – कहानी

 चिम्पू जी की योगा क्लास – कहानी

चंपकवन की शान माने जाने वाला चिम्पू हिरण एक पेशेवर योगा शिक्षक था | उसकी योगा क्लास की ख्याति आसपास के जंगलों में भी थी | अपनी शारीरिक समस्याओं को लेकर भी आसपास के जंगलों से भी जानवर चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र आया करते थे | चिम्पू हिरण सभी से बहुत ही मृदु भाषा में बात किया करता था जिसके कारण सभी जानवरों को अपने समस्याएँ बहुत ही छोटी महसूस हुआ करती थी और वे खुद को तरोताजा और खुश मह्सूस किया करते थे | योगा के लगभग सभी आसनों के साथ – साथ चिम्पू हिरण को ज्यादातर बीमारियों के इलाज़ की भी अच्छी – खासी जानकारी थी या यूं कहें कि उसे महारत हासिल थी | चिम्पू हिरण को सभी आसनों से होने वाले लाभ के साथ – साथ यह भी जानकारी थी कि कौन सा आसन कब करना है और कैसे करना है ताकि सभी को उसका पूरा – पूरा लाभ मिल सके |




इसी चंपकवन में एक चिपलू बिलौटा रहता था | एक दिन चिपलू बिलौटा भी चिम्पू हिरण के पास अपनी समस्या लेकर आया और उसने अपनी समस्या चिम्पू हिरण को बतायी | चिम्पू हिरण ने चिपलू बिलौटे की नब्ज़ देखी और उसे कुछ आसन बताये और कहा कि उसे यहीं पर रहकर ये आसन उसकी निगरानी में करने होंगे और साथ ही कुछ आयुर्वेदिक दवाएं भी लेनी होंगी ताकि वह पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए | चिपलू बिलौटा कुछ दिन चिम्पू हिरण के ही स्वास्थ्य केंद्र में रहा | उसके बाद एक दिन वह वहां से अचानक गायब हो गया और पूरे जंगल में यह खबर फैला दी कि मुझे चिम्पू हिरण के इलाज और योगा आसनों से कुछ भी लाभ नहीं हुआ और उसकी तबीयत पहले से भी ज्यादा ख़राब हो गयी |


यह खबर जंगल में और आसपास के जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी | चिम्पू हिरण को यह सब सुनकर बड़ा ही दुःख हुआ | किन्तु उसने इस बात को ज्यादा तूल न देते हुए इसके शीघ्र निवारण के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया और जंगल के राजा झबरू शेर से जाकर कहा कि चिपलू बिलौटा मेरे पेशे को लेकर गलत खबर फैला रहा है | आपसे अनुरोध है कि उसे रोकिये और सही फैसला सुनाइये ताकि दूसरे बीमार जानवर मेरे इलाज़ और आसनों के लाभ से वंचित न हों |


जंगल के राजा झबरू शेर ने अगले दिन जंगल में सभा का आयोजन किया ताकि चिम्पू हिरण और चिपलू बिलौटे की बात सुनी जाए और इस मसले का शीघ्र निपटारा किया जाए | सभा का आयोजन किया गया एक ओर चिम्पू हिरण तो दूसरी ओर चिपलू बिलौटा खड़े थे | जंगल के राजा झबरू शेर ने सभा की कारवाई शुरू करने को कहा | सबसे पहले चिपलू बिलौटे की बात सुन गयी और उसके बाद चिम्पू हिरण की बात सुनी गयी | दोनों की बात सुनने के बाद झबरू शेर कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं था सो उसने सबसे पहले चिपलू बिलौटे से पूछा कि जब तुम चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र आये थे तब तुम्हें क्या बीमारी थी | इसके जवाब में चिपलू बिलौटे ने कहा कि मुझे सांस की बीमारी थी | किन्तु चिम्पू हिरण ने कहा कि इसे सांस की बीमारी नहीं थी अपितु इसे कैंसर की बीमारी थी जिसे मैंने योगा के आसनों और आयुर्वेदिक दवाओं से ठीक किया | एक बात और कि मेरे स्वास्थ्य में केंद्र आने के एक सप्ताह पहले जंगल में पंद्रह किलोमीटर की मैराथन दौड़ का आयोजन किया गया था जिसमे इस चिपलू बिलौटे ने भी भाग लिया था | यदि ये सांस की बीमारी से पीड़ित होता तो उस दौड़ में भाग कैसे ले सकता था | ऐसा कहते ही झबरू शेर को चिम्पू हिरण की बात ठीक लगी | अब तो चिपलू बिलौटा घबराने लगा और उसे लगा कि वह अब और ज्यादा झूठ नहीं बोल सकता |


