लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Friday, 18 September 2015

धर्मपरायण :- एक सदविचार

धर्मपरायण

धर्म को मानना और धर्मपरायण होना दो अलग-अलग
विचार हैं ।थधर्म के प्रति श्रद्धा, मोह एवं आस्था, धार्मिक
संस्कारों का अक्षरशः: पालन  करना, मानवीय एवं नैतिक
मूल्यों के साथ मानवीय संवेदनाओं को जीवंत रखना, अपने
ईष्ट के प्रति पूर्ण श्रद्धा और आस्था, धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति
पूर्ण समर्पण | ये सब गुण एक धर्मपरायण चरित्र में पाए जाते
हैं| एक धर्मपरायण चरित्र स्वयं के धर्म, संस्कृति व संस्कारों
का सम्मान तो करता ही है साथ ही उसके मन के कोने में
अन्य सभी धर्मो के प्रति भी श्रद्धा व सम्मान की भावना होती है
| ये चरित्र समाज व राष्ट्र की धरोहर होते हैं और साम्प्रदायिक
एकता व सद्भावना को स्थिरता प्रदान करते हैं | ये संस्कृति व
संस्कारों के सर्वश्रेष्ठ रक्षक माने जाते हैं |





Wednesday, 16 September 2015

कलम का जादू

कलम का जादू

उसकी कलम का जादू  सर चढ़ बोल रहा है
वो साहित्य के समंदर में खुशबू घोल रहा है

उसने खाए हैं ज़ख्म ज़माने में
उसके भीतर का दर्द बोल रहा है

खुशबू कभी नहीं मिली उसको फूलों से
वो कागज़ पर खुशबू के बीज बो रहा है

मिलेगी राह उसको भी इसी उम्मीद पर
वो आंसुओं की माला पिरो रहा है

राह में उसकी कांटे ही कांटे हैं
वह दूसरों की राह के कांटे बटोर रहा है

कलम उसी भी रोकने की कोशिश की ज़माने ने
कलम की नज़र से वो दिलों में उतर रहा है

इंसानियत पर भरोसा सदा से रहा है उसको
कलम से वो लोगों के गम पी रहा है

वक़्त की मार भी क्या चीज होती है जालिम
वो सोने की तरह खरा हो रहा है

कलम की मार पर न जाओ यारों
ये तो सोये लोगों के भाग्य जगाती है

कलम के साए से बच न सका कोई
ये तो हर एक को मुकाम दिलाती है

कलम का सम्मान करें हम सब
संभालकर रखें इसे अपनी जान की तरह

उसकी कलम का जादू  सर चढ़ बोल रहा है
वो साहित्य के समंदर में खुशबू घोल रहा है





आज को क्या हो गया

आज को क्या हो गया

आज को क्या हो गया
कल सा क्यों नहीं रहा
विसंगतियां क्यों पैदा हो गयीं
सामंजस्य न रहा

मानव से मानव का पतन
सदाचार न रहा
हम एक न रहे
एकता का बहाव न रहा

अखंडता को खतरा लग रहा
भाईचारा न रहा
फूल खिले हैं गुलशन – गुलशन
खुशबू से नाता न रहा

रखते हैं सब धर्म जेब में
धर्माचार न रहा
वासना ने जड़ें फैलायीं
सुविचार न रहा

लग रहे धर्म के मेले
धर्म से लगाव न रहा
भागती जिन्दगी के मालिक
मौत पर एतबार न रहा

कल की चाह में भागता वह
कल का एतबार न रहा
पतवार खींच चल रहे सब
बहाव का भरोसा न रहा

मैंने किया जिस पर भरोसा
उसे अपने पर भरोसा न रहा
काल करे को आज कर
प्रलय पर भरोसा न रहा

कुछ कर तू मानव के हित में
जिन्दगी का भरोसा न रहा
विसंगतियां क्यों पैदा हो गयीं
सामंजस्य न रहा






आओ हम हिंदी दीप जलायें

आओ हम हिंदी दीप जलायें

आओ हम हिंदी दीप जलायें
चहुँ ओर रौशनी फैलायें

आओ हम हिंदी दीप जलायें

सभी भाषाओं को अपनाएँ
सभी के दिल पर हम छा जाएँ

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी को भाषा एक बनायें
सारा विश्व इसे अपनाए

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी में कुछ मंत्र बनाएं
विश्व मुग्ध हो इसे अपनाए

