लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 13 July 2015

फूलों से खुशबुओं को चुराया नहीं करते - मुक्तक


1.


फूलों से खुशबुओं को चुराया नहीं करते
बहती गंगा में हाथ धोया नहीं करते

थोड़ी सी भी गैरत तुममे बाकी है
तो फूलों को यूं डालियों से तोड़ा नहीं करते


२.


खिलने दो फूलों को खुशबुओं की खातिर
उड़ने दो हौसलों को आसमान की खातिर

रोको न राह उनकी ,जो उड़ने को हैं बेताब
खिलने दो कलियों को फूलों की खातिर


3.


इश्क के फूल खिलाकर कहाँ चले गए वो

जब तक था साथ, हर -पल सावन का
एहसास हुआ


4.


उनकी बेपनाह मुहब्बत ,बसी है यादों में

जब तक थे साथ, इश्क का इजहार हुआ


5.


वक़्त हुआ उनका दीदार किये

उनकी बेवफाई का गर्म बाज़ार हुआ




Sunday, 12 July 2015

निष्ठुर न बनो कान्हा

निष्ठुर बनो न कान्हा

निष्ठर बनो न कान्हा, मेरी बिगड़ी बना दो
मेरी किस्मत के तारे, आसमां पर सजा दो.

हर - पल तुझे मैं ढूंढूं - मुझको दरश दिखा दो.
निष्ठ॒र बनो न कान्हा , मेरी बिगड़ी बना दो

मुझ निर्बल को प्रभु, बल से सजा दो
मुझ निर्धन को प्रभु, भक्ति मार्ग दिखा दो

चरणों में अपने प्रभु , मुझको जगह दिला दो.
निष्ठर न बनो कान्हा , मेरी बिगड़ी बना दो

आडम्बर की इस दुनिया से , मुझको प्रभु बचा लो
अवगुण मेरे जीवन से , मेरे प्रभु मिटा दो

जीवन की सच्ची राह , मुझको प्रभु दिखा दो
निष्ठ॒र न बनो कान्हा , मेरी बिगड़ी बना दो

वि अपनी प्रभु, दिल में मेरे बसा दो.
बंशी की धुन पर , हमको प्रभु नचा दो

हे कान्हा मेरे प्रभु, मोक्ष की राह दिखा दो
निष्ठ॒र न बनो कान्हा , मेरी बिगड़ी बना दो

इस दुनिया में जीना है तो


इस दुनिया में जीना है तो

इस दुनिया में जीना है तो , अधिकारों हित लड़ना सीखो
सम्मान धरा पर पाना है तो, कर्म राह पर चलना सीखो

जीवन जीने का नाम है, हर पल आगे बढ़ना सीखो
दो पल सुखमय जीना है तो, सत्य राह पर चलना सीखो

देश प्रेम हित मरना है तो, मातृभूमि पर वरना सीखो
चिंताओं से लड़ना है तो, मन को शांत बनाना सीखो

आसमान को छूना है तो, गिर--गिर कर तुम उठना सीखो
चाँद तुम्हारे क़दमों में हो, ऐसे प्रयास तुम करना सीखो

धरती पर हों कदम तुम्हारे, स्वाभिमान हित लड़ना सीखो
स्वाभिमानी हो जीना है तो, कर्तव्य राह पर चलना सीखो

अभिनन्दन तेरा भी होगा, सच को आदर्श बनाना सीखो
मंगल कर्म सभी हों तेरे, धर्म राह पर चलना सीखो

पावन, मंगल छवि हो तेरी, संस्कार तुम वरना सीखो
शुभिंतक सभी हों तेरे, मानवता को धर्म बनाना सीखो

धर्म राह बलि- बलि जाना हो तो, धर्म से मोह लगाना सीखो
मोक्ष राह हो ध्येय तुम्हारा, परमेश्वर से जुड़ना सीखो







बुलंद ज़ज्बे हों जिनके - मुक्तक

१.


श्ण्द ज़ज्बे हों जिनके , उनको यूं निराश किया नहीं करते 
चलें जो राह मंजिल की, उन्हें भटकाया नहीं करते

छू लेंगे वो आसमां , खुदा का करम हो जिन पर
खुदा के बन्दों को यूं , सताया नहीं करते



२.