इसके बाद चिपलू बिलौटे से बताया कि इसी जंगल के ज्यादातर जानवर मुझे पसंद नहीं करते थे और मुझे नासमझ और हर एक बात पर बेवकूफ कहा करते थे जिसके कारण मुझे अपने आप से भी घृणा होने लगी | इसी बीच मुझे चंपकवन के ही एक जानवर मोनू बंदर से मिलने का मौका मिला | मोनू बंदर की बातों ने मुझमे साहस और ऊर्जा का संचार किया उसने ही मुझे बताया कि तुम इस जंगल के सबसे समझदार जानवर हो | फिर क्या था मैं उसकी बातों में आ गया और उसने ही मुझे चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र जाने और झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया | मुझे नहीं पता था कि वह मेरा इस्तेमाल चिम्पू हिरण को बदनाम करने के लिए कर रहा है | इसके बाद मोनू बंदर को सभा में बुलाया गया और उससे कड़ाई के साथ पूछा गया तो उसने बताया कि उसे चिम्पू हिरण की लोकप्रियता रास नहीं आ रही थी और वह चाहता था कि किसी तरह से चिम्पू हिरण का स्वास्थ्य केंद्र बंद हो जाए और उसके बाद वह खुद का एक स्वास्थ्य केंद्र खोल सके |


चिपलू बिलौटे को अपने आप पर शर्म आ रही थी कि क्यों चम्पकवन के लोगे उसे बेवकूफ कहते थे शयद वे ठीक कहते थे | दूसरी ओर मोनू बंदर भी अपने आपको कोस रहा था | झबरू शेर ने दोनों चिपलू बिलौटे और मोनू बंदर को चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र में अगले छः माह तक मरीजों की सेवा करने की सजा सुनाई | जिसे दोनों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | जंगल के सभी जानवर जंगल के राजा झबरू शेर के फैसले से बहुत खुश हुए | अब पहले की तरह ही चिम्पू हिरण का स्वास्थ्य केंद्र लोगों की सेवा करने लगा |

Friday, 30 August 2024

काली छाया का रहस्य – कहानी

 

