लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 4 December 2017

मैं चाहता हूँ , एक नए भारत का उदय हो

मैं चाहता हूँ एक नए भारत का उदय हो

मैं चाहता हूँ , एक नए भारत का उदय हो
जहां पले  घर - घर , संस्कार और संस्कृति हो

घर - घर में राम और लखन हों , दशरथ से पिता हों
माता हो केवल एक , कौशल्या सी मातृत्व की धनी हों

न हो कोई वनवास , मिलकर रहते सभी हों
रावण से मुक्त हो देश, कंस को न कहीं जगह हो

बच्चे भाई को भ्राता पुकारें ,  पिता को पिताश्री पुकारें
माँ के संबोधन में , दिल के तार सब जुड़े हों

गलियों में खेलें कान्हा , मटकी से खींचें माखन
मन में राम - राम हो, दिल में कृष्ण - कृष्ण हों

पीर पराई हमारी हो जाए, हमारी खुशियाँ दूसरों के ग़मों
का हिस्सा हों
हर घर एक देवालय हो , हर घर एक मस्जिद हो


 गिर पड़े तो उठा ले कोई, रोये तो चुप करा दे कोई 

 हर एक व्यक्तित्व शालीन हो , एक ऐसे भारत का उदय हो


बहे हर एक घर के आगे गंगा, भारत ऐसा एक नगर हो

माँ - बाप की सेवा हर एक का धर्म हो जाए, ऐसा भारत
बसर हो


चाणक्य से हों राजनीतिज्ञ , देश हित परम धर्म हो

घोटालों , भष्टाचारियों  , चापलूसों को न यहाँ जगह हो


हर एक दिल में हो देश प्रेम, देश हित मर मिटने का ज़ज्बा
हो

हर - गली हर - घर , हर एक दिल में वन्दे मातरम्‌ हो


मैं चाहता हूँ , एक नए भारत का उदय हो

जहां पले घर - घर ,  संस्कृति और संस्कार हों 






नज़रों के सामने से


नजरों के सामने से

नज़रों के सामने से मुस्कुरा के चल दिए , वो कुछ इस तरह
अपनी मुहब्बत का जाम , पिला के कुछ इस तरह

उनकी बेबाक अदाओं ने खींचा , हमे उनकी ओर कुछ इस तरह
अपनी अदाओं के जाल में कैद , कर रहे हों कुछ इस तरह

मुहब्बत की वेवाकियों का , हमें इल्म न था.
उनकी मुहब्बत के पाश में , हम फंसते गए कुछ इस तरह

मुहब्बत के अंजाम से नावाकिफ़ हो , बढ़े जा रहे थे हम कुछ इस तरह
एहसास तब हुआ जब जिन्दगी, आांसुओं का समंदर हो गयी कुछ इस तरह

उन चंद लम्हों को अपनी जिन्दगी का मकसद कर , जी रहे कुछ इस तरह
एक दिन तो क़यामत का आयेगा , जब रूवरू हंगे हम कद इस तरह

उनके हर एक सितम को , हमने अंजामे - मुहब्बत समझा
पाक इश्क की राह में तनहा , जिन्दगी गुजार रहे हैं हम कुछ इस तरह

नज़रों के सामने से मुस्कुरा के चल दिए , वो कुछ इस तरह
अपनी मुहब्बत का जाम , पिला के कुछ इस तरह

उनकी बेबाक अदाओं ने खींचा , हमे उनकी ओर कुछ इस तरह
अपनी अदाओं के जाल में कैद , कर रहे हों कुछ इस तरह





गीत भंवरों के संगीत के , अब गुनगुनाता नहीं कोई

गीत भंवरों के संगीत के , अब गुनगुनाता नहीं कोई

गीत भंवरों के संगीत के , अब गुनगुनाता नहीं कोई
साज महफिल में मुहब्बत की , अब सजाता नहीं कोई

साँसों को महका दे वो संगीत , अब सजाता नहीं कोई
संस्कृति, संस्कारों से सुसज्जित , चलचित्र अब बनाता नहीं कोई

हर एक काम को कर लिया , लोगों ने अपना पेशा
इंसानियत की राह में , अब खुद को मिटाता नहीं कोई

भौतिकता और विलासिता से परिपूर्ण चरित्र, मानव मन को
लुभाने लगे हैं
आध्यात्म की राह में ,अब अपने पाँव जमाता नहीं कोई

