लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |
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Wednesday, 15 July 2026

युद्ध की विभीषिका - एक रचना

 युद्ध की विभीषिका

रणभूमि पर रक्तिम प्रात का विकराल उदय हुआ,
मानवता का निर्मल मुख आज धूल-धूसरित हुआ।
शंखनाद की गर्जना में करुणा का स्वर खो गया,
विजय-पताका की चाह में जीवन का दीप सो गया।

धधक उठीं धरती की साँसें अग्नि के उच्छ्वास से,
काँप उठी अम्बर की सीमा मृत्यु के संत्रास से।
लोहे की वर्षा ने हरित स्वप्नों को चूर किया,
ममता के आँचल को क्षणभर में ही दूर किया।

अश्रु-सरिताएँ बह चलीं उजड़े हुए द्वारों से,
मौन विलाप उठने लगा सूने पड़े परिवारों से।
वीरगति का गौरव भी पीड़ा से भर जाता है,
जब माँ का निर्जन आँगन पुत्र-वियोग सह जाता है।

नन्हे सपनों की किलकारी शस्त्रों में विलीन हुई,
स्नेह-सुगंधित जीवन-वीणा क्षणभर में ही क्षीण हुई।
धुएँ की काली चादर ने नभ का नीलापन हर लिया,
राख बनी आशाओं ने जीवन का आलोक छीन लिया।

सत्ता की क्षणभंगुर इच्छा ने कितना अनर्थ किया,
मानव के अंतर्मन का सारा माधुर्य व्यर्थ किया।
घृणा की ज्वाला जब-जब मानव-हृदय में पलती है,
सभ्यता की हर उपलब्धि पलभर में ही ढहती है।

विजय यदि मानवता खो दे, वह पराजय कहलाती है,
रक्तरंजित उपलब्धि केवल इतिहास रुलाती है।
शांति का श्वेत कपोत ही जीवन का श्रृंगार बने,
विश्वबंधुत्व का पावन संदेश सदा आधार बने।

करुणा के कोमल उपवन फिर से पुष्पित हो जाएँ,
प्रेम-सुधा के निर्झर जग के प्राणों में बह जाएँ।
शस्त्र नहीं, विश्वास सजे हर मानव के हाथों में,
दीप जले सद्भावना के धरती और आकाशों में।

आओ ऐसा विश्व रचें जहाँ वैराग्नि न प्रज्वलित हो,
हर हृदय में प्रेम, दया का नित्य नवीन संचित हो।
युद्ध नहीं, मानवता का हो युग-युग तक अभिनंदन,
यही धरा का धर्म अमर, यही सृष्टि का पावन वंदन।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

Tuesday, 14 July 2026

एकता का रहस्य - कहानी

 एकता का रहस्य

बरसों पुराना एक सुंदर गाँव था—हरितपुर। चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, आम और पीपल के विशाल वृक्ष, चहचहाते पक्षी और मेहनती लोगों से भरा यह गाँव अपनी खुशहाली के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

इसी गाँव में रामप्रसाद का परिवार रहता था। परिवार में उनकी पत्नी सरस्वती, बड़े बेटे मोहन, छोटे बेटे सोहन, बेटी गीता, बहुएँ सीमा और राधा, तथा चार प्यारे-प्यारे बच्चे थे। पूरा परिवार एक ही आँगन में रहता था। सुबह सब मिलकर काम करते, दोपहर में साथ भोजन करते और शाम को हँसी-मज़ाक के बीच दिन समाप्त होता।

गाँव के लोग अक्सर कहते,
"रामप्रसाद का परिवार देखो, जैसे एक माला में पिरोए हुए मोती हों।"

रामप्रसाद मुस्कुराकर कहते,
"घर बड़ा होने से नहीं, दिल बड़ा होने से खुशहाल बनता है।"

बदलती हवा

समय कभी एक जैसा नहीं रहता।

एक वर्ष बारिश बहुत कम हुई। खेतों की फसल आधी रह गई। आमदनी घटने लगी। इसी बीच गाँव में एक नया व्यापारी जगदीश आया। वह बहुत चालाक था। उसकी नज़र रामप्रसाद की उपजाऊ जमीन पर थी।

उसने सोचा,
"जब तक यह परिवार एक है, इनसे जमीन लेना असंभव है। पहले इनके बीच दरार डालनी होगी।"

उसने धीरे-धीरे अपनी योजना शुरू कर दी। एक दिन वह मोहन से मिला।

"मोहन जी, सारी मेहनत तो आप करते हैं। लेकिन कमाई बराबर बाँटी जाती है। यह कहाँ का न्याय है?"

