लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 6 February 2019

मुझे नहीं मलाल, मेरी कोशिशें जाया हुईं - अंदाज़े शायरी


मुझे नहीं मलाल, मेरी कोशिशें जाया हुईं

मुझे नहीं मलाल, मेरी कोशिशें जाया हुईं
मेरे प्रयासों ने मुझे बेंइंतहां ख़ुशी  दी है

उनका रूठ जाना मुझे नागवार क्यों गुजरे
ये रूठने की अदा भी तो मुहब्बत की इंतहां ही तो है

कोई मुझ बीमार का हाल पूछे न पूछे
हम तो उनकी मुरझाई सूरत देख ही घबरा जाते हैं

उनका रूठना हमारा उनको मनाना यूं ही बदस्तूर जारी रहे
यूं ही रूठते मनाते जिन्दगी गुजर जाए तो अच्छा हो

मेरी आगोश में जब भी वो आते हैं
मेरी चाहत को वो अपनी मुहब्बत का जाम पिला जाते हैं

इम्तिहाँ मेरी जिन्दगी को और भी रोशन करते चले गए
मुझे अपनी कोशिशों पर था एतबार न कि इम्तिहानों का खौफ

उन्होंने अपनी साजिशों से कर लिया मुझको दुश्मन अपना
मेरी कोशिश ये थी कि कर लूं अपनी जिन्दगी का हमसफ़र उनको

मुझे मलाल न था उनकी बेवफाई का
वो जी रहे हैं खून के आंसू, मुझे मलाल इस बात का है

Tuesday, 5 February 2019

हर शख्स है बेचैन




हर शख्स है बेचैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
रूह रही तड़प  - तड़प , साँसें हैं सिसक रही
मुसीबतों का पहाड़ है, रिश्तों का अभाव है
 हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
आदमियत खो गयी , इम्तिहान की है हर घड़ी
आशियाने हैं झुलस रहे, इंसानियत है रो रही
हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
प्रतिशोध की एक आगा है, रिश्ते हुए दाग  - दाग हैं
कोई इधर है भागता , कोई उधर है भागता
हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
धर्म की आड़ में अधर्म, सेवा में मेवा ढूंढते
भटक रहा हर एक चरित्र, सांस हर एक डरी  - डरी
हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
जिन्दगी हुई पिंजरे में कैद, हर एक कदम बहक रहा
काबिल है यूं भटक रहा, चापलूसों का बोलबाल है
हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन
गुमराह हो रही जवानियाँ, लुप्त हो रहे संस्कार हैं
गुलिस्तां में अब गुल है कहाँ , उपवन हुए अब बेज़ार हैं
हर शख्स है बेचैन , कहाँ किसे है चैन

इस मौकापरस्त दुनिया में


इस मौकापरस्त दुनिया में

इस मौकापरस्त दुनिया में , इंसानियत का ज़ज्बा रोशन करें तो करें कैसे
इंसान के इंसान में तब्दील होने की सूरत नज़र नहीं आती

बिखरते  - टूटते रिश्तों में प्यार की गर्मी का एहसास जगाएं तो जगाएं कैसे
बिखरते  - टूटते रिश्तों के मुहब्बत में तब्दील होने की सूरत नज़र नहीं आती

क्यूं कर एक बेटे ने मोड़ लिया है मुंह अपनी माँ से
माँ और बेटे को करीब लाने की कोई सूरत नज़र नहीं आती

एक  दूसरे को गिराकर आगे बढ़ने की चल पड़ी है होड़
खुदा के इन बन्दों को एक दूसरे के करीब लाने की सूरत नज़र नहीं आती

हर एक के दामन में हैं दाग, ये एहसास है उन्हें
उनके दामन को पाकीजगी अता हो ये सूरत नज़र नहीं आती

गिले  - शिकवे में बीती जा रही जिन्दगी खुद को समझाएं कैसे
दिलों में मुहब्बत का ज़ज्बा रोशन करने की सूरत नज़र नहीं आती

उम्मीद न थी हमको



उम्मीद न थी हमको

उम्मीद न थी हमको, कोई हमसे भी करेगा धोखा
क्यों कर कोई कर गया नागवार खता , मुझे क्या मालूम

दिल ही दिल में समझते थे उन्हें हम मुहब्बत का खुदा
क्यों कर दिल को जख्म दे गया मुझे क्या मालूम

मुझे अपने दोस्त पर था खुद से भी ज्यादा एतबार
सीने में खंजर क्यूं घोंप गया मेरा दोस्त, मुझे क्या मालूम

सहेज  - सहेजकर रखने की कोशिश की थी मैंने हर एक रिश्ते को
हर एक रिश्ते का कोई क्यूं खून कर गया, मुझे क्या मालूम

सजाया था मैंने भी एक आशियाँ अपनी मुहब्बत का
मेरे इस आशियाँ पर क्यों कोई नज़र लगा गया ,मुझे क्या मालूम

चंद गीत सजाये थे मैंने उसकी मुहब्बत में पागल होकर
क्यों कर वो गीत चुरा ले गया कोई ,मुझे क्या मालूम

मेरी भी आरज़ू थी आसमां पर पंख लगाकर उड़ने की
मेरी आरज़ू के पंख कोई क्यूं कर चुरा ले गया ,मुझे क्या मालूम

क्यूं कर मेरी कलम को


क्यूं कर मेरी कलम को

क्यूं कर मेरे गीतों को भुला दे कोई
क्यूं कर मेरी कलम को सजा दे कोई

मेरी सांसों का कतरा – कतरा कुर्बान
क्यूं कर मेरी साँसों को सज़ा दे कोई

चंद असआर खुदा की इबादत में लिखे मैंने
क्यूं कर मेरी इबादत को भुला दे कोई

बरकरार राखी है मैंने अपने सीने में प्यार की खलिश
क्यूं कर मेरे प्यार को ठुकरा दे कोई

अपनी हर एक आरज़ू को पाकीजगी से सींचा मैंने
क्यूं कर मेरी आरज़ू को फ़ना कर दे कोई

मैंने अपनी चाहत को किया इबादते – खुदा
क्यूं कर मेरी चाहत की राह में रोड़ा बने कोई

अपनी कोशिशों को कर लिया मैंने अमानत मेरी
क्यूं कर मेरी कोशिशों को सजा दे कोई

Monday, 4 February 2019

तुम हमेशा ही मेरे हुए


तुम हमेशा ही मेरे हुए

तुम हमेशा ही मेरे हुए
इस विचार को अपने ही भीतर
संजोये रहा हूँ मैं

जीवन समर में
प्रेम आलिंगन बन उतरी
उस प्रेयसी को संबोधित
करते हुए
उसके व्यक्तित्व का
अवलोकन कर रहा हूँ

उस एक कमरे में
जो बारिश में
जगह – जगह से
टपकता था
उसमे गुजारे अन्तरंग पल
आज भी तुम्हें मेरी होने का
एहसास कराते हैं

घर में नन्ही परी का आगमन
झूम उठा था मेरा तन – मन
तब भी लगा था तुम मेरी हो

यह सिलसिला
 हमारे एक होने का
अनवरत चलता ही रहा

फिर एक और नन्ही परी
फिर एक प्रिंस का आगमन
इसी बीच उस “घोंसले रुपी”
आशियाने में बिठाये पल 

एक साइकिल पर चार सवार
तब भी तुम मेरी ही थीं

बच्चों के प्रति लगाव
उनके खिलोनों का रख रखाव
उनके पेन , पेंसिल , किताबें
सब कुछ संयोजित सा था

मेरा टूर पर जाना
तुम्हें पसंद न था
संभलकर ट्रेन पर चढ़ना
देखकर सड़क पार करना
समय पर खाना खाना
समय पर सोना आदि  - आदि
काफी था ये एहसास दिलाने के लिए
कि तुम मेरी सच्ची प्रेयसी हो

वो आशियाँ भी तो
हमारी जद्दोजहद और आपसी
समझ का ही प्रतीक था
जिसे हमने अपनी मुहब्बत
की निशानी बना दिया

मुझे आज भी याद है
मेरी पहली कविता “ सत्य “
इस कविता पर तुम्हारे विचारों ने
अनवरत लिखते रहने के लिए
मुझे ऊर्जा और प्रेरणा दी थी  
आज लेखन मेरा कर्म बन
निखर रहा है
उस वक़्त तुमने
मेरी कलम का साथ दिया
आज भी याद है मुझे

धर्म और कर्म के प्रति आस्था की
पुण्यमूर्ति बन
मेरे जीवन में उतरीं
आलोकित कर दिया
तुमने मेरा रोम – रोम

आज जिस मुकाम पर हूँ
 उसका श्रेय तुम्हें न दूं तो और किसे
तुम्हारा सत्कर्म की ओर
प्रेरित करने का ज़ज्बा
हमेशा हे मुझे सराहनीय लगा

तुम्हारा स्पर्श आज भी मुझे
रोमांचित करता है
तुम्हारा आलिंगन मुझे बार  - बार
जीवंतता प्रदान करता है
और हो भी क्यूं न
तुम मेरी प्रेयसी जो हो

होम मिनिस्टर , फाइनेंस मिनिस्टर
भी तो तुम्हीं हो
कहूं तो गृहलक्ष्मी हो तुम
मेरे जीवन का संगीत हो तुम
मेरे जीवन की पूर्णता हो तुम
मेरा घर मेरा संसार हो तुम
मेरे जीवन का विस्तार हो तुम
तुम हमेशा ही मेरे हुए , मेरे हुए , मेरे हुए .........


कुटिल , धूर्त , दुर्जन , अधम से परहेज करो


कुटिल , धूर्त , दुर्जन , अधम से परहेज करो

कुटिल , धूर्त , दुर्जन, अधम से परहेज करो
उत्थान, उन्नयन, विकास सिर माथे धरो

कोकिल, कोकिला, कलकंठी सी वाणी वारो
निपुणता, चातुर्य, प्रवीणता सर माथे धरो

नीरज, अम्बुज, जलज, पंकज सा पावन रहो
वाटिका, उपवन, कुसुमाकर से महके रहो

घमंड, अभिमान, दर्प, दंभ से परहेज करो
निर्मल, पुण्य, पावन विचारों से खुद को महकाए रहो

नीरद, वारिद, मेघ, जलधर सा जीवन अमृत बरसाए रहो
प्रणय , स्नेह , अनुराग अपने जीवन कण  - कण में समाये रहो

माथा, ललाट, भाल, शीश को विशाल करो
मोक्ष, निर्वाण, सद्गति को जीवन का उपहार करो

मानव, मनुज, नरदेही, मनुपुत्र सा व्यवहार करो
पुष्पराज , महक, खुशबू सा खुद को महकाए रहो

कुटिल , धूर्त , दुर्जन, अधम से परहेज करो
उत्थान, उन्नयन, विकास सिर माथे धरो