लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Sunday, 26 April 2026

संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

 संकल्प की वापसी: पारस की कहानी

बंसीराम जी के घर जब पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने उसका नाम रखा— पारस। बंसीराम खुद एक साधारण किसान थे, लेकिन उनका सपना असाधारण था। पारस बचपन से ही उनकी उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरा। वह न केवल शांत और सुशील था, बल्कि पढ़ाई में भी उसका कोई सानी नहीं था। गाँव के स्कूल में जब पारस अपनी किताबें लेकर बैठता, तो लोग कहते, "बंसीराम का बेटा एक दिन बड़ा अफसर बनेगा।" पारस की आँखों में भी वही चमक थी—एक प्रशासनिक अधिकारी (IAS) बनकर समाज की सेवा करने का सपना।


दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में जिले में प्रथम आने के बाद, पारस शहर चला गया। असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। शहर की चकाचौंध और नए परिवेश में पारस को कुछ ऐसे दोस्त मिले, जिनके लिए पढ़ाई से ज्यादा 'मौज-मस्ती' मायने रखती थी। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई—कभी एक फिल्म देखने जाना, कभी घंटों कैफे में बैठकर फिजूल की बातें करना।

धीरे-धीरे, पारस की मेज पर सजी प्रशासनिक सेवाओं की किताबें धूल फांकने लगीं। वह 'संगत के रंग' में ऐसा रंगा कि उसे अपनी मंजिल धुंधली लगने लगी। बंसीराम गाँव से मेहनत की कमाई भेजते रहे, इस भरोसे में कि उनका बेटा दिल्ली में 'साहब' बनने की तैयारी कर रहा है। लेकिन पारस अब सिगरेट के धुएं और रातों की आवारागर्दी में अपनी मेधा को खो चुका था। तीन साल बीत गए, ग्रेजुएशन जैसे-तैसे पूरी हुई, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में वह प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तक नहीं निकाल पाया।

एक दिन ऐसा आया जब पारस पूरी तरह हताश हो गया। आत्मविश्वास शून्य हो चुका था। उसने खुद को मान लिया था कि वह 'असफल' है। वह अपने दोस्तों के साथ गलत आदतों में इतना गहरा उतर गया कि गाँव जाना भी छोड़ दिया। बंसीराम की चिट्ठियाँ और फोन अब उसे बोझ लगने लगे थे। वह उस पारस का कंकाल मात्र रह गया था, जो कभी अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।


जिंदगी जब सबसे अंधेरे मोड़ पर होती है, तभी कहीं से रोशनी की एक किरण आती है। पारस के जीवन में वह किरण बनकर आए प्रोफेसर आदित्य। प्रोफेसर आदित्य पारस के कॉलेज में नए आए थे और उन्होंने पारस के पुराने रिकॉर्ड्स देखे थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना होनहार छात्र इस कदर टूट सकता है।

एक शाम, जब पारस पार्क के एक कोने में अकेला बैठा अपनी किस्मत को कोस रहा था, प्रोफेसर आदित्य उसके पास आकर बैठ गए। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, बस एक सवाल पूछा:

"पारस, क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता के हाथों की लकीरें मिट्टी से क्यों फटी हुई हैं?"

पारस खामोश रहा। प्रोफेसर ने आगे कहा, "वह मिट्टी पारस बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन तुमने खुद को कोयला बना लिया। तुम्हारी हार तुम्हारे दोस्तों की वजह से नहीं, बल्कि तुम्हारी खुद से हार है।"

प्रोफेसर आदित्य ने पारस को अपने संरक्षण में ले लिया। उन्होंने पारस के लिए एक सख्त दिनचर्या बनाई। शुरुआत में पारस का मन विचलित होता, पुराने दोस्त उसे वापस बुलाते, लेकिन इस बार उसके पास एक 'गुरु' का हाथ था।

पारस की नई दिनचर्या:

  • भोर का समय: योग और ध्यान (मानसिक शांति के लिए)।

  • दोपहर: गहन अध्ययन और नोट्स बनाना।

  • शाम: प्रोफेसर के साथ समसामयिक विषयों पर चर्चा।

  • रात: लेखन अभ्यास और आत्म-विश्लेषण।

प्रोफेसर ने उसे सिखाया कि सफलता केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि निरंतरता () से मिलती है। पारस ने अपने फोन से उन सभी नंबरों को हटा दिया जो उसे उसकी मंजिल से दूर ले जाते थे। उसने फिर से शून्य से शुरुआत की।


अगले दो साल पारस के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। एक बार फिर उसने परीक्षा दी। प्रीलिम्स निकला, मेंस भी शानदार रहा, लेकिन इंटरव्यू में वह कुछ अंकों से रह गया। पारस फिर से टूटने लगा। उसे लगा कि शायद अब बहुत देर हो चुकी है। लेकिन प्रोफेसर आदित्य ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मैदान में गिरा हुआ इंसान फिर उठ सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ नहीं। तुम हार के इतने करीब हो कि अगली कोशिश जीत की होगी।"

