लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Thursday, 30 September 2021

रुकना नहीं है तुमको

 रुकना नहीं है तुमको

 

रुकना नहीं है तुमको, क्यूं कर है घबराना

करना है आसमां रोशन, दूर मंजिल पार जाना I

 

क्यूं कर हो डर तुझको, आँधियों का , तूफानों का

अपने आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को पतवार बनाना I

 

क्यूं कर बिखर जाएँ , तेरे सपनों के आस के मोती

खुद पर करना भरोसा, आगे को बढ़ते जाना I

 

खुद पर करना यकीं , अपनी कोशिशों को अपनी धरोहर बनाना

मिटा संशय की दीवार, खुद पर विश्वास जगाना I

 

गिरोगे तुम भी कई बार, और होगे घायल

फिर उठ खड़े होना, खुद का हौसला बढ़ाना I

 

पीर दिल की भुला, अग्रसर होते जाना

करना खुद को रोशन , मंजिल की ओर बढ़ते जाना I

 

रुकना नहीं है तुमको, क्यूं कर है घबराना

करना है आसमां रोशन, दूर मंजिल पार जाना II

पावन तेरा मंदिर, पावन तेरा द्वारा - भजन

 पावन तेरा मंदिर, पावन तेरा द्वारा

 

पावन तेरा मंदिर, पवन तेरा द्वारा

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

छवि तेरी निराली, मन मोहने वाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

तेरा रूप सबको भाये , गोवर्धन उठाने वाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

महिमा तेरी निराली , ग्वालों का रखवाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

राधा संग है जोड़ी, वंशी बजाने वाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

मोर पंख धारी , गौओं को चराने वाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

ब्रज का है जो दुलारा, कान्हा सबका प्यारा

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

चरणों में स्वर्ग तेरे. मोक्ष मार्ग दिखाने वाला

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा I

 

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा

कान्हा सबका प्यारा , कान्हा सबका प्यारा II

Tuesday, 21 September 2021

तेरे चरणों में आकर

 तेरे चरणों में आकर

तेरे चरणों में आकर , संवर गया हूँ मैं

तेरे चरणों की धूलि पाकर, निखर गया हूँ मैं

रोशन हो गयी कलम मेरी, विचार मेरे
तुझसे रिश्ता निभाकर , संवर गया हूँ मैं

चंद क़दमों में ही, नसीब हो गयी मंजिल मुझको
तेरे दर को अपना बनाकर , संवर गया हूँ मैं

तेरी रहमत तेरे करम का , साया हो हम पर
तुझको अपना बनाकर , निखर गया हूँ मैं

चाँद सितारों की तमन्ना , कभी नहीं रही मेरी
तेरे करम से गीत, ग़ज़ल बनकर , संवर गया हूँ मैं

तेरा शागिर्द होकर निखर गया हूँ मैं
तुझको अपना हमसफ़र बनाकर निखर गया हूँ मैं

पीर दिल की भुलाकर , तेरे दर का हो लिया हूँ मैं
तेरी रहमत का प्रसाद पाकर , संवर गया हूँ मैं