गीत उस खुदा की इबादत के ,अब लिखता नहीं कोई
अपनी ही मुश्किलों में उलझा, दूसरों के ग़मों से रिश्ता बनाता
नहीं कोई

किसी की अँधेरी रातों में, उजाले का दीपक रोशन करता नहीं
कोई
खुदा की राह को , मकसदे - जिन्दगी बनाता नहीं कोई


द्झ के तन पर , अब कपड़ा दिखता नहीं कोई
बीच मझधार डूबते को , अब बचाने आता नहीं कोई

तन पर कपड़े नहीं , हाथों में कटोरा लिए , नज़र आ जाते
हैं चरित्र
'एक रुपये की मदद को , अपने पर्स तक हाथ बढ़ाता नहीं
कोई

दुःख के पहाड़ हर एक की , जिन्दगी का हो गए हिस्सा
वरना खुदा के दर पर , सजदा करने आता नहीं कोई

किसी को क्या सिला दें , किसी को क्या दें नसीहत
इन बेमानी रिश्तों में , अपना भी काम आता नहीं कोई

गीत भंवरों के संगीत के , अब गुनगुनाता नहीं कोई
साज महफ़िल में मुहब्बत की , अब सजाता नहीं कोई




Wednesday, 22 November 2017

हम गीतों में गुनगुनाएं चलो (ग़ज़ल)


हम गीतों में गुनगुनाएं चलो ( ग़ज़ल )

हम गीतों में गुनगुनाएं चलो
दो पल  को ही मुस्कराएं चल्रो

जिन्दगी को यूं न करें नासूर
किसी को दो पल  को हंसाएं चलो

गीतों मैं बंदगी का दिखे असर.
उस खुदा को मनाएं चलो  

किस्सा - ए - जिन्दगी को करें रोशन
इस जिन्दगी से रिश्ता बनाएं चलो

वक़्त ने दिए हैं गम बहुत
ग़मों को खुशियों का आइना दिखाएँ चलो

'छिलेंगे फू तेरी राहों में भी
किसी के सूने ऑँगन मैं दीपक जलाएं चलो 

ये आरजू हैं खुदा का करम हो हम पर.
किसी रोते को हंसाएं चलो

अनजान रिश्तों में भी ढूंढें प्यार की खुशबू
प्यार का एक खुशनुमा समंदर सजाएं चलो

हम गीतों में गुनगुनाएं चलो
दो पल  को ही मुस्कराएं चल्रो

जिन्दगी को यूं न करें नासूर
किसी को दो पल  को हंसाएं चलो



न जाने किसकी दुआओं का असर है मुझ पर

न  जाने किसकी दुआओं का , असर है मुझ पर

न जाने किसकी दुआओं का , असर है मुझ पर
समंदर की लहरों  के बीच भी , किनारा नसीब हो जाता है मुझे

न जाने किसके करम से , रोशन हुई लेखनी  मेरी
लिखता  हूँ न जाने क्या , खुदा की इबादत हो जाती है
.
न जाने किसके आशीर्वाद से , लिख रहा हूँ मैं
सोचता हूँ कुछ पंक्तियों , ग़ज़ल हो जाती हैं वो 

पाला हूँ दिल मैं प्यार , न जाने किसके करम से
दो मीठे बोल , चहरे पर मुस्कान दे जाती है

बो दिए हैं कुछ फूल , इस जहां में मैंने भी 
इनकी खुशबू , जिन्दगी रोशन कर जाती है

मुस्कुरा रहा  हूँ मैं , मुस्कराओ तुम भी
ये मुस्कराहट रोतों को भी , हँसा जाती है

चंद फूल  इंसानियत के , खिलाओ  तुम भी
ये हसरत हमें खुदा के , करीब ल्रे जाती है.

बीती बातों को दिल से , लगाकर  न रखना
ये जिन्दगी की खुशियाँ , हमसे छीन ले जाती हैं


खुद को खुद में ढूँढने की कोशिश (ग़ज़ल)

खुद को खुद में , टूँढने की कोशिश ( ग़ज़ल )

खुद को खुद में टूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ तो है मुझे

जिन्दगी की खुशबू का , शायद एहसास हो मुझमे
'खिलती हुई बहार शायद , कहीं आसपास हो मुझमे

गीत बनकर दिलों में उतर जाऊं, शायद ये ज़ज्बात हो मुझमें 
या ग़ज़ल बनकर रोशन हो जाऊं , शायद ये औकात हो मुझमे

एक आस की लौ ले खुद को ढूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ बात हो मुझमें 

