लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 22 November 2017

न जाने किसकी दुआओं का असर है मुझ पर

न  जाने किसकी दुआओं का , असर है मुझ पर

न जाने किसकी दुआओं का , असर है मुझ पर
समंदर की लहरों  के बीच भी , किनारा नसीब हो जाता है मुझे

न जाने किसके करम से , रोशन हुई लेखनी  मेरी
लिखता  हूँ न जाने क्या , खुदा की इबादत हो जाती है
.
न जाने किसके आशीर्वाद से , लिख रहा हूँ मैं
सोचता हूँ कुछ पंक्तियों , ग़ज़ल हो जाती हैं वो 

पाला हूँ दिल मैं प्यार , न जाने किसके करम से
दो मीठे बोल , चहरे पर मुस्कान दे जाती है

बो दिए हैं कुछ फूल , इस जहां में मैंने भी 
इनकी खुशबू , जिन्दगी रोशन कर जाती है

मुस्कुरा रहा  हूँ मैं , मुस्कराओ तुम भी
ये मुस्कराहट रोतों को भी , हँसा जाती है

चंद फूल  इंसानियत के , खिलाओ  तुम भी
ये हसरत हमें खुदा के , करीब ल्रे जाती है.

बीती बातों को दिल से , लगाकर  न रखना
ये जिन्दगी की खुशियाँ , हमसे छीन ले जाती हैं


खुद को खुद में ढूँढने की कोशिश (ग़ज़ल)

खुद को खुद में , टूँढने की कोशिश ( ग़ज़ल )

खुद को खुद में टूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ तो है मुझे

जिन्दगी की खुशबू का , शायद एहसास हो मुझमे
'खिलती हुई बहार शायद , कहीं आसपास हो मुझमे

गीत बनकर दिलों में उतर जाऊं, शायद ये ज़ज्बात हो मुझमें 
या ग़ज़ल बनकर रोशन हो जाऊं , शायद ये औकात हो मुझमे

एक आस की लौ ले खुद को ढूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ बात हो मुझमें 

लिखता  हूँ इस उम्मीद से कि शायद , भीतर कहीं एहसास हों मुझमे
किसी के दर का चराग हो जाऊं, शायद ये आस हो मुझमें

फूलों की पंखुड़ियों को निहारता हूँ , इस उम्मीद से मैं
फूलों की खुशबू सा कहीं , शायद अंदाज़ हो मुझमें

रिश्तों की डोर को इस उम्मीद से , पकड़े रहता हूँ मैं
'रिश्तों को निभाने के शायद , कहीं जज्बात हों मुझमें

खुद को खुद में ढूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ तो है मुझमे


कुर्सी को खुदा समझने वाले (व्यंग्य)

कुर्सी को खुदा समझने वाले

कुर्सी को खुदा समझने वाले
आदर्श कहाँ जिया करते हैं

राजनीति को धर्म समझने वाले
राष्ट्र धर्म की बात कहाँ करते हैं

पल - पल पार्टी बदलने वाले
कुर्सी पर ही मरने वाले

पल - पल विचार बदलने वाले
राष्ट्र हित की बात कहाँ करते हैं

जनता को मूर्ख समझने वाले
वादों पर ही जीने वाले

कुर्सी के हित जीने वाले
सामाजिकता की बात कहाँ करते हैं

मन मैं जहर घोलने वाले
अपराध जगत के ये रखवाले

सरहद पर मरने वालों को
सलाम कहाँ किया करते हैं



Saturday, 18 November 2017

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में है आनंद

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में हैं आनंद

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में हैं आनंद
सुख - दुःख का मंथन और जीवन का अमृत

संवेदनाएं खोलतीं  सुख के द्वार
स्वयं पर कितना विश्वास और कितना आत्मविश्वास

समृद्धि और सुख का भीषण द्वंद
कर्म भी सुख का सूचक 

समर्पण और प्रेम , सुख का पर्याय
'तलाशिये सुख का एक बीज , अपने प्रयासों से

जितना बड़ा संघर्ष , उतना बड़ा सुख
सुख की सीढ़ियों का अंत नहीं

'फिर भी तलाश , एक मुट्ठी भर सुख की
है यहीं कहीं , हमारे आसपास

हमारी कोशिशों में , हमारे प्रयासों में
संवेदनाओं में , हमारे मानव प्रेम में

आओ खोजें उस सुख को , उस असीम सुख को
हमारे प्रयासों , हमारी कोशिशों की परिणति के रूप में




