लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 4 February 2019

तुम हमेशा ही मेरे हुए


तुम हमेशा ही मेरे हुए

तुम हमेशा ही मेरे हुए
इस विचार को अपने ही भीतर
संजोये रहा हूँ मैं

जीवन समर में
प्रेम आलिंगन बन उतरी
उस प्रेयसी को संबोधित
करते हुए
उसके व्यक्तित्व का
अवलोकन कर रहा हूँ

उस एक कमरे में
जो बारिश में
जगह – जगह से
टपकता था
उसमे गुजारे अन्तरंग पल
आज भी तुम्हें मेरी होने का
एहसास कराते हैं

घर में नन्ही परी का आगमन
झूम उठा था मेरा तन – मन
तब भी लगा था तुम मेरी हो

यह सिलसिला
 हमारे एक होने का
अनवरत चलता ही रहा

फिर एक और नन्ही परी
फिर एक प्रिंस का आगमन
इसी बीच उस “घोंसले रुपी”
आशियाने में बिठाये पल 

एक साइकिल पर चार सवार
तब भी तुम मेरी ही थीं

बच्चों के प्रति लगाव
उनके खिलोनों का रख रखाव
उनके पेन , पेंसिल , किताबें
सब कुछ संयोजित सा था

मेरा टूर पर जाना
तुम्हें पसंद न था
संभलकर ट्रेन पर चढ़ना
देखकर सड़क पार करना
समय पर खाना खाना
समय पर सोना आदि  - आदि
काफी था ये एहसास दिलाने के लिए
कि तुम मेरी सच्ची प्रेयसी हो

वो आशियाँ भी तो
हमारी जद्दोजहद और आपसी
समझ का ही प्रतीक था
जिसे हमने अपनी मुहब्बत
की निशानी बना दिया

मुझे आज भी याद है
मेरी पहली कविता “ सत्य “
इस कविता पर तुम्हारे विचारों ने
अनवरत लिखते रहने के लिए
मुझे ऊर्जा और प्रेरणा दी थी  
आज लेखन मेरा कर्म बन
निखर रहा है
उस वक़्त तुमने
मेरी कलम का साथ दिया
आज भी याद है मुझे

धर्म और कर्म के प्रति आस्था की
पुण्यमूर्ति बन
मेरे जीवन में उतरीं
आलोकित कर दिया
तुमने मेरा रोम – रोम

आज जिस मुकाम पर हूँ
 उसका श्रेय तुम्हें न दूं तो और किसे
तुम्हारा सत्कर्म की ओर
प्रेरित करने का ज़ज्बा
हमेशा हे मुझे सराहनीय लगा

तुम्हारा स्पर्श आज भी मुझे
रोमांचित करता है
तुम्हारा आलिंगन मुझे बार  - बार
जीवंतता प्रदान करता है
और हो भी क्यूं न
तुम मेरी प्रेयसी जो हो

होम मिनिस्टर , फाइनेंस मिनिस्टर
भी तो तुम्हीं हो
कहूं तो गृहलक्ष्मी हो तुम
मेरे जीवन का संगीत हो तुम
मेरे जीवन की पूर्णता हो तुम
मेरा घर मेरा संसार हो तुम
मेरे जीवन का विस्तार हो तुम
तुम हमेशा ही मेरे हुए , मेरे हुए , मेरे हुए .........


कुटिल , धूर्त , दुर्जन , अधम से परहेज करो


कुटिल , धूर्त , दुर्जन , अधम से परहेज करो

कुटिल , धूर्त , दुर्जन, अधम से परहेज करो
उत्थान, उन्नयन, विकास सिर माथे धरो

कोकिल, कोकिला, कलकंठी सी वाणी वारो
निपुणता, चातुर्य, प्रवीणता सर माथे धरो

नीरज, अम्बुज, जलज, पंकज सा पावन रहो
वाटिका, उपवन, कुसुमाकर से महके रहो

घमंड, अभिमान, दर्प, दंभ से परहेज करो
निर्मल, पुण्य, पावन विचारों से खुद को महकाए रहो

नीरद, वारिद, मेघ, जलधर सा जीवन अमृत बरसाए रहो
प्रणय , स्नेह , अनुराग अपने जीवन कण  - कण में समाये रहो

माथा, ललाट, भाल, शीश को विशाल करो
मोक्ष, निर्वाण, सद्गति को जीवन का उपहार करो

मानव, मनुज, नरदेही, मनुपुत्र सा व्यवहार करो
पुष्पराज , महक, खुशबू सा खुद को महकाए रहो

