लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 30 May 2021

नारी हूँ मैं , देह नहीं हूँ

 नारी हूँ मैं , देह नहीं हूँ 


नारी हूँ मैं , देह नहीं हूँ आनंदमयी चेतना हूँ 

मैं मात्र शरीर नहीं हूँ, मोक्ष का आधार हूँ 


मैं करुणा और प्रेम का समंदर हूँ 

मैं संस्कृति और संस्कारों का विस्तार हूँ 


 मुझसे ही रोशन होता है मुहब्बत का समंदर 

मैं ही वात्सल्य और प्रेम का विस्तार हूँ 


मेरे वजूद से ही , इस दुनिया का वजूद है 

मैं ही नवजीवन की ओर अग्रसर करती हूँ 


मैं ही जीवन हूँ , जीवन का आधार हूँ 

मैं जब अलंकृत होती, तब समाज का विस्तार हूँ 


मुझसे ही प्रेम का आगाज है , जीवन का विस्तार है 

समंदर की लहरों में , हौसलों की पतवार हूँ 


बचपन को पोषित करती है जो, मैं वह करुणामयी अवतार हूँ 

पापियों का जो संहार करे , मैं वो काली का अवतार हूँ 


नारी हूँ मैं , देह नहीं हूँ,  मैं जगत अस्तित्व का आधार हूँ 

मुझसे पोषित होता है धर्म, मैं धर्म का विस्तार हूँ 


नारी हूँ मैं , देह नहीं हूँ आनंदमयी चेतना हूँ 

मैं मात्र शरीर नहीं हूँ, मोक्ष का आधार हूँ 


मैं करुणा और प्रेम का समंदर हूँ 

मैं संस्कृति और संस्कारों का विस्तार हूँ 

Saturday, 29 May 2021

मुक्तक

१.


जब तुम्हारा  अन्धकार, भक्ति रुपी मार्ग से मिटने लगे

जब तुम स्वयं को प्रभु का सेवक समझने लगो

जब तुम असीम शांति का अनुभव करने लगो

समझना तुम पर देवों की असीम अनुकम्पा है

२.

जब देवालय तुम्हारी लालसाओं पर विराम लगाने लगें

जब देवालय तुम्हारे मन में भक्ति भाव जगाने लगें

जब देवालय तुम्हें मोक्ष मार्ग बतलाने लगें

तुम यह मानकर चलना तुम्हारी भक्ति उस परमेश्वर को
स्वीकार्य है

3.

जब देवालय तुम्हारे प्रयोजन सिद्ध करने लगें 

जब तुम पर देव पुष्प बरसाने लगें

जब तुम पर से ग्रहण रुपी बादल छंटने लगें 

तुम महसूस करना तुम उस परमेश्वर के प्रिय हो
गए हो

4.

निर्मल जो तेरे भाव हो जाएँ

आसक्ति जो प्रभु में तेरी हो जाए

प्रकृति का हर कण जब तुझे भाने लगे

ये समझो तुम्हारे मन में प्रभु का वास है

5.

जब मन से कुटिल भावों का अंत होने लगे

जब सुविचारों की निर्धनता समाप्त होने लगे

जब ग्रीष्म में भी तुम्हें शीतलता महसूस होने लगे

तुम महसूस करोगे हृदय की पावनता को




६.

जब तेरे कष्ट समाप्त होने लगें

जब तू स्वयं को दूरद्रष्टा  महसूस करने लगे

जब तू अपनी तकदीर पर नाज़ करने लगे

तुम ये मान लेना तुम उस परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति हो


मुक्तक

 

१.

खामोश जुबां की अपनी जुबान होती है

बिना कहे भी बहुत कुछ कह जाती है


२.

वो महसूस तो करते होंगे, मेरे दर्द -
दिल की आवाज़

यूं ही नहीं कोई , किसी से ख़्वाबों में
रूबरू होता

3.


उसके दिल की धड़कन को मैं आज भी
करता हूँ महसूस

उसे दिल की गहराइयों से चाहा था
मैंने एक रोज


4.



किसी के दर्द को अपना बना लूं तो
अच्छा हो

किसी रोते हुए को दो पल के लिये
हँसा लूं तो अच्छा हो

Thursday, 27 May 2021

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम - गीत

 छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम - गीत  


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 

जी लेंगे  हम , सह लेंगे  हम 


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


बांटेंगे खुशियाँ , चुरा लेंगे गम 

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


रिश्तों का एक कारवाँ , सजा लेंगे हम 

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


तेरे हो लेंगे खुदा, अपना बना लेंगे हम 

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


जिन्दगी छोटी ही सही , तुझ पर लुटा देंगे हम 

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 


छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम 

छोटी - छोटी खुशियाँ , छोटे - छोटे गम  


मौसम ने ली अँगड़ाई है

 मौसम ने ली अँगड़ाई है

मौसम ने ली अँगड़ाई है
घनघोर घटा छाई है

मौसम सुहाना हो गया
ये दिल दीवाना हो गया

बारिश की झमाझम बूंदों से
प्रेम का पंछी मतवाला हो गया

कि मैं भीगा कि वो भीगे
ये समां सुहाना हो गया

ठंडी – ठंडी बयार ने
मुझको दीवाना कर दिया

वो कुछ सकुचाये , कुछ मुस्काये
बारिश ने उनको भी दीवाना कर दिया

प्रकृति की हर छटा खिल उठी
पंछियों का सफ़र सुहाना हो गया

बादलों का गड़गड़ – गड़गड़ करना
प्रेम का फ़साना हो गया

प्रकृति का रोम – रोम भीगा
बारिश का बहाना हो गया

नई – नई कोपलों से
अद्भुत नजारा हो गया

मैं भी भीगूँ तुम भी भीगो
मौसम सुहाना हो गया

बारिश की बूंदों से
कण – कण मतवाला हो गया

पीर दिल की मिट गयी
हर कोई दीवाना हो गया

पिछली बारिश याद आई
दिल मस्ताना हो गया

प्रकृति का रोम – रोम
बारिश से खिल उठा

बादलों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा
बारिशो के गीतों का मौसम सुहाना हो गया

मौसम ने ली अँगड़ाई है
घनघोर घटा छाई है

मौसम सुहाना हो गया
ये दिल दीवाना हो गया


अंदाज़े - शायरी

 १.


