लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 18 September 2016

उच्च से उच्चतर ई ओर बढ़ो

उच्च से उच्चतर की ओर

उच्च से उच्चतर की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करो . कुछ प्रयास करो

श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करों

जिन्दगी है चार दिनों का मेला
कुछ प्रयास करों , कुछ प्रयास करों

गुरु से गुरुतन की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करों

जो दारुण हैं . उसके कल्याण हित
कुछ प्रयास करो . कुछ प्रयास करो

पवित्र से पवित्रतम की ओर बढ़ों
कुछ प्रयास करों . कुछ प्रयास करो

मथुर से मधुरतम की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

महान से महानतम की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करों . कुछ प्रयास करो

सुन्दर से सुन्दरतम की ओर बढ़ो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

ड़ ही जिन्दगी को न निराश करो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

अपनी जिन्दगी को खुदा की अमानत बनाओं
कुछ प्रयास करो . कुछ प्रयास करो

चंद प्रयासों से सफलता नहीं मित्रती
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

अपनी कोशिशों को बेहतर से बेहतरीन करो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

खिलाओ फूल मुहब्बत के इस दुनिया को जन्नत कर दो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

अपने रिश्तों को घनिष्ट से घनिष्टतम करो
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

यूं ही क्‍यों रूठ जाए कोई . उसके चेहरे को मुस्कान से भर दो
कुछ प्रयास करो . कुछ प्रयास करो

अपने - पराये में क्यों उल्नझ कर जियें हम
कुछ प्रयास करो . कुछ प्रयास करो

एक दूसरे के गमों का हिस्सा क्‍यों न बनें हम
कुछ प्रयास करो , कुछ प्रयास करो

Saturday, 17 September 2016

गहरे अन्धकार में , आशा का सूरज बनकर देखो

गहरे अंधकार में आशा का सूरज बनकर
देखो

गहरे अन्धकार में आशा का सूरज .बनकर देखो
मन की आँखों से दुनिया की खूबसूरती ,निहारकर देखो

खुद को उस खुदा की नज़र में ,संवारकर देखो
इंसानियत की राह पर खुद को उस खुदा का ,चश्मों--चिराग
कर देखो

चांदनी रात में ढूंढ लेते हैं मं जिल सभी
अँधेरी राहों पर चलकर मंजिल का सफ़र ,तय कर देखो

कोशिशों को अपनी मंजिल का ,हमसफ़र कर देखो
लहरों के थपेड़ों में अपने आत्मविश्वास को अपनी ,धरोहर
कर देखो

किसी की वीरान जिन्दगी में कुछ पल  रोशन कर देखो
तसव्वुर में ही सही , किसी की जिन्दगी .रोशन कर देखो

निगेहबान है वो उस खुदा की राह पर ,चलकर देखो
जी रहे हैं जो असहायों की मानिंद , उन्हें दो पल की
ख़ुशी देकर देखो

किसी की खुशियों में शामिल्र हो ,खुशियाँ बांटकर देखो
खुदा के बन्दे हैं हम सब, उस खुदा पर ,एतबार कर
देखो

किसी की सिसकती साँसों को दो पल  की , ख़ुशी देकर
देखो
ये जिन्दगी है उस खुदा की नेमत , इसे खुदा के बन्दों
पर लुटाकर देखो

निगेहबान है वो उस खुदा की राह पर ,चलकर देखो
जी रहे हैं जो असहायों की मानिंद , उन्हें दो पल की
ख़ुशी देकर देखो

किसी की खुशियों में शामिल्र हो ,खुशियाँ बांटकर देखो
खुदा के बन्दे हैं हम सब, उस खुदा पर ,एतबार कर
देखो

किसी की सिसकती साँसों को दो पल  की , ख़ुशी देकर
देखो
ये जिन्दगी है उस खुदा की नेमत , इसे खुदा के बन्दों
पर लुटाकर देखो


डूब जाते हैं बीच मझधार - मुक्तक


डूब जाते हैं बीच मझधार - मुक्तक 

१.

डूब जाते हैं बीच मझघार, जिन्हें खुद पर एतबार नहीं
वो जिन्दगी भी क्या जिन्दगी , जिसे मादरे--वतन से प्यार नहीं

२.