मोहन ने पहले तो बात टाल दी, लेकिन वह बात उसके मन में कहीं बैठ गई।

दूसरे दिन जगदीश सोहन से मिला।

"आप तो पढ़े-लिखे हैं। अगर अलग होकर काम करें तो शहर में बड़ा कारोबार कर सकते हैं।"

धीरे-धीरे संदेह के छोटे-छोटे बीज दोनों भाइयों के मन में अंकुरित होने लगे।

छोटी बात, बड़ा विवाद

एक शाम खेत से लौटते समय मोहन ने कहा,
"इस बार पश्चिम वाले खेत में मैंने अधिक मेहनत की है। उसकी कमाई अलग होनी चाहिए।"

सोहन ने तुरंत उत्तर दिया,
"और मैंने नई सिंचाई की व्यवस्था करवाई थी। उसका क्या?"

बात बढ़ गई। बहुएँ भी अनजाने में अपने-अपने पतियों का पक्ष लेने लगीं।

घर का वातावरण बदल गया। जहाँ पहले हँसी गूँजती थी, अब वहाँ सन्नाटा था।

बच्चे भी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बड़े लोग अब साथ बैठकर बातें क्यों नहीं करते।

रामप्रसाद सब कुछ देख रहे थे, लेकिन वे जानते थे कि समझदारी थोपी नहीं जाती, उसे अनुभव से सीखा जाता है।

पहला झटका

इसी बीच गाँव में तेज़ आँधी और ओलावृष्टि हुई। कई खेत बर्बाद हो गए।

मोहन अकेले अपने खेत को बचाने दौड़ा, लेकिन अकेले वह कुछ नहीं कर पाया।

सोहन भी अपने हिस्से की चिंता में लगा रहा। पहले जहाँ पूरा परिवार मिलकर फसल बचा लेता था, इस बार अलग-अलग प्रयास नाकाम रहे। नुकसान पहले से कहीं अधिक हुआ।

रात को रामप्रसाद ने बस इतना कहा,
"जब हाथ अलग-अलग दिशा में खिंचते हैं, तो ताकत कम हो जाती है।"

लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

अलग होने का निर्णय

कुछ दिनों बाद दोनों भाइयों ने घर बाँटने का फैसला कर लिया। आँगन के बीच में दीवार खड़ी कर दी गई।

रसोई अलग हो गई। गायें बाँट दी गईं। खेती के औज़ार तक बाँट दिए गए। सबसे अधिक दुख बच्चों को हुआ।

जो बच्चे कल तक साथ खेलते थे, अब उन्हें अलग रहने को कहा गया।

छोटी पोती पायल रोते हुए बोली,
"दादा जी, क्या दीवार रिश्तों को भी बाँट देती है?"

रामप्रसाद की आँखें भर आईं।

उन्होंने केवल इतना कहा,
"दीवार ईंटों की नहीं होती बेटा, मन की होती है।"

संकट की दस्तक

कुछ महीनों बाद खबर आई कि पास की नदी का बाँध टूटने वाला है। गाँव में अफरा-तफरी मच गई।

लोग अपना सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। रामप्रसाद का घर भी खतरे में था।

मोहन अपने हिस्से का सामान बचाने लगा। सोहन अपने हिस्से का।

किसी को यह ध्यान ही नहीं रहा कि सबसे पहले बुज़ुर्गों और बच्चों को सुरक्षित निकालना चाहिए।

अचानक तेज़ पानी का बहाव आया। छोटी पायल और उसका भाई चिंटू घर के पिछवाड़े फँस गए।

चारों ओर पानी भर चुका था। महिलाएँ रोने लगीं।

एकता की परीक्षा

उस समय मोहन ने बिना कुछ सोचे पानी में छलाँग लगा दी। लेकिन तेज़ धारा उसे पीछे धकेलने लगी।

तभी सोहन भी दौड़कर आया।

"भैया, अकेले नहीं होगा।"

दोनों भाइयों ने एक लंबी रस्सी बाँधी। गाँव वालों ने दूसरी ओर से रस्सी पकड़ ली।

मोहन आगे बढ़ा। सोहन ने उसका हाथ मज़बूती से थाम रखा था। कई बार दोनों फिसले। कई बार लगा कि वे बह जाएँगे। लेकिन एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा।

आख़िरकार दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा। 

सरस्वती बच्चों को सीने से लगाकर रोने लगीं। उस रात पहली बार दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

रामप्रसाद का रहस्य

अगली सुबह रामप्रसाद ने पूरे परिवार को आँगन में बुलाया।

उन्होंने सबको लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर दिया।

"इसे तोड़ो।"

मोहन ने पूरी ताकत लगाई। नहीं टूटा। 

सोहन ने कोशिश की। वह भी असफल रहा।

फिर रामप्रसाद ने वही लकड़ियाँ अलग-अलग कर दीं।

अब हर लकड़ी आसानी से टूट गई।

रामप्रसाद मुस्कुराए।

"यही है एकता का रहस्य।"

