लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Tuesday, 12 April 2016

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो, सरकार तेरे नाम से
मुझे अपना बना लो , सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

मेरे पिया तेरे नाम से,  मेरे पिया तेरे नाम से
मेरे ख्वाजा तेरे नाम से, मेरे ख्वाजा तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

राम तेरे नाम से, घनश्याम तेरे नाम से
कान्हा तेरे नाम से, कृष्ण तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

ओ भोले तेरे नाम से, कन्हैया तेरे नाम से
मुझे अपना बना लो, सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

मैं जियूं तेरे नाम से, मैं मरूं तेरे नाम से
मैं जहाँ भी रहूँ, मैं रहूँ तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

इंतज़ार न कराना, मेरे पिया जल्दी आना
दीदार मुझे कराना, दीदार मुझे कराना

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

रोशन हो मेरी किस्मत, सरकार तेरे नाम से
बिगड़े काज संवरें , सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

तेरी रहमत का चर्चा , सरकार तेरे नाम से
मेरा जीवन संवरे, सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

आशा और विश्वास जगा दो, सरकार तेरे नाम से
मुझे फूल सा खिला दो, सरकार तेरे नाम से

धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से

मेरा जन्म सुधारो, सरकार तेरे नाम से
चरणों में मुझको ले लो, सरकार तेरे नाम से


धूलि चरणों की बना लो ,सरकार तेरे नाम से 

Monday, 11 April 2016

हर एक साँस में

हर एक सांस में

हर एक सांस में , अनंत जीवन मृत्यु
हर एक सांस के साथ,

जिंदगी के उतार--चढ़ाव का एहसास
अचानक छूटती सांस

जिंदगी में किसी अशुभ की
आशंका के आगमन के साथ

साँसों का सामान्य होना जीवन में
सब कुछ ठीक होने का
आभास करता है

साँसों का चलते रहना
जीवन को बनाए रखना है

एक उम्र के पड़ाव पर आकर
साँसों को टूटने का डर
हे रहता है

अपनी साँसों को
अर्थात जीवन को
उस परमात्म तत्व से
जोड़कर ही मानव
जीवन के अंतिम क्षणों को
समर्पण भाव के साथ
जी सकता है

स्वयं के उद्धार , स्वयं के मोक्ष के
सारे प्रयास
उसकी साँसों के उतार--चढ़ाव
पर ही निर्भर होते हैं

साँसों का बंधन , जीवन का बंधन
साँसों से मुक्ति , जीवन से मुक्ति

यही इस मानव जीवन का अंतिम और एकमात्र सत्य




Sunday, 10 April 2016

सीमाओं पर लगी बाड़ के उस पार

सीमाओं पर लगी बाड़ के उस पार

सीमाओं पर लगी बाड़ के उस  पार
चलो
आपसी मुहब्बत की  ,भाईचारे  की
महफ़िल  सजा आयें

बाँट लें  
एक दूसरे के ग़मों को
चलो
फिर एक नयी दुनिया बसायें

आतंक के इस नासूर को
 हम 
अपनी एकता और भाईचारे  का
आइना दिखा आयें  

कुछ करें ऐसा
इन आतंक के रखवालों के
दिलों में
अहिंसा के पथ पर चलकर.
प्यार, मुहब्बत से
जीने का
ज़ज्बा जगाएं

चलो
एक नया  जहां बसायें
एक नया आशियाँ बसायें



चला था वह


चला था वह

चला था  
कंधे पर
बन्दूक धर वह
 
सीमा को पार कर
लोगों के
लहू की प्यास लिए
आतंक का परचम लहराने
सीमा पर लगी बाड़
और
जवानों की आँखों में
धूल झोंककर

वह भारत भूमि पर
पैर पड़ते ही
ख़ुशी से झूम उठा

जंगल, नदियों को पार कर
मीलों चलता,
स्वयं को बचाता
भूख – प्यास से
परेशान

पीने को पानी की
एक बूँद भी नहीं बची थी
उसके पास

याद हो आये
उसे अपनी अम्मी और अब्बू

वो छोटा भाई
और
  छोटी बहन

जो भाईजान – भाईजान कह
नाक में दम
किये रहती थी

स्वयं को जीवित रखना
अब उसकी प्राथमिकता हो गई
बन्दूक, हथियार
को कहीं छुपा

वह पहुंचा
एक गाँव में

दरवाज़े पर
दस्तक दी
भाई !
दो रोटी और एक गिलास पानी
मिलेगा क्या

एक महिला ने दरवाज़ा खोला

और कहा
क्यों नहीं भाई जान !

अन्दर आइये

मकान के भीतर
वह महिला ,
उसके बूढ़े
सास – ससुर
एक प्यारी सी बच्ची

बुजुर्गवार ने पूछा
क्या हुआ बरखुरदार
रास्ता भटक गए क्या ?

वह अपने दिल की आवाज़ को
टटोलने लगा

अंतरात्मा से आवाज़ आई

“अपना मकसद न भूलना असलम”

कोई उत्तर मिलता

इसी बीच
वह नन्ही सी परी
बोल पड़ी

अम्मी कौन हैं ये ?

माँ ने कहा
बेटा ये तुम्हारे
मामू – जान हैं

खाने से भरी

थाली और
एक गिलास पानी

अब उसका जीवन बन गया

दो वक़्त की रोटी
ने   

उस घर के लोगों के
काम में उसे मशगूल कर दिया

वह खेत पर काम करता ,
ईंधन इकट्ठा करता,
जानवरों को चराता

इस तरह
वह उस घर के
एक सदस्य की तरह
जिंदगी गुजारने लगा

उस घर के हर एक सदस्य में
उसे अपनी
अम्मी, अब्बू ,
छोटी बहन
नज़र आने लगे

उस नन्ही परी
की पाकीज़ा आँखें

उन बुजुर्गवार
की लाखों आशीष

और उस
विधवा के
हाथों से बने
भोजन का बोझ

वह ज्यादा समय तक
ढो नहीं पाया

खुद को उसने
उस परिवार पर

कुर्बान करने
का निर्णय कर लिया

उस परिवार की
मुहब्बत ने
उसे जीने का
मकसद दिया

उसका मकसद
अब आतंक न होकर
दूसरों की
जिंदगी संवारना हो गया


खुद ही नहीं
दूसरों की खातिर

काश सभी असलम “ऐसे हो जायें “

काश....................................










Monday, 4 April 2016

वक़्त के समंदर में


वक्त के  समंदर में

वक़्त के समंदर में , कोशिशों की नाव चलाकर देखो
किनारे तेरी मंजिलों का पता होंगे , मंजिलें तुम्हारे कदमों का निशाँ होंगी

वक़्त को अपना ,हमसफ़र बनाकर तो देखो
तेरे प्रयासों को खुला आसमां ,होगा नसीब

अपनी कोशिशों को ,जिंदगी का मकसद कर लो
तेरी उम्मीदों को हंसी मंजिलों का ,दामन होगा नसीब

वक़्त को अपनी मंजिलों का ,हमसफ़र बनाकर देखो
तेरी जिंदगी ,जन्नत के एहसासों से रूबरू होगी.

खिलेंगे फूल तेरी राहों में, जिंदगी संवर जायेगी तेरी
तेरे प्रयासों को गर , वक़्त सा हमसफ़र जो हो जाए नसीब

तेरी कोशिशें तेरे जूनून की ;गर हो जाएँ गवाह
तेरी कोशिशों को खुले आसमां सा ,हमसफ़र होगा नसीब

तेरे प्रयासों पर ,खुदा का जो हो जाए करम
तेरे अरमानों, तेरी मंजिलों , तेरे ख़वाबों को जन्नत हो नसीब

तेरे प्रयास तेरी मंजिल का , सबब हो जाएँ
इंतज़ार फिर किस बात का , तुझे ऐ मुसाफिर

वक़्त के समंदर में , कोशिशों की नाव चलाकर देखो
किनारे तेरी मंजिलों का पता होंगे , मंजिलें तुम्हारे कदमों का निशाँ होंगी

वक़्त को अपना ,हमसफ़र बनाकर तो देखो
तेरे प्रयासों को खुला आसमां ,होगा नसीब




Friday, 18 March 2016

वो सवार ही क्या - मुक्तक

१.


वो सवार ही क्या

जिसे मंजिल का एहसास न हो

वो पतवार ही क्या

जिसे किनारों का एहसास न हो

२.

इश्क को वफ़ा से

यूं न जोड़कर देखो

वक़्त का क्या भरोसा

किस करवट बदल जाए



3.


बेगैरत हैं वो

जिन्हें मादरे--वतन से प्यार नहीं

बिक जाते हैं जो

चंद सिक्कों के लिए


4.

बला की खूबसूरती से

नवाज़ा है खुदा ने उसको

खुदा करे उनको

हमसे मुहब्बत हो जाए

5.


अभी कुछ और रातें

तन्हाइयों में गुजरेंगी ए नादाँ दिल

सब्र रख उस खुशनुमा

सुबह के होने तक



इश्क की खातिर खुद को मिटा देना - शायरी

१.

इश्क की खातिर ,खुद को मिटा देना

कुसूर उसका हो तो भी ,खुद को सज़ा देना

इश्क ,खुदा की बंदगी का है नाम , ये मालूम है तुझे

खामोशी से उसकी बेवफाई को भुला देना

२.


खामोश रहकर इश्क को अंजाम दे

खामोश रहकर इश्क को परवान दे

इश्क को ज़माने की निगाहों से छुपाकर रख

अपनी मुहब्बत को इबादत नाम दे


3.


इश्क. निर्जीव को सजीव बना देता है

इश्क आदमी को खुदा से मिला देता है

बचाकर रखना खुद को कातिल निगाहों से

वरना इश्क सब कुछ तबाह कर देता है


4.


कद उनके छोटे होते हैं

जिनको मंजिल की आस नहीं होती

जीते हैं वो बुजदिल की तरह

जिनको सपनों की चाह नहीं होती





आवेश में आकर मानव - मुक्तक

१.

आवेश में आकर मानव
सदबुद्धि खो देता है
इस अवस्था में मानव का
हर पल  पतन होता है


२.

विजय की बात कर
और विजय की राह चल
पराजय उनकी होती है
जिनकी कोई मंजिल नहीं होती









अक्सर वो मेरे ख़्वाब में

अक्सर वो मेरे ख़वाब में
मुझे रूबरू होते हैं
खुदा करे ये ख़वाब में उनका आना
हकीकत हो जाए

वो गुलशन ही कया
जिसमे गुलाब न हो
वो जिन्दगी ही क्या
जिसमे जीवनसाथी का साथ न हो

तृष्णा , प्यास, लालसा और अभिलाषा
सभी मायाजाल हैं
माया -- मोह में उलझा मानव
मोक्ष मार्ग पर होता कंगाल है

दोस्ती जहां में खुदा का दिया
खूबसूरत उपहार है
जिसका कोई दोस्त न हो
उसकी जिन्दगी बेज़ार है

तेरे जादुई हुस्न ने

तेरे जादुई हुस्न ने
किया मुझको बेकरार
तेरे हुस्न का साथ मिले
दिल को आये करार

फुर्सत मिले तो मेरी गली का
चक्कर लगा लेना
ये गुजारिश है तुझसे
बेआबरू न हो मुहब्बत मेरी

अफसाना न हो जाए
मेरी मुहब्बत, मेरा इश्क
खुदा करे चंद रातें
उसकी बाहों में गुज़र हो जाएँ तो अच्छा

दिल के ज़ख्म
नासूर न बन जाएँ ऐ मेरे खुदा
तेरा करम हो और
उसके दामन का सहारा हो मुझे