पारस ने अपनी कमियों पर काम किया। उसने अपनी भाषा, अपने दृष्टिकोण और अपने प्रशासनिक कौशल को निखारा। इस बीच बंसीराम बीमार पड़ गए, घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, लेकिन पारस ने हार नहीं मानी। वह दिन में ट्यूशन पढ़ाता और रात भर पढ़ाई करता।

अंततः, वह दिन आ ही गया जिसका पूरे गाँव को इंतजार था। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का परिणाम घोषित हुआ। पारस ने न केवल परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि पूरे देश में 25वीं रैंक हासिल की।

जब वह लाल बत्ती की गाड़ी (प्रतीकात्मक रूप से अब प्रशासनिक पद) से अपने गाँव पहुँचा, तो पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। बंसीराम की आँखों में खुशी के आँसू थे। पारस सीधे अपने पिता के पास गया और उनके फटे हुए हाथों को चूम लिया। लेकिन उसकी यात्रा यहाँ पूरी नहीं हुई थी। वह तुरंत शहर गया और प्रोफेसर आदित्य के चरणों में गिर पड़ा।

प्रोफेसर ने उसे गले लगाकर बस इतना कहा, "पारस, याद रखना, एक अधिकारी कलम से नहीं, बल्कि अपने चरित्र से बड़ा होता है। जिस भटकाव ने तुम्हें गिराया था, वह तुम्हें दूसरों को उठाने की प्रेरणा देगा।"


कहानी का सार

पारस की कहानी हमें यह सिखाती है कि:

  1. संगत का असर: गलत मित्र आपकी क्षमता को नष्ट कर सकते हैं।

  2. गुरु की महत्ता: एक सही मार्गदर्शक पत्थर को भी हीरा बना सकता है।

  3. आत्म-बोध: अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।

  4. दृढ़ता: सफलता वक्त माँगती है, और जो अंत तक टिका रहता है, वही विजेता बनता है।

आज पारस एक ईमानदार जिलाधिकारी के रूप में जाना जाता है, जो भटके हुए युवाओं को सही राह दिखाने के लिए विशेष कार्यशालाएं चलाता है। उसकी जिंदगी का उतार-चढ़ाव अब हज़ारों युवाओं के लिए एक मशाल बन चुका है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम 

ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

 ख़ामोशी की आवाज़ – कहानी

प्रवेश हमेशा चुप रहता था।
इतना चुप कि कई बार लोग उसके होने या न होने में कोई अंतर ही महसूस नहीं करते थे।
वह न तो ज़्यादा हँसता था, न ग़ुस्सा करता था, न ही अपनी बात किसी से खुलकर कह पाता था। उसकी आँखें बहुत कुछ कहती थीं, पर होंठ जैसे हमेशा किसी अनदेखे डर से सिले रहते थे।
प्रवेश के पिता, शैलेश कुमार, एक साधारण कर्मचारी थे। माँ, मीरा देवी, बेटे को देखकर अक्सर चिंतित हो जातीं। छोटा भाई उत्साही था, बहन चंचल। बस प्रवेश ही था—शांत, संकोची और भीतर सिमटा हुआ।
“यह लड़का कभी बोलेगा भी?”
पिता कभी–कभी झुंझलाकर कह देते।
माँ धीरे से समझातीं—
“इसे डाँटो मत, ये वैसे ही भीतर से सहमा रहता है।”
स्कूल में भी प्रवेश अलग-थलग रहता। शिक्षक उसे मेधावी मानते थे, पर मंच पर बोलने के लिए कहो तो उसके हाथ काँपने लगते। शब्द गले में अटक जाते।
बच्चे कभी–कभी उसका मज़ाक उड़ाते—
“देखो, फिर चुप हो गया!”
प्रवेश सुनता था, लेकिन कुछ कह नहीं पाता था।
रात को जब सब सो जाते, प्रवेश छत पर बैठकर आसमान देखता। उसे लगता, जैसे सितारे उससे बातें कर रहे हों।
उसकी डायरी ही उसकी सबसे अच्छी मित्र थी। उसमें उसने लिखा था—
“मैं बोलना चाहता हूँ, लेकिन जब मुँह खोलता हूँ तो शब्द डर जाते हैं।”
परिवार को उसकी चिंता थी। माँ को डर था कि दुनिया उसकी इस ख़ामोशी का फ़ायदा न उठा ले।
एक दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। बिजली बार–बार चमक रही थी। गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर थी।
रात के लगभग दस बजे अचानक पूरे इलाके की बिजली चली गई।
कुछ देर बाद बाहर से शोर सुनाई दिया—
“बचाओ! कोई है?”
आवाज़ काँपती हुई थी।
प्रवेश की धड़कन तेज़ हो गई।
पिता ने दरवाज़ा खोला। सामने अँधेरे में कुछ लोग भागते दिखे।
“नदी का बाँध टूट गया है!”
“नीचे की बस्ती में पानी घुस रहा है!”
घर में अफ़रातफ़री मच गई।
माँ ने बच्चों को भीतर कर लिया। पिता मदद के लिए बाहर निकलने लगे।
प्रवेश चुपचाप खड़ा सब देख रहा था। उसके मन में कुछ अजीब-सा चल रहा था। डर… और साथ ही कोई अनजानी शक्ति।
बहुत कम लोग जानते थे कि प्रवेश को तैरना आता था—बहुत अच्छा तैरना।
बचपन में उसके नाना उसे नदी में ले जाते थे। पर एक हादसे के बाद नाना नहीं रहे, और प्रवेश ने कभी किसी को इस बारे में बताया ही नहीं।
उस रात नदी का पानी गाँव की ओर बढ़ रहा था।
तभी किसी ने चिल्लाकर कहा—
“बस्ती में एक बच्चा फँस गया है!”
चारों ओर सन्नाटा छा गया।
सब लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
प्रवेश का दिल ज़ोर–ज़ोर से धड़कने लगा।
उसके भीतर वर्षों से दबी आवाज़ अचानक चीख उठी—
“अगर अब नहीं, तो कभी नहीं!”
अचानक वह आगे बढ़ा।
पहली बार उसने ऊँची आवाज़ में कहा—
“मैं जाऊँगा।”
सब चौंक गए।
माँ की आँखें फैल गईं—
“प्रवेश…?”
पिता बोले—
“तुम? लेकिन…”
प्रवेश ने पहली बार किसी की बात बीच में काटी—
“मुझे तैरना आता है।”
अँधेरी, उफनती नदी। तेज़ बारिश। लोग दुआ कर रहे थे।
प्रवेश पानी में उतर गया।
हर सेकंड भारी लग रहा था। कोई नहीं जानता था कि वह ज़िंदा लौटेगा या नहीं।
कुछ लोग बोले—
“ये तो बोलता ही नहीं था, इतना साहस कहाँ से आया?”
पानी का बहाव बहुत तेज़ था। प्रवेश को कई बार लगा कि वह बह जाएगा।
पर उसे उस बच्चे की याद आ रही थी, जो शायद इस समय डर से काँप रहा होगा।
आख़िरकार उसने बच्चे को देखा—एक टूटी छत पर फँसा हुआ।
प्रवेश ने चिल्लाकर कहा—
“डरो मत! मैं आ गया हूँ!”
वह खुद भी चौंक गया—वह बोल पा रहा था।
कुछ ही देर में प्रवेश बच्चे को सुरक्षित लेकर लौट आया।
गाँव में जैसे जान आ गई।
माँ उसे गले लगाकर रो पड़ीं। पिता की आँखों में गर्व था।
उस घटना के बाद प्रवेश वही नहीं रहा।
अब वह कम बोलता था, लेकिन जब बोलता—तो सार्थक।
स्कूल में उसे सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। सबको आश्चर्य हुआ, जब उसने बिना हिचक एक प्रेरक भाषण दिया।
उसने कहा—
“ख़ामोशी कमज़ोरी नहीं होती। कभी–कभी वही हमारी सबसे बड़ी ताक़त होती है।”
आज प्रवेश आपदा प्रबंधन से जुड़ा है। वह बच्चों को तैरना सिखाता है। डर से लड़ना सिखाता है।
जो लड़का अपनी बात कह नहीं पाता था, वह आज दूसरों को आवाज़ देता है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