सितारों को चमकने से रोका नहीं करते
उत्कर्ष की राह पर चलने वालों को , यूं गिराया
नहीं करते

छूने दो तारे उनको, खुदा ने रोशन किया जिनको
७ की राह में कांटे बोकर, खुद को लजाया नहीं करते 


3.


चंद सिक्कों के लिए यूं खून, बहाया नहीं करते
नियाते हैं रिश्तों को यूं, पैसों पर मर जाया नहीं
कर

खुदा ने चार दिन की जिन्दगी से रोशन किया
हमको
मरते हैं रिश्तों की खातिर , यूं रिश्तों को लजाया
नहीं करते 


4.


कुदरत से यूं नजरें, फिराया नहीं करते
कुदरत के नजारों को यूं ,ख़ाक में मिलाया
नहीं करते

कुदरत की खिदमत. खुदा की खिदमत
खुदा की राह से यूं , किनारा नहीं करते





किस्मत में हों जिनकी तारे - मुक्तक

१.

किस्मत में जिनकी हों तारे , उन्हें बहकाया नहीं करते

चलते हैं जो इंसानियत की राह, उन्हें गुमराह किया नहीं करते


खुदाई हो जिनका सबब, वो गुनाह की राह पर खुद को
उलझाया नहीं करते

गर्दिशि में भी हों सितारे तो , खुद को भटकाया नहीं करते


२.


गुलिस्तां से फूलों को यूं तोड़ा नहीं करते
अजनबी को यूं दोस्त बनाया नहीं करते

अक्सर मिलते हैं इश्क में धोखे
यूं ही किसी को अपना बनाया नहीं करते

3.


आँखों से आंसू यूं ही बहाया नहीं करते
किसी हँसते को यूं ही रुलाया नहीं करते

जिन्दगी की राहों में मुश्किलें वैसे ही कम नहीं हैं
किसी चलते राही को यूं गिराया नहीं करते




4.


किसी को यूं बदनाम किया नहीं करते
खुशी हो या गम , जाम पिया नहीं करते

खुद को खुदा का बन्दा कहते हैं जो
किसी को यूं नीचे गिराया नहीं करते


5.

किसी का दिल यूं ही तोड़ा नहीं करते
किसी को यूं ही रुलाया नहीं करते

कहते हैं जो खुद को , उस खुदा का बन्दा
किसी राही  को यूं भटकाया नहीं करते




Tuesday, 30 June 2015

मुल्क देख रहा है

मुल्क देख रहा है

मुल्क देख रहा है मायूसी का दौर
सरे राह बिकते बदन, चीरहरण का दौर

काम प्रबल विचार, वहशीपन का दौर
टूटती सांसें , असुरक्षा का दौर

रक्षकों पर से उठते , भरोसे का दौर
असामाजिक, अनैतिक  लालसाओं का दौर

अमर्यादित , नाउम्मीदी से जूझता दौर
रिश्तों पर से विश्वास खोते, बन्धनों का दौर

शून्य में झांकती आंखें, आशंका भरे पदचापों का दौर
सामाजिक बन्धनों को “ लिव – इन रिलेशनशिप “ कहने का दौर

शारीरिक सम्मोहन में घिरे रहने का अनैतिक दौर
आध्यात्मिकता को नगण्य बता, आधुनिक विचारों में जीवन ढूँढने का दौर

एक दूसरे को संदेह भरी नज़रों से देखने का दौर
बुजुर्गों के सम्मान और प्रतिष्ठा से खेलने का दौर

आधुनिक वैज्ञानिक विचारों में जीवन स्थापित करने का असफल दौर
सद्विचारों, सद्चारित्रों, आदर्शों,अभिनन्दन मार्ग से विहीन दौर
 स्वय को असहाय बनाये रखने का दौर

क्या यह दौर युवा पीढ़ी के उज्जवल भविष्य की दस्तक है ?
या स्वयं को छलावे में फंसाए रखने का दौर

कब मुक्त होगा यह मानव, कब नींद से जागेगा यह ?
कब इसे अनैतिक प्रयासों का होगा भान ?

कब इसे अपने मानव होने का होगा बोध ?
कब यह रिश्तों के बंधन को समझेगा ?

कब इसे होगा अनैतिकता का बोध ?
कब यह मानव युवा पीढ़ी का आदर्श बन चमकेगा ?