कुटिल , धूर्त , दुर्जन, अधम से परहेज करो
उत्थान, उन्नयन, विकास सिर माथे धरो



आँखें न हों


आँखें न हों

ऑंखें न हों , पर निगाह हो
साहस न भी हो पर
बहुत सी उम्मीदें हों
पंख न भी हों पर
आसमां पर उड़ने की चाह हो

मंजिल का भान न भी हो
पर सपने अपार हों
गीत न भी हों जुबां पर
गुनगुनाने की चाह हो

ज़ज्बा न हो दिल में फिर भी
मर  - मिटने की चाह हो
कलम चाहे टूटी हो तेरी
पर लिखने की चाह हो

दिल में निराशा अपार हो
पर जीने की चाह हो
मिल जायेगी मंजिल तुझको
गर तुझे खुद पर विश्वास हो

चीर देगा तू तूफानों का सीना
गर हाथ जोश की पतवार हो
ऑंखें न हों , पर निगाह हो
साहस न भी हो पर
बहुत सी उम्मीदें हों
पंख न भी हों पर
आसमां पर उड़ने की चाह हो




मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें


मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें

मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें
चरितार्थ करने ही होंगे मुझे अपने सपने

मंजिल के चरम को छूना ही होगा मुझको
आखिर मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें

रोशन करना ही होगा अपना आशियाँ मुझको
चीरकर अन्धकार को आगे बढना ही होगा मुझको

अपने पंखों को एक खुला आसमां देना ही होगा
आखिर मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें

पानी ही होगी मंजिल अपने प्रयासों के बूते
कोशिशों का एक समंदर सजाना ही होगा मुझको

अपनी हर एक कोशिश को दिखानी होगी सच की राह
आखिर मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें

खुद को खुद का खैख्वाह बनाना ही होगा मुझको
“ एकला चलो ” ये गीत गुनगुनाना ही होगा मुझको

अपने सपनों का , अपनी कोशिशों का एक महल सजाना ही होगा मुझको
आखिर मुझे खुद से हैं बहुत सी उम्मीदें




एक अनजान साया


एक अनजान साया


एक अनजान साया जिसने
बींध दिया मेरे सुस्वप्न को
क्यों कर मिला था उसे
मेरे घर का ही दरवाज़ा

स्वयं को कैद कर लिया मैंने
एक बंद कमरे में
एक अजीब सी कसक का
साथ लिए जी रहा हूँ मैं

बाध्य था यह सोचने को
क्यूं कर लोग दूसरो के
आंसुओं पर अपनी खुशियों का
महल तराशा करते हैं

क्यूं कर उनकी आत्मा
उनके इस कुटिल खेल का
साथ देती

मुझे जगाना ही होगा खुद को
मुझे बाहर निकलना ही 
होगा

उस बंद कमरे से
अपने भीतर साहस का
एक समंदर रोशन करना होगा
उस घने काले साए का
सामना करना होगा

उस कुटिल सोच से
पोषित प्राणी को
सत्य का बोध
कराना ही होगा

चीरना होगा तम को
कमरे से बाहर के प्रकाश से
आँख मिलाना ही होगा
मुझे स्वयं को
बलशाली बनाना ही होगा

क्यूं कर सह जाऊं मैं
उस कुटिल सोच का परिणाम
मुझे आशा का एक दीपक
जलाना ही होगा, जलाना ही होगा


कोमल पंखुड़ियों में


कोमल पंखुड़ियों में

कोमल पंखुड़ियों में
जागता है
जिन्दगी का सपना
एक एहसास जो ले जाता
नवजीवन की ओर

पुष्प खिलते हैं , बातें करते हैं
महकते हैं , चेहकते हैं
प्रफुल्लित कर ले चलते हैं
नवजीवन की ओर

हमसे बहुत कुछ
 बयाँ करते हैं पुष्प
उनकी महक
बहुत कुछ कहती हमसे
एहसास करो
नई जिन्दगी का
और बढ़ चलो
नवजीवन की ओर

पुष्पों से सुशोभित
एक उपवन
अनाया स ही अपनी ओर
आकर्षित कर लेता है
जीवन राग खुशबूमय हो जाता है
और स्वयं ही अग्रसर हो जाता है मानव मन
नवजीवन की ओर