भूतिया महल - कहानी

 भूतिया महल

गाँव के उत्तर छोर पर, सालों से खड़ा एक जर्जर-सा महल था। टूटी हुई खिड़कियाँ, झूलते दरवाज़े, दीवारों पर उगी काई और हर समय वहाँ पसरा रहने वाला सन्नाटा—इन सबके कारण लोग उसे भूतिया महल कहते थे। शाम ढलते ही उस ओर कोई झाँकने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को डराने के लिए बड़े बस इतना कह देते—“पढ़-लिख लो, वरना भूतिया महल तुम्हें उठा ले जाएगा।”
इसी गाँव में रहता था मोंटू—कामचोरी का जीता-जागता उदाहरण। न पढ़ाई में मन लगता, न घर के किसी काम में। माँ जब कहती, “बेटा, ज़रा किताब खोल लो,” तो मोंटू जम्हाई लेकर कह देता, “अभी तो बहुत समय है।” पिता खेत से थके-हारे लौटते और कहते, “कुछ तो सीख ले,” तो वह कंधे उचका देता। उसे बस दोस्तों के साथ घूमना, गिल्ली-डंडा खेलना और बेवजह हँसना आता था।
मोंटू के दोस्त—गोलू, पिंटू और चीकू—अक्सर उसे चिढ़ाते रहते।
“अरे मोंटू, तू तो पैदा ही आराम करने के लिए हुआ है,” गोलू हँसता।
“कल बड़ा आदमी बनेगा—नींद विशेषज्ञ!” पिंटू ताना मारता।
मोंटू बाहर से हँस देता, पर भीतर कहीं कुछ चुभता था। उसे लगता था कि वह कुछ कर सकता है, पर आलस और डर उसे जकड़े रहते।
एक दिन स्कूल में अध्यापक ने घोषणा की—“अगले महीने वार्षिक परीक्षा है। जो मेहनत नहीं करेगा, वही पछताएगा।” पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया, सिवाय मोंटू के। वह खिड़की से बाहर ताक रहा था—उसी भूतिया महल की ओर।
उसी शाम दोस्तों ने शर्त लगा दी।
“हिम्मत है तो आज रात भूतिया महल के भीतर जाकर आ,” चीकू ने कहा।
“कामचोर कहीं का! डरपोक!” पिंटू ने जोड़ा।
मोंटू का अहंकार जाग उठा। उसने बिना सोचे कहा, “ठीक है, मैं जाऊँगा।”
रात गहरी हो चुकी थी। चाँद बादलों में छिपा-छिपा सा खेल रहा था। मोंटू दिल पर पत्थर रखकर महल के फाटक तक पहुँचा। फाटक चरमराया—किर्र…किर्र…—जैसे किसी ने चेतावनी दी हो। वह काँपा, पर कदम आगे बढ़ा दिए। भीतर घुसते ही ठंडी हवा का झोंका आया और दीपक की लौ थरथरा उठी।
अचानक उसे लगा जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा—“वापस लौट जाओ…”
मोंटू घबरा गया, पर तभी उसे दोस्तों की हँसी याद आई। उसने खुद को संभाला और आगे बढ़ा।
महल के भीतर एक बड़ा-सा हॉल था। बीचोंबीच धूल जमी मेज़ और दीवार पर टंगा एक पुराना चित्र। चित्र में एक युवक था—आँखों में अजीब-सी उदासी। तभी पीछे से भारी आवाज़ गूँजी—
“क्यों आए हो यहाँ?”
मोंटू का कलेजा मुँह को आ गया। वह घूमते हुए बोला, “क…कौन है?”
अंधेरे से एक धुँधली आकृति उभरी। वह भूत नहीं, बल्कि किसी बूढ़े व्यक्ति की छाया थी।
“डरो मत,” आवाज़ नरम थी, “मैं इस महल का रखवाला हूँ… और कभी इस गाँव का सबसे आलसी लड़का था।”
“आलसी?” मोंटू चौंक पड़ा।
“हाँ,” छाया बोली, “मेरा नाम था माधव। मैं भी तुम्हारी तरह काम से भागता था। पढ़ाई को बोझ समझता था। लोग मुझे निकम्मा कहते थे।”
मोंटू को लगा जैसे कोई उसकी कहानी सुना रहा हो।
“फिर?” उसने धीरे से पूछा।
“फिर एक दिन मुझे भी चुनौती मिली। इसी महल में आया। यहाँ मुझे एक रहस्य पता चला—मेरी असली दुश्मन कोई भूत नहीं, बल्कि मेरा आलस था।”
छाया ने दीवार की ओर इशारा किया। वहाँ एक बंद दरवाज़ा था।
“उस दरवाज़े के पीछे मेरी डायरी है। पढ़ो।”
मोंटू काँपते कदमों से दरवाज़ा खोलता है। भीतर एक पुरानी डायरी पड़ी थी। उसने पहला पन्ना खोला—
‘आज फिर मैंने काम टाल दिया। दिल कहता है—कल कर लूँगा। पर हर कल, आज बनकर मुझे चिढ़ा जाता है।’
पन्ने पलटते गए। हर पन्ने पर पछतावे की स्याही थी—अधूरी पढ़ाई, छूटे अवसर, टूटे सपने। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
‘जो समय को नहीं पकड़ता, समय उसे छोड़ देता है।’
मोंटू की आँखें नम हो गईं।
“मैं यही गलती कर रहा हूँ…” वह बुदबुदाया।
तभी छाया बोली—“मोंटू, यह महल भूतिया नहीं, सच का आईना है। यहाँ आने वाले वही देखते हैं, जिससे वे भागते रहते हैं। तुम चाहो तो अभी भी लौट सकते हो—वैसे ही जैसे आए हो। या फिर इस रहस्य को अपनी ताक़त बना सकते हो।”
“मैं… मैं बदलना चाहता हूँ,” मोंटू ने दृढ़ता से कहा।
छाया मुस्कराई। “तो सुनो—डर से नहीं, अनुशासन से आगे बढ़ो। रोज़ थोड़ा-सा काम, पूरे मन से। आलस को टालो, काम को नहीं।”
इतना कहकर छाया धीरे-धीरे हवा में घुल गई। हॉल में सन्नाटा छा गया, पर मोंटू के भीतर एक आवाज़ जाग चुकी थी।
वह महल से बाहर निकला। रात वही थी, पर मोंटू वही नहीं था।
अगली सुबह मोंटू जल्दी उठ गया। माँ ने हैरानी से देखा—“आज सूरज पश्चिम से उगा है क्या?”
मोंटू मुस्कराया, “नहीं माँ, आज मैं खुद से भागना छोड़ रहा हूँ।”
उसने पढ़ाई का छोटा-सा समय-सारिणी बनाई। पहले दिन मुश्किल हुई, पर उसने डायरी का आख़िरी वाक्य याद किया। धीरे-धीरे दिन बदले। दोस्त चिढ़ाने आए तो उसने शांत स्वर में कहा—“हँस लो, पर मैं रुकूँगा नहीं।”
परीक्षा आई। मोंटू ने पूरी तैयारी नहीं की थी, पर जितनी की थी, ईमानदारी से की थी। परिणाम आया—वह अव्वल तो नहीं आया, पर फेल भी नहीं हुआ। उसके चेहरे पर संतोष था—एक नई शुरुआत का।
कुछ महीनों बाद वही दोस्त बोले—
“यार मोंटू, तू बदल गया है।”
मोंटू मुस्कराया—“नहीं, मैं खुद को पहचान गया हूँ।”
भूतिया महल आज भी गाँव के किनारे खड़ा है। लोग अब भी डरते हैं। पर मोंटू जानता है—वहाँ कोई भूत नहीं, बल्कि एक सच्चाई रहती है, जो सही समय पर किसी न किसी को बुला लेती है… और उसकी ज़िन्दगी को नई दिशा दे देती है।