कब यह अभिनन्दन मार्ग पर होगा प्रस्थित ?
कब इसे स्वाकार होगा उस परम तत्व का बोध ?

कब यह  टूटी साँसों का बनेगा सहारा ?
कब इसकी पदचाप शुभ का संकेत होगी ?

कब यह बुजुर्गों के आशीर्वाद तले पायेगा जीवन ?
कब यह आधुनिक विचारों को देगा तिलांजलि ?

कब यह आध्यात्मिकता के मार्ग पर होगा प्रस्थित ?
कब यह काम के वशीकरण से आएगा बाहर ?

 मानव का होना शुभ का संकेत होगा कब?
कब........? कब..........? आखिर कब .............?



Monday, 29 June 2015

शिक्षा साधनों की मोहताज नहीं होती - शिक्षा पर मेंरे विचार


१.

शिक्षा साधनों की मोहताज नहीं होती

शिक्षा हौसलों की उड़ान होती है 


२.


शिक्षा चंद सिक्कों से तौली नहीं जाती

शिक्षा संस्कृति व संस्कारों की बिसात होती है


3.



शिक्षा किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं होती

शिक्षा तो हर एक की किस्मत का नूर होती है




वो शरमाये तो लगा , चाँद भी शरमाया - मुक्तक

१.


वो शरमाये तो लगा, चाँद भी शरमाया
उनसे नज़रें मिली ,उन पर हमको प्यार आया

चूड़ियों की खनखनाहट ने, जगा दिया मुझको
सपनों में ही सही ,उनको अपने करीब पाया

२.


पाक-साफ़ नीयत से, चाहा है मैंने तुझको
त का खुदा समझा ,मैंने तुझको

रहे मुहब्बत का ,यह चश्मों - चिराग
कुछ इसी आरज़ू से ,पूजा है मैंने तुझको


3.


कौन कहता है , इश्क रुलाता है हमें

ये तो वो शै है , जो खुदा से मिलाता है हमें

4.


चाहता हूँ मेरे खुदा ,तेरी रहमत

कुछ ऐसा कर ,इंसानियत मेरा खुदा हो जाए

खुद को दूसरों के लिए ,कर सकूं कुर्बान

कुछ ऐसा कर हर एक शख्स ,मेरा भगवान हो
जाए


5.


जोश, ज़ज्बा, जूनून, दिल में साथ लिए

चले हैं वतन की राह , दिल में साथ लिए

मर मिटेंगे वतन पर , रोशन चिराग लिए

मिटा देंगे दुश्मनों के निशान, वतन परस्ती का

ज़ज्बा, दिल में साथ लिए






वो जो मुस्कुरा दें, तो रोशन बहार हो जाए

१. 

वो जो मुस्कुरा दें ,तो रोशन बहार हो जाए
दिल में उमंग जगे , दिल को करार आये

कौन है जो उनकी मुस्कराहट पर न मरे
हाँ कि खुद को उनकी मुस्कराहट पर निसार आये 

२.

गर सभी को चाँद नसीब हो जाए
तारों की  ओर  से फिर जायेगी नज़र सबकी

गर सभी की किस्मत में आसमां हो जाए
धरती की ओर  फिर नज़र होगी किसकी

3.


किनारों पर बैठकर अथाह समंदर का नज़ारा नहीं करते 
'\करते  हैं सैर समंदर की , यूं लहरों से किनारा नहीं करते 

 मौज़ों से खेलना है जिनकी जिन्दगी का सबब 
वो किनारों पर बैठकर , यूं जिन्दगी गुजारा  नहीं करते








Sunday, 28 June 2015

बनाकर अपना मुझको , वो कहीं गुम हो गए

१.

बनाकर अपना मुझको , वो कहीं गुम हो
गए

हम हैं कि अपनी यादों में , उनकी  तलाश
करते हैं


२.


दिल की आवाज़, दिल ही बेहतर जाने

दिल की दुनिया का अपना ही खुदा होता है 

3.

ज़ख्म दिल के भरेंगे एक दिन, उम्मीद नहीं

दिल का हर एक ज़ख्म ,लाइलाज होता है

4.


जुकाम हुआ नहीं है मुझको, जो ठीक हो जाए

ये दिल का रोग है, जिसका कोई इलाज़ नहीं