स्वच्छता ही सेवा है


स्वच्छता ही सेवा है

स्वच्छता ही सेवा है
आओ इसे अपनाएँ

गली और मुहल्लौं को
आओ रौशन बनाएं

गांधीजी के इस  सपने को
आओ अमली जामा पहनाएं

स्वच्छता ही सैव हैं
आओ इसे अपनाएँ

स्वच्छता की पावनता
हमारे स्वच्छ कर्मों में 

स्वच्छता की गूँज से
मनी - गमी महकाएं

स्वच्छता ही सेवा है 
आओ इसे अपनाएँ

आओ स्वच्छ भारत का
सपना साकार करें

प्रकृति की पावनता
आओ बरकरार रखें

स्वच्छता ही सेवा  है
आओ इसे अपनाएँ

स्वच्छता एक विचार है.
तन की पावनता का

स्वच्छता एक नारा नहीं
स्वच्छता पावनता है

स्वच्छता ही सैवा है
आओ इसे अपनाएँ






Monday, 9 October 2017

मुक्तक

१.

जिन्दगी में कुछ के , ऐसे भी आते हैं 

दे जाते हैं कुछ सिला, जिन्दगी संवार जाते हैं

२.


कुछ  प्रयास तुम करो , कुछ प्रयास
मैं करूं

चलो इस जहां को . महब्बत का
सिला दे चले


3.

किसी की तनहा रातों को , दो पल
की ख़ुशी अता कर देख

तेरे इस प्रयास और तुझ पर होगा
उस खुदा का करम

4.


सका एक सच्चे दोस्त की, कर रहा
हूँ मैं

खुद को हर एक रोज मुसीबतों के
समंदर में, धकेल रहा हूँ मैं


5.

फूल पत्तों से दो पल  के लिए ही
सही, बात कर देखो

जिन्दगी के थपेड़ों से लड़ने का,
सिला मिलेगा तुझको



Wednesday, 20 September 2017

तुझे मैं अपने गीतों में ढाल लूं तो चैन आये मुझे

तुझे मैं अपने गीतों में ढाल लूं तो चैन आये मुझे

तुझे मैं अपने गीतों में ढाल लूं , तो चैन आये मुझे
मैं तुझको अपना बना लूं , तो चैन आये मुझे

मैं जानता हूँ , तुझे फ़िक् है हर पल की
अपने आशियाँ को तेरी इबादतगाह बना लूं , तो चैन आये मुझे


कल ही ख्वाव में रूबरू हुआ था , मैं तुझसे
'पती स्लातगाह को तेरी उतादतगाह बना से , तो चैन आये मुझे 
  
तेरे करम से रोशन हुआ हूँ मैं , ए मेरे खुदा
खुद को तुझ पर लुटा दूं , तो चैन आये मुझे

सभी कहते हैं इस जहां के हर एक बन्दे के दिल में , वसता है तू
तेरे हर एक बन्दे में तेरे अश्क़ का दीदार कर लूं , तो चैन आये मुझे

खुद को तेरे दर का चराग करने की रही , बरसों तमन्ना मेरी
खुद को तेरे दर का चराग कर लूं , तो चैन आये मुझे

मेरी कोशिशों , मेरे प्रयासों पर , तेरा करम बना रहे मेरे खुदा
अपनी हर एक कोशिश को तेरी इवादत कर लूं., तो चैन आये मुझे

तुझे मैं अपने गीतों में ढाल लूं , तो चैन आये मुझे
मैं तुझको अपना बना लूं , तो चैन आये मुझे

मैं जानता हूँ , तुझे फ़िक् है हर पल की
अपने आशियाँ को तेरी इबादतगाह बना लूं , तो चैन आये मुझे







ग़मों और मुसीबतों के इस दौर में भी

ग़मों और मुसीबतों के इस दौर में भी

ग़मों और मुसीबतों के ,इस दौर में भी
खुश रहने के ,सौ बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

जब भी खुद से ,रूठ जाता हूँ मैं
खुद को मनाने के ,सौं बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

