मुक्तक
क्यूँ कर ये जीवन, यूँ ही व्यर्थ हो जाये
क्यूँ कर जीवन, सितारों विहीन हो जाये
क्यूँ कर चांद घर के आंगन का, पता भूल जाये
क्यूँ ना हम खुद, किसी के घर के आँगन का चांद हो जाएँ l
अनिल कुमार गुप्ता *अंजुम *
मेरी रचनाएं मेरी माताजी श्रीमती कांता देवी एवं पिताजी श्री किशन चंद गुप्ता जी को समर्पित
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