लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Tuesday, 15 December 2015

प्यार वालों ज़रा संभल के

प्यार वालों ज़रा संभल के

प्यार वालों ज़रा संभल के , ये इश्क आसां नहीं है
कुछ गिरते हैं , कुछ उठते हैं, ये राह इतनी आसां नहीं है

प्यार वालों ज़रा संभल्र के , ये इश्क आसां नहीं है

इश्क में चैन नहीं , दो पल का सुकून नहीं
कुछ हैं जीते , कुछ हैं मरते, ये राह इतनी आसां नहीं है

प्यार वालों ज़रा संभल के , ये इश्क आसां नहीं है

अंजामे--मुहब्बत से वाकिफ हैं सभी “ अनिल"
खुद को रोक सकें , ये राह इतनी भी आसां नहीं है

प्यार वालों ज़रा संभल्न के , ये इश्क आसां नहीं है

अमानत हो जाए एहसासे--मुहब्बत , ऐसे अरमां दिल में रख
मुहब्बत के दुश्मनों से बच , ये राह इतनी भी आसां नहीं है

प्यार वालों ज़रा संभलत्र के , ये इश्क आसां नहीं है

Monday, 14 December 2015

पर्वतों की ऊँचाइयों से पूछो ,मंजिलों का पता

पर्वतों की ऊँचाइयों से पूछो ,मंजिलों का पता


पर्वतों की ऊँचाइयों से पूछो ,मंजिलों का पता
किसी निर्धन से अभाव में जीने का मर्म पूछो

पंक्षियों से पूछो , आसमां तक पहुँचने का राज
चींटियों से पूछो, सफल और अनुशासित जीवन जीने का राज़

हाथी से पूछो, उसकी मदमस्त चाल का राज़
फूलों से पूछो, मुस्कुराते रहने का अंदाज़

घास से पूछो , दूसरों का बार – बार ग्रास हो जाने की व्यथा
भंवरों से पूछो,  मुस्कुराते रहने का राज़

कल – कल बहती सरिता से पूछो , अविराम बहते रहने का राज़

पुष्प से पूछो , खुशबू बिखेरने की कला
गिर – गिर कर उठते और सफल होते सवार से पूछो सफल होने की कथा

कल- कल कर गिरते झरनों से पूछो, गिरने और बहते रहने की कला

किसी अंधे व्यक्ति से पूछो , कुछ भी न देख पाने का गम
किसी शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति से पूछो न दौड़ पाने का गम

किसी अनाथ बच्चे से पूछो, सर पर माता – पिता  की छाया न होने की व्यथा
किसी बेघर व्यक्ति से पूछो, यहाँ – वहां भागते रहने और छत ढूंढते रहने की व्यथा


किसी पक्षी से पूछो , तूफां में आशियाने के बिखर जाने का गम
किसी पत्थर से पूछो, ठोकर खा – खाकर सिसकने का गम

किसी भटकते राही से पूछो, मंजिल न पाने की व्यथा
किसी बच्चे से पूछो, उसके रोने की वजह

किसी स्त्री से पूछो, उसके चीरहरण की व्यथा
किसी प्यासे से पूछो दो बूँद पानी की कीमत

किसी गिरते हुए राही से पूछो न उठ पाने का गम
 
किसी बदनसीब से पूछो, खुशियों के घर का पता

पर्वतों की ऊँचाइयों से पूछो ,मंजिलों का पता
किसी निर्धन से अभाव में जीने का मर्म पूछो

पंक्षियों से पूछो , आसमां तक पहुँचने का राज
चींटियों से पूछो, सफल और अनुशासित जीवन जीने का राज़


उपरोक्त सभी प्रश्नों के उत्तर , क्या जीवन का सत्य बयाँ नहीं करते ?
स्वयं से पूछकर देखो..................................