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

Dinesh: The Uniform of Dreams - a story

 Dinesh: The Uniform of Dreams

Dinesh lived in a small house at the edge of a village, where mornings began with the crowing of roosters and evenings ended beside a mud stove glowing with fire. His father was a farmer, his mother a homemaker. Life was simple, resources were limited, but values were strong. Yet, one concern troubled everyone—Dinesh had no interest in studies.
The classroom felt like a burden to him. Books made his eyes heavy, and the teacher’s voice often faded into silence. During examinations, fear and self-doubt surrounded him. When his classmates scored high marks, Dinesh felt angry with himself. People often said,
“If you want to become something in life, you must study.”
Dinesh stayed silent, knowing that academics were not his strength.
But Dinesh was not useless. Deep inside him burned a desire—to prove himself, to earn respect, to stand tall in society. He longed to do something meaningful, something that would make his existence count. Any how he passed his class 10 exams.
One evening, at the village’s old community hall, a television was playing. That day, Dinesh watched a film based on soldiers. Snow-covered borders, fearless men in uniform, the roar of gunfire, the pride of the tri-colour, and the echo of “Victory to Mother India”—the images pierced his heart.
That night, sleep escaped him.
The scenes kept replaying in his mind—a simple man transformed the moment he wore the uniform, becoming a guardian of the nation.
From that day onward, Dinesh began watching every film, documentary, and news story related to soldiers. Their discipline, courage, and sacrifice fascinated him. He realized that a soldier does not merely carry a weapon—he carries responsibility, loyalty, and the willingness to give up everything, even life itself.
Slowly, a decision formed within him.
“If studies are not my strength, then hard work will be my identity.”
The very next morning, before sunrise, Dinesh started running on the dusty village roads. In the beginning, even half a kilometer left him breathless, his legs trembling. People mocked him,
“What will he become? He neither studies nor rests.”
But Dinesh did not stop.
He had made a promise to himself.
He worked in the fields during the day and trained in the evenings—push-ups, sit-ups, skipping rope, and every exercise he could manage. Using his phone, he researched military recruitment standards—height, weight, endurance, and fitness requirements. He shaped his routine accordingly.
Although academics still failed to excite him, Dinesh studied what truly mattered to him—his country, the armed forces, discipline, and duty. This learning felt purposeful, not forced.
One day, news of an army recruitment rally reached the village. Dinesh’s eyes sparkled with hope. His family was anxious,
“What if you fail?”
For the first time, Dinesh replied firmly,
“At least I will try.”
The day of recruitment arrived. Hundreds of young men stood in line—some from cities, others trained in academies. Dinesh had neither expensive shoes nor professional coaching. All he carried was faith fueled by sweat and determination.
The race began.
The first kilometer felt manageable. The second burned his lungs. By the third, his legs pleaded for rest. His mind whispered, Stop.
Then images flashed before him—a soldier standing at the border, wounded yet refusing to let the flag fall.
Dinesh clenched his teeth and kept running.
He finished the race.
One by one, he cleared every test. When he finally saw his name on the selection list, tears filled his eyes. He stood silently before the national flag—his dream had become reality.
Months later, when Dinesh returned to the village wearing his uniform, the same people who once laughed stood up in respect. Children looked at him with shining eyes; elders gazed at him with pride.
Dinesh had learned a powerful truth—
Being weak in studies is not failure; failing to recognize one’s inner strength is.
Today, Dinesh is not just a soldier in society—he is an inspiration for countless young people who underestimate themselves. His story declares:
• Everyone has a different path.
• Success does not always rise from textbooks.
• When the goal is honest and effort sincere, an ordinary person can become extraordinary.
Dinesh proved that when courage dares to dream, a uniform becomes more than fabric—it becomes identity.