चंद सिक्कों की खातिर , जो ईमान लुटा देते हैं
अपनी जिन्दगी को वो ;नासूर बना लेते हैं

3.

 मर मिटने का ज़ज्बा नहीं , जिनमे वतन की खातिर
उनका न कोई खुदा होता है, न कोई दोस्त यहाँ

4.

खुदा की राह जो चले उसे मंजिल हो नसीब
फिरे जो राह से खुदा की , तो जिन्दगी न मिले

5.

सुबह की ताजगी लाती है , जिन्दगी में रौनके - बहार
जो सुबह देर तक सोये, उसे जिन्दगी कहें क्या कहें

६.


किसी के बारे में बात करें ,तो कया बात करें
अपने ग़म से मिलाएं तो ,मिलाएं कैसे 

7.


फ़िक्र किसी और की मेरी जिन्दगी का ,हिस्सा हो जाए तो अच्छा हो
यूं ही लोगों के गम पीते जिन्दगी ;गुजर जाये तो अच्छा हो.

8.


शुक्रिया उस खुदा का , जिसने जहां बनाया
मकसदे - इंसानियत मेरी जिन्दगी का हिस्सा हो जाए तो अच्छा हो





गर सत्य ही सत्य है

गर सत्य ही सत्य है

गर सत्य ही सत्य है तो ,फिर झूठ से रिश्ता कैसा
गर सत्कर्म ही जीवन मर्म है , तो फिर दुष्कर्म से रिश्ता कैसा

'गर जन्नत जीवन का सुख, तो जहन्नुम से फिर नाता कैसा
गर खुदा ही एकमात्र सच तो ,माया मोह से रिश्ता कैसा

'गर सत्य जीवन मर्म तो ,असत्य से फिर रिश्ता कैसा
'गर नश्वर है यह तन तो ,विलासिता का बंधन कैसा

'गर आस्तिकता धर्म मर्म तो ,नास्तिकता से लगाव कैसा
'गर मानवता धर्म मूल तो ,आतंकवाद से रिश्ता कैसा

'गर मानव उत्कर्ष जीवन सत्य तो ,पराक्षाव से नाता कैसा
'गर न्याय मानव धर्म तो ,अन्याय से रिश्ता कैसा

गर  सादा जीवन परम सुख तो ,भौतिक जगत से रिश्ता कैसा
'गर स्वाभिमान जीवन मर्म तो ,अहंकार से रिश्ता कैसा

'गर भक्ति मोक्ष मार्ग तो ,माया मोह का बंधन कैसा
'गर सद्चिन्तन जीवन धर्म तो ,कुविचारों से नाता कैसा

गर मन की पावनता चरम सुख तो ,रिश्तों का फिर भय कैसा
'गर मन मंदिर हो जाए तो ,जीवन--मरण का फिर भय कैसा






एक छोटी सी जिन्दगी

एक छोटी सी जिन्दगी

इस छोटी सी जिन्दगी से , मुहब्बत कर नहीं रहे तो क्यूं
इस छोटी सी जिन्दगी को, नासूर कर रहे तो क्यूं

इस भौतिक जगत में , यूं ही विचर रहे तो क्यूं
खुद से आँखें मिला नहीं , पा रहे तो क्यूं

आध्यात्मिक जगत से रिश्ता , नहीं बना पा रहे तो क्यूं
रिश्तों की एक माला , पिरो पा नहीं रहे तो क्यूं

विलासिता के इस बवंडर से , बाहर आ पा रहे नहीं तो क्यूं
किसी के आंसुओं को अपना ,बना पा नहीं रहे तो क्यूं

एक अनजान मोड़ पर जिन्दगी को ,ला खड़ा किया तो क्यूं
अपने संस्कारों को अपनी अमानत ,बना  नहीं पा रहे तो क्यूं 

हम खुद को उस खुदा की ,निगाहों में गिरा रहे तो क्यूं
'किसी की ग़मगीन रातों में ,उजाला कर नहीं रहे तो क्यूं

नजरिया हमारा इतना विकृत ,हो गया तो क्यूं
चाहकर भी खुद को संवार ,नहीं पा रहे तो क्यूं

सत्कर्म को जीवन का हिस्सा ,बना पा नहीं रहे तो क्यूं
'जिए जा रहे, बस जिए जा रहे , बस जिए जा रहे तो क्यूं

