संकल्प की वापसी: पारस की कहानी
बंसीराम जी के घर जब पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने उसका नाम रखा— पारस। बंसीराम खुद एक साधारण किसान थे, लेकिन उनका सपना असाधारण था। पारस बचपन से ही उनकी उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरा। वह न केवल शांत और सुशील था, बल्कि पढ़ाई में भी उसका कोई सानी नहीं था। गाँव के स्कूल में जब पारस अपनी किताबें लेकर बैठता, तो लोग कहते, "बंसीराम का बेटा एक दिन बड़ा अफसर बनेगा।" पारस की आँखों में भी वही चमक थी—एक प्रशासनिक अधिकारी (IAS) बनकर समाज की सेवा करने का सपना।
दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में जिले में प्रथम आने के बाद, पारस शहर चला गया। असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। शहर की चकाचौंध और नए परिवेश में पारस को कुछ ऐसे दोस्त मिले, जिनके लिए पढ़ाई से ज्यादा 'मौज-मस्ती' मायने रखती थी। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई—कभी एक फिल्म देखने जाना, कभी घंटों कैफे में बैठकर फिजूल की बातें करना।
धीरे-धीरे, पारस की मेज पर सजी प्रशासनिक सेवाओं की किताबें धूल फांकने लगीं। वह 'संगत के रंग' में ऐसा रंगा कि उसे अपनी मंजिल धुंधली लगने लगी। बंसीराम गाँव से मेहनत की कमाई भेजते रहे, इस भरोसे में कि उनका बेटा दिल्ली में 'साहब' बनने की तैयारी कर रहा है। लेकिन पारस अब सिगरेट के धुएं और रातों की आवारागर्दी में अपनी मेधा को खो चुका था। तीन साल बीत गए, ग्रेजुएशन जैसे-तैसे पूरी हुई, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में वह प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तक नहीं निकाल पाया।
एक दिन ऐसा आया जब पारस पूरी तरह हताश हो गया। आत्मविश्वास शून्य हो चुका था। उसने खुद को मान लिया था कि वह 'असफल' है। वह अपने दोस्तों के साथ गलत आदतों में इतना गहरा उतर गया कि गाँव जाना भी छोड़ दिया। बंसीराम की चिट्ठियाँ और फोन अब उसे बोझ लगने लगे थे। वह उस पारस का कंकाल मात्र रह गया था, जो कभी अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।
जिंदगी जब सबसे अंधेरे मोड़ पर होती है, तभी कहीं से रोशनी की एक किरण आती है। पारस के जीवन में वह किरण बनकर आए प्रोफेसर आदित्य। प्रोफेसर आदित्य पारस के कॉलेज में नए आए थे और उन्होंने पारस के पुराने रिकॉर्ड्स देखे थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना होनहार छात्र इस कदर टूट सकता है।
एक शाम, जब पारस पार्क के एक कोने में अकेला बैठा अपनी किस्मत को कोस रहा था, प्रोफेसर आदित्य उसके पास आकर बैठ गए। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, बस एक सवाल पूछा:
"पारस, क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता के हाथों की लकीरें मिट्टी से क्यों फटी हुई हैं?"
पारस खामोश रहा। प्रोफेसर ने आगे कहा, "वह मिट्टी पारस बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन तुमने खुद को कोयला बना लिया। तुम्हारी हार तुम्हारे दोस्तों की वजह से नहीं, बल्कि तुम्हारी खुद से हार है।"
प्रोफेसर आदित्य ने पारस को अपने संरक्षण में ले लिया। उन्होंने पारस के लिए एक सख्त दिनचर्या बनाई। शुरुआत में पारस का मन विचलित होता, पुराने दोस्त उसे वापस बुलाते, लेकिन इस बार उसके पास एक 'गुरु' का हाथ था।
पारस की नई दिनचर्या:
भोर का समय: योग और ध्यान (मानसिक शांति के लिए)।
दोपहर: गहन अध्ययन और नोट्स बनाना।
शाम: प्रोफेसर के साथ समसामयिक विषयों पर चर्चा।
रात: लेखन अभ्यास और आत्म-विश्लेषण।
प्रोफेसर ने उसे सिखाया कि सफलता केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि निरंतरता () से मिलती है। पारस ने अपने फोन से उन सभी नंबरों को हटा दिया जो उसे उसकी मंजिल से दूर ले जाते थे। उसने फिर से शून्य से शुरुआत की।
अगले दो साल पारस के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। एक बार फिर उसने परीक्षा दी। प्रीलिम्स निकला, मेंस भी शानदार रहा, लेकिन इंटरव्यू में वह कुछ अंकों से रह गया। पारस फिर से टूटने लगा। उसे लगा कि शायद अब बहुत देर हो चुकी है। लेकिन प्रोफेसर आदित्य ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मैदान में गिरा हुआ इंसान फिर उठ सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ नहीं। तुम हार के इतने करीब हो कि अगली कोशिश जीत की होगी।"
पारस ने अपनी कमियों पर काम किया। उसने अपनी भाषा, अपने दृष्टिकोण और अपने प्रशासनिक कौशल को निखारा। इस बीच बंसीराम बीमार पड़ गए, घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, लेकिन पारस ने हार नहीं मानी। वह दिन में ट्यूशन पढ़ाता और रात भर पढ़ाई करता।
अंततः, वह दिन आ ही गया जिसका पूरे गाँव को इंतजार था। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का परिणाम घोषित हुआ। पारस ने न केवल परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि पूरे देश में 25वीं रैंक हासिल की।
जब वह लाल बत्ती की गाड़ी (प्रतीकात्मक रूप से अब प्रशासनिक पद) से अपने गाँव पहुँचा, तो पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। बंसीराम की आँखों में खुशी के आँसू थे। पारस सीधे अपने पिता के पास गया और उनके फटे हुए हाथों को चूम लिया। लेकिन उसकी यात्रा यहाँ पूरी नहीं हुई थी। वह तुरंत शहर गया और प्रोफेसर आदित्य के चरणों में गिर पड़ा।
प्रोफेसर ने उसे गले लगाकर बस इतना कहा, "पारस, याद रखना, एक अधिकारी कलम से नहीं, बल्कि अपने चरित्र से बड़ा होता है। जिस भटकाव ने तुम्हें गिराया था, वह तुम्हें दूसरों को उठाने की प्रेरणा देगा।"
कहानी का सार
पारस की कहानी हमें यह सिखाती है कि:
संगत का असर: गलत मित्र आपकी क्षमता को नष्ट कर सकते हैं।
गुरु की महत्ता: एक सही मार्गदर्शक पत्थर को भी हीरा बना सकता है।
आत्म-बोध: अपनी गलतियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।
दृढ़ता: सफलता वक्त माँगती है, और जो अंत तक टिका रहता है, वही विजेता बनता है।
आज पारस एक ईमानदार जिलाधिकारी के रूप में जाना जाता है, जो भटके हुए युवाओं को सही राह दिखाने के लिए विशेष कार्यशालाएं चलाता है। उसकी जिंदगी का उतार-चढ़ाव अब हज़ारों युवाओं के लिए एक मशाल बन चुका है।
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम