लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Thursday, 22 July 2021

मुक्तक

 1.


जब तुम्हारे प्रयास , सफल होने लगें 

जब तुम्हारी कोशिशों को, दिशा प्राप्त होने लगे 

जब तुम सफ़लता की , सीढियां चढ़ने लगो 

तब समझना , मंजिल तुम्हारे कदम चूमने लगी है ||


2.


जब तुम्हारा अंतर्मन , सच और झूठ का अंतर समझने लगे 

जब तुम्हारी अंतरात्मा सत्य का वरण करने लगे  

जब तुम्हारे नेत्र निश्छल हो जाएँ 

तब समझना तुम पूर्ण मानव बनने की दिशा में अग्रसर हो ||




कहाँ मिलेंगे उसके क़दमों के निशाँ

कहाँ मिलेंगे उसके क़दमों के निशाँ 


कहाँ मिलेंगे , उसके क़दमों के निशाँ 

कहाँ नज़र आयेंगे , उसकी उपस्थिति के निशाँ |


किस आकृति में उसने , स्वयं को किया होगा अवस्थित 

किस रंग रूप में उसने , स्वयं को किया होगा पोषित |


कोई कहता है , ईश्वर मानव मन में अवस्थित 

कोई कहता है ईश्वर , मानव रूप में अवस्थित |


कहते हैं प्रेम की अनुभूति में , ईश्वर का एहसास 

प्रकृति का कण  - कण , उसके एह्सास से  प्रफुल्लित |


सलिला के कल  - कल निनाद में , उसकी अनुभूति 

मंदिर के घंटे की ध्वनि और शंखनाद में उसका आभास |


पंछियों के मधुर स्वर में , उसकी अनुभूति 

श्रद्धा और सबूरी में उसकी उपस्थिति का एहसास |


आध्यात्मिक सोच में , उसकी उपस्थिति की अनुभूति 

इस धरा की प्रत्येक कृति में , उसका एहसास |


उसकी प्रत्येक अनुभूति पर , सर्वस्व समर्पित 

उसके प्रत्येक एहसास और अनुभूति को , वंदन और नमन |


कहाँ मिलेंगे , उसके क़दमों के निशाँ 

कहाँ नज़र आयेंगे , उसकी उपस्थिति के निशाँ |


किस आकृति में उसने , स्वयं को किया होगा अवस्थित 

किस रंग रूप में उसने , स्वयं को किया होगा पोषित | |

Wednesday, 21 July 2021

हमने जिन्दगी में कभी रात का अँधेरा , तो कभी सुबह का उजाला देखा है

 हमने जिन्दगी में कभी रात का अँधेरा , तो कभी सुबह का उजाला देखा है 


हमने जिन्दगी में कभी रात का अँधेरा , तो कभी सुबह का उजाला देखा है 

कभी गुमनामी का अँधेरा , कभी रोशन उजाला देखा है |


कभी बिखरे आँख के मोती , तो कभी आस के पल 

कभी अभाव की सुनामी, तो कभी किस्मत का छलावा देखा है |


इश्क़ में गुजरी चंद यादें, तो कभी चंद लम्हे 

हमने उनका रूठना , और हमारा उनको मनाना देखा है |


तरस रहे हैं सभी, उस आसमां की एक पल छाँव के लिए 

हमने नवोदित रचनाकारों की कलम को, घायल होते देखा है |


हाथ में फूलदान लिए , गाड़ियों के पीछे भागता बचपन

हमने गरीबी का अजब आलम, अजब मंज़र देखा है |


उसकी पीठ से बंधा बच्चा, और सिर पर ईटों का अंबार 

हमने दो वक़्त की रोटी की जद्दोजहद का , भयावह मंज़र देखा है |


दो वक़्त की रोटी को तरसते , लाखों परिवार 

हमने अमीरों की पार्टी में , अन्न की बर्बादी का अजब मंज़र देखा है |


बाबाओं का पाखण्ड , और उनका अनैतिक आचरण 

हमने बाबाओं को कभी नेता  , तो कभी  बिजनेसमैन होते देखा है |


