लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Sunday, 26 April 2026

भूतिया महल - कहानी

 भूतिया महल

गाँव के उत्तर छोर पर, सालों से खड़ा एक जर्जर-सा महल था। टूटी हुई खिड़कियाँ, झूलते दरवाज़े, दीवारों पर उगी काई और हर समय वहाँ पसरा रहने वाला सन्नाटा—इन सबके कारण लोग उसे भूतिया महल कहते थे। शाम ढलते ही उस ओर कोई झाँकने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को डराने के लिए बड़े बस इतना कह देते—“पढ़-लिख लो, वरना भूतिया महल तुम्हें उठा ले जाएगा।”
इसी गाँव में रहता था मोंटू—कामचोरी का जीता-जागता उदाहरण। न पढ़ाई में मन लगता, न घर के किसी काम में। माँ जब कहती, “बेटा, ज़रा किताब खोल लो,” तो मोंटू जम्हाई लेकर कह देता, “अभी तो बहुत समय है।” पिता खेत से थके-हारे लौटते और कहते, “कुछ तो सीख ले,” तो वह कंधे उचका देता। उसे बस दोस्तों के साथ घूमना, गिल्ली-डंडा खेलना और बेवजह हँसना आता था।
मोंटू के दोस्त—गोलू, पिंटू और चीकू—अक्सर उसे चिढ़ाते रहते।
“अरे मोंटू, तू तो पैदा ही आराम करने के लिए हुआ है,” गोलू हँसता।
“कल बड़ा आदमी बनेगा—नींद विशेषज्ञ!” पिंटू ताना मारता।
मोंटू बाहर से हँस देता, पर भीतर कहीं कुछ चुभता था। उसे लगता था कि वह कुछ कर सकता है, पर आलस और डर उसे जकड़े रहते।
एक दिन स्कूल में अध्यापक ने घोषणा की—“अगले महीने वार्षिक परीक्षा है। जो मेहनत नहीं करेगा, वही पछताएगा।” पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया, सिवाय मोंटू के। वह खिड़की से बाहर ताक रहा था—उसी भूतिया महल की ओर।
उसी शाम दोस्तों ने शर्त लगा दी।
“हिम्मत है तो आज रात भूतिया महल के भीतर जाकर आ,” चीकू ने कहा।
“कामचोर कहीं का! डरपोक!” पिंटू ने जोड़ा।
मोंटू का अहंकार जाग उठा। उसने बिना सोचे कहा, “ठीक है, मैं जाऊँगा।”
रात गहरी हो चुकी थी। चाँद बादलों में छिपा-छिपा सा खेल रहा था। मोंटू दिल पर पत्थर रखकर महल के फाटक तक पहुँचा। फाटक चरमराया—किर्र…किर्र…—जैसे किसी ने चेतावनी दी हो। वह काँपा, पर कदम आगे बढ़ा दिए। भीतर घुसते ही ठंडी हवा का झोंका आया और दीपक की लौ थरथरा उठी।
अचानक उसे लगा जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा—“वापस लौट जाओ…”
मोंटू घबरा गया, पर तभी उसे दोस्तों की हँसी याद आई। उसने खुद को संभाला और आगे बढ़ा।
महल के भीतर एक बड़ा-सा हॉल था। बीचोंबीच धूल जमी मेज़ और दीवार पर टंगा एक पुराना चित्र। चित्र में एक युवक था—आँखों में अजीब-सी उदासी। तभी पीछे से भारी आवाज़ गूँजी—
“क्यों आए हो यहाँ?”
मोंटू का कलेजा मुँह को आ गया। वह घूमते हुए बोला, “क…कौन है?”
अंधेरे से एक धुँधली आकृति उभरी। वह भूत नहीं, बल्कि किसी बूढ़े व्यक्ति की छाया थी।
“डरो मत,” आवाज़ नरम थी, “मैं इस महल का रखवाला हूँ… और कभी इस गाँव का सबसे आलसी लड़का था।”
