लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 15 June 2020

कहाँ गए वो लोग


कहाँ गए वो लोग

कहाँ गए वो लोग, वतन पर जान दिया करते थे
कहाँ गए वो लोग, मातृभूमि पर न्योछावर हो जाया करते थे

कहाँ गए वो लोग, जो देशभक्ति का ज़ज्बा जगाया करते थे
कहाँ गए वो लोग, जो मानवता को धर्म कहा करते थे

कहाँ गए वो लोग, पीर पराई को अपनी पीर कहा करते थे
कहाँ गए वो लोग, जो देश सेवा को धर्म कहा करते थे

कहाँ गए वो लोग, जिनकी कलम देश पर मर मिटा करती थी
कहाँ गए वो लोग, जो मातृभूमि पर गर्व किया करते थे

कहाँ गए वो लोग, जिन्होंने भारत माँ का मान बढ़ाया करते थे
कहाँ गए वो लोग, अपनी जवानी देश के नाम लिख दिया करते थे



कोरोना


कोरोना

कोरोना की इस भयावह त्रासदी के समंदर में डूबे करोड़ो मजदूर
कोरोना की इस महात्रासदी में मैंने  , इंसानियत को तार  - तार होते देखा

दो वक़्त की रोटी की आस लिए और अपनों से बिछुड़ने का गम
बिलखते भूख से मजदूर, आँखों में आंसू हज़ार देखा

कोसों पैदल चलने की पीड़ा से उन्हे नहीं था गुरेज़
सड़क पर ट्रकों तले रौंदते , ट्रेन से कटते मैंने बार  - बार देखा

मुसीबत के इस दौर में थी उन्हें जिन नेताओं से आस
किसी नेता को क्रिकेट, किसी को पोलो खेलते मैंने बार  - बार देखा

बिखर गए सपने , बिखर गयीं सभी आशाएं
राजनीति के ठेकेदारों के चेहरे पर , बेशर्मी मैंने हज़ार बार देखा

वोट देकर जिन्हें समझा था , अपने उज्जवल भविष्य का हमसफ़र
ऐसे नेताओं द्वारा मानवता का चीरहरण मैंने बार  - बार देखा

नन्ही  - नन्ही जान चली जा रही थी सड़क पर , न खाना न पानी
चीख पुकार का ये आलम मैंने हज़ार बार देखा

भयावह पीड़ा से गुजर रहे थे मजदूर और उनका परिवार
बिलखते बच्चे और उनकी आँखों में आंसुओं का समंदर हज़ार  - हज़ार देखा

चलती रही वो कोख में अपनी आशाओं का दीपक लिए
सड़कों पर नवजात की चीख का मंजर मैंने बार  - बार देखा

पड़ रहे थे डंडे फिर भी चले जा रहे थे घर पहुंचने की आस लिए
पुलिस वालों का अपने डंडे के प्रति इतना प्यार मैंने पहली बार देखा

मंजिल की चाह जिन्दगी


मंजिल की चाह जिन्दगी  
  
मंजिल की चाह जिन्दगी
क़दमों का रुक जाना जिन्दगी नहीं

कोशिशों का कारवाँ है जिन्दगी
थक कर हार जाना जिन्दगी नहीं

सपनों का समंदर रोशन करना जिन्दगी
सपनों का बिखर जाना जिन्दगी नहीं

मंजिल की आस हो जिन्दगी
मंजिल से पहले ठहर जाना जिन्दगी नहीं

खुशियों का एक कारवाँ हो जिन्दगी
चंद ग़मों से डर जाना जिन्दगी नहीं

खुद पर एतबार का माद्दा है जिन्दगी
विश्वास का डगमगा जाना जिन्दगी नहीं

अपने हौसलों को अपनी धरोहर बनाना जिन्दगी
मंजिल से पहले हौसलों का टूट जाना जिन्दगी नहीं

समंदर की लहरों से दोस्ती जिन्दगी
समंदर की लहरों से घबरा जाना जिन्दगी नहीं

अपनी मुस्कराहट को अपनी धरोहर बनाना जिन्दगी
चंद ग़मों से घबरा जाना जिन्दगी नहीं

इंसानियत का ज़ज्बा बरकरार रखना जिन्दगी
उस खुदा की नज़र में गिर जाना जिन्दगी नहीं



कुदरत की अनुपम कलाकृति हैं हम


कुदरत की अनुपम कलाकृति हैं हम

कुदरत की अनुपम कलाकृति हैं हम
पंचतत्वों से निर्मित एक परिपूर्ण मूर्ति

स्वयं के उद्धार की संस्कृति से संस्कारित
मुक्तिपथ के ज्ञान बोध से भिज्ञ

सत्यम शिवम् सुन्दरम के सत्य से आल्हादित
साकार ब्रह्म स्वरूप अवतार हैं हम

स्वयं को संयमित करने की असीम ऊर्जा से ओतप्रोत
कुदरत का अनुपम उपहार हैं हम

तूफाँ में भी आशा का दीपक रोशन कर लेते हैं हम
गिरते हैं , सँभलते हैं उठकर फिर बढ़ चलते हैं हम

हारने की पीड़ा की जद्दोजहद में नहीं फंसते
एक नए आशियाँ की  तलाश में अग्रसर हो लेते हैं हम

क्यूं कर न करें एहसास  स्वयं के अस्तित्व का
स्वयं की खोज का उद्देश्य लिए जी रहे हैं हम

खुदा है परमात्मा है इस एहसास को महसूस करने की आरज़ू है हमारी
खुद को आध्यात्मिकता की राह पर लिए जा रहे हैं हम