नेताओं का वादा करना , और मुकर जाना 

हमने नेताओं की हरकतों का , अजब मंज़र देखा है |


हमने जिन्दगी में कभी रात का अँधेरा , तो कभी सुबह का उजाला देखा है 

कभी गुमनामी का अँधेरा , कभी रोशन उजाला देखा है |


कभी बिखरे आँख के मोती , तो कभी आस के पल 

कभी अभाव की सुनामी, तो कभी किस्मत का छलावा देखा है ||


तेरी उम्मीद में जी रहा हूँ मैं - ग़ज़ल

तेरी उम्मीद में जी रहा हूँ मैं - ग़ज़ल 


तेरी उम्मीद में , जी रहा हूँ मैं 

तेरी उम्मीद में पी रहा हूँ मैं |


जाम नहीं है , आंसुओं का समंदर है ये 

अपने ज़ख्मों  को सी रहा हूँ मैं |


इक तेरे दीदार की आरज़ू है, मेरा मकसद 

अपने दरवाजे की चौखट पर , निगाह लगाए बैठा हूँ मैं |


तेरी एक मुस्कराहट ने जगाई थी ,  एक उम्मीद मुझमे

तेरे आने का इंतज़ार कर रहा हूँ मैं |


तुझे परवाह है अपनी, और अपनों की 

तेरी चाहत में खुद को , फ़ना कर रहा हूँ मैं |


पीर दिल की मिटा जा , और दिल को दे जा सुकूँ 

इस दिल के इक  - इक ज़ज्बात को पिरो रहा हूँ मैं |


तेरी उम्मीद में , जी रहा हूँ मैं 

तेरी उम्मीद में पी रहा हूँ मैं |


जाम नहीं है , आंसुओं का समंदर है ये 

अपने ज़ख्मों  को सी रहा हूँ मैं | |



मुक्तक

 1.


जब तेरी कोशिशें , तेरी मंजिल का हमसफ़र होने लगें 

जब तेरे प्रयास , तुझे प्रेरित करने लगें |

जब तेरी कोशिशों को , खुला आसमां नसीब होने लगे 

तब समझ लेना, तुम अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो रहे हो ||


2.


जब तुझे सत्कर्मों की ओर , प्रस्थित होने की प्रेरणा मिलने लगे 

जब तुझे , सद्विचारों का भान होने लगे |

जब तुझे सत्मार्ग की ओर प्रस्थित होने की , तीव्र लालसा होने लगे 

तब समझ लेना , तुम एक पुण्य आत्मा बनने की ओर अग्रसर हो ||



मुक्तक

 1.

जब तेरे प्रयास , तेरी मंजिल का हमसफ़र होने लगें 

जब तेरी सफलता के,  सकारात्मक प्रभाव दिखने लगें |

जब तेरे प्रयास , दूसरों का मार्गदर्शन करने लगें 

तब समझ लेना ,तुम सही दिशा की ओर अग्रसर हो ||


2. 


जब दूसरों की पीर का दर्द, तेरी आत्मा महसूस करने लगे 

जब दूसरों की राह के कांटे , तुझे नश्तर सा महसूस होने लगें |

जब किसी गिरते को देख , उसे संभालने को तेरे कदम आतुर होने लगें 

तब समझ लेना, तुम इंसानियत की राह पर अग्रसर हो ||


Wednesday, 14 July 2021

आज जानकारियों का बढ़ गया भण्डार है

 

आज जानकारियों का बढ़ गया भण्डार है

 

आज जानकारियों का बढ़ गया भण्डार है

कुछ सच्ची कुछ झूठी , कुछ की महिमा अपरम्पार है

 

कुछ यू - ट्यूब पर चला रहे चैनल , कुछ के ब्लॉग बेमिसाल हैं

वेबसाइट के अंदाज़ भी निराले हैं , कुछ इन्स्टाग्राम , एफ़ बी , ट्विटर के मतवाले हैं

 

खे रहे हैं सब अपनी  - अपनी नावें

कुछ को हासिल मंजिल, कुछ बीच मझधार हैं

 

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की अपनी ही माया है

फेसबुक , ट्विटर पर हर कोई छाया है

 

