"जनसेवा का महान व्यापार" - राजनीतिक कुटिल चालों पर व्यंग्य
लोकतंत्र को अक्सर जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन कहा जाता है। यह परिभाषा सुनने में जितनी सुंदर लगती है, व्यवहार में उतनी ही रोचक दिखाई देती है। हमारे देश में लोकतंत्र एक ऐसा विशाल मंच है जहाँ जनता दर्शक होती है, नेता कलाकार होते हैं और चुनाव सबसे बड़ा मनोरंजन कार्यक्रम होता है। हर पाँच वर्ष में यह कार्यक्रम बड़े धूमधाम से आयोजित होता है और जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि इस बार का प्रदर्शन पिछली बार से कहीं अधिक शानदार होगा।
राजनीति वास्तव में एक अद्भुत कला है। यहाँ सफेद को काला और काले को सफेद सिद्ध करने की क्षमता को प्रतिभा माना जाता है। जो नेता कल तक एक-दूसरे को भ्रष्टाचार का जीवित स्मारक बताते थे, वे आज एक-दूसरे को ईमानदारी का प्रतीक घोषित करते दिखाई देते हैं। जनता जब इस परिवर्तन का कारण पूछती है तो उसे समझाया जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। अर्थात् कल जो असंभव था, वह आज संभव है और जो आज संभव है, वह कल असंभव हो सकता है।
चुनाव का मौसम आते ही नेताओं के भीतर जनसेवा का ऐसा ज्वार उठता है कि वैज्ञानिक भी उसका कारण खोजने में असफल रहे हैं। पाँच वर्षों तक जनता को दूरबीन से देखने वाले नेता अचानक उसकी चौखट पर दिखाई देने लगते हैं। जिन गलियों में बरसों तक उनका वाहन नहीं पहुँचा, वहाँ वे पैदल भ्रमण करते हुए मिल जाते हैं। जिन घरों में कभी उनका प्रवेश नहीं हुआ, वहाँ वे चाय पीते, बच्चों को गोद में उठाते और बुजुर्गों के चरण स्पर्श करते दिखाई देते हैं।
चुनावी मौसम में नेता का व्यवहार किसी ऐसे रिश्तेदार की तरह हो जाता है जो केवल शादी-ब्याह के अवसर पर याद आता है। वह बड़े प्रेम से कहता है—"आपका परिवार ही मेरा परिवार है।" जनता भी मुस्कुरा देती है क्योंकि उसे पता होता है कि चुनाव परिणाम आते ही यह पारिवारिक संबंध अगले पाँच वर्षों के लिए स्थगित हो जाएगा।
राजनीतिक भाषणों का अपना अलग ही महत्व है। यह एक ऐसी विधा है जिसमें कल्पना और आशा का अनुपात वास्तविकता से कहीं अधिक होता है। मंच पर खड़े होकर नेता घोषणा करते हैं कि यदि उनकी सरकार बनी तो हर हाथ को काम मिलेगा, हर खेत को पानी मिलेगा, हर सड़क चमक उठेगी और हर नागरिक खुशहाल हो जाएगा।
जनता तालियाँ बजाती है।
पाँच वर्ष बाद वही नेता फिर मंच पर आते हैं और कहते हैं कि परिस्थितियाँ कठिन थीं, वैश्विक संकट था, मौसम प्रतिकूल था, विरोधियों ने सहयोग नहीं किया और कुछ अदृश्य शक्तियाँ विकास में बाधा बन गईं। इसलिए वादे पूरे नहीं हो सके। लेकिन इस बार अवसर मिल जाए तो सब ठीक हो जाएगा।
जनता फिर तालियाँ बजाती है।
राजनीति में आशा कभी समाप्त नहीं होती। समाप्त होती है तो केवल योजनाएँ।
राजनीतिक दलों की विचारधारा भी बड़ी अद्भुत वस्तु है। सामान्य मनुष्य अपने विचार बदलने में वर्षों लगा देता है, लेकिन नेता कुछ ही घंटों में वैचारिक परिवर्तन कर सकते हैं। सुबह तक जो दल राष्ट्र के लिए खतरा था, शाम तक वही राष्ट्र निर्माण का साथी बन जाता है। जो नेता कल तक किसी पार्टी की आलोचना करते हुए थकते नहीं थे, वे आज उसी पार्टी की उपलब्धियों पर पुस्तक लिखने को तैयार रहते हैं।
