लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Friday, 4 October 2019

मुमकिन है


मुमकिन है

जिस सुबह का बड़ी बेसब्री से किया मैंने बरसों इंतज़ार
मुमकिन है उस सुबह का आगाज़ होगा एक दिन

मेरी भी जिन्दगी का गुलशन होगा गुलज़ार
मुमकिन है मेरे भी ख़्वाब होंगे साकार एक दिन

मेरे प्रयासों को भी नसीब होगी वो खुशनुमा सुबह
मुमकिन है मेरी कोशिशें रंग लायेंगी एक दिन

चूम लूंगा अपनी मंजिल अपनी कोशिशों के दम से
मुमकिन है मेरी भी खुशियों का सूरज रोशन होगा एक दिन

जीत जाऊंगा जंग जिन्दगी की खुद पर भरोसा कर
मुमकिन है रोशन जिन्दगी का सफ़र होगा एक दिन

कुछ गीत लिख जाऊंगा , लाऊँगा चेहरों पर नूर
मुमकिन है मुस्कराहटों का समंदर रोशन कर जाऊंगा एक दिन

मेरी कलम होगी मेरी मंजिल का हमसफ़र
मुमकिन है खुशनुमा गीतों का उपवन सजा जाऊंगा एक दिन

रंग लाएगी मेरी कोशिशें , होंगी मेरी मंजिल का हमसफ़र
मुमकिन है खुशियों के गीतों का समंदर रोशन कर जाऊंगा एक दिन


मौकापरस्त


 मौकापरस्त

आज के इस मौकापरस्त जमाने में
किसी का अच्छा करे तो क्यूं करे कोई

पुलिस के पचड़े में
बेवजह पड़े तो क्यूं पड़े कोई

अच्छे का सिला हो अच्छा
भला ये क्यूं सोचे कोई

सबकी जिन्दगी का अपना खुदा
क्यूं कर किसी के दर पर नाक़ रगड़े कोई

मुसीबत के वक़्त क्यूं कर
किसी का हमसफ़र बने कोई

अजनबी पर वक़्त – बेवक्त
एतबार क्यूं करे कोई

किसी की राह के काँटों को
अपना क्यूं करे कोई

खोखली होती संवेदनाओं में
अपने को भला क्यूं तलाशे कोई

चीरहरण के इस युग में
मानवता का चोला क्यूं कर ओढ़े कोई

लिव – इन – रिलेशन के जमाने में
सामाजिक रिलेशन क्यूं रखे कोई

आजाद परिंदों की दुनिया में
सामाजिकता में क्यूँ फंसे कोई

अतिमहत्वाकांक्षा के दौर में
रिश्तों की परवाह भला क्यूं करे कोई

आगे बढ़ने की दौड़ में
संस्कारों की परवाह भला क्यूं करे कोई

बेवजह अपनों को अपना
भला क्यूं कहे कोई

गिराकर बढ़ने की चाह दिल में
भला क्यूं न रखे कोई


हर आज़ादी है पहरे में


हर आज़ादी है पहरे में

हर आजादी है पहरे में
हर शख्स जी रहा पहरे में

साँसें घुंटी – घुंटी हुई सी हैं
बेजुबां हो गया हर शख्स पहरे में

अजीब सा डर लिए जी रहा हर एक शख्स
जुबां वाले भी हो गए बेजुबां पहरे में

अजब आतंक का खौफ है ये
घुटी  - घुटी सी सांस पहरे में

सुन्दरता हो रही अभिशाप
हर वक़्त चीरहरण का खौफ पहरे में

तिराहों चौराहों पर आवारा फिरते गोवंश
गोवंश के नाम पर बलि चढ़ रहा मानव पहरे में

आज रक्षक ही हो रहे भक्षक
अपराध पल रहे पहरे में

माँ- बाप को भी बच्चा चोरी की नज़र से देखते हैं लोग
मॉब लिंचिंग का शिकार हो रहे रिश्ते पहरे में

सेंसर बोर्ड पर नहीं पड़ रही , बुद्धिजीवी समाज किसी की नज़र
समाज के हर पहलू में अश्लीलता, पैर पसार रही पहरे में



Monday, 16 September 2019

पाषाण पोषित शहर में


पाषाण इस पोषित शहर में

पत्थरों के इस शहर में संवेदनाओं को तलाशता हर एक शख्स
पाषाण पोषित इस शहर में , संवेदनाओं के दीप जलाऊँ तो जलाऊँ कैसे

नशे में डूबता इस शहर का हर एक शख्स
नशे में डूबे इस शहर के हर एक शख्स को , होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे

रिश्तों की चाह में भटकता इस शहर का हर एक शख्स
अजनबियों के इस बियाबान शहर में रिश्तों की आस जगाऊं तो जगाऊं कैसे

मानव मूल्य स्वयं को खोजते इस अजनबी बियाबान शहर में
मानवीय मूल्यों को खोते इस शहर को मानवता का राग सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे

ख़ुशी हो या गम , पीना है जिनकी जिन्दगी का शगल
पी रखी है जिन्होंने वक़्त  - बेवक्त , उन्हें होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे

खुद की परवाह में मशगूल,  अपनों को खोता इस शहर का हर एक शख्स
इस शहर के लोगों को , एक दूसरे के नजदीक लाऊँ तो लाऊँ कैसे

पत्थरों के इस शहर में संवेदनाओं को तलाशता हर एक शख्स
पाषाण पोषित इस शहर में , संवेदनाओं के दीप जलाऊँ तो जलाऊँ कैसे