“आलसी?” मोंटू चौंक पड़ा।
“हाँ,” छाया बोली, “मेरा नाम था माधव। मैं भी तुम्हारी तरह काम से भागता था। पढ़ाई को बोझ समझता था। लोग मुझे निकम्मा कहते थे।”
मोंटू को लगा जैसे कोई उसकी कहानी सुना रहा हो।
“फिर?” उसने धीरे से पूछा।
“फिर एक दिन मुझे भी चुनौती मिली। इसी महल में आया। यहाँ मुझे एक रहस्य पता चला—मेरी असली दुश्मन कोई भूत नहीं, बल्कि मेरा आलस था।”
छाया ने दीवार की ओर इशारा किया। वहाँ एक बंद दरवाज़ा था।
“उस दरवाज़े के पीछे मेरी डायरी है। पढ़ो।”
मोंटू काँपते कदमों से दरवाज़ा खोलता है। भीतर एक पुरानी डायरी पड़ी थी। उसने पहला पन्ना खोला—
‘आज फिर मैंने काम टाल दिया। दिल कहता है—कल कर लूँगा। पर हर कल, आज बनकर मुझे चिढ़ा जाता है।’
पन्ने पलटते गए। हर पन्ने पर पछतावे की स्याही थी—अधूरी पढ़ाई, छूटे अवसर, टूटे सपने। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
‘जो समय को नहीं पकड़ता, समय उसे छोड़ देता है।’
मोंटू की आँखें नम हो गईं।
“मैं यही गलती कर रहा हूँ…” वह बुदबुदाया।
तभी छाया बोली—“मोंटू, यह महल भूतिया नहीं, सच का आईना है। यहाँ आने वाले वही देखते हैं, जिससे वे भागते रहते हैं। तुम चाहो तो अभी भी लौट सकते हो—वैसे ही जैसे आए हो। या फिर इस रहस्य को अपनी ताक़त बना सकते हो।”
“मैं… मैं बदलना चाहता हूँ,” मोंटू ने दृढ़ता से कहा।
छाया मुस्कराई। “तो सुनो—डर से नहीं, अनुशासन से आगे बढ़ो। रोज़ थोड़ा-सा काम, पूरे मन से। आलस को टालो, काम को नहीं।”
इतना कहकर छाया धीरे-धीरे हवा में घुल गई। हॉल में सन्नाटा छा गया, पर मोंटू के भीतर एक आवाज़ जाग चुकी थी।
वह महल से बाहर निकला। रात वही थी, पर मोंटू वही नहीं था।
अगली सुबह मोंटू जल्दी उठ गया। माँ ने हैरानी से देखा—“आज सूरज पश्चिम से उगा है क्या?”
मोंटू मुस्कराया, “नहीं माँ, आज मैं खुद से भागना छोड़ रहा हूँ।”
उसने पढ़ाई का छोटा-सा समय-सारिणी बनाई। पहले दिन मुश्किल हुई, पर उसने डायरी का आख़िरी वाक्य याद किया। धीरे-धीरे दिन बदले। दोस्त चिढ़ाने आए तो उसने शांत स्वर में कहा—“हँस लो, पर मैं रुकूँगा नहीं।”
परीक्षा आई। मोंटू ने पूरी तैयारी नहीं की थी, पर जितनी की थी, ईमानदारी से की थी। परिणाम आया—वह अव्वल तो नहीं आया, पर फेल भी नहीं हुआ। उसके चेहरे पर संतोष था—एक नई शुरुआत का।
कुछ महीनों बाद वही दोस्त बोले—
“यार मोंटू, तू बदल गया है।”
मोंटू मुस्कराया—“नहीं, मैं खुद को पहचान गया हूँ।”
भूतिया महल आज भी गाँव के किनारे खड़ा है। लोग अब भी डरते हैं। पर मोंटू जानता है—वहाँ कोई भूत नहीं, बल्कि एक सच्चाई रहती है, जो सही समय पर किसी न किसी को बुला लेती है… और उसकी ज़िन्दगी को नई दिशा दे देती है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

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