दल-बदल राजनीति का सबसे लोकप्रिय खेल है। यह ऐसा खेल है जिसमें खिलाड़ी मैदान नहीं बदलता, केवल जर्सी बदलता है। कल तक जो नेता सत्ता पक्ष को भ्रष्ट बता रहा था, आज उसी सत्ता पक्ष में शामिल होकर बताता है कि उसे अब वास्तविकता का ज्ञान हुआ है। जनता आश्चर्य करती है कि ज्ञान का यह प्रकाश हमेशा मंत्री पद मिलने के बाद ही क्यों प्रकट होता है।
राजनीति में घोषणाओं का विशेष महत्व है। घोषणा करना आसान है क्योंकि उसके लिए बजट की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए घोषणाएँ भरपूर की जाती हैं। हर वर्ष नई योजनाएँ आती हैं, नए नारे बनते हैं और नए संकल्प लिए जाते हैं।
एक योजना पूरी होने से पहले दूसरी योजना की घोषणा कर दी जाती है। दूसरी योजना के परिणाम आने से पहले तीसरी योजना प्रस्तुत कर दी जाती है। धीरे-धीरे योजनाओं का इतना बड़ा परिवार बन जाता है कि जनता को याद ही नहीं रहता कि शुरुआत कहाँ से हुई थी।
यदि कोई नागरिक पूछ बैठे कि पुरानी योजना का क्या हुआ, तो उसे बताया जाता है कि उसकी सफलता इतनी महान थी कि उसके आधार पर नई योजना बनाई गई है।
राजनीतिक कुटिलता का सबसे रोचक रूप तब दिखाई देता है जब वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाना हो। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और विकास जैसे कठिन विषयों पर चर्चा करना श्रमसाध्य कार्य है। इसलिए बहस को किसी ऐसे विषय की ओर मोड़ दिया जाता है जहाँ भावनाएँ अधिक हों और तथ्य कम।
कुछ दिनों तक पूरा देश उसी विषय पर चर्चा करता है। समाचार चैनल बहस करते हैं, सोशल मीडिया पर अभियान चलते हैं और जनता आपस में तर्क-वितर्क करती रहती है। इस बीच वास्तविक समस्याएँ चुपचाप किसी कोने में बैठकर अपनी बारी का इंतजार करती रहती हैं।
राजनीति में विरोधियों का महत्व भी कम नहीं होता। लोकतंत्र में विपक्ष आवश्यक माना जाता है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि सत्ता और विपक्ष का संबंध कुश्ती के खिलाड़ियों जैसा है। मंच पर वे एक-दूसरे पर जमकर प्रहार करते हैं, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुस्कुराते हुए साथ चाय पीते दिखाई देते हैं।
जनता यह देखकर भ्रमित हो जाती है कि जो लोग कुछ घंटे पहले एक-दूसरे को लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, वे अब इतने प्रसन्न क्यों हैं।
लेकिन राजनीति में यह सामान्य बात है। यहाँ विरोध भी रणनीति है और मित्रता भी रणनीति।
सोशल मीडिया ने राजनीतिक कुटिलता को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। अब किसी घटना के अनेक संस्करण एक साथ प्रस्तुत किए जा सकते हैं। एक ही समाचार को समर्थक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हैं और विरोधी उसे राष्ट्रीय संकट घोषित कर देते हैं।
साधारण नागरिक मोबाइल स्क्रीन को देखकर सोचता रह जाता है कि सत्य आखिर कहाँ गया।