किसी के दुःख दर्द से , किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता

सूचनाओं का बाज़ार गर्म होना चाहिए

 

गम किसी के कम हों न हों , क्यों सोचें

टी आर पी का खेल बदस्तूर चलते रहना चाहिए

 

कोई आविष्कार का बना रहा वीडियो तो कोई सुसाइड का

कोई डूबते हुए का बना रहा वीडियो, तो कोई तेज़ाब में नहा चुकी ........का

 

किसी को फ़र्क पड़े तो पड़े क्यों

यू  - ट्यूब से कमाई की राह निकलती रहनी चाहिए

 

आज जानकारियों का बढ़ गया भण्डार है

समाज अपनी ही तरक्की पर शर्मशार है

 

संस्कृति, संस्कारों को बचाने की आज चुनौती है

“ बाबे “ निकल रहे बहुरूपिये , ये अजब कसौटी है

 

नेता धर्म का कर रहे अतिक्रमण

राम के नाम पर लग रही बोली है

 

मंदिरों पर अंधाधुंध चढ़ावे चढ़ रहे हैं

झोपड़ी में लाल भूख से बिलख रहे हैं

 

कोरोना का भयावह रूप देखकर भी नहीं सुधरी दुनिया

इस भयावह त्रासदी में करोड़ों की उजड़ गयी दुनिया

 

“ बाबे “ सभी हो गए बिज़नेसमैन

गली  - मुहल्लों में खुल रही इनकी दुकान है

 

प्रकृति से खिलवाड़ को समझ रहे तरक्की का सिला

कभी सुनामी कभी बाढ़ कभी भूकंप तो कभी कोरोना की मार है

 

पहाड़ों का दिल चीरकर कम कर रहे दूरी

अजब तरक्की का गजब बुखार है

 

कोरोना ने इंसान को कीड़े मकोड़ों की तरह कुचला

फिर भी इंसान का दिल इंसान की मौत पर नहीं पिघला

 

मंदिरों में घंटों की ध्वनि पर लग गया विराम

आज भी डीजे पर नाचने वालों को कहाँ आराम

 

आज अजब नज़ारे दिखा रही है ये धरा और ये आसमां

अभी भी चाहे तो संभल जा ए आदम की औलाद , अपनी जिन्दगी को नासूर न बना

 

तरक्की के मायने बदल, लिख सके तो लिख इबारत इंसानियत की तरक्की की

सजा सके तो सजा महफ़िल , खुदा की इबादत की

 

इस नायाब प्रकृति को बना अपनी जिन्दगी का हमसफ़र

सिसकती सांसों का बन मरहम , इस धरा को कर रोशन

 

आज जानकारियों का बढ़ गया भण्डार है

कुछ सच्ची कुछ झूठी , कुछ की महिमा अपरम्पार है

 

 

हिंदी साहित्य जगत में अनेक सितारे हैं

 हिंदी साहित्य जगत में अनेक सितारे हैं

 

 हिंदी साहित्य जगत में , अनेक सितारे हैं

कुछ टिमटिमाते तारे, कुछ सूर्य की तरह गरम अंगारे हैं

 

कुछ स्वयं को साहित्य जगत में , स्थापित कर पाते हैं

कुछ गुमनामी के , अँधेरे में खो जाते हैं

 

कुछ तो पुराने सतित्याकारों को ही , साहित्य जगत का आधार स्तम्भ मान बैठे हैं

नवीन उदीयमान साहित्यकारों को ,  पराया मान बैठे हैं

 

कुछ नहीं चाहते कि , नित नए कमल खिलें

कुछ नहीं चाहते कि , दूसरों की भी दाल गले

 

कुछ ऐसा समझते हैं कि केवल , उनकी रचनाएं ही गर्व का विषय हैं

दूसरों की रचनाओं को वे , गर्व का विषय कैसे कह दें

 

वे चाहते हैं कि लोग उनकी रचनाओं का आचमन कर , सकारात्मक टिप्पणी करें

पर शायद भूल जाते हैं कि दूसरों की उत्कृष्ट रचनाओं पर , वे भी ताली बजा सकते हैं

 