Anil Kumar Gupta Anjum

नीली स्क्रीन का साया - कहानी

 नीली स्क्रीन का साया

रात के बारह बज रहे थे।
घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था। बाहर सर्द हवा पेड़ों की सूखी पत्तियों को हिलाकर अजीब-सी सरसराहट पैदा कर रही थी। कमरे में केवल एक चीज़ चमक रही थी—मोबाइल की नीली स्क्रीन।
आरव, सातवीं कक्षा का छात्र, अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी थीं। माँ-पापा सो चुके थे, बहन भी। लेकिन आरव की दुनिया उस छोटे से मोबाइल में कैद थी।
“बस एक रील और… बस एक वीडियो और…”
वह खुद से कहता और उँगलियाँ स्क्रीन पर सरकती जातीं।
अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमक उठी।
एक नया अकाउंट सामने आया—
“नीलाया_1890”
प्रोफाइल फोटो में एक धुँधली-सी लड़की थी, नीली आँखें और बेहद फीकी मुस्कान।
कुछ ही सेकंड में उस अकाउंट से मैसेज आया—
“तुम भी रात में जागते हो?”
आरव चौंक गया।
“हाँ… तुम कौन हो?” उसने टाइप किया।
उत्तर आया—
“मैं भी तुम्हारी तरह अकेली हूँ।”
आरव को अजीब लगा, फिर भी उसे अच्छा लगा कि कोई उससे बात कर रहा है। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती गई। नीलाया को पता था कि आरव कौन-सा गेम खेलता है, कौन-सी क्लास में है, किस स्कूल में पढ़ता है।
“तुम्हें ये सब कैसे पता?” आरव ने पूछा।
मैसेज आया—
“मैं सब देखती हूँ।”
उस रात के बाद नीलाया रोज़ ऑनलाइन आने लगी। आरव स्कूल से आते ही मोबाइल खोल लेता। न होमवर्क, न खेल, न परिवार से बातें।
धीरे-धीरे अजीब बातें होने लगीं।
मोबाइल अपने आप ऑन हो जाता।
रात में नोटिफिकेशन बजता।
कभी-कभी स्क्रीन पर नीली रोशनी फैल जाती, जैसे कोई उसे देख रहा हो।
एक रात नीलाया ने लिखा—
“तुम मुझे मिलना चाहोगे?”
आरव ने उत्सुकता से हाँ कर दी।
“तो कल रात 12 बजे पुराने कुएँ के पास आना।”
वह कुआँ गाँव के बाहर था—जहाँ कोई नहीं जाता था। कहा जाता था कि वहाँ कभी एक लड़की गिरकर मर गई थी।
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पुराने कुएँ की रहस्यमयी रात
अगली रात आरव चुपचाप घर से निकल पड़ा।
कुएँ के पास पहुँचते ही ठंडी हवा चलने लगी। चारों ओर अंधेरा था।
“नीलाया?” उसने काँपती आवाज़ में पुकारा।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट हुई।
वह मुड़ा तो देखा—नीली साड़ी पहने एक लड़की, बेहद पीली त्वचा, और आँखों में अजीब चमक।
“तुम आ गए…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
आरव डर गया, लेकिन उत्सुकता ने उसे रोक लिया।
“तुम… ऑनलाइन वही हो न?”
लड़की मुस्कराई।
“हाँ… मैं वही हूँ।”
तभी अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें पता है, मैं कैसे मरी थी?”
आरव ने सिर हिला दिया।
“मैं भी मोबाइल में ही खोई रहती थी। माँ-पापा बुलाते थे, दोस्त बुलाते थे… लेकिन मैं स्क्रीन में डूबी रहती थी। एक रात यहाँ वीडियो देखते-देखते पैर फिसल गया… और मैं गिर गई।”
कुएँ से ठंडी हवा का झोंका आया।
लड़की की आवाज़ बदलने लगी—
“और अब मैं उन बच्चों को ढूँढती हूँ जो मेरी तरह खो जाते हैं…”
अचानक उसका चेहरा विकृत हो गया।
नीली आँखें चमक उठीं।
“तुम भी मेरे साथ रहोगे!”
वह आरव की ओर बढ़ी।
आरव डरकर पीछे हटा और फिसल गया।
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नीली स्क्रीन का जादू
आरव ने आँखें खोलीं तो खुद को अपने कमरे में पाया।
सब कुछ सामान्य था।
“क्या वह सपना था?” उसने सोचा।
तभी मोबाइल बज उठा।
नीलाया_1890 ऑनलाइन थी।
मैसेज आया—
“आज भी आओगे?”
आरव के हाथ काँप गए।
उसे लगा कोई उसे लगातार देख रहा है।
स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा। दोस्तों ने कहा—
“तू पहले हमारे साथ खेलता था, अब बस फोन देखता रहता है।”
माँ ने डाँटा—
“आरव, पढ़ाई पर ध्यान दो।”
लेकिन वह फिर भी मोबाइल में उलझा रहा।
उस रात मोबाइल की स्क्रीन से नीली रोशनी निकलने लगी।
धीरे-धीरे कमरे में ठंड फैल गई।
एक साया दीवार पर उभरा।
नीलाया का चेहरा सामने था।
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
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सच का सामना
डर के मारे आरव ने मोबाइल फेंक दिया।
वह सीधे माँ-पापा के कमरे में भागा और सब बता दिया।
पापा गंभीर हो गए।
अगले दिन वे उसे उस कुएँ के पास ले गए।
वहाँ एक बूढ़े चौकीदार ने बताया—
“सालों पहले यहाँ एक लड़की गिरकर मर गई थी। वह हमेशा मोबाइल में लगी रहती थी। किसी से बात नहीं करती थी।”
आरव को सिहरन हो गई।
पापा ने समझाया—
“बेटा, मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसका गलत इस्तेमाल खतरनाक है। इससे लोग अपनों से दूर हो जाते हैं।”
माँ ने कहा—
“हमारे साथ समय बिताओ, असली दुनिया देखो।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसे समझ आ गया कि वह धीरे-धीरे उसी राह पर जा रहा था।
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नई शुरुआत
उस दिन के बाद आरव ने मोबाइल का समय कम कर दिया।
वह दोस्तों के साथ खेलने लगा।
माँ-पापा से बातें करने लगा।
किताबें पढ़ने लगा।
एक दिन अचानक मोबाइल में नोटिफिकेशन आया।
नीलाया_1890 ने अंतिम संदेश भेजा—
“तुम बच गए… काश मैं भी बच पाती।”
फिर वह अकाउंट गायब हो गया।
उस रात आरव ने चैन की नींद सोई।