काली छाया का रहस्य – कहानी

रामगढ़ के लोग अपना जीवन मेहनत करके बहुत ही आराम से गुजार रहे थे | किन्तु इन दिनों एक काली छाया इन लोगों के डर का कारण बनी हुई थी | रामगढ़ गाँव में प्रवेश करने से पहले एक पगडंडी पड़ती थी | जिस पर से गुजरने पर एक काली छाया वहां से गुजरने वालों को दिखाई देती थी | जिसे देखकर लोग बेहोश हो जाते थे | बाद में होश आने पर पता चलता था कि उनके पास जो भी पैसे , कीमती सामान होता था वो सब गायब हो जाता था |
यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा पर किसी को भी काली छाया का रहस्य पता नहीं चला | लोग उस रास्ते से गुजरते और काली छाया का शिकार हो जाते | काली छाया का लोगों के दिलों दिमाग पर यह असर हुआ कि उन्होंने नया रास्ता खोजने का विचार किया ताकि इस काली छाया से कहर से बचा ज सके | नया रास्ता खोजने के बाद शुरू के दिनों में काली छाया का कोई असर नहीं दिखाई दिया किन्तु दो दिन बाद फिर से वही सिलसिला शुरू हो गया | लोग उस रास्ते से गुजरते और काली छाया देखकर बेहोश हो जाते और फिर वही सामान और कीमती चीजें गायब |
अब तो बात इतनी बढ़ गयी कि लोगों का जीना दूभर हो गया | इसी बीच एक दिन उसी रस्ते से साधुओं का एक काफिला निकला और रामगढ़ आ पहुंचा | पर लोगों को यह जानकार आश्चर्य हुआ कि उस साधुओं पर काली छाया का कोई असर नहीं हुआ | वे सोचने लगे कि हो सकता है कि काली छाया पर इस साधुओं की शक्ति का असर हुआ होगा | इसलिए सभी साधू सुरक्षित रामगढ़ पहुँच गए | किन्तु इसके बाद फिर वही सिलसिला शुरू हो गया |
एक दिन शाम होने से पहले रामगढ का ही एक लड़का दौड़ा – दौड़ा गाँव की ओर आया और गाँव के सरपंच को उसने कुछ बताया | सरपंच उस लड़के की बात सुनकर अचंभित रह गया | सरपंच ने तुरंत गाँव के बहुत से लोगों को इकठ्ठा किया और दौड़ चले उस जगह से कुछ दूरी पर जहाँ काली छाया का प्रकोप दिखाई देता था | सभी ने ध्यान से देखा तो पता चला कि काली छाया वाली सड़क के दोनों ओर जो पेड़ लगे थे उन पर कुछ लड़के छिपे बैठे थे | और किसी के वहां से गुजरने का इंतजार कर रहे थे |
इसी बीच सरपंच ने अँधेरा होने पर दो लोगों को सड़क के दूसरी ओर से गाँव की ओर इसी सड़क से जाने को कहा | जैसे ही वे सड़क पर पहुंचे | पेड़ पर बैठे लड़कों में से दो लड़कों ने लेज़र बीम से काली छाया बनाई | जिसे देखकर दोनों लड़के बेहोश होने का नाटक करने लगे | उन्हें बेहोश देख पेड़ से सभी लड़के उतर आये | जैसे ही वे उस दोनों बेहोश लड़कों के पास पहुंचे गाँव के सरपंच और अन्य गाँव वासियों ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें पकड़ लिया | पूछने पर पता चला कि उन्हें नशा करने की आदत थी जिसकी वजह से कोई उन्हें काम नहीं देता था | और नशा करने के लिए उन्हें ये रास्ता सूझा | सभी लुटेरों को पुलिस के हवाले कर दिया गया और जिस लड़के ने उन लुटेरों के बारे में सरपंच को जानकारी दी थी उसे सम्मानित किया गया |
अब रामगढ़ गाँव उस काली छाया के कहर से मुक्त हो चुका था | सारे रामगढ़ वासी ख़ुशी – ख़ुशी रहने लगे |

चिंपू गधे की समझदारी – कहानी

चिंपू गधे की समझदारी – कहानी

                                 चंपकवन के सभी जानवर एक – दूसरे के साथ बहुत ही प्रेम व्यवहार के साथ रहते थे | चंपकवन में ही चिंपू गधा अपने माता – पिता के साथ आलीशान बंगले में रहा करता था | चंपू गधे के माता – पिता को अपने धनी होने का बहुत ज्यादा ही घमंड था |