नये युग का निर्माण करना है तो , उदीयमान रचनाकारों को स्वीकारना ही होगा

उनके द्वारा स्थापित किये जा रहे , नित  - नए आयामों को अधिकार दिलाना ही होगा

 

एक स्वस्थ साहित्य जगत का निर्माण करना है

तो सभी को विश्व साहित्य मंच पर लाना ही होगा

 

कलम किसी की भी हो , विचार किसी के भी हों

उदीयमान रचनाकारों को भी , खुला आसमां दिलाना ही होगा

 

उदीयमान हिंदी साहित्यकारों को , उनका मुकाम दिलाना ही होगा

सबको गले लगाना होगा , सबके लिए ताली बजाना ही होगा

 

हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना है

तो इस गीत को अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाना ही होगा

 

आइये सब साथ बढ़ चलें , दूर स्वच्छ गगन की ओर

जहां सभी को सूर्य की तरह , चमकने का अधिकार हो

 

जहां आसमां , किसी से भेद नहीं करता

जहां सभी को पंख फैला , उड़ने का अवसर हो

 

जहां समा लेता है , उन्मुक्त गगन अपनी आगोश में

देता है पंख लगा अवसरों की , उड़ान भरने का हौसला

 

तो विलंब कैसा और किसका इंतज़ार

तो आओ चलो मिलकर चलें

 

हिंदी साहित्य जगत को शिखर पर विराजें

और स्थापित करें नित नए आयाम II

 

Tuesday, 6 July 2021

पीर दिलों की मिटा के

 पीर दिलों की मिटा के

 

पीर दिलों की मिटा के , रोशन किया ज़ज्बा – ए  - वतन

मादरे वतन पर मर मिटने का ज़ज्बा सिखा गए |

 

वतनफ़रोशी का ज़ज्बा थी , उनकी धरोहर

वो राग जिन्दगी का सुनाकर चले गए |

 

कर गए रोशन अपने देश पर,  मर मिटने का ज़ज्बा

वो गीत बन के दिल में समाते चले गये |

 

अपने लहू से सींच गए , वतनपरस्ती का ज़ज्बा

मादरे वतन पर निसार होने की कला सिखा गए |

 

मिटा दिया नासूर गुलामी का , कर अपना सर्वस्व समर्पण

जो मर मिटे थे अपने , अपने देश की खातिर चले गए |

 

गुलामी की जंजीरों से , आजाद कर गए वतन को

माँ भारती के सच्चे सपूत होने का , सिला सिखा गए |


पीर दिलों की मिटा के , रोशन किया ज़ज्बा – ए  - वतन

मादरे वतन पर मर मिटने का ज़ज्बा सिखा गए |

 

वतनफ़रोशी का ज़ज्बा थी , उनकी धरोहर

वो राग जिन्दगी का सुनाकर चले गए | |


 

बंदिशों में रहकर ही

 बंदिशों में रहकर ही

 

बंदिशों में रहकर ही , संवरता है जीवन

बंदिशों के आँचल तले , निखरता है जीवन |

 

जो चंचल हो भटकता है , वो बिखरता है जीवन

संस्कारों में बंध कर ही , संवरता है जीवन |

 

क्यूं कर बिखर जाएँ, आस के मोती

बन्धनों में रहकर ही , निखरता है जीवन |

 

बंदिशें जो आत्ममंथन की राह मजबूत करें   

बंदिशें जो न हों , तो तड़पता है जीवन |

 

बंदिशें जो ख्वाहिशों के समंदर में पतवार बन उतरें

बंदिशें जो दर्द में मरहम हो जाएँ , संवर जाए जीवन |

 

बंदिशें जो खुद से खुद का परिचय कराएं

बंदिशें जो खुद से खुद का परिचय करा , कर दें रोशन |

 

बंदिशें जो कदम दर कदम उन्नति की राह निखारें

बंदिशें जो जीवन में सफ़लता का एहसास कराएं |


बंदिशों में रहकर ही , संवरता है जीवन

बंदिशों के आँचल तले , निखरता है जीवन |

 

जो चंचल हो भटकता है , वो बिखरता है जीवन

संस्कारों में बंध कर ही , संवरता है जीवन | |