कुछ ज्यादा की चाह में , सब कुछ लुटा रहे तो क्यूं
जनाब , जिन्दगी को जहन्नुम  ,किये जा रहे तो क्यूं

खुदा की दी हुई नायाब , जिन्दगी पर एतबार कर
खुद को बुलंद कर, खुदा की निगाहों में खुद को चश्मो -- चराग कर







Tuesday, 13 September 2016

करता हूँ सजदा पेश ऐ मेरे खुदा


 करता हूँ सजदा पेश ऐ मेरे खुदा

करता हूँ सजदा पेश ऐ मेरे खुदा
क़ुबूल करना इलत्ज़ा मेरी ऐ मेरे खुदा
सजा दे मेरे ख़्वाब ऐ मेरे खुदा
मुसीबतों से रखना बचाकर ऐ मेरे खुदा

तुझ पर करूँ कुर्बान खुद को ऐ मेरे खुदा
तेरी करूँ इबादत मैं ऐ मेरे खुदा
मुझ पर हो करम तेरा ऐ मेरे खुदा
अरमान मेरे पूरे करना ऐ मेरे खुदा

मुझको अपनी अमानत करना ऐ मेरे खुदा
आगोश में तेरी गुजरे मेरी जिन्दगी ऐ मेरे खुदा
मुझको अपना शागिर्द बना ले ऐ मेरे खुदा
तेरे करम, तेरी इनायत से वाकिफ हूँ ऐ मेरे खुदा


एतबार है तुझ पर , मुझको ऐ मेरे खुदा
रोशन हो मेरी दुनिया , एक तुझसे ऐ मेरे खुदा
तेरे दर पर आ गया हूँ मैं मेरे खुदा
आजमाइशों के दौर से बचाना मुझको ऐ मेरे खुदा

मुझको अपना बना ले ऐ मेरे खुदा
ग़ज़ल हो जाए जिन्दगी मेरी ऐ मेरे खुदा
इंसानियत की राह पर ले चल ऐ मेरे खुदा
मेरी जिन्दगी को अपनी अमानत कर ऐ मेरे खुदा

मुझे क़दमों की जरूरत नहीं , मेरे पास पंख जो हैं


मुझे क़दमों की जरूरत नहीं

मुझे क़दमों की जरूरत नहीं , मेरे पास पंख जो हैं
मुझे दोस्तों की जरूरत नहीं , मेरे पास पुस्तकें जो हैं

मुझे किसी का भय नहीं , मेरे साथ भगवान् जो है
मुझे खाली रहना पसंद नहीं , मुझे व्यस्त रहना पसंद जो है

मुझे कविताओं के लिए विषयों का अभाव नहीं, मेरे पास अथाह कल्पना शक्ति जो है
जीवन मेरा अभावों का साथी क्यों हो, मेरे पास विचारों की पूँजी जो है

मैं क्यों भटकूँ यहाँ से वहां, मेरी निगाहें मंजिल पर जो हैं
मुझे अकेलापन भाता है बहुत, मेरे पास चिंतन के विषय जो हैं

मुझे भंवरों के गुंजन से लगाव नहीं, मेरे चिंतन मन में विचारों का अथाह गुंजन जो है
मुझे असामाजिक कृत्य व्याकुल करते हैं बहुत, मेरा मन अथाह मानवीय संवेदनाओं का सागर जो है


मानवीय संवेदनाओं को लेकर  व्याकुल हो जाता हूँ बहुत,  दिल के किसी कोने में संवेदशील होने का दर्द पाले हुए हूँ मैं
मुझे बाह्य आडम्बरों से लगाव नहीं, अपनी संस्कृति एवं संस्कारों से खुद को पोषित किये हुए हूँ मैं

मुझ पर आधुनिकता का प्रभाव पड़ता नहीं , स्वयं को आदर्शों की डोरी से बांधे हुए हूँ मैं
मेरा मन चंचलता धारण नहीं करता, मुझे शांतिप्रिय वातावरण से लगाव जो है

मुझे विषय व्याकुल नहीं करते, स्वयं को अनुशासन की डोरी से बांधे हुए हूँ मैं
मुझे बड़ों के आशीर्वाद की पूँजी से सरोकार है बहुत, जीवन को संस्कारों की पूँजी किये हूँ मैं