युद्ध की विभीषिका
रणभूमि पर रक्तिम प्रात का विकराल उदय हुआ,
मानवता का निर्मल मुख आज धूल-धूसरित हुआ।
शंखनाद की गर्जना में करुणा का स्वर खो गया,
विजय-पताका की चाह में जीवन का दीप सो गया।
धधक उठीं धरती की साँसें अग्नि के उच्छ्वास से,
काँप उठी अम्बर की सीमा मृत्यु के संत्रास से।
लोहे की वर्षा ने हरित स्वप्नों को चूर किया,
ममता के आँचल को क्षणभर में ही दूर किया।
अश्रु-सरिताएँ बह चलीं उजड़े हुए द्वारों से,
मौन विलाप उठने लगा सूने पड़े परिवारों से।
वीरगति का गौरव भी पीड़ा से भर जाता है,
जब माँ का निर्जन आँगन पुत्र-वियोग सह जाता है।
नन्हे सपनों की किलकारी शस्त्रों में विलीन हुई,
स्नेह-सुगंधित जीवन-वीणा क्षणभर में ही क्षीण हुई।
धुएँ की काली चादर ने नभ का नीलापन हर लिया,
राख बनी आशाओं ने जीवन का आलोक छीन लिया।
सत्ता की क्षणभंगुर इच्छा ने कितना अनर्थ किया,
मानव के अंतर्मन का सारा माधुर्य व्यर्थ किया।
घृणा की ज्वाला जब-जब मानव-हृदय में पलती है,
सभ्यता की हर उपलब्धि पलभर में ही ढहती है।
विजय यदि मानवता खो दे, वह पराजय कहलाती है,
रक्तरंजित उपलब्धि केवल इतिहास रुलाती है।
शांति का श्वेत कपोत ही जीवन का श्रृंगार बने,
विश्वबंधुत्व का पावन संदेश सदा आधार बने।
करुणा के कोमल उपवन फिर से पुष्पित हो जाएँ,
प्रेम-सुधा के निर्झर जग के प्राणों में बह जाएँ।
शस्त्र नहीं, विश्वास सजे हर मानव के हाथों में,
दीप जले सद्भावना के धरती और आकाशों में।
आओ ऐसा विश्व रचें जहाँ वैराग्नि न प्रज्वलित हो,
हर हृदय में प्रेम, दया का नित्य नवीन संचित हो।
युद्ध नहीं, मानवता का हो युग-युग तक अभिनंदन,
यही धरा का धर्म अमर, यही सृष्टि का पावन वंदन।
अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"
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