संदेश (बच्चों के लिए)

सोशल मीडिया और मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम उनमें जरूरत से ज्यादा डूब जाएँ, तो हम अपने परिवार, दोस्तों और असली दुनिया से दूर हो जाते हैं। कभी-कभी यह दूरी खतरनाक भी हो सकती है।

मोबाइल का इस्तेमाल करें, लेकिन मोबाइल के गुलाम न बनें।
अपनों के साथ समय बिताएँ, खेलें, सीखें और असली दुनिया को अपनाएँ।

क्योंकि असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
आपके आसपास की दुनिया में है।

अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी

 परछाइयों वाला मोबाइल - कहानी 

गाँव का नाम था सोनपुर। चारों तरफ हरियाली, पीपल के पेड़, कच्ची गलियाँ और एक पुराना स्कूल—जिसकी दीवारों पर समय की दरारें साफ दिखती थीं। इसी गाँव में रहता था आरव, पाँचवीं कक्षा का छात्र। पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन मोबाइल फोन से उसे कुछ ज़्यादा ही प्यार था।
सुबह उठते ही मोबाइल, सोते समय मोबाइल, खाते समय मोबाइल, पढ़ते समय मोबाइल—आरव की दुनिया मोबाइल में सिमट गई थी।
उसकी माँ अक्सर कहती,
“बेटा, मोबाइल ज़रूरी है, लेकिन ज़िंदगी नहीं।”
पर आरव हँस देता।
एक दिन उसके पापा शहर से नया स्मार्टफोन लेकर आए। बड़ा स्क्रीन, तेज़ इंटरनेट और ढेर सारे ऐप्स। आरव की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
अब वह घंटों रील्स, शॉर्ट वीडियो और गेम्स में खोया रहता।
धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगे—
• पढ़ाई में मन नहीं लगता
• नींद पूरी नहीं होती
• चिड़चिड़ा रहने लगा
• अकेला रहने लगा
• दोस्तों से बात कम हो गई
एक रात, जब पूरा गाँव सो चुका था, आरव अपने कमरे में मोबाइल चला रहा था। अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने आप चमकने लगी। एक नया नोटिफिकेशन आया—
प्रोफाइल फोटो में सिर्फ़ काली परछाईं थी।
आरव ने सोचा कोई मज़ाक होगा और बिना सोचे समझे Accept कर लिया।
तुरंत एक मैसेज आया—
“तुम मुझे देख सकते हो… पर मैं तुम्हें देख रहा हूँ।”
आरव को हल्की सिहरन हुई, पर उसने सोचा यह कोई फेक अकाउंट होगा।
उसने जवाब लिखा—
“कौन हो तुम?”
उत्तर आया—
“मैं वही हूँ जो मोबाइल के अंदर रहता है… और बच्चों को अपने साथ ले जाता है।”
अब आरव को डर लगा। उसने मोबाइल बंद कर दिया और सो गया।
पहली परछाईं
अगली रात फिर वही नोटिफिकेशन।
“तुम मुझसे भाग नहीं सकते।”
मोबाइल अपने आप ऑन हो गया। स्क्रीन पर वीडियो चलने लगा।
वीडियो में एक लड़का था—ठीक आरव जैसा दिखने वाला—जो अँधेरे कमरे में मोबाइल पकड़े बैठा था। उसके पीछे एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।
अचानक परछाईं ने लड़के को पकड़ लिया।
आरव डर से चीख पड़ा।
उसी रात उसने सपना देखा—
वह एक अँधेरी दुनिया में है जहाँ हजारों बच्चे मोबाइल पकड़े खड़े हैं। सबकी आँखें नीली रोशनी से चमक रही हैं। उनके पीछे काली परछाइयाँ घूम रही हैं।
एक आवाज़ गूँजी—
“जो बच्चे मोबाइल को अपनी दुनिया बना लेते हैं…
वो हमारी दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।”
आरव की नींद खुल गई। पसीने से पूरा शरीर भीगा था।
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🧓 पुरानी लाइब्रेरी और रहस्य
अगले दिन स्कूल में उसने यह बात अपने दोस्त मोहन को बताई। मोहन ने उसे स्कूल के पीछे बनी पुरानी लाइब्रेरी में चलने को कहा।
वहाँ एक बूढ़े बाबा रहते थे—सब उन्हें “ज्ञान बाबा” कहते थे।
बाबा ने पूरी बात सुनी और गंभीर होकर बोले—
“बेटा, ये कोई साधारण आत्मा नहीं है।
ये डिजिटल आत्मा है।”
आरव हैरान—
“डिजिटल आत्मा?”
बाबा बोले—
“बहुत साल पहले एक बच्चा था—नाम था शिव।
वो मोबाइल और इंटरनेट का इतना आदी था कि उसने दुनिया से रिश्ता तोड़ लिया।
एक रात मोबाइल चलाते-चलाते उसकी मौत हो गई।
उसकी आत्मा मोबाइल की दुनिया में भटकती रह गई।
अब वो बच्चों को सोशल मीडिया, मोबाइल और स्क्रीन की दुनिया में खींच लेता है।”
आरव काँप उठा।
बाबा बोले—
“अगर बचना है, तो तीन काम करने होंगे:
1. मोबाइल से दूरी
2. असली दुनिया से दोस्ती
3. मन से डर को निकालना”