                                     चंपकवन के सभी जानवर चिंपू गधे की सादगी के कायल थे | चिंपू गधा अब बड़ा हो गया था | उसके माता – पिता को अब उसकी शादी की चिंता होने लगी थी | उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि उनकी बराबरी का कोई भी गधा परिवार न तो चंपकवन में था न ही आसपास के किसी और वन में | चिंपू गधे की माँ की वजह से दो – तीन रिश्ते यूं ही आये और चले गए | चूँकि चिंपू गधे की माँ को बारातियों का भव्य स्वागत और दहेज़ में बहुत सारा सामान चाहिए था | चिंपू गधे को माँ की इन बातों से लगने लगा कि इस जन्म में तो उसकी शादी होने वाली नहीं |
                                    एक दिन अचानक पास के जंगल कुंजनवन से चिंपू के लिए एक रिश्ता आया | चिंपू गधे के माता – पिता चूँकि पास के ही एक रिश्तेदार के पास गए थे | सो चिंपू ने ही उनका स्वागत किया | और उनसे आवश्यक बातें कर उनको समझा देता है कि वे किसी भी हालत में रिश्ते के लिए ना नहीं करें |
चिंपू के माता – पिता से बात करने के बाद कुंजनवन से आये लड़की के माता – पिता अपनी बेटी चिंकी गधी का हाथ चिंपू गधे के हाथ में देने को तैयार हो जाते हैं | शादी धूमधाम से हो जाती है | बारातियों का स्वागत भी और दहेज़ में ढेर सारी चीजें देखकर चिंपू गधे के माता – पिता भी बहुत खुश होते हैं | चंपकवन के सभी जानवर इस शादी का हिस्सा बनकर ख़ुशी से फूले नहीं समाते | क्यूँकि ऐसी खातिरदारी चंपकवन के किसी और जानवर की शादी में नहीं हुई थी |
                                            चिंपू की पत्नी चिंकी इस बात से बेहद खुश थी कि उसका पति चिंपू गधा बहुत ही सीधा सादा है | चिंकी अपने पति चिंपू गधे से पूछती है कि आपने इस शादी के लिए मना क्यों नहीं किया | चूंकि मेरा परिवार तो बहुत गरीब है | चिंपू ने बड़ी ही सादगी के साथ बताया कि मेरे माता – पिता की हैसियत के बराबर इस जंगल और आसपास के किसी भी जंगल में कोई भी नहीं है | उनकी दहेज़ लेने की आदत के चलते इस जन्म में मेरी शादी होने से थी | सो मैंने तुम्हारे माता – पिता से बात कर शादी का पूरा खर्च अपने हाथों में ले लिया | वैसे भी मुझे दहेज़ से सख्त नफरत है | अब मेरे माता – पिता भी खुश और तुम्हारा परिवार भी | और मैं और तुम भी तो इस शादी से खुश हैं |
                                  चिंपू गधे की पत्नी चिंकी अपने पति चिंपू के गले लग जाती है | दोनों ख़ुशी – ख़ुशी रहने लगते हैं |

अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'