उन्होंने आगे कहा,

"कल यदि तुम दोनों अलग-अलग बच्चों को बचाने जाते, तो शायद कोई भी वापस न आता। लेकिन जब तुम एक हुए, तब असंभव भी संभव हो गया।"

"घर केवल दीवारों से नहीं बनता। घर विश्वास, सहयोग, त्याग और प्रेम से बनता है।"

"जिस परिवार में 'मैं' बड़ा हो जाता है, वहाँ 'हम' छोटा पड़ जाता है। और जहाँ 'हम' सबसे बड़ा होता है, वहाँ कोई संकट बड़ा नहीं होता।"

दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बहने लगे।

नई शुरुआत

उसी दिन आँगन की दीवार गिरा दी गई। रसोई फिर एक हो गई।

बच्चे खुशी से उछल पड़े।

पायल बोली,
"अब हम फिर साथ खेलेंगे!"

सीमा और राधा ने मिलकर पहली बार फिर से एक साथ रोटी बनाई। शाम को पूरा परिवार वर्षों बाद एक साथ बैठकर भोजन कर रहा था। गाँव वालों ने भी राहत की साँस ली।

अंतिम चुनौती

कुछ महीनों बाद सरकार ने गाँव में आधुनिक कृषि प्रतियोगिता आयोजित की।

शर्त थी कि जो परिवार सबसे अधिक उत्पादन करेगा और नई तकनीक अपनाएगा, उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा।

कई लोगों ने कहा,
"रामप्रसाद का परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा।"

लेकिन इस बार पूरा परिवार एकजुट था।

मोहन खेती संभालता। सोहन नई तकनीक लागू करता।

सीमा और राधा बीजों की देखभाल करतीं। गीता बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खेतों का हिसाब रखती।

बच्चे पौधों को पानी देते और जैविक खाद तैयार करने में मदद करते।

कुछ ही महीनों में खेत लहलहा उठे। फसल पहले से कहीं अधिक हुई।

प्रतियोगिता में रामप्रसाद का परिवार पूरे जिले में प्रथम आया।

जब मंच पर पुरस्कार दिया गया तो अधिकारी ने पूछा,

"आपकी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?"

रामप्रसाद ने मुस्कुराकर अपने परिवार की ओर देखा और बोले,

"हमारे खेतों की मिट्टी उपजाऊ है, लेकिन उससे भी अधिक उपजाऊ हमारे रिश्ते हैं। जहाँ परिवार एक रहता है, वहाँ मेहनत कई गुना बढ़ जाती है और सफलता स्वयं चलकर आती है।"

पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

शिक्षा

उस दिन हरितपुर के लोगों ने केवल एक परिवार की जीत नहीं देखी, बल्कि एक ऐसा सत्य भी सीखा जिसे समय कभी नहीं बदल सकता—

धन, संपत्ति और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन परिवार की एकता ही जीवन को सच्ची खुशी, सुरक्षा और सम्मान देती है।

एकता का रहस्य किसी जादू में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग, त्याग, क्षमा और प्रेम में छिपा होता है। यही वह शक्ति है जो हर कठिनाई को अवसर और हर संकट को विजय में बदल देती है।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