आख़िरी रात
उस रात फिर मैसेज आया—
“आज तुम मेरे साथ आओगे।”
मोबाइल अपने आप चमकने लगा। कमरे की लाइट बंद हो गई। दीवार पर काली परछाईं उभर आई।
पर इस बार आरव डरा नहीं।
उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
माँ-पापा की तस्वीर देखी।
दोस्तों की याद की।
स्कूल, मैदान, पेड़, किताबें—सब याद आया।
वह बोला—
“तुम मेरी ज़िंदगी नहीं हो।
मेरी दुनिया मोबाइल नहीं है।”
परछाईं चिल्लाई—
“तुम झूठ बोलते हो!”
आरव ने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
अचानक सब कुछ शांत हो गया।
कमरा रोशनी से भर गया।
परछाईं गायब हो गई।
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🌞 नई सुबह, नई ज़िंदगी
अगली सुबह आरव जल्दी उठा।
मोबाइल अलमारी में रखा।
स्कूल गया।
दोस्तों के साथ खेला।
माँ की मदद की।
किताबें पढ़ीं।
अब वह मोबाइल का इस्तेमाल करता था—
लेकिन सीमित समय के लिए।
उसने स्कूल में बच्चों को कहानी सुनाई।
टीचर ने कहा—
“डर के साथ सीख—यही सबसे मजबूत शिक्षा होती है।”
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🌈 कहानी का संदेश

बच्चों के लिए सीख:
1. मोबाइल बुरा नहीं है,
लेकिन उसका ज़्यादा इस्तेमाल खतरनाक है
2. सोशल मीडिया दिखावटी दुनिया है
3. असली खुशी स्क्रीन में नहीं,
रिश्तों में होती है
4. दोस्ती, खेल, किताबें, परिवार—
यही असली दुनिया है
5. जो बच्चे मोबाइल को दुनिया बना लेते हैं,
वो असली दुनिया खो देते हैं

✨ अंतिम पंक्तियाँ

“मोबाइल साधन है, संसार नहीं
स्क्रीन रोशनी है, सूरज नहीं
डिजिटल दुनिया आकर्षक है,
पर असली दुनिया ही जीवन है।”

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम


क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग

 क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग

क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग
क्यूँ कर स्वाभिमान को दांव पर लगा लेते हैं लोग

क्यूँ कर राजनीति अपने मार्ग से भटक रही है
क्यूँ कर कुर्सी के लिए अनैतिक रास्ते अपना रहे हैं लोग

जनता खुद को ठगा सा कर रही है महसूस
क्यूँ कर सपनों को धराशायी कर रहे हैं लोग

जिसको माध्यम बनाके खुद को किया स्थापित
उसी के घर में गड्ढे खोद रहे हैं लोग

रेवड़ी बांट बाँटकर लोगों को कर रहे हैं वो गुमनाम
कुर्सी के मोह मे, देश से गद्दारी कर रहे हैं लोग

क्यूँ कर पाला बदल लेते हैं लोग
क्यूँ कर स्वाभिमान को दांव पर लगा लेते हैं लोग l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

विचार

 विचार

जब अनैतिक रास्ते दैनिक जीवन का हिस्सा होने लगें तो समझ लेना चाहिए कि आप रावण, कंस या फिर कहें कि आप दुर्योधन बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं l

अनिल कुमार गुप्ता अंजुम