तेरे चरणों में आकर , संवर गया हूँ मैं
तेरे चरणों की धूलि पाकर, निखर गया हूँ मैं

रोशन हो गयी कलम मेरी, विचार मेरे
तुझसे रिश्ता निभाकर , संवर गया हूँ मैं

कान्हा जी घर आये

 कान्हा जी घर आये

कान्हा जी घर आये, आये मोरे अंगना
राधाजी को संग लाये, आये मोरे अंगना

शंकर जी घर आये , आये मोरे अंगना
पार्वती को संग लाये , आये मोरे अंगना

विष्णु जी घर आये , आये मोरे अंगना
लक्ष्मी जी को संग लाये , आये मोरे अंगना

राम जी घर आये , आये मोरे अंगना
सीता मैया को संग लाये , आये मोरे अंगना

नारायण जी घर आये , आये मोरे अंगना
लक्ष्मी जी को संग लाये , आये मोरे अंगना

ब्रह्मा जी घर आये , आये मोरे अंगना
सरस्वती को संग लाये , आये मोरे अंगना

कान्हा जी घर आये, आये मोरे अंगना
राधाजी को संग लाये, आये मोरे अंगना

शंकर जी घर आये , आये मोरे अंगना
पार्वती को संग लाये , आये मोरे अंगना

Tuesday, 31 August 2021

पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ

 पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 


पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 

गीत बनकर मैं संवरना चाहता हूँ 


कोशिशों को अपनी धरोहर करना चाहता हूँ 

कीर्ति के नए आयाम रचना चाहता हूँ 


मैं रुकना नहीं , आगे बढ़ना चाहता हूँ 

पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 


कुछ ग़ज़ल. कुछ कवितायें रचना चाहता हूँ 

सद्विचारों का एक समंदर , रोशन करना चाहता हूँ 


गिले  - शिकवे छोड़, मुहब्बत से रहना चाहता हूँ 

इंसानियत को अपना ईमान बनाना चाहता हूँ 


पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 

चीरकर तम को उजाला रोशन करना चाहता हूँ 


बेड़ियों को तोड़ आगे बढ़ना चाहता हूँ 

कुरीतियों का महल ढहाना चाहता हूँ 


मैं एक रोशन सवेरा चाहता हूँ 

पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 


हर एक शख्स को मैं अपना बनाना चाहता हूँ 

रिश्तों का एक कारवाँ सजाना चाहता हूँ 


गीत मैं इंसानियत के गुनगुनाना चाहता हूँ 

खुशियों का एक समंदर सजाना चाहता हूँ 


पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 

मैं खुद को दुनिया से मिलाना चाहता हूँ 


अपना खुद का नया जहां बसाना चाहता हूँ 

मैं शिक्षा को संस्कृति बनाना चाहता हूँ 


मैं पीर दिलों की मिटाना चाहता हूँ 

मुहब्बत का एक कारवाँ सजाना चाहता हूँ 


क्यूं कर भूख से बिलख कर दम तोड़ दे बचपन 

मैं हर एक शख्स में , इंसानियत का ज़ज्बा जगाना चाहता हूँ 


पुष्प बनकर मैं खिलना चाहता हूँ 

गीत बनकर मैं संवरना चाहता हूँ 


कोशिशों को अपनी धरोहर करना चाहता हूँ 

कीर्ति के नए आयाम रचना चाहता हूँ 

Monday, 30 August 2021

यादों का सफ़र खुशनुमा हो, कुछ ऐसा कर जाएँ

 यादों का सफ़र खुशनुमा हो, कुछ ऐसा कर जाएँ

यादों का सफ़र खुशनुमा हो, कुछ ऐसा कर जाएँ
किसी का भी दिल न टूटे , कुछ ऐसा कर जाएँ

बदनुमा यादों को भुला सकें , कुछ ऐसा कर जाएँ
सबके दिलों में राज कर सकें, कुछ ऐसा कर जाएँ

बिखर न जाएँ आस के मोती, कुछ ऐसा कर जाएँ
रोशन हो इंसानियत का ज़ज्बा , कुछ ऐसा कर जाएँ

टूटें न रिश्तों की माला के मोती , कुछ ऐसा कर जाएँ
रोशन हो रिश्तों का कारवाँ , कुछ ऐसा कर जाएँ

सबके चहरों पर नूर आ जाए, कुछ ऐसा कर जाएँ
संस्कृति और संस्कारों से पोषित हो समाज , कुछ ऐसा कर जाएँ

चमक उठें दरबार सभी देवालयों के , कुछ ऐसा कर जाएँ
रोशन हो जाएँ चर्च, गुरद्वारे और मस्ज़िद , कुछ ऐसा कर जाएँ

नसीब हो नवोदित रचनाकारों को खुला आसमां , कुछ ऐसा कर जाएँ
राजभाषा हिंदी को विश्व मंच पर आसीन करें, कुछ ऐसा कर जाएँ

यादों का सफ़र खुशनुमा हो, कुछ ऐसा कर जाएँ
किसी का भी दिल न टूटे , कुछ ऐसा कर जाएँ

बदनुमा यादों को भुला सकें , कुछ ऐसा कर जाएँ
सबके दिलों में राज कर सकें, कुछ ऐसा कर जाएँ

मेरी कान्हा मेरी सरकार हो तुम

 मेरी कान्हा मेरी सरकार हो तुम 


मेरे दिल में बसते हो मेरे प्रभु तुम 

मेरी कान्हा मेरी सरकार हो तुम 


दिशा ज्ञान दे रहे हो मुझको मेरे प्रभु 

मेरे जीवन का प्रभु , विस्तार हो तुम 


सत्कर्म की राह पर ले चलो मेरे  प्रभु 

मेरे हर एक कर्म में प्रभु , साझेदार हो तुम 


विचारों को मेरे पावन कर रहे हो प्रभु 

मेरे भाग्य का प्रभु , विस्तार हो तुम 


मेरी कलम को सहारा दिया तुमने प्रभु 

रोशन मेरी राहों का , आधार हो तुम 


भक्ति की राह पर ले चलिए प्रभु मेरे 

मेरी श्रद्धा और मेरा विश्वास हो तुम 


मुसीबतों के दौर में तुम साथ थे मेरे 

बीच मझधार में प्रभु , पतवार हो तुम 


मार्ग मोक्ष का दिखा दिया तुमने प्रभु 

मेरे सबसे अच्छे , खेवनहार हो तुम 


मेरे दिल में बसते हो मेरे प्रभु तुम 

मेरी कान्हा मेरी सरकार हो तुम 


दिशा ज्ञान दे रहे हो मुझको मेरे प्रभु 

मेरे जीवन का प्रभु , विस्तार हो तुम 






Sunday, 29 August 2021

योग

 