लिखता  हूँ इस उम्मीद से कि शायद , भीतर कहीं एहसास हों मुझमे
किसी के दर का चराग हो जाऊं, शायद ये आस हो मुझमें

फूलों की पंखुड़ियों को निहारता हूँ , इस उम्मीद से मैं
फूलों की खुशबू सा कहीं , शायद अंदाज़ हो मुझमें

रिश्तों की डोर को इस उम्मीद से , पकड़े रहता हूँ मैं
'रिश्तों को निभाने के शायद , कहीं जज्बात हों मुझमें

खुद को खुद में ढूँढने की , कोशिश कर रहा हूँ मैं
इस उम्मीद से कि शायद , कुछ तो है मुझमे


कुर्सी को खुदा समझने वाले (व्यंग्य)

कुर्सी को खुदा समझने वाले

कुर्सी को खुदा समझने वाले
आदर्श कहाँ जिया करते हैं

राजनीति को धर्म समझने वाले
राष्ट्र धर्म की बात कहाँ करते हैं

पल - पल पार्टी बदलने वाले
कुर्सी पर ही मरने वाले

पल - पल विचार बदलने वाले
राष्ट्र हित की बात कहाँ करते हैं

जनता को मूर्ख समझने वाले
वादों पर ही जीने वाले

कुर्सी के हित जीने वाले
सामाजिकता की बात कहाँ करते हैं

मन मैं जहर घोलने वाले
अपराध जगत के ये रखवाले

सरहद पर मरने वालों को
सलाम कहाँ किया करते हैं



Saturday, 18 November 2017

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में है आनंद

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में हैं आनंद

मानुषिक प्रवृत्तियों की निवृति में हैं आनंद
सुख - दुःख का मंथन और जीवन का अमृत

संवेदनाएं खोलतीं  सुख के द्वार
स्वयं पर कितना विश्वास और कितना आत्मविश्वास

समृद्धि और सुख का भीषण द्वंद
कर्म भी सुख का सूचक 

समर्पण और प्रेम , सुख का पर्याय
'तलाशिये सुख का एक बीज , अपने प्रयासों से

जितना बड़ा संघर्ष , उतना बड़ा सुख
सुख की सीढ़ियों का अंत नहीं

'फिर भी तलाश , एक मुट्ठी भर सुख की
है यहीं कहीं , हमारे आसपास

हमारी कोशिशों में , हमारे प्रयासों में
संवेदनाओं में , हमारे मानव प्रेम में

आओ खोजें उस सुख को , उस असीम सुख को
हमारे प्रयासों , हमारी कोशिशों की परिणति के रूप में




स्वच्छता ही सेवा है


स्वच्छता ही सेवा है

स्वच्छता ही सेवा है
आओ इसे अपनाएँ

गली और मुहल्लौं को
आओ रौशन बनाएं

गांधीजी के इस  सपने को
आओ अमली जामा पहनाएं

स्वच्छता ही सैव हैं
आओ इसे अपनाएँ

स्वच्छता की पावनता
हमारे स्वच्छ कर्मों में 

स्वच्छता की गूँज से
मनी - गमी महकाएं

स्वच्छता ही सेवा है 
आओ इसे अपनाएँ

आओ स्वच्छ भारत का
सपना साकार करें

प्रकृति की पावनता
आओ बरकरार रखें

स्वच्छता ही सेवा  है
आओ इसे अपनाएँ

स्वच्छता एक विचार है.
तन की पावनता का

स्वच्छता एक नारा नहीं
स्वच्छता पावनता है

स्वच्छता ही सैवा है
आओ इसे अपनाएँ






Monday, 9 October 2017

मुक्तक

१.

जिन्दगी में कुछ के , ऐसे भी आते हैं 

दे जाते हैं कुछ सिला, जिन्दगी संवार जाते हैं

२.


कुछ  प्रयास तुम करो , कुछ प्रयास
मैं करूं

चलो इस जहां को . महब्बत का
सिला दे चले


3.

किसी की तनहा रातों को , दो पल
की ख़ुशी अता कर देख

तेरे इस प्रयास और तुझ पर होगा
उस खुदा का करम

4.


सका एक सच्चे दोस्त की, कर रहा
हूँ मैं

खुद को हर एक रोज मुसीबतों के
समंदर में, धकेल रहा हूँ मैं


5.

फूल पत्तों से दो पल  के लिए ही
सही, बात कर देखो

जिन्दगी के थपेड़ों से लड़ने का,
सिला मिलेगा तुझको