लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 15 July 2026

युद्ध की विभीषिका - एक रचना

 युद्ध की विभीषिका

रणभूमि पर रक्तिम प्रात का विकराल उदय हुआ,
मानवता का निर्मल मुख आज धूल-धूसरित हुआ।
शंखनाद की गर्जना में करुणा का स्वर खो गया,
विजय-पताका की चाह में जीवन का दीप सो गया।

धधक उठीं धरती की साँसें अग्नि के उच्छ्वास से,
काँप उठी अम्बर की सीमा मृत्यु के संत्रास से।
लोहे की वर्षा ने हरित स्वप्नों को चूर किया,
ममता के आँचल को क्षणभर में ही दूर किया।

अश्रु-सरिताएँ बह चलीं उजड़े हुए द्वारों से,
मौन विलाप उठने लगा सूने पड़े परिवारों से।
वीरगति का गौरव भी पीड़ा से भर जाता है,
जब माँ का निर्जन आँगन पुत्र-वियोग सह जाता है।

नन्हे सपनों की किलकारी शस्त्रों में विलीन हुई,
स्नेह-सुगंधित जीवन-वीणा क्षणभर में ही क्षीण हुई।
धुएँ की काली चादर ने नभ का नीलापन हर लिया,
राख बनी आशाओं ने जीवन का आलोक छीन लिया।

सत्ता की क्षणभंगुर इच्छा ने कितना अनर्थ किया,
मानव के अंतर्मन का सारा माधुर्य व्यर्थ किया।
घृणा की ज्वाला जब-जब मानव-हृदय में पलती है,
सभ्यता की हर उपलब्धि पलभर में ही ढहती है।

विजय यदि मानवता खो दे, वह पराजय कहलाती है,
रक्तरंजित उपलब्धि केवल इतिहास रुलाती है।
शांति का श्वेत कपोत ही जीवन का श्रृंगार बने,
विश्वबंधुत्व का पावन संदेश सदा आधार बने।

करुणा के कोमल उपवन फिर से पुष्पित हो जाएँ,
प्रेम-सुधा के निर्झर जग के प्राणों में बह जाएँ।
शस्त्र नहीं, विश्वास सजे हर मानव के हाथों में,
दीप जले सद्भावना के धरती और आकाशों में।

आओ ऐसा विश्व रचें जहाँ वैराग्नि न प्रज्वलित हो,
हर हृदय में प्रेम, दया का नित्य नवीन संचित हो।
युद्ध नहीं, मानवता का हो युग-युग तक अभिनंदन,
यही धरा का धर्म अमर, यही सृष्टि का पावन वंदन।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

Tuesday, 14 July 2026

एकता का रहस्य - कहानी

 एकता का रहस्य

बरसों पुराना एक सुंदर गाँव था—हरितपुर। चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, आम और पीपल के विशाल वृक्ष, चहचहाते पक्षी और मेहनती लोगों से भरा यह गाँव अपनी खुशहाली के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

इसी गाँव में रामप्रसाद का परिवार रहता था। परिवार में उनकी पत्नी सरस्वती, बड़े बेटे मोहन, छोटे बेटे सोहन, बेटी गीता, बहुएँ सीमा और राधा, तथा चार प्यारे-प्यारे बच्चे थे। पूरा परिवार एक ही आँगन में रहता था। सुबह सब मिलकर काम करते, दोपहर में साथ भोजन करते और शाम को हँसी-मज़ाक के बीच दिन समाप्त होता।

गाँव के लोग अक्सर कहते,
"रामप्रसाद का परिवार देखो, जैसे एक माला में पिरोए हुए मोती हों।"

रामप्रसाद मुस्कुराकर कहते,
"घर बड़ा होने से नहीं, दिल बड़ा होने से खुशहाल बनता है।"

बदलती हवा

समय कभी एक जैसा नहीं रहता।

एक वर्ष बारिश बहुत कम हुई। खेतों की फसल आधी रह गई। आमदनी घटने लगी। इसी बीच गाँव में एक नया व्यापारी जगदीश आया। वह बहुत चालाक था। उसकी नज़र रामप्रसाद की उपजाऊ जमीन पर थी।

उसने सोचा,
"जब तक यह परिवार एक है, इनसे जमीन लेना असंभव है। पहले इनके बीच दरार डालनी होगी।"

उसने धीरे-धीरे अपनी योजना शुरू कर दी। एक दिन वह मोहन से मिला।

"मोहन जी, सारी मेहनत तो आप करते हैं। लेकिन कमाई बराबर बाँटी जाती है। यह कहाँ का न्याय है?"