कहानीकार 

Sunday, 26 April 2026

नीली स्क्रीन का साया - कहानी

 नीली स्क्रीन का साया

रात के बारह बज रहे थे।
घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था। बाहर सर्द हवा पेड़ों की सूखी पत्तियों को हिलाकर अजीब-सी सरसराहट पैदा कर रही थी। कमरे में केवल एक चीज़ चमक रही थी—मोबाइल की नीली स्क्रीन।
आरव, सातवीं कक्षा का छात्र, अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी थीं। माँ-पापा सो चुके थे, बहन भी। लेकिन आरव की दुनिया उस छोटे से मोबाइल में कैद थी।
“बस एक रील और… बस एक वीडियो और…”
वह खुद से कहता और उँगलियाँ स्क्रीन पर सरकती जातीं।
अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमक उठी।
एक नया अकाउंट सामने आया—
“नीलाया_1890”
प्रोफाइल फोटो में एक धुँधली-सी लड़की थी, नीली आँखें और बेहद फीकी मुस्कान।
कुछ ही सेकंड में उस अकाउंट से मैसेज आया—
“तुम भी रात में जागते हो?”
आरव चौंक गया।
“हाँ… तुम कौन हो?” उसने टाइप किया।
उत्तर आया—
“मैं भी तुम्हारी तरह अकेली हूँ।”
आरव को अजीब लगा, फिर भी उसे अच्छा लगा कि कोई उससे बात कर रहा है। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती गई। नीलाया को पता था कि आरव कौन-सा गेम खेलता है, कौन-सी क्लास में है, किस स्कूल में पढ़ता है।
“तुम्हें ये सब कैसे पता?” आरव ने पूछा।
मैसेज आया—
“मैं सब देखती हूँ।”
उस रात के बाद नीलाया रोज़ ऑनलाइन आने लगी। आरव स्कूल से आते ही मोबाइल खोल लेता। न होमवर्क, न खेल, न परिवार से बातें।
धीरे-धीरे अजीब बातें होने लगीं।
मोबाइल अपने आप ऑन हो जाता।
रात में नोटिफिकेशन बजता।
कभी-कभी स्क्रीन पर नीली रोशनी फैल जाती, जैसे कोई उसे देख रहा हो।
एक रात नीलाया ने लिखा—
“तुम मुझे मिलना चाहोगे?”
आरव ने उत्सुकता से हाँ कर दी।
“तो कल रात 12 बजे पुराने कुएँ के पास आना।”
वह कुआँ गाँव के बाहर था—जहाँ कोई नहीं जाता था। कहा जाता था कि वहाँ कभी एक लड़की गिरकर मर गई थी।
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पुराने कुएँ की रहस्यमयी रात
अगली रात आरव चुपचाप घर से निकल पड़ा।
कुएँ के पास पहुँचते ही ठंडी हवा चलने लगी। चारों ओर अंधेरा था।
“नीलाया?” उसने काँपती आवाज़ में पुकारा।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट हुई।
वह मुड़ा तो देखा—नीली साड़ी पहने एक लड़की, बेहद पीली त्वचा, और आँखों में अजीब चमक।
“तुम आ गए…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
आरव डर गया, लेकिन उत्सुकता ने उसे रोक लिया।
“तुम… ऑनलाइन वही हो न?”
लड़की मुस्कराई।
“हाँ… मैं वही हूँ।”
तभी अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें पता है, मैं कैसे मरी थी?”
आरव ने सिर हिला दिया।
“मैं भी मोबाइल में ही खोई रहती थी। माँ-पापा बुलाते थे, दोस्त बुलाते थे… लेकिन मैं स्क्रीन में डूबी रहती थी। एक रात यहाँ वीडियो देखते-देखते पैर फिसल गया… और मैं गिर गई।”
कुएँ से ठंडी हवा का झोंका आया।
लड़की की आवाज़ बदलने लगी—
“और अब मैं उन बच्चों को ढूँढती हूँ जो मेरी तरह खो जाते हैं…”
अचानक उसका चेहरा विकृत हो गया।
नीली आँखें चमक उठीं।
“तुम भी मेरे साथ रहोगे!”
वह आरव की ओर बढ़ी।
आरव डरकर पीछे हटा और फिसल गया।
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नीली स्क्रीन का जादू
आरव ने आँखें खोलीं तो खुद को अपने कमरे में पाया।
सब कुछ सामान्य था।
“क्या वह सपना था?” उसने सोचा।
तभी मोबाइल बज उठा।
नीलाया_1890 ऑनलाइन थी।
मैसेज आया—
“आज भी आओगे?”
आरव के हाथ काँप गए।
उसे लगा कोई उसे लगातार देख रहा है।
स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा। दोस्तों ने कहा—
“तू पहले हमारे साथ खेलता था, अब बस फोन देखता रहता है।”
माँ ने डाँटा—
“आरव, पढ़ाई पर ध्यान दो।”
लेकिन वह फिर भी मोबाइल में उलझा रहा।
उस रात मोबाइल की स्क्रीन से नीली रोशनी निकलने लगी।
धीरे-धीरे कमरे में ठंड फैल गई।
एक साया दीवार पर उभरा।
नीलाया का चेहरा सामने था।
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
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सच का सामना
डर के मारे आरव ने मोबाइल फेंक दिया।
वह सीधे माँ-पापा के कमरे में भागा और सब बता दिया।
पापा गंभीर हो गए।
अगले दिन वे उसे उस कुएँ के पास ले गए।
वहाँ एक बूढ़े चौकीदार ने बताया—
“सालों पहले यहाँ एक लड़की गिरकर मर गई थी। वह हमेशा मोबाइल में लगी रहती थी। किसी से बात नहीं करती थी।”
आरव को सिहरन हो गई।
पापा ने समझाया—
“बेटा, मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसका गलत इस्तेमाल खतरनाक है। इससे लोग अपनों से दूर हो जाते हैं।”
माँ ने कहा—
“हमारे साथ समय बिताओ, असली दुनिया देखो।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसे समझ आ गया कि वह धीरे-धीरे उसी राह पर जा रहा था।
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नई शुरुआत
उस दिन के बाद आरव ने मोबाइल का समय कम कर दिया।
वह दोस्तों के साथ खेलने लगा।
माँ-पापा से बातें करने लगा।
किताबें पढ़ने लगा।
एक दिन अचानक मोबाइल में नोटिफिकेशन आया।
नीलाया_1890 ने अंतिम संदेश भेजा—
“तुम बच गए… काश मैं भी बच पाती।”
फिर वह अकाउंट गायब हो गया।
उस रात आरव ने चैन की नींद सोई।

