लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Saturday, 3 November 2018

इस नाचीज़ का आदाब क़ुबूल कर मौला


इस नाचीज़ का आदाब क़ुबूल कर मौला


इस नाचीज़ का आदाब क़ुबूल कर मौला
तेरी इबादत को मेरी आरज़ू कर मौला

अपने करम से मुझको आलिम कर मौला
अपने करम का इज़हार कर मौला

मेरे आशियाँ को अपना आशियाँ कर मौला
मुसीबतों के दौर से निज़ात दे मौला

मेरी आरज़ू  -   - इबादत को अपनी इजाज़त अता कर मौला
मुझको अपने दर का चराग कर मौला

मेरे प्रयासों को दिशा दे मौला
अपनी खुशबू से मेरा आशियाँ रोशन कर मौला

तेरे दर को मेरा सलाम क़ुबूल हो मौला
इस नाचीज़ को अपना शागिर्द कर मौला

तेरे करम से जी रहा हूँ मौला
इस नाचीज़ का तुझ पर एतबार बरकरार हो मौला

इस मुसाफिर को राह दिखा मौला
मेरी इबादत क़ुबूल कर मौला

Thursday, 1 November 2018

पेड़ लगाएं


 पेड़ लगाएं

गली  - गली और नगर  - नगर
चलो पेड़ लगाएं सब मिलकर

आओ सब मिलकर पेड़ लगाएं
धरती का आँचल सजाएं

रोशन हो हर कोनाकोना
धरती हो जाए एक बिछौना

धरती हो जाए एक उपवन
आओ पेड़ लगाएं सब मिलकर

पेड़ों की है महिमा न्यारी
देते छाँव और हरियाली

श्रृंगार करें इस धरती माँ का
करते पुष्पित  ये सबका जीवन

पेड़ों से फलफूल हैं मिलते
खिलते हैं आँगन , नगर हैं खिलते

चन्दन की खुशबू से महकते
जीवन सबका रोशन करते


द्वारा

अनिल कुमार गुप्ता
पुस्तकालय अध्यक्ष 
केंद्रीय विद्यालय फाजिल्का
वर्तमान के वी सुबाथू 



Wednesday, 24 October 2018

इंसानियत के रखवालों का अकाल हो गया


इंसानियत के रखवालों का अकाल हो गया

इंसानियत के रखवालों का अकाल हो गया
दमन करने वालों का रूप विकराल हो गया

इंसानियत अपनी किस्मत पर बहा रही है आंसू
खुदा के चाहने वालों का जीना मुहाल हो गया

मदमस्त जवानी से भरे गीतों पर थिरक रहे हैं लोग
सुरीले गीतों से सजे उपवन का अकाल हो गया

नेताओं को राजगद्दी से हो गया है मोह
देश पर मरने वाले नेताओं का अकाल हो गया

“डीजे वाले बाबू “ गीत पर थिरक रहे नर और नारी
मंदिरों में भक्तों का अकाल हो गया

वक़्त बेवक्त की ये पार्टियां और ये मस्ती
उम्र का अंतर घटा , संस्कारों का अभाव हो गया

टूटते और भटकते रिश्तों से पट रही दुनिया
संबंधों में सामाजिकता का अभाव हो गया

बिखर रहे परिवार, भटकती सी जवानियाँ
इस युवा पीढ़ी पर , पाश्चात्य का प्रभाव हो गया

इंसानियत के रखवालों का अकाल हो गया
दमन करने वालों का रूप विकराल हो गया





उस खुदा की इबादत के गीत गुनगुनाएं चलो


उस खुदा की इबादत के गीत गुनगुनाएं चलो


उस खुदा की इबादत के गीत गुनगुनाएं चलो
इस जहां को उस खुदा की इबादतगाह बनायें चलो

कुछ गीत लिखें , उस खुदा की इबादत के
उस खुदा की इबादत का एक कारवाँ सजाएं चलो

उस खुदा के नेक बन्दों से , मुहब्बत का एक रिश्ता सजाएं चलो
उस खुदा के करम से , इस जहां को खुशनुमा आशियाँ बनाएं चलो

वो नेक दिल है , उसकी नवाजिश है हम सब पर
उस खुदा के दर पर सजदा कर आयें चलो

उसकी रहमत उसके करम से हम सब हैं वाकिफ
उसके दर पर सजदों का एक कारवाँ सजाएं चलो

उस खुदा ने खूबसूरत करिश्मों से सजाया है इस जहां को
उस खुदा की इस नेमत से एक रिश्ता सजाएं चलो

