लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 15 February 2016

तेरी शरण में आये हैं प्रभु , अपना हमें बना लो तुम




तेरी शरण में आये हैं प्रभु जी, अपना हमें अपना बना लो तुम


तेरी शरण में आये हैं प्रभु जी, अपना हमें अपना बना लो तुम

चरणों का अपने देकर सहारा, जीवन ज्योति जगा दो तुम


सदाचार की राह में ले लो, मानवता भाव जगा दो तुम

वात्सल्य से भर दो हमको, प्रेम का भाव जगा दो तुम


करूँ विनय तुमसे मैं प्रभु जी, मानव मुझे बनाओ तुम

भोगविलास से दूर रहूँ मैं , अभिलाषी बनाना तुम


तेरी दया का पात्र रहूँ मैं , कामनाओं में उलझाना तुम

सुकर्मों में मेरी प्रीति होवे, कुकर्मों से मुझे बचाना तुम


मेरे भगवन तेरी महिमा न्यारी, अपना मुझे बनाओ तुम

अभिनन्दन की राह चलूँ मैं, सच की राह दिखाओ तुम

चन्दन सा मुझे पावन कर दो, उत्कर्ष राह दिखाना तुम

कर्म राह को धर्म बनाकर, जीवन सफल बनाना तुम


तृष्णा से प्रभु मुझे बचाना, भक्ति राह दिखलाना तुम

श्रद्धा तुझ पर रहे हमेशा , पर निंदा से बचाना तुम


पावन, सुन्दर छवि तुम्हारी, हमको दरश दिखना तुम

अमृत से पावन वचन हमारे, वाणी में पावनता लाना तुम


सरिता से पावन हों कर्म हमारे, कर्तव्य राह दिखलाना तुम

करो प्रकाश जीवन में हमारे, मदिरालय से हमें बचाना तुम


कर्म सभी पावन हों मेरे, सत्कर्म राह दिखलाना तुम

मुक्ति हो जीवन का गहना, मोक्ष राह दिखलाना तुम


जी रहे हैं सब, रोशन कल के लिए

जी रहे हैं सब , रोशन कल के लिए

जी रहे हैं सब , रोशन कल के लिए
कामनायें जन्म ले रही हैं , रोशन कल के लिए
मेरे सभी प्रयास हैं , रोशन कल के लिए
जोश से भरपूर हूँ, रोशन कल के लिए
आत्मविश्वास से भरपूर हूँ, रोशन कल के लिए
कुसुमित है सुकामनायें, रोशन कल के लिए
पिरो रहा हूँ , सुकर्म की माला, रोशन कल के लिए
मर्यादित रहना है मुझको, रोशन कल के लिए
मैं रच रहा हूँ कुछ कृतियाँ , रोशन कल के लिए
मैं उपासक हूँ तेरा , रोशन कल के लिए
खिला रहा हूँ कुछ फूल , रोशन कल के लिए
चल रहा हूँ तेरी राह, रोशन कल के लिए
जी रहा हूँ तेरे दम से, रोशन कल के लिए
अग्रसर हूँ अभिनन्दन की राह, रोशन कल के लिए
आदर्शों को कर लिया धरोहर, रोशन कल के लिए
परम्पराओं से बना लिया नाता, रोशन कल के लिए
संस्कारों को कर लिया पूँजी मैंने, रोशन कल के लिए
परिश्रम को कर लिया ,सफल होने का सबब, रोशन कल के लिए
तेरे चरणों में सर रख दिया मैंने, रोशन कल के लिए
हो जाऊं तेरा, समर्पित हूँ मैं तुझ पर , रोशन कल के लिए

Wednesday, 3 February 2016

इम्तिहान और भी हैं , खुदा की राह में बन्दे - मुक्तक

१.

इम्तिहान और भी हैं ,खुदा की राह में बन्दे

एक अदद इबादत को ,मुस्तकबिल बना अपना



२.

इशारा करके जता देता है, वो अपने दिल की बातें

खुद पर कर भरोसा और, कर अपनी इबादत पर यकीन


3.

किनारे पर बैठकर सागर की गहराई का ,अंदाजा लगा.
रहे हैं वो

एक हम हैं हमने, खुद को लहरों के हवाले कर दिया


4.


कुदरत के क़ानून से ,जो धोखा करेगा

एक न एक दिन ,कुत्ते की मौत मरेगा



5.


पिंजरे में बंद रहकर , कुछ हासिल न होगा

दो पल  के लिए ही सही, आसमां में उड़ान भर के
तो देख


६.