कामचोर पार्ट - 2

           कामचोर             पार्ट -  2


कामचोरों के नखरे हज़ार होते हैं
दिखते हैं चुस्त, पर दिल से बीमार होते हैं

कामचोरों की हमसे मत पूछो भैया
जहां भी जाते हैं , ये कामचोर पैदा करते हैं

बड़ी ही गन्दी कौम होती है ये भैया
इनके साथ रहो, पार न होवे नैया

डांट खाना , इनकी पुरानी आदत है
बड़े बेशर्म हैं , कोई फर्क नहीं पड़ता है इन्हें

इनकी कातिल मुस्कान से बचना भैया
खुद तो डूबते, दूसरों को डुबो देते हैं

चाल से इनकी बचकर रहना भैया
खड़े – खड़े ये नाकों चने चबवा देते हैं

जहां भी जाते हैं ये गालिया खाते हैं
जो साथ इनके रहता है,  उसे भी गालिया खिलवाते हैं

न जीतते हैं , न दूसरों को जीतने देते हैं
इनके सारे कारनामे , बेवकूफी भरे होते हैं

कामचोरों ने हमको बहुत छकाया है
इनकी माया में छिपी कोई महामाया है

अल्ला बचाए , हमें इन कामचोरों से
धरती पर घूमते- विचरते इन बोझों से

दुनिया की तरक्की में ये बाधक हैं
वैसे इनका हम पर चलता जोर नहीं

काम करने वालों की जग में पूछ होती है
दुनिया में कामवालों की इज्जत होती है

कामवालों से ये कामचोर कुछ सीखें
ज्यादा नहीं तो थोड़ा ही योगदान करैं

खुद की इज्जत करें औरों को इज्जत दें
जितने भी दिन ये जियें सर उठाकर जियें

अभिनन्दन की राह पर ये बेखौफ बढ़ें
दूसरों को प्रेरित करें, आगे बढ़ें – आगे बढ़ें

 


शागिर्द समझकर ऐ मौला

शागिर्द समझकर ऐ मौला

शागिर्द समझकर ऐ मौला , तेरे दर मैं जगह देना मुझको
जागूं तो इबादत मेँ तेरी. सोरऊँ तो इबादत दे मुझको

जन्नत की मुझे परवाह नहीं . निगाह में अपनी रख मुझको
मेरा ठिकाना कोई नहीं. दर पर अपने रख मुझको

अकबर है तू तुझसा कोई नहीं, अपनी पनाह में रख मुझको
मैं अंजामे इबादत क्या जानू शागिर्द बना ले तू मुझको

रोशन हो सुबह और शाम मेरी. आदिल तू बना दे मुझको
आखिर मैं बन्दा हूँ तेरा. आगोश में अपनी ले मुझको

ज़मीर मेरा बोझिल न हो . जिल्‍्लत से बचाना तू मुझको
मैं नक़्शे कदम पर चलूँ तेरे . ऐसी तदबीर सुझा मुझको

दामन में मेरे खुशियाँ बरसें , ऐसी तरकीब बता मुझको
तसब्वुर में ही सही. दीदार से अपने नवाज मुझकों

मैं यहाँ रहूँ या वहां रहूँ. पनाह में अपनी रख मुझको
नाउम्मीद न करना मेरे खुदा, काबित्र बना माला मुझको

निस्‍्बत है तुझसे मुझको माला. अपने दर का चराग बना मुझको
पाकीजा शख्सियत हो मेरी. पासबान तेरा . तू कर मुझको



जन्नत की आरज़ू नहीं मुझको

जन्नत की आर जू नहीं मुझको

जन्नत की आरजू नहीं मुझको
अपना गुलाम बना के रख
जूनून की हद तक ही सही
अपना शागिर्ट बना के रख

डबादत की जंजीरों में
जकड़कर रख मुझको ऐ मौला
ठिकाना मेरा, दर हो तेरा
इस नाचीज को अपना बना के रख

नादानी में भी मुझसे
हो न गुनाह कोई
निगेहबान हो तू मेरा
मुझको अपनी पनाह मेँ रख

मुहब्बत हो मुझको
सभी बन्दों से तेरे
आँखों का तेरी नूर हो सकूं मौला
रहम कर , अपनी नवाजिश मैं रख

टुकड़े जिगर के संभालता रहा हूँ मैं

टुकड़े जिगर के संभातरता रहा हूँ मैं
मुहब्बत की इन निशानियों को चाहता रहा हूँ मैं
यू ही नहीं आबाद , आशियाने हैं होते
मुहब्बत की जीत है ये, खुदा के करम से


तारीख हो गए वो, जो वतन पर हुए शहीद
गली -कृचों में मरने वाले , तारीख का हिस्सा
नहीं होते