योग

 

योग जीवन की प्राण वायु

योग की हर छटा निराली

योग से हो तन प्रफुल्लित

योग से हो मन प्रफुल्लित

 

योग से हो रोम – रोम पुलकित

योग से हो जीवन अलंकृत

योग करे जहां पर वास

रोग नहीं फटके कोई पास

 

योग से जीवन हो पुलकित

योग कर देता प्रफुल्लित

असीम शांति योग की देन

आध्यात्मिक सुख योग की देन

 

योग ईश्वर से साक्षात्कार कराये

योग जीवन की नैया पार लगाए

योग भौतिक सुख से परे ले जाये

आध्यात्मिकता की ज्योति जगाये

 

योग से योगी बनें हम

परमात्व तत्व की धरोहर बनें हम

योग की पावनता है भाये

जीवन में खुशियाली लाये

 

योग को अपनाना होगा

समाज को स्वस्थ बनाना होगा

घर  - घर अलख जगाना होगा

योग की ज्योति  जलाना होगा

 

योग जीवन की प्राण वायु

योग की हर छटा निराली

योग से हो तन प्रफुल्लित

योग से हो मन प्रफुल्लित

Saturday, 28 August 2021

आज मैं देख लूं तुझे , जी भर के जरा – ग़ज़ल

 आज मैं देख लूं तुझे , जी भर के जरा – ग़ज़ल

आज मैं देख लूं तुझे , जी भर के जरा
आज मैं छू लूं तुझे , जी भर के जरा

तेरे पहलू में चंद पल गुजारूं मैं , जी भर के जरा
तुझको अपना बना लूं , जी भर के जरा

मुहब्बत के गीत गा लूं मैं , जी भर के जरा
तेरी आशिक़ी में डूब जाऊँ मैं , जी भर के जरा

बाहों में बाहें सजा लूं , जी भर के जरा
चलो तुमको मना लूं मैं , जी भर के जरा

तेरे नजदीक आ लूं मैं , जी भर के जरा
तुझको मैं तुझसे मिला दूं मैं , जी भर के जरा

तेरा तुझसे परिचय करा दूं , जी भर के जरा
इस खुशनुमा पल को अपना बना लूं मैं , जी भर के जरा

तेरी चाहत में खुद को मिटा लूं , जी भर के जरा
जी भर के जरा नज़रों से नज़रें मिला लूं मैं , जी भर के जरा

इश्क़ की महफ़िल सजा लूं , जी भर के जरा
तेरी आशिक़ी में सब कुछ भुला दूं , जी भर के जरा

आज मैं देख लूं तुझे , जी भर के जरा
आज मैं छू लूं तुझे , जी भर के जरा

तेरे पहलू में चंद पल गुजारूं मैं , जी भर के जरा
तुझको अपना बना लूं , जी भर के जरा

वक्त नाजुक है ( कोरोना काल पर रचना )

 वक्त नाजुक है ( कोरोना काल पर रचना )

वक्त नाजुक है , जरा संभलकर रहिये
कोरोना की भीषण त्रासदी है, जरा बचकर रहिये |

कैद कर लोगे जो खुद को, खुद के ही आशियाँ में
जीत जाओगे जंग जिन्दगी की, होशियारी से रहिये |

कुछ पल की दूरियां, जिन्दगी से नजदीकियाँ बढ़ा देंगी
कोरोना की भयावह चाल है, संभलकर रहिये |

खुद की परवाह करें, और अपनों की भी
चंद रोज साथ गुजारकर . खुश रहिये |

बेवक्त बेवजह घर से , बाहर न निकलें
जब भी मजबूरी हो , सेनीटाईजर , मास्क के साथ चलिए |

इस धरा ने इससे भी भयावह, देखे हैं तूफां
खुदा ने दिया है तुझे वक्त इबादत का, कुछ वक्त उस खुदा की इबादत में गुजारकर चलिए |

वक्त नाजुक है , जरा संभलकर रहिये
कोरोना की भीषण त्रासदी है, जरा बचकर रहिये |

कैद कर लोगे जो खुद को, खुद के ही आशियाँ में
जीत जाओगे जंग जिन्दगी की, होशियारी से रहिये ||