अपनी कलम को उस खुदा की धरोहर कर दें
उस खुदा की इबादत को अपनी कलम का जरिया बनाएं चलो

पाक दामन हो पाक हो रिश्तों का सफ़र
उस खुदा के बन्दों से रिश्ता निभाएं चलो

Wednesday, 12 September 2018

उत्थान की ओर दो कदम



उत्थान की और दो कदम 


द्वारा

अनिल कुमार गुप्ता 

जब तुम स्वयं का आत्म मंथन करने लगो
जब तुम्हारे भीतर आत्मीयता का भाव जागने लगे
जब तुम आत्मबोध का एहसास करने लगो
तब तुम मुक्ति मार्ग पर अग्रसर हो , यह महसूस करना

  
जब तुम्हारे प्रयास कर्मनिष्ठ हो, कर्मक्षेत्र का हिस्सा होने लगे
जब तम्हारी कोशिशें उत्तरदायित्व का बोध कराने लगें
जब तुम्हारे कर्म तुम्हें कर्मफल का एहसास कराने लगें
तब तुम सफलता के मार्ग पर अग्रसर हो , यह समझ लेना

  
जब तुम्हारी मुखकृति से देवत्व का आभास होने लगे
जब तुम्हारा हर एक कर्म , धर्म का प्रतीक महसूस होने लगे
जब तुम्हें सभी देव का अवतार समझ पूजने लगें
तब तुम समझना कि तुम एक पुण्यात्मा हो इस धरा पर विचार रहे हो
  

जब तुम्हारी चरण धूलि दूसरों के माथे का चन्दन होने लगे
जब लोग तुम्हारे आभामंडल के दर्शन को लालायित होने लगें
जब तुम्हारे सद्विचार दूसरों के जीवन को दिशा दिखाने लगें
तब समझना कि तुम एक पुण्य कृति हो , दूसरों का उद्धार कर रहे हो


Monday, 3 September 2018

असंभव को संभव कर


असंभव को संभव कर

असंभव को संभव कर, महानायक बनो
कुछ दर्द चुनो, कुछ अश्रू चुनो
किसी की साँसों का मरहम बनो
असंभव को संभव कर महानायक बनो

कुछ मानव प्रेम के मूल्य रचो
कुछ जीवन मूल्य के गीत रचो
कुछ त्याग के सुख की सोचो  
असंभव को संभव कर महानायक बनो

नवजागरण के नायक बनो
सत संदेशों की रचना करो
ज्ञान के आलोक से स्वयं को पुष्पित करो
असंभव को संभव कर महानायक बनो

उनके जीवन की दास्ताँ सुनो
कटे पंखों के साथ विचार रहे जो
सत्याग्रह को जीवन का अस्त्र करो
असंभव को संभव कर महानायक बनो

असंभव को संभव कर, महानायक बनो
कुछ दर्द चुनो, कुछ अश्रू चुनो
किसी की साँसों का मरहम बनो
असंभव को संभव कर महानायक बनो


हमको तुम समझाओ न


हमको तुम समझाओ न

हमको न समझाओ तुम , हमें न यूं बहलाओ तुम
हमको तुम चंचल न समझो , कर्तव्य राह बतलाओ तुम

हम तो हैं माटी के ढेले, रूप हमें दिखलाओ तुम
हम क्या जानें सच और झूठ , सच की राह बतलाओ तुम

तन से कोमल, मन से पावन, हमको खुद से मिलाओ तुम
छू सकें आसमां हम भी, ऐसी राह दिखाओ तुम

हमको भी प्यारी है मंजिल , सही राह दिखलाओ तुम
गीत बनकर सजें लबों पर, संगीत से हमें सजाओ तुम

पावन हो जाएँ मन हमारे, मन में संस्कार जगाओ तुम
धर्म पथ पर बढ़ चलें हम, धर्म की राह दिखाओ तुम

हमको भी है प्यारा आसमां, मंजिल का मर्म समझाओ तुम
हम भी करें इस धरा को पावन, हम पर विश्वास दिखाओ तुम

हम हैं नन्हे – नन्हे बालक, सुन्दर हमें बनाओ तुम
सबके दिलों पर राज़ करें हम, ऐसा हमें बनाओ तुम

 हमको न समझाओ तुम , हमें न यूं बहलाओ तुम
हमको तुम चंचल न समझो , कर्तव्य राह बतलाओ तुम