मोहन ने पहले तो बात टाल दी, लेकिन वह बात उसके मन में कहीं बैठ गई।

दूसरे दिन जगदीश सोहन से मिला।

"आप तो पढ़े-लिखे हैं। अगर अलग होकर काम करें तो शहर में बड़ा कारोबार कर सकते हैं।"

धीरे-धीरे संदेह के छोटे-छोटे बीज दोनों भाइयों के मन में अंकुरित होने लगे।

छोटी बात, बड़ा विवाद

एक शाम खेत से लौटते समय मोहन ने कहा,
"इस बार पश्चिम वाले खेत में मैंने अधिक मेहनत की है। उसकी कमाई अलग होनी चाहिए।"

सोहन ने तुरंत उत्तर दिया,
"और मैंने नई सिंचाई की व्यवस्था करवाई थी। उसका क्या?"

बात बढ़ गई। बहुएँ भी अनजाने में अपने-अपने पतियों का पक्ष लेने लगीं।

घर का वातावरण बदल गया। जहाँ पहले हँसी गूँजती थी, अब वहाँ सन्नाटा था।

बच्चे भी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बड़े लोग अब साथ बैठकर बातें क्यों नहीं करते।

रामप्रसाद सब कुछ देख रहे थे, लेकिन वे जानते थे कि समझदारी थोपी नहीं जाती, उसे अनुभव से सीखा जाता है।

पहला झटका

इसी बीच गाँव में तेज़ आँधी और ओलावृष्टि हुई। कई खेत बर्बाद हो गए।

मोहन अकेले अपने खेत को बचाने दौड़ा, लेकिन अकेले वह कुछ नहीं कर पाया।

सोहन भी अपने हिस्से की चिंता में लगा रहा। पहले जहाँ पूरा परिवार मिलकर फसल बचा लेता था, इस बार अलग-अलग प्रयास नाकाम रहे। नुकसान पहले से कहीं अधिक हुआ।

रात को रामप्रसाद ने बस इतना कहा,
"जब हाथ अलग-अलग दिशा में खिंचते हैं, तो ताकत कम हो जाती है।"

लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

अलग होने का निर्णय

कुछ दिनों बाद दोनों भाइयों ने घर बाँटने का फैसला कर लिया। आँगन के बीच में दीवार खड़ी कर दी गई।

रसोई अलग हो गई। गायें बाँट दी गईं। खेती के औज़ार तक बाँट दिए गए। सबसे अधिक दुख बच्चों को हुआ।

जो बच्चे कल तक साथ खेलते थे, अब उन्हें अलग रहने को कहा गया।

छोटी पोती पायल रोते हुए बोली,
"दादा जी, क्या दीवार रिश्तों को भी बाँट देती है?"

रामप्रसाद की आँखें भर आईं।

उन्होंने केवल इतना कहा,
"दीवार ईंटों की नहीं होती बेटा, मन की होती है।"

संकट की दस्तक

कुछ महीनों बाद खबर आई कि पास की नदी का बाँध टूटने वाला है। गाँव में अफरा-तफरी मच गई।

लोग अपना सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। रामप्रसाद का घर भी खतरे में था।

मोहन अपने हिस्से का सामान बचाने लगा। सोहन अपने हिस्से का।

किसी को यह ध्यान ही नहीं रहा कि सबसे पहले बुज़ुर्गों और बच्चों को सुरक्षित निकालना चाहिए।

अचानक तेज़ पानी का बहाव आया। छोटी पायल और उसका भाई चिंटू घर के पिछवाड़े फँस गए।

चारों ओर पानी भर चुका था। महिलाएँ रोने लगीं।

एकता की परीक्षा

उस समय मोहन ने बिना कुछ सोचे पानी में छलाँग लगा दी। लेकिन तेज़ धारा उसे पीछे धकेलने लगी।

तभी सोहन भी दौड़कर आया।

"भैया, अकेले नहीं होगा।"