संदेश (बच्चों के लिए)

सोशल मीडिया और मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम उनमें जरूरत से ज्यादा डूब जाएँ, तो हम अपने परिवार, दोस्तों और असली दुनिया से दूर हो जाते हैं। कभी-कभी यह दूरी खतरनाक भी हो सकती है।

मोबाइल का इस्तेमाल करें, लेकिन मोबाइल के गुलाम न बनें।
अपनों के साथ समय बिताएँ, खेलें, सीखें और असली दुनिया को अपनाएँ।

क्योंकि असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
आपके आसपास की दुनिया में है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी

 परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी 

गाँव का नाम था सोनपुर। चारों तरफ हरियाली, पीपल के पेड़, कच्ची गलियाँ और एक पुराना स्कूल—जिसकी दीवारों पर समय की दरारें साफ दिखती थीं। इसी गाँव में रहता था आरव, पाँचवीं कक्षा का छात्र। पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन मोबाइल फोन से उसे कुछ ज़्यादा ही प्यार था।
सुबह उठते ही मोबाइल, सोते समय मोबाइल, खाते समय मोबाइल, पढ़ते समय मोबाइल—आरव की दुनिया मोबाइल में सिमट गई थी।
उसकी माँ अक्सर कहती,
“बेटा, मोबाइल ज़रूरी है, लेकिन ज़िंदगी नहीं।”
पर आरव हँस देता।
एक दिन उसके पापा शहर से नया स्मार्टफोन लेकर आए। बड़ा स्क्रीन, तेज़ इंटरनेट और ढेर सारे ऐप्स। आरव की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
अब वह घंटों रील्स, शॉर्ट वीडियो और गेम्स में खोया रहता।
धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगे—
• पढ़ाई में मन नहीं लगता
• नींद पूरी नहीं होती
• चिड़चिड़ा रहने लगा
• अकेला रहने लगा
• दोस्तों से बात कम हो गई
एक रात, जब पूरा गाँव सो चुका था, आरव अपने कमरे में मोबाइल चला रहा था। अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमकने लगी। एक नया नोटिफिकेशन आया—
प्रोफाइल फोटो में सिर्फ़ काली परछाईं थी।
आरव ने सोचा कोई मज़ाक होगा और बिना सोचे समझे Accept कर लिया।
तुरंत एक मैसेज आया—
“तुम मुझे देख सकते हो… पर मैं तुम्हें देख रहा हूँ।”
आरव को हल्की सिहरन हुई, पर उसने सोचा यह कोई फेक अकाउंट होगा।
उसने जवाब लिखा—
“कौन हो तुम?”
उत्तर आया—
“मैं वही हूँ जो मोबाइल के अंदर रहता है… और बच्चों को अपने साथ ले जाता है।”
अब आरव को डर लगा। उसने मोबाइल बंद कर दिया और सो गया।
पहली परछाईं
अगली रात फिर वही नोटिफिकेशन।
“तुम मुझसे भाग नहीं सकते।”
मोबाइल अपने आप ऑन हो गया। स्क्रीन पर वीडियो चलने लगा।
वीडियो में एक लड़का था—ठीक आरव जैसा दिखने वाला—जो अँधेरे कमरे में मोबाइल पकड़े बैठा था। उसके पीछे एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।
अचानक परछाईं ने लड़के को पकड़ लिया।
आरव डर से चीख पड़ा।
उसी रात उसने सपना देखा—
वह एक अँधेरी दुनिया में है जहाँ हजारों बच्चे मोबाइल पकड़े खड़े हैं। सबकी आँखें नीली रोशनी से चमक रही हैं। उनके पीछे काली परछाइयाँ घूम रही हैं।
एक आवाज़ गूँजी—
“जो बच्चे मोबाइल को अपनी दुनिया बना लेते हैं…
वो हमारी दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।”
आरव की नींद खुल गई। पसीने से पूरा शरीर भीगा था।
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🧓 पुरानी लाइब्रेरी और रहस्य
अगले दिन स्कूल में उसने यह बात अपने दोस्त मोहन को बताई। मोहन ने उसे स्कूल के पीछे बनी पुरानी लाइब्रेरी में चलने को कहा।
वहाँ एक बूढ़े बाबा रहते थे—सब उन्हें “ज्ञान बाबा” कहते थे।
बाबा ने पूरी बात सुनी और गंभीर होकर बोले—
“बेटा, ये कोई साधारण आत्मा नहीं है।
ये डिजिटल आत्मा है।”
आरव हैरान—
“डिजिटल आत्मा?”
बाबा बोले—
“बहुत साल पहले एक बच्चा था—नाम था शिव।
वो मोबाइल और इंटरनेट का इतना आदी था कि उसने दुनिया से रिश्ता तोड़ लिया।
एक रात मोबाइल चलाते-चलाते उसकी मौत हो गई।
उसकी आत्मा मोबाइल की दुनिया में भटकती रह गई।
अब वो बच्चों को सोशल मीडिया, मोबाइल और स्क्रीन की दुनिया में खींच लेता है।”
आरव काँप उठा।
बाबा बोले—
“अगर बचना है, तो तीन काम करने होंगे:
1. मोबाइल से दूरी
2. असली दुनिया से दोस्ती
3. मन से डर को निकालना”