उस खुदा की इस ,अनजान दुनिया में
लोगों को दिल के करीब लाने के ,सौं बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

न जाने क्यों कर हो रहे लोग, एक दूसरे से दूर
'रिश्तों को जीने के ,सौ बहाने ढूंढ लेत हूँ मैं

मुसीबतों के दौर मैं में ही ,याद आता है खुदा उनको
अपनी खुशियाँ उस खुदा के बन्दों से बांटने के , सौ बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

लोग फेर लेते हैं नज़र , न जाने क्यों अपनों से भी
'परायों को भी दिल से लगाने के , सौ बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

क्यों कर कोई स्ठे , इस जिन्दगी से
जिन्दगी को जिन्दादिली से जीने के , सौँ बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

ग़मों और मुसीबतों के ,इस दौर में भी
खुश रहने के ,सौं बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं

जब भी खुद से ,रूठ  जाता हूँ मैं
खुद को मनाने के ,सौं बहाने ढूंढ लेता हूँ मैं




जब भी उदास होता हूँ मैं

जब भी उदास होता हूँ मैं

जब भी उदास, होता हूँ मैं
खुद को मुस्कराहट के समंदर में , डुबो लेता हूँ मैं

जब भी अपनों से, बेज़ार हो जाता हूँ मैं
खुद को नए रिश्तों में ,पिरो लेता हूँ मैं

इस फीकी - फीकी दुनिया में , मन जब नहीं लगता मेरा
किसी सरिता के तीर , दो चार गीत गुनगुना लेता हूँ मैं 

प्रकृति के आँचल में कांटे, लोगों ने बो दिए हैं बहुत
नन्हे पौधों से बात कर , खुद को बहला लेता हूँ मैं

चादुकारिता की बातें करते देखे हैं, मैंने कवि बहुत
बालपन को संवारने की ,कवितायें गुनगुना लेता हूँ मैं

लोगों को खुश करने के लोग, ढूंढ लेते हैं बहाने बहुत
बच्चों को खुश करने के , तरीके इजाद कर लेता हूँ मैं

मेरी बात किसी को ,जो बुरी लग जाए.
परवाह किये बिना दो चार और , कवितायें लिख देता हूँ मैं

लोग अपने दामन के फूलों की , खुशबू मे हैं व्यस्त
लोगों के दामन को , खुशबू से भर देता हूँ मैं

जब भी उदास, होता हूँ मैं
खुद को मुस्कराहट के समंदर में , डुबो लेता हूँ मैं

जब भी अपनों से, बेज़ार हो जाता हूँ मैं
खुद को नए रिश्तों में ,पिरो लेता हूँ मैं







एक दिन तुम्हें मेरी याद सताएगी

एक दिन तुम्हें , मेरी  याद सताएगी

एक दिन तुम्हें , मेरी याद सताएगी
तुम मुझे , अपने करीब पाओगी

बीती बातें कुछ हद तक , तुम्हें रुलायेंगी 
तुम मुझे अपने, दिल के आसपास पाओगी 

तनहा रहना होता है कितना मुश्किल , ये पूछो खुद से 
दिल से याद करोगी तो, हर एक रात रोशन हो जायेगी 

यूं ही न बहाओ, अपनी आँखों से मोती 
दिल को दिल से होती है आस, जांन जाओगी 

मुहब्बत के चाहने वालों पर होता है, उस खुदा का करम 
आज नहीं तो कल , मेरी बाहों में समा  जाओगी 

अपने इस एहसासे  - मुहब्बत को कम नहीं होने देना 
एक दिन तुम भी मुहब्बत के गीत गाओगी 

पाक दामन से रोशन रहे ये मुहब्बत का जूनून 
गीत मेरी वफ़ा के भी , एक दिल गुनगुनाओगी 

खुश होंगे चाँद तारे, सितारे और ये फिजां 
जब तुम मेरे आशियाँ का चाँद हो जाओगी 

एक दिन तुम्हें , मेरी  याद सताएगी
तुम मुझे , अपने करीब पाओगी

बीती बातें कुछ हद तक , तुम्हें रुलायेंगी 
तुम मुझे अपने, दिल के आसपास पाओगी