मैं अक्सर उसकी गली के चक्कर लगाया करता हुँ

खुली जुल्फों के साथ उसे खिड़की के करीब पाया

करता हूँ

जब दीदार नहीं होता है, मैं उदास हो जाया करता हूँ

ये मेरा जुनून-ए--आशिकी है, मैं उसकी गली के

चक्कर लगाया करता हूँ


२.

इकबाल मेरा भी बुलंद हो आहिस्ता--आहिस्ता

इंतज़ार मेरा भी ख़त्म हो आहिस्ता--आहिस्ता

उन्हें भी मुझे इश्क हो जाए आहिस्ता- आहिस्ता

जिन्दगी में मेरी भी बहार आ जाए आहिस्ता-- आहिस्ता

Monday, 24 May 2021

मुक्तक


 शायरी का एक खुशनुमा दौर हुआ था रोशन , हिन्दुस्तान में 

" ग़ालिब " शायरों की महफ़िल में गुलाब बन महका 


लैला - मजनू , हीर - रांझा , सोहनी - महिवाल थे मुहब्बत के निशाँ 

" ग़ालिब "मुहब्बत के चाहने वालों की महफ़िल में गुलाब बन महका 



जय गोविंदा जय गोपाला - भजन

 जय गोविंदा जय गोपाला 


जय गोविंदा जय गोपाला 

कृष्ण मुरारी बांसुरी वाला 


कृपा करो हे कृपा करो हे 

कृपा करो हे दीनदयाला 


हे गिरधर हे वंशीधर 

हे दीनों  के पालनहारा 


पीर हरो प्रभु, पीर हरो प्रभु 

कष्ट हरो प्रभु दीनदयाला 


तुझ पर हम बलि - बलि जाएँ 

पावन कर दो जग उजियारा 


चिंतन द्वार करो प्रभु रोशन 

आध्यात्म से हो जीवन में उजाला 


प्रेममय मूर्ति हो जाए जीवन 

राधा संग कान्हा ब्रजवाला 


जीवन मरण प्रभु तेरी धरोहर 

मुक्त करो हे दीनदयाला 





तू जिन्दा है तो , जिन्दगी की जीत में यकीन कर

 तू जिन्दा है तो , जिन्दगी की जीत में यकीन कर 


तू जिन्दा है तो , जिन्दगी की जीत में यकीन कर 

प्रयासों की गंगा बहा दे, मंजिल में यकीन कर 


मिलेगी तुझको भी मंजिल, दो कदम तो चल 

कोशिशों का एक कारवाँ कर रोशन , खुद पर यकीन कर 


उस खुदा की नायाब धरोहर है तू, तुझे हो एहसास 

क्यूं कर बिखर जाएँ ये अनमोल मोती, उस खुदा पर यकीन कर 


चंद उपवन कर रोशन , इस कायनात को सजाने के लिए 

तेरी जिन्दगी इस कायनात की अमानत है , इस पर यकीन कर 

 

जीत लेगा तू हर एक जंग, हौसलों के दम पर 

खुद पर भरोसा है तो कोशिशो  पर यकीन कर 


किसी की स्याह रात में , रौशनी का उजाला करके तो देख 

इंसानियत  की राह , उस खुदा की राह , इस पर यकीन कर 


उस खुदा की राह पर चलने से रोशन होती है सबकी दुनिया 

इबादत का एक कारवाँ हो रोशन , इस पर यकीन पर 


किसी के दिल की पीर को , अपने दिल की पीर समझ 

उस खुदा की शागिर्दगी नसीब होगी तुझे, इस पर यकीन कर 


कोरोना की अजब मार है

 कोरोना की अजब मार है 


कोरोना की अजब मार है 

हर सांस हुई बेजार है 


सूझती नहीं राह किसी को 

कैसी अजब कुदरत की मार है 


बुजुर्ग तो बुजुर्ग 

अब युवाओं पर भी इसकी मार है 


अजब पीड़ा का दौर ये 

लाशों की भरमार है 


दो गज जमीन का अभाव है 

अजब कोरोना की मार है 


तड़पती साँसों का 

समंदर हो गयी ये धरा 


पेड़ों की शाखाएं ढो रहीं 

 जीवित आत्माओं का बोझ 


इन जीवित आत्माओं को अपने 

मोक्ष का इंतज़ार है 


झूठ का पुलिंदा होती राजनीति की भी 

जनता पर अजब मार है 


गली - चौराहों पर तड़पती 

जिंदगियों का अंबार है 


लुटेरों का अजब बोलबाला है 

नकली दवाइयों ने भी छीना जिन्दगी का निवाला है 


नेता करते एक दूसरे पर वार 

जनता की जिन्दगी के साथ ये कैसा छलावा है 


कोरोना की अजब मार है 

हर सांस हुई बेजार है 


सूझती नहीं राह किसी को 

कैसी अजब कुदरत की मार है