नशे में डूबता इस शहर का हर एक शख्स
नशे में डूबे इस शहर के हर एक शख्स को , होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे


उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली


उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली

उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली
उसने अपनी बची साँसें बोतल के नाम कर दी

पिए जा रहा था वो , बोतल को गड़गड़ करके
बोतल ने उसकी सारी अंतड़ियां अपने नाम कर ली

क्या गम क्या ख़ुशी , बोतल हो गयी थी जिन्दगी की उसकी हमसफ़र
ताउम्र का रिश्ता बोतल से उससे अपने नाम कर ली

न उसे थी बच्चों की परवाह , न ही बीवी की खबर
उसकी हर खुशियाँ बोतल ने अपने नाम कर ली

घर का एक – एक सामान बिकने लगा था एक-एक कर
घर की हर एक चीज बोतल ने अपने नाम कर ली

घर की सारी खुशियाँ हो गयीं छूमंतर एक ही पल में
एक बोतल ने घर के हर सदस्य की आँखें नाम कर दी

पीता रहा वो बोतल अपने गम को कम करने के लिए
घर के हर शख्स की जिन्दगी बोतल ने अपने नाम कर ली

एक बोतल की चाह में उसने भुला दिया दुनिया को
उसकी जिन्दगी की हर एक चाह बोतल ने अपने नाम कर ली



तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे


तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

रोशन मेरी किस्मत एक करम से तेरे
तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

तेरी इबादत मेरी जिन्दगी का मकसद
तुझसे कोई शिकायत नहीं है मुझे

मेरी खुशनसीबी, मैं तेरा मुरीद
तेरा दरबार मेरा इबादतखाना

तुझसे रोशन मेरी हर एक खुशी
तुझसे रोशन मेरा आशियाना

तू फ़रिश्ता है ऐ मेरे खुदा
तेरे बन्दों की खिदमत खुशनसीबी मेरी

फलक पर बैठाया है तूने मुझको
तेरे करम से रोशन जिन्दगी मेरी

मेरी तकदीर संवार दी है तूने
मेरे गुलिस्तां को रोशन किया है तूने

अपनी परवरिश में हमेशा रखना तुमको
अपनी इबादत के काबिल बनाए रखना मुझको

मेरी जिन्दगी का हर पल कुर्बान तुझ पर
अपने दर का चिराग़ करना मुझको

तेरे बन्दों से मुहब्बत का ज़ज्बा रहे कायम
अपने गुलिस्तां का गुलाब करना मुझको

रोशन मेरी किस्मत एक करम से तेरे
तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

तेरी इबादत मेरी जिन्दगी का मकसद
तुझसे कोई शिकायत नहीं है मुझे


Friday, 16 August 2019

तराना - ए - हिन्द (हास्य - व्यंग्य कविता)


तराना  - ए   - हिन्द

तराना-ए- हिन्द गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे
बेजुबानों को गुनगुनाना सिखाएं तो सिखाएं कैसे

पेशानी पर बल लिए जी रहा हर एक शख्स
राष्ट्रवाद का तराना गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे

सलामत हैं नेता , बमुश्किल हो रही जनता की गुजर - बसर
जनता के दरबार में , संसद की “थाली” पहुंचाएं तो पहुंचाएं कैसे

फ़रिश्ता हूँ “अच्छे दिन लाऊंगा “  ऐसा कहते हैं नेता लोग
जनता को बेवकूफ ये बनाएं तो बनाएं कैसे

बेबसी और मुफलिसी के दौर से गुजरता हर एक शख्स
स्विट्ज़रलैंड से काला धन लायें तो लायें कैसे

देश का रुपया खाकर भी विदेशों में कर रहे हैं ऐश कुछ लोग
नीरव मोदी और विजय माल्या को पैसा लौटाने को मनाएं तो मनाएं कैसे

फितरत में जिनकी है जनता को धोखा देना
उन्हें राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाएं तो पढ़ायें कैसे

“अच्छे दिन आयेंगे “ इसी आस में जी रहा हर एक शख्स
नेता भी ये सोच रहे “अच्छे दिन लायें ” तो लायें कैसे

तराना-ए- हिन्द गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे
बेजुबानों को गुनगुनाना सिखाएं तो सिखाएं कैसे

पेशानी पर बल लिए जी रहा हर एक शख्स
राष्ट्रवाद का तराना गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे

देवों के चरणों में


देवों के चरणों में

देवों के चरणों में मस्तक रख दूं
कल्याण मेरा हो जाएगा
जो मिला नहीं मिल जाएगा
जो खोया है पा जाऊंगा


ख़्वाबों के दरवाजे खुल जायेंगे
जीवन सफल हो जाएगा
खिल जाएगा भाग्य मेरा
जग में नाम मेरा हो जाएगा

सत्कर्म राह बढ़ चलूँगा मैं
हर कर्म पावन हो जाएगा
तेरे चरणों का करके आचमन
मैं मोक्ष राह बढ़ जाऊंगा

भक्ति के दीपक की लौ से
जीवन को दिशा दे पाऊंगा
मेरी पीर हरेंगे मेरे भगवन
कष्ट मुक्त जीवन हो जाएगा

पावनता को गहना कर लूंगा
मेरा हर कर्म पवित्र हो जाएगा
देवों के चरणों में मस्तक रख दूं
कल्याण मेरा हो जाएगा