लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 15 March 2017

हम अपने वतन की माटी को

हम अपने वतन की माटी को

हम अपने वतन की माटी को , अपने माथे से लगा लेंगे
खिला देंगे कुछ फूल इस धरती पर , इसे उपवन बना देंगे |

भारत माँ के सपूतों के दिल में, वतन परस्ती का ज़ज्बा जगा देंगे
शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगा देंगे |

जियेंगे इस धरती पर तेरे बेटे बनकर , तेरी खातिर हम अपनी जां लुटा
देंगे
भारत  माँ तेरे सपूत हैं हम, तुझे जो घूरकर देखे उसे मिटटी में मिला देंगे |


तेरे ऑचल में पाया है जीवन हमने, तुझ पर कुर्बान अपना सर्वस्व कर ..
देंगे
बुरी निगाह जो डाली किसी ने तुझ पर , उस दुश्मन का हम नामों - निशाँ मिटा देंगे  |

हम अपने वतन की माटी को , अपने माथे से लगा लेंगे
खिला देंगे कुछ फूल इस धरती पर , इसे उपवन बना देंगे |

हम अपने वतन की माटी को , अपने माथे से लगा लेंगे
खिला देंगे कुछ फूल इस धरती पर , इसे उपवन बना देंगे |

भारत माँ के सपूतों के दिल में, वतन परस्ती का ज़ज्बा जगा देंगे
शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगा देंगे ||



व्यंग्य

व्यंग्य 

'एक नेता ,अपने भाषण  में 100 बार

गधे का नाम ले चुके ,

 तभी

एक गधा , मंच पर लपक कर आया

नेता गुर्राया  ,“इस गधे को नीचे उतारो”

तभी गधा , बड़े ही मासूमियत भरे अंदाज़ में बोला

नेता जी
अभी - अभी आपने अपने भाषण में 100 बार मेरे नाम का गीत
गुनगुनाया

तभी तो मेरा मन , मंच पर आने को ललचाया

गधे ने आगे कहा “मैंने  सोचा मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे “

“अब तक गधों की खूब सेवा की चलो कुछ दिन राजनीति में बिताएंगे ”



मुहब्बत के राही

मुहब्बत के राही

मुहब्बत के राही ,जिन्दगी को यूं तनहा गुजारा नहीं करते
मिले जो दामन किसी का , उसे ठुकराया नहीं करते |

चलते हैं जो मुहब्बत की राह, किसी को यूं सताया नहीं करते
मुहब्बत के राही जिन्दगी को यूं तनहा गुजारा नहीं करते |

गुजारिश उस खुदा से , कोई गुमराह न हो
जीते हैं जो गुमसुम , वो किसी को रुलाया नहीं करते |

मुहब्बत के राही मुहब्बत करने वालों को , यूं भरमाया नहीं करते
खुदा के चाहने वाले , किसी को यूं भटकाया नहीं करते |

जीते हैं जो खुद , सिसकती सांसों के साथ
वो किसी गमगीन को , यूं सताया नहीं करते |

इंसानियत के रखवाले , किसी को यूं बीच राह छोड़ा नहीं करते
बीती बात बिसारिये , यूं दुश्मनी को दिल से लगाया नहीं करते |

मुहब्बत के राही जिन्दगी को यूं गुजारा नहीं करते
मिले जो दामन किसी का , उसे ठुकराया नहीं करते |

चलते हैं जो मुहब्बत की राह, किसी को यूं सताया नहीं करते
मुहब्बत के राही जिन्दगी को यूं गुजारा नहीं करते |

मुहब्बत के राही ,जिन्दगी को यूं तनहा गुजारा नहीं करते
मिले जो दामन किसी का , उसे ठुकराया नहीं करते |

चलते हैं जो मुहब्बत की राह, किसी को यूं सताया नहीं करते
मुहब्बत के राही जिन्दगी को यूं तनहा गुजारा नहीं करते ||


जिन्दगी से हो गयी जिन्हें नफ़रत

जिन्दगी से जिन्हें हो गयी नफ़रत

जिन्दगी से जिन्हें हो गयी नफ़रत
मधुशाला को अपना आशियाँ कर लिया.|

डुबोकर मधुरस की दुनिया में खुद को
जिन्दगी की परेशानियों से किनारा कर लिया |

मधुशाला से रिश्ता रखने वाले
जीवन कहाँ जिया करते हैं |

पीते हैं घूँट - घूँट मौत की
जीवन का अंत जिया करते हैं |

पत्र - पत्र घूँट - घूँट पर मरने वाले
जीवन से रिश्ता कहाँ रखते हैं |

सोमरस पर मरने वाले
खुद की परवाह कहाँ करते हैं |

जीते हैं बोतल की खातिर
मरते हैं बोतल की खातिर |

दुनिया मैं कीड़ों से रैंगते
दुनिया की परवाह कहाँ करते हैं |

जीवन इनका मधुशाला है.
ये देवालय की बात कहाँ करते हैं|

रिश्ते - नाते सब बेगाने
खुद से भी ये रिश्ता कहाँ रखते हैं

जिन्दगी से जिन्हें हो गयी नफ़रत
मधुशाला को अपना आशियाँ कर लिया.|

डुबोकर मधुरस की दुनिया में खुद को
जिन्दगी की परेशानियों से किनारा कर लिया ||





Thursday, 9 March 2017

शिक्षक


शिक्षक

शिक्षक को मर्यादा की सीमाओं में न बांधो
उसके भी दिल में पत्ते हैं सपने |

उसे ही यूं कर्तव्यपरायणता का सिंबल न
बनाओ
उसके भी दिल में आरजू है बहुत |

उसे बन्धनों में यूं न जकड़ो
उसके भी अपने कुछ सामाजिक दायित्व हैं |

क्यों उसे रोकते हो अपने मन की करने से
उसकी भी अपनी उड़ान है 
उसे एक कमरे के दायरे में न समेटो |

उसके भी अपने आसमान हैं
गलती पर उसे माफ़ी नहीं है क्यों |