Friday, 13 January 2023

वृद्धाश्रम – कहानी

 वृद्धाश्रम – कहानी

चंदेल जी के परिवार में दो बेटे मनोज और दिनेश के अलावा बेटी प्रिया भी थी l घर में चंदेल जी की पत्नी और माता सावित्री देवी भी रहती थीं l पिता को गुजरे वर्षों बीत गए थे l
चंदेल जी काफी समझदार व्यक्ति थे l घर में खुशी का माहौल बना रहता था l बच्चे भी दादी को खुश रखते थे l पर यह खुशी ज्यादा दिन तक न रह सकी l हुआ यूँ कि चंदेल जी के परिवार में दूर की बुआ घूमने आयीं l कुछ दिन रहीं और चली गईं l पड़ोस की मिश्रा जी एवं यादव जी की पत्नी भी कभी – कभी आ जाती और दादी से बातें करके चली जाती l किसी रिश्तेदार का घर आना अर्थात् भगवान का घर आना माना जाता है किन्तु जब ये मेहमान घर में फूट का बीज बो जाते हैं तब मन को कष्ट होता है | ऐसा ही चंदेल जी की बुआ ने किया और उनकी पड़ोसन ने | आइये आगे क्या हुआ देखते हैं इस कहानी में |
दो चार दिन बाद दादी के व्यवहार में परिवर्तन होना शुरू हो गया l अब दादी सास – बहू के टी वी सीरियल देखने की जिद करने लगी l बच्चों और दादी में कई बार तू – तू मैं – मैं होनी शुरू होने लगी l मामला और भी गंभीर होने लगा जब दादी अपनी बहु प्रिया पर तीखे प्रहार करने लगी l सभी दादी के इस व्यवहार से खुश नहीं थे l पर दादी के सिर पर तो मानो चंडी सवार हो गयी थी l अब दादी पड़ोसियों के घर भी जाने लगी और अपने परिवार की बुराईयां करने लगी l चंदेल जी का परिवार यह सब सहन करने की स्थिति में नहीं था l
चंदेल जी ने भी पूरी कोशिश की कि किसी तरह माँ के व्यवहार में पहले जैसा निखार आ जाये किन्तु वे भी असफल रहे l चंदेल जी ने अपनी माँ को कुछ दिन के लिए अपने छोटे भाई के पास भेज दिया ताकि कुछ बदलाव आ जाये l किन्तु दादी का यही व्यवहार वहाँ भी छोटे भाई और उसकी पत्नी के साथ भी बना रहा l सभी सोच में पड़ गए कि आखिर दादी ऐसा क्यों कर रही हैं l कुछ दिन बाद दादी वापस आ गयी l पर स्थिति वही बनी रही l
थक हारकर चंदेल जी ने एक निर्णय लिया और अपनी माँ को शहर के ही एक वृद्धाश्रम में छोड़ आए l अब दादी की हालत ख़राब होने लगी | पर मन मसोस कर वे आश्रम में रहने लगीं और घर के लोगों की सभी से चुगली करने लगीं | पर उनकी बातों का किसी पर कोई असर नहीं होता था l वे सब सुनते और मुस्कुरा देते l एक दिन आश्रम में कोई विशेष कार्यक्रम था l जोर शोर से तैयारियाँ हो रही थीं l सभी आज के कार्यक्रम के मेहमान को देखने के लिए उत्सुक थे l कार्यक्रम शुरू हुआ तो मेहमान की कुर्सी पर चंदेल जी विराजमान थे l उन्हैं देखते ही उनकी माँ जोर – जोर से चिल्लाने लगी l लोगों ने किसी तरह उन्हैं चुप कराया l
आश्रम के प्रबंधक महोदय ने चंदेल जी का स्वागत किया और इस आश्रम की स्थापना के लिए चंदेल जी को सम्मानित किया l अगले दिन चंदेल जी के बारे में किसी ने उनकी माँ को बताया कि आपके बेटे ने ही इस आश्रम की स्थापना की थी ताकि घर से बेघर हुए माता – पिता को इस आश्रम में जगह मिले और वे अपना जीवन आराम से गुजार सकें | एक और अच्छी बात ये है कि जिन बच्चों के माता – पिता ने अपने बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया उन्हें भी वे अपनी कोशिशों से उनके घर वापस भेज देते हैं ताकि उनके घर में पहले जैसी खुशियाँ वापस लौट सकें | अब चंदेल जी की माँ को अपने किये पर पछतावा होने लगा और उन्होंने भी अपने बर्ताव में परिवर्तन लाने शुरू कर दिए और आश्रम के अधिकारी से अपने घर के सभी सदस्यों से बात कराने को कहा | अधिकारी महोदय ने उनकी बात सभी से करवायी | दादी सभी से माफ़ी मांग रही थी | अपनी बहु से , बेटे से | सभी एक साथ उनको वापस घर ले जाने के लिए थोड़ी देर बाद ही वृद्धाश्रम आ पहुंचे |
चंदेल जी की माँ अपने आपको अपने परिवार के बीच पाकर बहुत खुश थी और घर के सभी लोग भी |