ख्वाहिशों के ख़वाब , कहीं गुम न हो जाएँ

चलो किसी मज़ार पर , इबादत का चराग रोशन कर
आयें


ख़ाक में मिल जानी है , एक दिन हस्ती मेरी - मुक्तक

१.


ख़ाक में मिल जानी है ,एक दिन हस्ती मेरी

फिर भी दो वक़्त खुदा को याद , हम क्यूं नहीं करते

दिल तो करता है मिटा दूं ,  इंसानियत की राह पर खुद को

ऐसा क्यों है इंसानियत कीं राह पर , हम चाहकर भी चला
क्यों नहीं करते

२.

सफ़र पर महब्बत की ,हम जाया नहीं करते

दो बेकरार दिलों को ,हम मिलाया नहीं करते

यूं तो कहते हैं हम, मुहब्बत को इबादते - खुदा

बिछुड़ जाते हैं जब दो  दिल, हम पछताया क्यूं नहीं करते


3.


चाँद - तारों ,प्रकृति के उपहारों की बात आज करता हैं कौन

क , फेसबुर्क , whatsapp से रिश्ता जोड़ने लगे है

 
राजनेता, राजनीति और ट्विटर में ,कुछ इस तरह से हो

गए हैं मशगूल

गरीबों, किसानों, मजदूरों की ,परवाह आज करता है कौन

4.


आजमाईश के दौर से ,गुजर रहे हैं हम सभी

नेक बन्दे को खोजती , तलाशती उस खुदा की नज़र




इंसान को हम इंसान गंवारा नहीं करते - मुक्तक

१.


इंसान को हम इंसान ,गंवारा नहीं करते

खुदा के बन्दे का ,हम सहारा नहीं बनते

कहने को तो कहते हैं, उस अल्लाह के बन्दे हैं हम

किसी मजलूम की जिन्दगी का ,सहारा नहीं बनते


२.

किसी भूखे को भोजन ,कराया नहीं करते

किसी प्यासे को पानी ,पिलाया नहीं करते

समझते हो खुद को ,उस खुदा का बंदा

किसी गिरते मुसाफिर को ,उठाया नहीं करते


3.


किसी की किस्मत को ,हम संवारा क्यूं नहीं करते

किसी की तरक्की को ,हम गंवारा नहीं करते

समझते हम भी हैं जिन्दगी ,चार दिन का है मेला

किसी की बेरंग जिन्दगी में ,हम रंग क्यूं नहीं भरते


4.


हमें पता है कितने मतलबी हैं ;दुनिया वाले

किसी के गम में ये शरीक क्यूं हुआ नहीं करते

आज हैं हम , कल का भरोसा नहीं हमको

चाहकर भी किसी के आंसू ,क्यूं पोछा नहीं करते




चंद किताबें पढ़कर इल्म हासिल नहीं होता - मुक्तक

१.


चंद किताबें पढ़कर ,इल्म हासिल नहीं होता

कुछ और किताबें पढ़ो ,तो बात बने


२.

हर एक घर बीमारों की ,कब्रगाह बना

अपनी तबीयते नासाज़ का , किस - किससे ज़िक्र करूँ


3.


क्यों हम किसी गिरते राही को ,उठाया नहीं करते

क्यों हम किसी को मुस्कराहट से ,रोशन किया नहीं करते

उस खुदा ने अपना नूर बना ,भेजा हम सबको

क्यों हम किसी की स्याह रात में ,उजाला नहीं करते


4.


क्यों हम चाँद को देख ,मुस्कुराया नहीं करते

क्यों हम गीत प्रेम के ,गुनगुनाया नहीं करते

इश्क को जब हम समझते हैं, मुहब्बत का खुदा

क्यों हम इश्क को ,गंवारा नहीं करते





Thursday, 28 January 2016

चंद क़दमों का सहारा ही बहुत है जीने के लिए

चंद क़दमों का सहारा ही बहुत है जीने के लिए

चंद क़दमों का सहारा ही ,बहुत है जीने के लिए
कौन जीता है यहाँ ,पल--पल मरने के लिए.

दो पल के लिए हमसफ़र ,जो हो जाए कोई
कौन जीता है यहाँ ,ताउम्र बसर करने के लिए

एक चाँद ही काफी है , खूबसूरती बयाँ करने के लिए.
कौन जीता है , पल--पल सिसकने के लिए.

उसने सोचा था , एक चाँद उसे भी होगा नसीब
यूं ही नहीं इश्क को खुदा समझा उसने जीने के लिए.

जीते तो रहे हैं सभी, किसी न किसी वजह को लिए.
जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, बुझदिल तो है मरने के लिए

इश्के - खुदा को कर लिया उसने अपनी जिन्दगी का सबब
मुश्किलों के दौर में वक़्त बचा ही कहाँ है खुदा के लिए.

