लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Sunday, 26 April 2026

ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

 ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

प्रवेश हमेशा चुप रहता था।
इतना चुप कि कई बार लोग उसके होने या न होने में कोई अंतर ही महसूस नहीं करते थे।
वह न तो ज़्यादा हँसता था, न ग़ुस्सा करता था, न ही अपनी बात किसी से खुलकर कह पाता था। उसकी आँखें बहुत कुछ कहती थीं, पर होंठ जैसे हमेशा किसी अनदेखे डर से सिले रहते थे।
प्रवेश के पिता, शैलेश कुमार, एक साधारण कर्मचारी थे। माँ, मीरा देवी, बेटे को देखकर अक्सर चिंतित हो जातीं। छोटा भाई उत्साही था, बहन चंचल। बस प्रवेश ही था—शांत, संकोची और भीतर सिमटा हुआ।
“यह लड़का कभी बोलेगा भी?”
पिता कभी–कभी झुंझलाकर कह देते।
माँ धीरे से समझातीं—
“इसे डाँटो मत, ये वैसे ही भीतर से सहमा रहता है।”
स्कूल में भी प्रवेश अलग-थलग रहता। शिक्षक उसे मेधावी मानते थे, पर मंच पर बोलने के लिए कहो तो उसके हाथ काँपने लगते। शब्द गले में अटक जाते।
बच्चे कभी–कभी उसका मज़ाक उड़ाते—
“देखो, फिर चुप हो गया!”
प्रवेश सुनता था, लेकिन कुछ कह नहीं पाता था।
रात को जब सब सो जाते, प्रवेश छत पर बैठकर आसमान देखता। उसे लगता, जैसे सितारे उससे बातें कर रहे हों।
उसकी डायरी ही उसकी सबसे अच्छी मित्र थी। उसमें उसने लिखा था—
“मैं बोलना चाहता हूँ, लेकिन जब मुँह खोलता हूँ तो शब्द डर जाते हैं।”
परिवार को उसकी चिंता थी। माँ को डर था कि दुनिया उसकी इस ख़ामोशी का फ़ायदा न उठा ले।
एक दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। बिजली बार–बार चमक रही थी। गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर थी।
रात के लगभग दस बजे अचानक पूरे इलाके की बिजली चली गई।
कुछ देर बाद बाहर से शोर सुनाई दिया—
“बचाओ! कोई है?”
आवाज़ काँपती हुई थी।
प्रवेश की धड़कन तेज़ हो गई।
पिता ने दरवाज़ा खोला। सामने अँधेरे में कुछ लोग भागते दिखे।
“नदी का बाँध टूट गया है!”
“नीचे की बस्ती में पानी घुस रहा है!”
घर में अफ़रातफ़री मच गई।
माँ ने बच्चों को भीतर कर लिया। पिता मदद के लिए बाहर निकलने लगे।
प्रवेश चुपचाप खड़ा सब देख रहा था। उसके मन में कुछ अजीब-सा चल रहा था। डर… और साथ ही कोई अनजानी शक्ति।
बहुत कम लोग जानते थे कि प्रवेश को तैरना आता था—बहुत अच्छा तैरना।
बचपन में उसके नाना उसे नदी में ले जाते थे। पर एक हादसे के बाद नाना नहीं रहे, और प्रवेश ने कभी किसी को इस बारे में बताया ही नहीं।
उस रात नदी का पानी गाँव की ओर बढ़ रहा था।
तभी किसी ने चिल्लाकर कहा—
“बस्ती में एक बच्चा फँस गया है!”
चारों ओर सन्नाटा छा गया।
सब लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
प्रवेश का दिल ज़ोर–ज़ोर से धड़कने लगा।
उसके भीतर वर्षों से दबी आवाज़ अचानक चीख उठी—
“अगर अब नहीं, तो कभी नहीं!”
अचानक वह आगे बढ़ा।
पहली बार उसने ऊँची आवाज़ में कहा—
“मैं जाऊँगा।”
सब चौंक गए।
माँ की आँखें फैल गईं—
“प्रवेश…?”
पिता बोले—
“तुम? लेकिन…”
प्रवेश ने पहली बार किसी की बात बीच में काटी—
“मुझे तैरना आता है।”
अँधेरी, उफनती नदी। तेज़ बारिश। लोग दुआ कर रहे थे।
प्रवेश पानी में उतर गया।
हर सेकंड भारी लग रहा था। कोई नहीं जानता था कि वह ज़िंदा लौटेगा या नहीं।
कुछ लोग बोले—
“ये तो बोलता ही नहीं था, इतना साहस कहाँ से आया?”
पानी का बहाव बहुत तेज़ था। प्रवेश को कई बार लगा कि वह बह जाएगा।
पर उसे उस बच्चे की याद आ रही थी, जो शायद इस समय डर से काँप रहा होगा।
आख़िरकार उसने बच्चे को देखा—एक टूटी छत पर फँसा हुआ।
प्रवेश ने चिल्लाकर कहा—
“डरो मत! मैं आ गया हूँ!”
वह खुद भी चौंक गया—वह बोल पा रहा था।
कुछ ही देर में प्रवेश बच्चे को सुरक्षित लेकर लौट आया।
गाँव में जैसे जान आ गई।
माँ उसे गले लगाकर रो पड़ीं। पिता की आँखों में गर्व था।
उस घटना के बाद प्रवेश वही नहीं रहा।
अब वह कम बोलता था, लेकिन जब बोलता—तो सार्थक।
स्कूल में उसे सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। सबको आश्चर्य हुआ, जब उसने बिना हिचक एक प्रेरक भाषण दिया।
उसने कहा—
“ख़ामोशी कमज़ोरी नहीं होती। कभी–कभी वही हमारी सबसे बड़ी ताक़त होती है।”
आज प्रवेश आपदा प्रबंधन से जुड़ा है। वह बच्चों को तैरना सिखाता है। डर से लड़ना सिखाता है।
जो लड़का अपनी बात कह नहीं पाता था, वह आज दूसरों को आवाज़ देता है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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