आओ हम हिंदी दीप जलायें

प्रेमचन, गुप्त, बच्चन का
साहित्य घर – घर तक पहुंचाएं

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी संग्रह का अनुवाद
अन्य भाषाओं में करवाएं

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी जगत की विभूतियों को
विश्व मंच पर लेकर आयें

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी के सम्मान के लिए
अन्य भाषाओं को अपनाएँ

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी एक दीपक की भांति
चहुँ ओर रौशनी फैलाएं

आओ हम हिंदी दीप जलायें

हिंदी के विस्तार से हम
संस्कृति को जीवन्त पायें

आओ हम हिंदी दीप जलायें


Tuesday, 15 September 2015

कर्मपथ पर बढ़ते चलो

कर्म  पथ चलते रहो.

कर्म पथ चलते रहो,
भाग्य के मरोसे मत रहो

आलसी न होना तुम
परिश्रम करते रहो

कर्म से तुम मत डरो.
'लक्ष्य पर बढ़ते रहो.

ध्येय से तुम मत डिगो
अविराम बढ़ते चलो

आलस का मोह छोड़
'कर्मप्रिय तुम हो चलो

अवगुर्णों की खान आलस
हो सके तो तुम बचो

कठिनाइयों से मत डरो
'अविराम बढ़ते चलो

उद्यम सफलता की है कुजी
हों सके तो उयम करो

कर्महीन को कोई न पूछे
कर्मराह बढ़ते चलो

लेखनी का लेकर सहारा '
ऑदर्श चरित्र तुम गढ़ो 

कर्म पथ चलते रहो
भाग्य के भरोसे मत रहो





Sunday, 13 September 2015

वो चाहकर भी , आधुनिक न्दगी के हो न सके

वो चाहकर भी


वो चाहकर भी, आधुनिक जिन्दगी के हो न सके
उनके आदर्श उनकी धरोहर हो गए

भीतर की ज्वाला भी , उन्हैं प्रेरित न कर सकी
उनके संस्कार उनकी धरोहर हो गए

एक अजाब सी कसक थी उनके भीतर कहीं
मानवीय संवेदनायें उनकी धरोहर हो गए

जिन्दगी में लालसा को जगह मिल न सकी
उनके ज़ज्बात उनकी धरोहर हो गए

व्याकुलता उनके जीवन का हिस्सा न हो सकी
उनके सद आचरण उनकी धरोहर हो गए

आचरण में उनके गज़ब के संस्कार थे
उनकी शालीनता उनकी धरोहर हो गए

विपत्ति में  भी न भागना स्वभाव  था उनका
उनके प्रयास उनकी धरोहर हो गए







प्रेरणा

प्रेरणा

प्रेरणा एक. अनुभूति है जो स्व: अवलोकन से प्राप्त होती है | किसी
आदर्श चरित्र , कुशल व्यक्तित्व, संत, पीर , सदचरित्र आदि के जीवन
से प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है | उनके जीवन का अनुशासन,
संस्कृति, संस्कार , आदर्श, दैनिक दिनचर्या, जीवन के प्रति
मानवीय दृष्टिकोण , सामाजिकता , जीवन शैली आदि विषय प्रेरणा
का स्रोत हो सकते हैं | प्रेरणा से व्यक्ति स्वयं के भीतर की कमियों क।
अवलोकन कर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है और स्वयं को भी
आदर्श चरित्र के रूप में समाज में प्रतिष्ठित करने की और अग्रसर
होता है| जीवन में उत्कर्ष व अभिनन्‍्दन की राह प्रास करनी हो तो
अतिविशिष्ट सामाजिक चरित्रों की जीवनी का आचमन करना
चाहिए जिसे स्वयं को भी ऊर्जावान किया जा सके और स्वयं को
सही दिशा दी जा सके |






उत्तम विचार

१.


लक्ष्य भ्रष्ट  मनुष्य को मंजिल कभी भी 
नसीब नहीं होती | वह दिशाहीन व्यक्ति
की तरह यहाँ से वहां भटकता रहता है |
उसके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों का
कोई सुअन्त नहीं होता |वह स्वयं तो
दिशाहीन होता ही है साथ ही जीवन भर
किसी दूसरे व्यक्ति को राह नहीं दिखा पाता

२.