ढक्कन – कहानी

 ढक्कन – कहानी

मोहित अपने परिवार के साथ झुग्गी – झोपड़ी वाले इलाके में रहता था | माता – पिता दोनों दैनिक मजदूरी किया करते थे | घर में एक बहन भी थी जिया | जिया और मोहित की माँ आसपास के बड़े घर के लोगों के यहाँ झाड़ू – पोछे का काम करती थीं | मोहित के पिता पास ही एक फैक्ट्री में

काम किया करते थे | मोहित के पिता को शराब पीने का शौक था सो वे घर में किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं किया करते थे | घर का खर्च किसी तरह से चल रहा था | घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के बावजूद भी जिया के ब्याह को लेकर घर में सभी चिंचित थे |

घर का माहौल ठीक न होने की वजह से भी मोहित पढ़ाई नहीं कर सका और दोस्तों के साथ आवारागर्दी में समय बिताने लगा | अपना खर्च चलाने के लिए वह दोस्तों के साथ कभी किसी का पर्स चुराने लगा तो कभी रेलवे स्टेशन पर किसी का पॉकेट मारने लगा | यहाँ तक कि वह महिलाओं के गले से सोने की चैन की झपटमारी भी करने लगा | कई बार वह जेल भी हो आया | घर वाले भी कोशिश कर चुके पर मोहित पर इसका कोई असर नहीं होता था | घर वालों ने मोहित को कई बार समझाया कि किसी दूकान पर काम कर ले या सब्जी का ठेला ही खोल ले | पर उसे तो रातों – रात अमीर बनना था | सो घर वालों की बातों को अनसुना कर देता |

धीरे – धीरे मोहित की आदतें बिगड़ने लगीं | वह पुलिस को बेवकूफ बनाने की कोशिश करता किन्तु उसकी ज्यादातर घटनाएँ सी सी टी वी कैमरे में रिकॉर्ड हो जातीं जिसके कारण वह कई बार पुलिस के चंगुल में फंस गया | छोटी – छोटी हरकतों के कारण उसे सजा भी छोटी मिलती इसलिए उस पर इनका कम असर होता | मोहित और उसके दोस्त कोई नया तरीका खोजने लगे ताकि काम भी हो जाए और घटना कहीं रिकॉर्ड भी न हो और जेल जाने से बच जाएँ | उनके दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न शहर के बाहर की सड़कों पर सीवरेज पर लगे ढक्कनों को चुराया जाए | सो वे सभी इस काम पर लग गए | इस काम से उन्हें अच्छी रकम हाथ लगने लगी | जो रकम मिलती सब बराबर – बराबर बाँट लेते और अगली रात फिर वही ढक्कन को चुराने का खेल शुरू |

एक दिन सुबह – सुबह मोहित के घर पर उनके पडोसी जो मोहित के पिता के साथ फैक्ट्री में काम करते थे ने आकर बताया कि मोहित के पिता फैक्ट्री से लौटते वक़्त रात को सीवरेज टैंक में गिर गए और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया है आप लोग जाकर देख लो | उनकी हालत गंभीर है | मोहित . उसकी माँ और बहन को पता चला तो वे अस्पताल भागे पर वहां जाकर पता चला कि मोहित के पिता की मृत्यु हो गयी है | यह सुनते ही मोहित को अपने आप से नफरत होने लगी कि जिस सीवरेज टैंक में गिरकर उसके पिता की मृत्यु हुई उसका ढक्कन उसने ही एक रात पहले चुराकर बेच दिया था | मोहित को एहसास ही नहीं था कि उस टैंक में गिरकर किसी की मृत्यु भी हो सकती है |

मोहित ने ये बात किसी को नहीं बतायी पर उसने मन ही मन निश्चय किया कि आज के बाद मैं ऐसे कोई भी गंदे काम नहीं करूंगा और मेहनत करके ही दो वक़्त की रोटी जुटाऊँगा | मोहित की मेहनत रंग लायी और उसने अपनी मेहनत की दम पर अपनी बहन की शादी भी की और अपनी माँ को भी लोगों के घर काम करने से मना किया | वे सभी एक खुशहाल जिन्दगी व्यतीत करने लगे |