रोटी, कपड़ा और मकान की आरज़ू लिए जी रहे हैं सब
वरना किसको पड़ी है , जिए दो पहर के लिये.

जिन्दगी की भागदौड़ से मिले दो वक़्त का आराम
कौन नहीं है चाहता , दो वक़्त इबादत के लिए.

मुसीबतों के दौर ने किया, उन्हें मजबूर पीने के लिए
वरना चाहता कौन है पीना दो घूँट , बेवक्त मरने के लिए

लिख दिया है उसने अपना नाम , इतिहास के पत्नों में
वरना किसको पड़ी है , जिये जानवरों सा मरने के लिए.

चंद क़दमों का सहारा ही ,बहुत है जीने के लिए
कौन जीता है यहाँ ,पल--पल मरने के लिए.

दो पल के लिए हमसफ़र ,जो हो जाए कोई
कौन जीता है यहाँ ,ताउम्र बसर करने के लिए



Wednesday, 27 January 2016

किसकी बातों पर करें विश्वास

किसकी बातों पर करें विश्वास

किसकी बातों पर करें विश्वास , किसकी बातों पर नहीं
जुल्म के  सौंदागरों से , पट गयी दुनिया

किसको कहूं अपना, किसको कहूँ बेगाना
रिश्तों को , तार --तार कर रहीं दुनिया

कया कहें , क्यो हो रहा ये सब
खुद को क्‍यों , बदनाम कर रही दुनिया

इंसानियत के रखवालों का , दिखता नहीं नामों निशाँ 
दो पल  के मज़े के लिए , चीरहरण कर रही दुनिया

उसने खुद को बचाकर रखा बरसों
अचानक ये क्या  हुआ; उजड़ गयी उसकी दुनिया

मर्यादा लाघते , ये समाज के आवारा चरित्र
न जाने क्यों संस्कारों से, मटक रही दुनिया

क्या बताएँ क्यों हो रहा संस्कृति: संस्करों से पलायन
आधुनिकता की अंधी दौइ की , भेंट  चढ़ रही दुनिया

किताबों से अब रहा नाता नहीं यार
whatsapp, फेसबुक, twitter  में उलझ कर रह गयी दुनिया

खुदा की इबादत के लिए , वक्त बचा ही कहाँ यारों
मल्टीमीडिया  की दुनिया में , उलझ कर रह गयी दुनिया

चंद प्रयासों को सफलता का , समझ रहे वो हमसफ़र
शोर्टकट  की बलि चढ़ रही , आज की युवा दुनिया

कोई तो इनको बताये, किस दिशा में बढ़ रहे हैं हम
यूं ही चलता रहा तो, नासूर होकर रहे जायेगी इनकी दुनिया




चंद लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ शख्सियत तेरी मौला

चंद लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ शख्सियत तेरी मौला 

चंद लफ़्जों में बयाँ कैसे करूँ शख्सियत तेरी मौला
तू कारसाज़ है मेरे लफ़्जों को नूर अता कर मॉला

तूहै अजब, तेरी शान अजब , मुझ पर हो करम मौला 
जिल्लत से बचाना हम सबको, अपनी पनाह मैं रख मौला 

मेरे हर एक प्रयास में हो तू शामिल, कुछ ऐसा कर मौला 
मैं जिस भी डगर से निक्लूँ, एहसास तेरा हो मौला

मेरे दामन को फूलों से सजा मौला, अपने करम से सजा मौला
झोली खाली है मेरी मौला, अपना शागिर्द बना मौला

तुझसे उम्मीद मुझको ऐ मेरे खुदा, अपने दर पर जगह देना मौला
मैं तेरी निगेहबानी में रहूँ. कुछ ऐसा नजारा दे मौला

नफरत से बचाना ऐ मौला, एहसासे मुहब्बत दे मौला 
मैं तेरे करम से वाकिफ हूँ, मुझे अपना मुरीद बना मौला 

कुछ तेरी नवाजिश हो मौला, मुझे तुझसे निस्वत हो मौला
मुझ पर हो करम तेरा मला, पलकों पर बिठा कर रख मौला 

तेरा पैगाम उसूल मेरा , सच की राह दिखा मौला 
मैं जागूं तो दम से तेरे. सोऊँ तो करम तेरा मौला

मेरी ख्वाहिशों में बसर कर मॉला, मेरी निगाहों में बस मौला
मेरे अरमानों , मेरे खवाबों को सजा मौला 

मेरी जिन्दगी को इंसानियत की राह पर कुर्बान कर मौला 
जियूं जब तक लब पर हो नाम तेरा, मरूं तो आगोश में ले मौला