आख़िरी रात
उस रात फिर मैसेज आया—
“आज तुम मेरे साथ आओगे।”
मोबाइल अपने आप चमकने लगा। कमरे की लाइट बंद हो गई। दीवार पर काली परछाईं उभर आई।
पर इस बार आरव डरा नहीं।
उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
माँ-पापा की तस्वीर देखी।
दोस्तों की याद की।
स्कूल, मैदान, पेड़, किताबें—सब याद आया।
वह बोला—
“तुम मेरी ज़िंदगी नहीं हो।
मेरी दुनिया मोबाइल नहीं है।”
परछाईं चिल्लाई—
“तुम झूठ बोलते हो!”
आरव ने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
अचानक सब कुछ शांत हो गया।
कमरा रोशनी से भर गया।
परछाईं गायब हो गई।
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🌞 नई सुबह, नई ज़िंदगी
अगली सुबह आरव जल्दी उठा।
मोबाइल अलमारी में रखा।
स्कूल गया।
दोस्तों के साथ खेला।
माँ की मदद की।
किताबें पढ़ीं।
अब वह मोबाइल का इस्तेमाल करता था—
लेकिन सीमित समय के लिए।
उसने स्कूल में बच्चों को कहानी सुनाई।
टीचर ने कहा—
“डर के साथ सीख—यही सबसे मजबूत शिक्षा होती है।”
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🌈 कहानी का संदेश

बच्चों के लिए सीख:
1. मोबाइल बुरा नहीं है,
लेकिन उसका ज़्यादा इस्तेमाल खतरनाक है
2. सोशल मीडिया दिखावटी दुनिया है
3. असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
रिश्तों में होती है
4. दोस्ती, खेल, किताबें, परिवार—
यही असली दुनिया है
5. जो बच्चे मोबाइल को दुनिया बना लेते हैं,
वो असली दुनिया खो देते हैं

✨ अंतिम पंक्तियाँ

“मोबाइल साधन है, संसार नहीं
स्क्रीन रोशनी है, सूरज नहीं
डिजिटल दुनिया आकर्षक है,
पर असली दुनिया ही जीवन है।”

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम


क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग

 क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग

क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग
क्यूँ कर स्वाभिमान को दांव पर लगा लेते हैं लोग

क्यूँ कर राजनीति अपने मार्ग से भटक रही है
क्यूँ कर कुर्सी के लिए अनैतिक रास्ते अपना रहे हैं लोग

जनता खुद को ठगा सा कर रही है महसूस
क्यूँ कर सपनों को धराशायी कर रहे हैं लोग

जिसको माध्यम बनाके खुद को किया स्थापित
उसी के घर में गड्ढे खोद रहे हैं लोग

रेवड़ी बांट बाँटकर लोगों को कर रहे हैं वो गुमनाम
कुर्सी के मोह मे, देश से गद्दारी कर रहे हैं लोग

क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग
क्यूँ कर स्वाभिमान को दांव पर लगा लेते हैं लोग l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

विचार

 विचार

जब अनैतिक रास्ते दैनिक जीवन का हिस्सा होने लगें तो समझ लेना चाहिए कि आप रावण, कंस या फिर कहें कि आप दुर्योधन बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

Sunday, 11 May 2025

अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम" के 15 बेहतरीन विचार

आओ दर्द मिटायें

 आओ दर्द मिटायें

उन जीवित सिसकती सांसों का
जो जीवित होते हुए भी जीवित नहीं हैं I

आओ दर्द मिटायें
उन भीगी आंखों का
जो ना चाहते हुए भी ग़मगीन हैं I

आओ दर्द मिटायें
उस सिसकते बालपन का
जो अभावों से ग्रसित हैं I

आओ दर्द मिटायें
उस बेबस चहरों की थकान का
जो चीथड़ों में लिपटे हुए हैं I

आओ दर्द मिटायें
उन जीवित रूहों का
जो जीवन को तरस रही हैं I

आओ दर्द मिटायें
उस मुस्कान रहित बालपन का
जो अथाह पीड़ा से ग्रसित है I

आओ दर्द मिटायें
उन तड़पती जीवित आत्माओं का
जो रोगों से ग्रसित हैं I

Tuesday, 6 May 2025

विचार

 विचार

तुम्हारे द्वारा किए गए सत्कर्म ही तुम्हारा धर्म है, जिस दिन इस बात का तुम्हें बोध हो जाएगा उस दिन मानव धर्म तुम्हारे लिए सर्वोपरि हो जाएगा l सारे द्वेष मिट जाएंगे और तुम खुद को उस परमात्मा के समीप पाओगे l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