कर्तव्य विमुख चरित्र शून्य से शून्यतम
की ओर प्रस्थान करते हैं | इनका न तो
कोई लक्ष्य होता है न ही कोई दिशा | ये
दिशाहीन व्यक्ति की भांति अपने कर्तव्यों
से पीछा छुड़ाने में लगे रहते हैं | ये चरित्र
कभी भी सफल नहीं होते | इनका समाज
में कोई विशेष स्थान नहीं होता | ये
दुश्चरित्र की भांति विचरते रहते हैं |


3.


बंधनमुक्त जीवन व्यक्ति को सुन्दर से
सुन्दरतम , मधुए से मधुरतम, पवित्र से
पवित्रतम एवं महान से महानतम की ओर
प्रस्थित करता है | इसकी छाया मात्र से
हज़ारों लोगों का जीवन मंगलमय हो जाता है |
ये सत्मार्ग पर चलने की प्रेरणा का स्रोत होते हैं
| ये मानव को सही दिशा दिखाते हैं साथ ही.
उन्हें अपने मोक्ष की दिशा का ज्ञान कराते हैं |
ये संस्कारों एवं संस्कृति को पुष्पित करने का
कार्य करते हैं | ये मानव और परमात्मा के
बीच की विशेष कड़ी होते हैं |

4.


उपकार करना एक ऐसी मानवीय प्रक्रिया है
 जिसमे उपकार करने वाले को उपकार करने
के पश्चात भूल जाना ही बेहतर होता है | यदि
ऐसा नहीं होता तो समझना चाहिए कि
 उपकार के बदले वापस उपकार की आकांक्षा
मन के कोने में घर बनाए हुए है | और बदले
 में उपकार न प्राप्त होने पर उपकार करने की
ड प्रवृत्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है अर्थात
“नेकी कर दरिया में डाल “ की कहावत को
आधार बनाकर ही उपकार करना चाहिए |












सदविचार - द्वारा - अनिल कुमार गुप्ता

१.

निंदा करने वाले व्यक्ति का स्वयं का स्वयं के अभिनंदन 
से कोई लेना देना नहीं होता | वह तो केवल दूसरों के
अभिनंदन व  सम्मान से स्वयं को बोझिल्र किये रहता है
और निंदा स्तुति को अपनी आवश्यक दिनचर्या मानता है


२.

आनंद वह जो जन कल्याण से प्राप्त होता है | इसे
स्वयं के सुख या दुख से कोई सरोकार नहीं होता |
मानवता की सेवा से अंतर्मन को पुष्पित एवं
पत्लवित करना इसका लक्ष्य होता है |


3.

आलस्य मनुष्य को निकम्मा कर देता है |
आलसी मनुष्य स्वयं के लिए तो बोझ होता ही है
साथ ही वह समाज व देश के लिए कैंसर की तरह होता है |



4.


नायक बनना उतना कठिन नहीं है जितना उसकी
गरिमा को बनाए रखना | नायक को स्वयं को आदर्शों
एवं नियमों से खुद को बांध लेना चाहिए| ताकि
'किसी भी प्रकार के प्रभाव से वह बच सके | और
अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण निष्ठा से निर्वहन कर सके |









नए सदविचार

१.

शिक्षा मनुष्य को अज्ञान के अंधे कुएं से
बाहर निकालकर प्रकाश रूप ज्ञान की ओर
मुखरित करती है |


२.


कृतज्ञता व्यक्त करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होनी
अत्यंत आवश्यक है | इससे दूसरों के प्रति शुभ इच्छा
रखने वाले व्यक्ति को भविष्य में  भी इसे अपने आचार-
विचार का हिस्सा बनाने में मदद मिलती है | और वह
जन कल्याण को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है |

3.

अच्छा परिणाम, किये गए प्रयासों से
ज्यादा प्रभावित नहीं होता, वह प्रभावित
होता है आत्मविश्वास से |


4.

समाधि में स्थित मनुष्य के लिए जय-पराजय ,
सुख-दुःख, समाज, परिवार , मोह , लोभ आदि
विषय गौण हो जाते हैं | वह केवल मोक्ष की प्राति
की ओर अग्रसर होता है | यह असाधारण मानव की
परमात्मा से शुभ मिलन की शुभ अवस्था होती है|


5.

किसी  व्यक्ति की प्रशंसा , उसके द्वारा  किये गए प्रयासों

का सुइच्छित  परिणाम की तारीफ़ तो है ही ,

साथ ही साथ यह मनुष्य को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम 

की ओर ले जाता है |