तरक्की के  मायने , आलिशान भवन नहीं
तरक्की वो जो मरकर , जन्नत नसीब करे


सरहदें दिलों के रिश्तों को तोड़ा नहीं करतीं
मुहब्बत वो, पाक जूनून है , सरहदें जिन्हें
सीमा में बांध नहीं सकतीं


सरहदों के लिए मरना, सरहदों के लिए जीना
ये वतन परस्ती का जूनून है, जिसका कोई जवाब
नहीं




Sunday, 13 December 2015

मैं तेरी शरण में आया हूँ प्रभु

मैं तेरी शरण में आया हूँ प्रभु

मैं तेरी शरणमें आया हूँ प्रभु
नैया मेरी पार लगा दो

तेरे चरणों से बांध जाऊं मैं
ऐसे मेरे मन में विचार जगा दो

अजनबी न समझो मुझको
निज चरणों में जगह दिला दो

भाग्य मेरा मुझसे न रूठे
कर्म राह दिखला दो मुझको

बिखरा – बिखरा सा है जीवन
प्रभु अपने चरणों में मुझे रमा दो

लालसायें तो बहुत हैं
मोक्ष राह दिखला दो मुझको

काम – वासना राह नहीं हो
आध्यात्म राह पर प्रस्थित कर दो

सौभाग्य मेरा कीर्ति हो तेरी
ऐसा कुछ विश्वास जगा दो

पुरस्कार मुझको नहीं भाते
मन में सुन्दर भाव जगा दो

श्रेष्ठ उपासक हो जाऊं मैं
ऐसे मेरे भाग्य जगा दो

प्रतिशोध नहीं हो नियति मेरी
मन में क्षमा भाव जगा दो

गौरवान्वित हो जाऊं प्रभु
मन में सेवा भाव जगा दो

भोग विलास नहीं मुझको प्यारे
स्वर्ग राह दिखला दो प्रभु 

मैं तेरी शरण में आया हूँ प्रभु
नैया मेरी पार लगा दो







चंद एहसास - मुक्तक


1.

मुहब्बत के इन खुशनुमा पलों को दिल में सजाकर रखना
इंबादते -इश्क के इन एहसासों को बचाकर रखना

खुदा ने नवाज़ा है हमें , मुहब्बत की इस नियामत से
खुदा की इस नियामत को , दिल में सहेजकर रखना

२.

उस आसमानी खुदा पर , गर भरोसा है तुझको
एहसासे -मुह॒ब्बत के इस चिराग को रोशन रखना

उस खुदा का हर एक करम गर कबूल है तुझको
खुद की उस खुदा की राह पर फना करना

3.

अजनबी न समझना खुद को, अज़ीज़ है उस खुदा को तू
इंसानियत की राह में तू खुद को , उस खुदा की अमानते करना

खुदा का दर नसीब हो तुझको, इस एहसास को दिल में ज़वां रखना
आहिस्ता -आहिस्ता ही सही करम होगा उसका , उस खुदा पर एतबार रखना


4.

किनारे यूं ही मंजिल का निशाँ नहीं होते
बीच मझचधार कोशिशों की नाव चलाकर देखो


5.

कायदों की परछाइयों को जिन्दगी का हिस्सा बनाकर देखो
सफलताओं के दौर से गुजरोगे तुम और मंजिलें तेरे क़दमों का निशाँ होंगी



क्षणिकायें

घरेलू हिंसा पर कविता लिख
इतरा रहा है वो
रोज शाम अपनी बीवी से
मार खा रहा है वो



वह कवि ही क्या जो
अपनी बीवी से न डरे
सुबह हो या शाम
उसे दंडवत न करे



वह कवि ही क्या जो
अपनी बीवी की तारीफ़ में कविता न लिखे
वह कवि ही क्या जो
अपनी पड़ोसन को भाभीजी न कहे\

क्षणिकायें

बेदर्द जमाने ने मुझे
ग़मों की सौगात दी है
एक हम थे जिन्होंने
उफ़ भी न किया



कुदरत के नज़ारे
हमारी जिन्दगी का हिस्सा हो जाते
काश पर्यावरण के प्रति
हम भाईचारा दिखाते



मेरी कलम ने देखो
क्या कमाल किया
वो वाहवाही करते रहे
और मैं हैरान हुआ