विचार

 विचार

तुम्हारे द्वारा किए गए सत्कर्म ही तुम्हारा वास्तविक धर्म है इस बात का जिस दिन तुम्हें बोध हो जाएगा उस दिन मानव धर्म तुम्हारे लिए सर्वोपरि हो जाएगा l तुम्हारे सारे क्लेश समाप्त हो जाएंगे और तुम खुद को उस परमात्मा के बहुत समीप पाओगे l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

मुझको हो हर पल तेरा एहसास

 मुझको हो हर पल तेरा एहसास

तू यहीं – कहीं है मेरे आसपास

हर पल जुबां पर हो तेरा नाम
तू ही सँवारे सबके काम

तेरे आदेश से ही रोशन जिन्दगी
तेरी मर्जी से होती रोशन कायनात

तू चाहे तो पल में राजा को रंक कर दे
तू चाहे तो पल में जिन्दगी बदल दे

एक तेरे चरणों का जो मिल जाए सहारा
दीदार हो जाए मोक्ष राह का द्वारा

तेरी चंचल चितवन पर रीझे हैं सभी
तेरे चरणों की लालसा में जी रहे हैं सभी

हमें भी अपने चरणों का दास कर ले
थोड़ी सी भक्ति का हमें भी वर दे

जियें तो बस एक तेरे नाम का सहारा लेकर
तू चाहे तो मुझे भी पार करा दे मालिक

मुझको हो हर पल तेरा एहसास
तू यहीं – कहीं है मेरे आसपास

हर पल जुबां पर हो तेरा नाम
तू ही सँवारे सबके काम


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

विचार

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जब तुम खुद से ही रूठ जाओ तो किसी रूठे को मनाने की कोशिश करना I यदि वो मान जाए तो समझ लेना तुम्हारी जिन्दगी दूसरों की अमानत हो गयी है I

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

Saturday, 15 March 2025

विचार

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जब भी आपके प्रयासों को सकारात्मक ऊर्जा का सानिध्य प्राप्त होता है तब एक नयी इबारत का सृजन होता है l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

विचार

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जब भी आप निराशा के दौर से गुजर रहे होते हैं तब आपकी मंजिल भी आपसे कोसों दूर कहीं गुमनामी के अंधेरे में पनाह ले लेती है l इसलिए आपको चाहिए कि आप सकारात्मक ऊर्जा के साथ – साथ खुद पर अपना विश्वास बनाए रखें l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

विचार

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दिशाहीन मार्ग पर चलने से मंजिल की प्राप्ति की कल्पना करना व्यर्थ है ठीक उसी तरह जैसे कुमार्ग पर चलकर मोक्ष की प्राप्ति की कल्पना करना l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

चिम्पू जी की योगा क्लास – कहानी

 चिम्पू जी की योगा क्लास – कहानी

चंपकवन की शान माने जाने वाला चिम्पू हिरण एक पेशेवर योगा शिक्षक था | उसकी योगा क्लास की ख्याति आसपास के जंगलों में भी थी | अपनी शारीरिक समस्याओं को लेकर भी आसपास के जंगलों से भी जानवर चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र आया करते थे | चिम्पू हिरण सभी से बहुत ही मृदु भाषा में बात किया करता था जिसके कारण सभी जानवरों को अपने समस्याएँ बहुत ही छोटी महसूस हुआ करती थी और वे खुद को तरोताजा और खुश मह्सूस किया करते थे | योगा के लगभग सभी आसनों के साथ – साथ चिम्पू हिरण को ज्यादातर बीमारियों के इलाज़ की भी अच्छी – खासी जानकारी थी या यूं कहें कि उसे महारत हासिल थी | चिम्पू हिरण को सभी आसनों से होने वाले लाभ के साथ – साथ यह भी जानकारी थी कि कौन सा आसन कब करना है और कैसे करना है ताकि सभी को उसका पूरा – पूरा लाभ मिल सके |




इसी चंपकवन में एक चिपलू बिलौटा रहता था | एक दिन चिपलू बिलौटा भी चिम्पू हिरण के पास अपनी समस्या लेकर आया और उसने अपनी समस्या चिम्पू हिरण को बतायी | चिम्पू हिरण ने चिपलू बिलौटे की नब्ज़ देखी और उसे कुछ आसन बताये और कहा कि उसे यहीं पर रहकर ये आसन उसकी निगरानी में करने होंगे और साथ ही कुछ आयुर्वेदिक दवाएं भी लेनी होंगी ताकि वह पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए | चिपलू बिलौटा कुछ दिन चिम्पू हिरण के ही स्वास्थ्य केंद्र में रहा | उसके बाद एक दिन वह वहां से अचानक गायब हो गया और पूरे जंगल में यह खबर फैला दी कि मुझे चिम्पू हिरण के इलाज और योगा आसनों से कुछ भी लाभ नहीं हुआ और उसकी तबीयत पहले से भी ज्यादा ख़राब हो गयी |