दोनों भाइयों ने एक लंबी रस्सी बाँधी। गाँव वालों ने दूसरी ओर से रस्सी पकड़ ली।

मोहन आगे बढ़ा। सोहन ने उसका हाथ मज़बूती से थाम रखा था। कई बार दोनों फिसले। कई बार लगा कि वे बह जाएँगे। लेकिन एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा।

आख़िरकार दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा। 

सरस्वती बच्चों को सीने से लगाकर रोने लगीं। उस रात पहली बार दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

रामप्रसाद का रहस्य

अगली सुबह रामप्रसाद ने पूरे परिवार को आँगन में बुलाया।

उन्होंने सबको लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर दिया।

"इसे तोड़ो।"

मोहन ने पूरी ताकत लगाई। नहीं टूटा। 

सोहन ने कोशिश की। वह भी असफल रहा।

फिर रामप्रसाद ने वही लकड़ियाँ अलग-अलग कर दीं।

अब हर लकड़ी आसानी से टूट गई।

रामप्रसाद मुस्कुराए।

"यही है एकता का रहस्य।"

उन्होंने आगे कहा,

"कल यदि तुम दोनों अलग-अलग बच्चों को बचाने जाते, तो शायद कोई भी वापस न आता। लेकिन जब तुम एक हुए, तब असंभव भी संभव हो गया।"

"घर केवल दीवारों से नहीं बनता। घर विश्वास, सहयोग, त्याग और प्रेम से बनता है।"

"जिस परिवार में 'मैं' बड़ा हो जाता है, वहाँ 'हम' छोटा पड़ जाता है। और जहाँ 'हम' सबसे बड़ा होता है, वहाँ कोई संकट बड़ा नहीं होता।"

दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बहने लगे।

नई शुरुआत

उसी दिन आँगन की दीवार गिरा दी गई। रसोई फिर एक हो गई।

बच्चे खुशी से उछल पड़े।

पायल बोली,
"अब हम फिर साथ खेलेंगे!"

सीमा और राधा ने मिलकर पहली बार फिर से एक साथ रोटी बनाई। शाम को पूरा परिवार वर्षों बाद एक साथ बैठकर भोजन कर रहा था। गाँव वालों ने भी राहत की साँस ली।

अंतिम चुनौती

कुछ महीनों बाद सरकार ने गाँव में आधुनिक कृषि प्रतियोगिता आयोजित की।

शर्त थी कि जो परिवार सबसे अधिक उत्पादन करेगा और नई तकनीक अपनाएगा, उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा।

कई लोगों ने कहा,
"रामप्रसाद का परिवार अब पहले जैसा नहीं रहा।"

लेकिन इस बार पूरा परिवार एकजुट था।

मोहन खेती संभालता। सोहन नई तकनीक लागू करता।

सीमा और राधा बीजों की देखभाल करतीं। गीता बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खेतों का हिसाब रखती।

बच्चे पौधों को पानी देते और जैविक खाद तैयार करने में मदद करते।

कुछ ही महीनों में खेत लहलहा उठे। फसल पहले से कहीं अधिक हुई।

प्रतियोगिता में रामप्रसाद का परिवार पूरे जिले में प्रथम आया।

जब मंच पर पुरस्कार दिया गया तो अधिकारी ने पूछा,

"आपकी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?"

रामप्रसाद ने मुस्कुराकर अपने परिवार की ओर देखा और बोले,

"हमारे खेतों की मिट्टी उपजाऊ है, लेकिन उससे भी अधिक उपजाऊ हमारे रिश्ते हैं। जहाँ परिवार एक रहता है, वहाँ मेहनत कई गुना बढ़ जाती है और सफलता स्वयं चलकर आती है।"

पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

शिक्षा

उस दिन हरितपुर के लोगों ने केवल एक परिवार की जीत नहीं देखी, बल्कि एक ऐसा सत्य भी सीखा जिसे समय कभी नहीं बदल सकता—

धन, संपत्ति और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन परिवार की एकता ही जीवन को सच्ची खुशी, सुरक्षा और सम्मान देती है।

एकता का रहस्य किसी जादू में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग, त्याग, क्षमा और प्रेम में छिपा होता है। यही वह शक्ति है जो हर कठिनाई को अवसर और हर संकट को विजय में बदल देती है।


अनिल कुमार गुप्ता "अंजुम"

कहानीकार