लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 22 January 2012

छू लेंगे हम आसमान

छू लेंगे हम आसमान
छू लेंगे हम आसमान
कौन कहता है
हम बच्चे हैं
हममें जोश नहीं है
संकल्प की पूंजी
हमारी धरोहर
कर्त्तव्य की राह
हमारी डगर
वादियों में सत्य की
विचरते हैं हम
और
कर्म की राह पर
चलते हैं हम
कौन कहता है
छू सकते नहीं हम आसमान
छू लेंगे हम आसमान
कौन कहता है हम बच्चे हैं
गुरु शिष्य परंपरा का
करते हैं आचमन
बुजुर्गों के आशीर्वचन तले
पलता हमारा बचपन
संवारते खिलते विचार हमारे
पाते हम सुरक्षा
होते संस्कारित 
कहलाते   
संस्कृति के रखवाले हम
विद्यालयों के प्रांगण तले
संवारता हमारा बचपन
हर-छण हर -पल
खिलता हमारा तन मन
विचरों के युद्ध में
बनते विजेता
साथ ले
पुस्तकों का
अग्रसर होते
उस मंजिल की और
जो हमारा सपना होता
हम हर पल
ऋणी होते जाते
उस शिक्षक के
जो दीपक की तरह
स्वयं को जला
हमारे जीवन को
रोशन करता
इस संपूर्ण
जीवन के साथ
जी रहे हैं हम
कौन कहता है
छू नहीं सकते हम आसमान
कौन कहता है
हम बच्चे हैं



जीवन ज्योति जगाऊं कैसे


जीवन ज्योति जगाऊं कैसे

कैसे करूँ तेरा अभिनन्दन
कैसे करूँ मैं कोटि वंदन
निर्मल नहीं है काया मेरी
शीतल नहीं हुआ मन मेरा
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
निर्मल नीर कहाँ से लाऊं
कैसे तेरे चरण पखाऊँ
तामस होता मेरा तन मन
निर्जीव जी रहा हूँ जीवन
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
अमृत वचन कहाँ से पाऊं
कैसे तेरी स्तुति गाऊं
सूरज बन चमकूँ मै कैसे
चंदा बन चमकूँ मैं कैसे
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
आँगन मेरा तुम बिन सूना
अधीर हो रहे मेरे नयना
निश्चल समाधि पाऊं कैसे
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
उत्कर्ष मेरा होगा प्रभु कैसे
बंधन मुक्त रहूँगा कैसे
पीड़ा मन की दूर करो तुम
असह्य मेरा दर्द हरो तुम
जीवन ज्योति जगाऊं कैसे
नैतिकता की राह दिखा दो

चलने दो जितनी चले आंधियां

चलने दो जितनी चले आंधियां
चलने दो जितनी चले आंधियां
आँधियों से डरना क्या
मुस्कराकर ठोकर मारो
वीरों मन में भय कैसा
चलने दो जितनी चले आंधियां
तूफानों की चाल जो रोके
पल में नदियों के रथ रोके
वीर धरा के पवन पुतले
चलने दो जितनी चले आंधियां
पाल मन में वीरता को
झपटे दुश्मन पर बाज सा
करता आसान राहें अपनी
तुझे हारने का दर कैसा
चलने दो जितनी चले आंधियां
भारत माँ के पूत हो प्यारे
लगते जग में अजब निराले
करते आसाँ मुश्किल सारी
तुझे पतन का भय कैसा
चलने दो जितनी चले आंधियां
पड़े पाँव दुश्मन की छाती पर
चीरे सीना पल भर में
थर – थर काँपे दुश्मन
या हो कारगिल , या हो सियाचिन
चलने दो जितनी चले आंधियां
पायी है मंजिल तूने प्रयास से
पस्त किये दुश्मन के हौसले
फ़हराया तिरंगा खूब शान से
नमन तुझे ए भारत वीर
चलने दो जितनी चले आंधियां






Friday, 20 January 2012

सत्य मार्ग तेरी डगर हो

सत्य मार्ग तेरी डगर हो

सत्य मार्ग तेरी डगर हो
सत्य पथ तेरा बसर हो
बंधन मुक्त जीवन तेरा हो
मोक्ष तेरा हमसफ़र हो
माया तेरा पीछा न पकड़े
दुर्गुण कभी तुझको न जकड़े
ज्ञान पथ तेरा हो साथी
आदर्श हो जाए तेरा निवासी
सत्मार्ग के तुम बनो प्रवासी
कर्मभूमि तेरा बसर हो
मंजिल पर हमेशा तेरी नज़र हो
खिलते रहो जहां में फूल बनकर
खुदा की तुम पर मेहर हो
अनुपम धरा पर तेरी छवि हो
अनुचर धरा पर तेरे बहुत हों
अभिमानी न होना कभी तुम
अंधविश्वास हो न राह तुम्हारी
अंजुली भर श्रद्धा जगा जो लोगे तुम
इस जग को स्वर्ग बना लोगे तुम
अंकित करो कुछ तो इस धरा पर
नाम तुम्हारा अमर हो जाएगा
सत्य मार्ग तेरी डगर हो
सत्य पथ तेरा बसर हो

Friday, 6 January 2012

बदरी

बदरी

प्रकृति ने ली अंगडाई है
चहुँ ओर बदरी छाई है
ग्रीष्म को बिदाई मिल रही
चहुँ और बूँदें पड़ रही

करो वर्षा का आगमन
करो बूंदों से आचमन  
प्रकृति की छटा  निराली हो रही
चहुँ और बूँदें पड़ रही

हम बादलों को चूम लें
पंछी ये गीत गा रहे
इस अवसर को हम न गवाएं
बादलों का साथ निभाएं

चहुँ और हरियाली खिलाएं
आओ हम मिल पेड़ लगाएं
कितना सुन्दर है ये आलम
हो रही चहुँ और रिमझिम

कोयल की कुक प्यारी
खिल रही है क्यारी-क्यारी
प्रकृति के हम ऋणी हैं
जिसने चहुँ और शांति दी है

बच्चों के भीगे तन-मन
झूमें सबके तन-मन
ये वर्षा का आगमन
प्रक्रति को करो नमन



पुस्तकें


पुस्तकें

ये पुस्तकों की दुनिया
होती नहीं बेमानी
देती हैं ज्ञान सबको
दिखाती हैं राह सबको

ये पुस्तकों की दुनिया

ये पुस्तकें जहां हों
फिर दोस्त न वहाँ हों
सच्चा दोस्त बनने का
सपना दिखाती पुस्तकें

ये पुस्तकों की दुनिया

इन पुस्तकों से नाता
सदियों रहा सभी का
ज्ञान को संजोती
संवारती ये पुस्तकें

ये पुस्तकों की दुनिया

ये पुस्तकें जहां हो
कहलाएं ज्ञान मंदिर
पूजा करें सब इनकी
कह गए बापू जी

ये पुस्तकों की दुनिया

पुस्तकों ने सभी को
सभ्यता सिखाई
इनके आचमन से
चहुँ रौशनी है छाई

ये पुस्तकों की दुनिया
होती नहीं बेमानी
देती हैं ज्ञान सबको
दिखाती हैं राह सबको