शायद सत्य भी भ्रमित होकर किसी शांत स्थान की तलाश में निकल गया हो।
राजनीति में सर्वेक्षणों का भी बड़ा महत्व है। चुनाव से पहले ऐसे सर्वेक्षण आते हैं जिनमें हर दल स्वयं को विजेता मानता है। यदि किसी दल के पक्ष में सर्वेक्षण हो तो वह उसे वैज्ञानिक सत्य घोषित करता है। यदि परिणाम विपरीत हो तो वही सर्वेक्षण पक्षपाती और अविश्वसनीय हो जाता है।
अर्थात् सर्वेक्षण की विश्वसनीयता उसके परिणाम पर निर्भर करती है।
राजनीतिक भाषणों में इतिहास का उपयोग भी अत्यंत रचनात्मक ढंग से किया जाता है। प्रत्येक दल इतिहास में अपनी उपलब्धियाँ खोजता है और विरोधियों की गलतियाँ। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान की समस्याएँ केवल इसलिए मौजूद हैं ताकि अतीत पर बहस की जा सके।
कई बार जनता सोचती है कि यदि इतिहास इतना ही महत्वपूर्ण है तो शायद भविष्य को भी किसी दिन महत्व मिल जाएगा।
राजनीति में वादों की आयु भी बड़ी विचित्र होती है। चुनाव के समय वे अमर प्रतीत होते हैं, लेकिन परिणाम घोषित होते ही उनकी आयु तेजी से घटने लगती है। कुछ वादे अगले चुनाव तक जीवित रहते हैं, कुछ पहले ही वर्ष में लुप्त हो जाते हैं और कुछ तो शपथ ग्रहण समारोह के बाद ही दिखाई देना बंद कर देते हैं।
फिर भी नए वादों का उत्पादन कभी नहीं रुकता।
यह राजनीति का सबसे सफल उद्योग है।
जनता भी कम दिलचस्प नहीं है। वह हर चुनाव में नेताओं की आलोचना करती है, उनके वादों पर हँसती है और उनकी रणनीतियों पर चर्चा करती है। लेकिन जब चुनाव आता है तो फिर उम्मीद करती है कि इस बार कुछ अलग होगा।
शायद लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही आशा है।
और नेताओं की सबसे बड़ी पूँजी भी।
राजनीतिक कुटिल चालें तभी सफल होती हैं जब जनता भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी भूमिका केवल मतदाता की नहीं, बल्कि सजग नागरिक की भी है। यदि नागरिक प्रश्न पूछें, जवाब माँगें, तथ्यों की जाँच करें और भावनाओं के साथ-साथ तर्क का भी उपयोग करें, तो राजनीति की कई पुरानी चालें स्वतः निष्प्रभावी हो जाएँगी।
लेकिन ऐसा होते ही राजनीति का मनोरंजन उद्योग संकट में पड़ जाएगा। तब नेताओं को भाषणों से अधिक काम करना पड़ेगा, घोषणाओं से अधिक परिणाम देने होंगे और प्रचार से अधिक जवाबदेही निभानी होगी।
शायद वही दिन लोकतंत्र का सबसे सुंदर दिन होगा।
तब जनसेवा वास्तव में सेवा बन जाएगी और राजनीति जनता के विश्वास का माध्यम।
लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक राजनीतिक कुटिल चालों का यह महान नाटक चलता रहेगा, नेता अपने किरदार निभाते रहेंगे, जनता आश्चर्य करती रहेगी और व्यंग्यकारों को लिखने के लिए विषयों की कभी कमी नहीं होगी।
आखिर राजनीति और व्यंग्य का संबंध उतना ही पुराना है जितना चुनाव और वादा, भाषण और ताली, तथा घोषणा और प्रतीक्षा का। लोकतंत्र की यही सबसे रोचक कहानी है—जहाँ हर कोई परिवर्तन की बात करता है, लेकिन सबसे कठिन परिवर्तन स्वयं को बदलना होता है।
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