यह खबर जंगल में और आसपास के जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी | चिम्पू हिरण को यह सब सुनकर बड़ा ही दुःख हुआ | किन्तु उसने इस बात को ज्यादा तूल न देते हुए इसके शीघ्र निवारण के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया और जंगल के राजा झबरू शेर से जाकर कहा कि चिपलू बिलौटा मेरे पेशे को लेकर गलत खबर फैला रहा है | आपसे अनुरोध है कि उसे रोकिये और सही फैसला सुनाइये ताकि दूसरे बीमार जानवर मेरे इलाज़ और आसनों के लाभ से वंचित न हों |


जंगल के राजा झबरू शेर ने अगले दिन जंगल में सभा का आयोजन किया ताकि चिम्पू हिरण और चिपलू बिलौटे की बात सुनी जाए और इस मसले का शीघ्र निपटारा किया जाए | सभा का आयोजन किया गया एक ओर चिम्पू हिरण तो दूसरी ओर चिपलू बिलौटा खड़े थे | जंगल के राजा झबरू शेर ने सभा की कारवाई शुरू करने को कहा | सबसे पहले चिपलू बिलौटे की बात सुन गयी और उसके बाद चिम्पू हिरण की बात सुनी गयी | दोनों की बात सुनने के बाद झबरू शेर कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं था सो उसने सबसे पहले चिपलू बिलौटे से पूछा कि जब तुम चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र आये थे तब तुम्हें क्या बीमारी थी | इसके जवाब में चिपलू बिलौटे ने कहा कि मुझे सांस की बीमारी थी | किन्तु चिम्पू हिरण ने कहा कि इसे सांस की बीमारी नहीं थी अपितु इसे कैंसर की बीमारी थी जिसे मैंने योगा के आसनों और आयुर्वेदिक दवाओं से ठीक किया | एक बात और कि मेरे स्वास्थ्य में केंद्र आने के एक सप्ताह पहले जंगल में पंद्रह किलोमीटर की मैराथन दौड़ का आयोजन किया गया था जिसमे इस चिपलू बिलौटे ने भी भाग लिया था | यदि ये सांस की बीमारी से पीड़ित होता तो उस दौड़ में भाग कैसे ले सकता था | ऐसा कहते ही झबरू शेर को चिम्पू हिरण की बात ठीक लगी | अब तो चिपलू बिलौटा घबराने लगा और उसे लगा कि वह अब और ज्यादा झूठ नहीं बोल सकता |


इसके बाद चिपलू बिलौटे से बताया कि इसी जंगल के ज्यादातर जानवर मुझे पसंद नहीं करते थे और मुझे नासमझ और हर एक बात पर बेवकूफ कहा करते थे जिसके कारण मुझे अपने आप से भी घृणा होने लगी | इसी बीच मुझे चंपकवन के ही एक जानवर मोनू बंदर से मिलने का मौका मिला | मोनू बंदर की बातों ने मुझमे साहस और ऊर्जा का संचार किया उसने ही मुझे बताया कि तुम इस जंगल के सबसे समझदार जानवर हो | फिर क्या था मैं उसकी बातों में आ गया और उसने ही मुझे चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र जाने और झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया | मुझे नहीं पता था कि वह मेरा इस्तेमाल चिम्पू हिरण को बदनाम करने के लिए कर रहा है | इसके बाद मोनू बंदर को सभा में बुलाया गया और उससे कड़ाई के साथ पूछा गया तो उसने बताया कि उसे चिम्पू हिरण की लोकप्रियता रास नहीं आ रही थी और वह चाहता था कि किसी तरह से चिम्पू हिरण का स्वास्थ्य केंद्र बंद हो जाए और उसके बाद वह खुद का एक स्वास्थ्य केंद्र खोल सके |


चिपलू बिलौटे को अपने आप पर शर्म आ रही थी कि क्यों चम्पकवन के लोगे उसे बेवकूफ कहते थे शयद वे ठीक कहते थे | दूसरी ओर मोनू बंदर भी अपने आपको कोस रहा था | झबरू शेर ने दोनों चिपलू बिलौटे और मोनू बंदर को चिम्पू हिरण के स्वास्थ्य केंद्र में अगले छः माह तक मरीजों की सेवा करने की सजा सुनाई | जिसे दोनों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | जंगल के सभी जानवर जंगल के राजा झबरू शेर के फैसले से बहुत खुश हुए | अब पहले की तरह ही चिम्पू हिरण का स्वास्थ्य केंद्र लोगों की सेवा करने लगा |

अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम" का अंदाज़े शायरी