राजनीतिक कुटिल चालें
(व्यंग्य कविता )
नेता जी फिर गाँव में आए, लेकर मीठी बात,
पाँच बरस जो दिखे नहीं थे, अब करते हैं मुलाकात।
हाथ जोड़कर कहते सबको, "आप हमारे प्राण",
जीत गए तो भूल जाएंगे, गली, मोहल्ला, मकान।
कल तक जिनको चोर कहा था, आज बने हैं मित्र,
राजनीति की गंगा में सब, हो जाते पवित्र।
दल बदला तो विचार बदले, बदली पूरी चाल,
कुर्सी के संग बदल गया फिर, सिद्धांतों का जाल।
वादों की बरसात हुई है, सपनों का व्यापार,
कागज़ पर ही बन जाते हैं, सौ-सौ नए द्वार।
सड़क, अस्पताल, स्कूलों की, बातें होती खूब,
लेकिन फाइल के जंगल में, जाते सारे डूब।
जनता को मुद्दों से हटाकर, नई बहस करवाएँ,
रोटी, शिक्षा भूल सभी फिर, झंडों में उलझाएँ।
भाषण में विकास दिखाते, जैसे स्वर्ग उतार,
धरती पर सुविधाएँ ढूँढे, जनता बारंबार।
चुनावों के मौसम में फिर, सेवा का अवतार,
जीत मिलते ही हो जाता, जनता से इंकार।
सोशल मीडिया पर चलती, वाह-वाही की रेल,
सच की हालत ऐसी जैसे, बिन पानी की बेल।
हर गलती का दोष विरोधी, हर सफलता अपनी,
राजनीति की इस विद्या पर, दुनिया जाए हँसनी।
युवा जब जागे प्रश्नों लेकर, खुलने लगे हिसाब,
झूठे वादों की दीवारों में, दिखने लगे खराब।
जनता बोली काम बताओ, मत गाओ गुणगान,
लोकतंत्र में सबसे ऊँचा, होता है इंसान।
कुर्सी कोई सिंहासन नहीं, सेवा का आधार,
जो जनता को भूल गया है, उसका बेड़ा पार।
यही व्यंग्य का सार मित्रों, सुन लो मेरे साथ,
जनता जागे तो रुक जाती, छल-कपटों की बात।
No comments:
Post a Comment