कुदरत की नेमत , कुदरत का अनमोल उपहार है  हम
खुद को पिरो लेते हैं संस्कारों की माला में हम

हर एक शख्स उस खुदा का नूर और उसकी शख्सियत का एहसास
सच कहें तो पूरी की पूरी कुदरत और उसका एकमात्र सत्य हैं हम


पिघलते बादलों का इंतज़ार है मुझे


पिघलते बादलों का इंतज़ार है मुझे

पिघलते बादलों का इंतज़ार है मुझे
भीगती बयार का इंतज़ार है मुझे

सजाये हैं प्रकृति से , आलिंगन के सपने
बादलों के बरसने का , इंतज़ार है मुझे

भिगूंगा मैं और भीगेगा, मन का हर एक कोना
झर  - झर करते  झरनों  का , इंतज़ार है मुझे

प्रकृति  के नजारों से कर लूंगा , भाव विभोर खुद को
पुष्पों के संवरने का , इंतज़ार है मुझे

खुद को पावन करने की आस लिए जी रहा हूँ मैं
पावन सलिला के कल  - कल करने का इंतज़ार है मुझे

प्रकृति के मनोरम दृश्यों से पोषित करने की चाह लिए दिल में
वसंत के आगमन का , इंतज़ार है मुझे

जीवन को पूर्णतः जीने की आस में
एक खुशनुमा सुबह का , इंतज़ार है मुझे

मेरी जिन्दगी कुदरत की नायाब कलाकृति हो जाए
जिन्दगी के जीवन के सत्य से गुजरने का , इंतज़ार है मुझे

आयेंगे एक दिन सब माथा तुझे झुकाने


आयेंगे एक दिन सब माथा तुझे झुकाने

आयेंगे एक दिन सब माथा तुझे झुकाने
हर लेना पीर सबकी, आयेंगे तुझे मनाने

इस त्रासदी में प्रभुजी, द्वार बंद कर दिए हैं तूने
आरती करेंगे सब मिल, आयेंगे तुझे मनाने

कोरोना की इस त्रासदी ने,बहुत कुछ हमें सिखाया
डॉक्टर बन प्रभु तू ज़मीं पर आया

किस्से तेरे करम के , जानते सभी हैं
तूने ही आदमी को , घर एक मंदिर बताया

गरीबों की सुधि लेना, उनका रहबर होकर
तेरे दर पर आयेंगे वो सब माथा झुकाने

माँ को बेटे से, भाई को बहन से मिला दो
रिश्तों को तू मिला दे , आयेंगे माथा झुकाने

तू अज़ीज़ है सबको, सब पर है तेरी रहमत
इस कोरोना मुसीबत से , आजा हमें बचाने

तेरी हर एक सजा को , सर माथे रखा है हमने
बच्चे हैं सारे तेरे, आजा गम मिटाने

तुझ पर एतबार की , सीमा नहीं हमारी
हर लेना पीर सबकी , आयेंगे माथा झुकाने

किस्सा  - ए  - इंसानियत , ज़िंदा ज़मीं पर
बहते हज़ारों आंसुओं को , आजा तू हंसाने

Sunday, 31 May 2020

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है


थोड़ा है थोड़े की जरूरत है

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है
पीड़ा है मरहम की जरूरत है

सपने हैं आसमां की जरूरत है
मंजिल है साहिल की जरूरत है

रिश्ते हैं अपनेपन की जरूरत है
मिलते हैं चाहत की जरूरत है

गीत है संगीत की जरूरत है
मीत है प्रीत की जरूरत है

किस्से है किरदार की जरूरत है
खिलते हैं खुशबू की जरूरत है

कहते हैं कहने की जरूरत है
अन्धेरा है उजाले की जरूरत है

खोया है पाने की चाहत है
जीवन है जीने की जरूरत है

कहना है सुनने की जरूरत है
रोता हूँ हंसने की चाहत है

संगीत है सुनने की जरूरत है
हंसता हूँ खिलने की चाहत है
संभालता हूँ जीने की चाहत है
हौसला हूँ जीतने की चाहत है


जानो है अपने गाँव


जानो है अपने गाँव

जानो है अपने गाँव रे भैया, जानो है अपने गाँव रे
जा शहर ने न प्रीत निभाई  का से करूँ मै प्रीत रे भैया

जानो है अपने गाँव रे ....................

सरकार की दिखे उदासी, अँखियाँ रोवें प्यासी  - प्यासी
कारोबार की नहीं है छाँव रे भैया , काम को हो रहो अभाव रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................

कूटनीति चल रहे हैं नेता , हमको झोंको सड़क पर
रेलगाड़ी चलती पटना को, पहुंचे बनारस रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................
खाने को न मिले है भोजन , पीने को नहीं पानी
अजब मुश्किल पडी है जिन्दगी , रोवे है जिंदगानी रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................

सपने अब सब हुए पराये, तन पटरी पर बिखरे
इंसानियत भी आंसू बहाए , गरीबन की आँखों से छलके रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................

मटर पनीर की चाह नहीं है , रूखा – सूखा कुछ मिल जाए
सरकारी रसोई का पता बता दो , भूख मिटा लें  भैया

जानो है अपने गाँव ...................

दुबके नेता घर में सारे , मौत का भय है सताए
नेतागिरी पर ख़तरा कैसा , जो धर्म की चाबुक चलाये रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................

मेरी माँ मेरी राह देखती , बहना करती इंतज़ार
चलनो है कई सौ कोस , पैरन छालों के साथ रे भैया

जानो है अपने गाँव ...................