लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 16 September 2019

पाषाण पोषित शहर में


पाषाण इस पोषित शहर में

पत्थरों के इस शहर में संवेदनाओं को तलाशता हर एक शख्स
पाषाण पोषित इस शहर में , संवेदनाओं के दीप जलाऊँ तो जलाऊँ कैसे

नशे में डूबता इस शहर का हर एक शख्स
नशे में डूबे इस शहर के हर एक शख्स को , होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे

रिश्तों की चाह में भटकता इस शहर का हर एक शख्स
अजनबियों के इस बियाबान शहर में रिश्तों की आस जगाऊं तो जगाऊं कैसे

मानव मूल्य स्वयं को खोजते इस अजनबी बियाबान शहर में
मानवीय मूल्यों को खोते इस शहर को मानवता का राग सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे

ख़ुशी हो या गम , पीना है जिनकी जिन्दगी का शगल
पी रखी है जिन्होंने वक़्त  - बेवक्त , उन्हें होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे

खुद की परवाह में मशगूल,  अपनों को खोता इस शहर का हर एक शख्स
इस शहर के लोगों को , एक दूसरे के नजदीक लाऊँ तो लाऊँ कैसे

पत्थरों के इस शहर में संवेदनाओं को तलाशता हर एक शख्स
पाषाण पोषित इस शहर में , संवेदनाओं के दीप जलाऊँ तो जलाऊँ कैसे

नशे में डूबता इस शहर का हर एक शख्स
नशे में डूबे इस शहर के हर एक शख्स को , होश में लाऊँ तो लाऊँ कैसे


उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली


उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली

उसने अपनी सारी जिन्दगी यूं ही तमाम कर ली
उसने अपनी बची साँसें बोतल के नाम कर दी

पिए जा रहा था वो , बोतल को गड़गड़ करके
बोतल ने उसकी सारी अंतड़ियां अपने नाम कर ली

क्या गम क्या ख़ुशी , बोतल हो गयी थी जिन्दगी की उसकी हमसफ़र
ताउम्र का रिश्ता बोतल से उससे अपने नाम कर ली

न उसे थी बच्चों की परवाह , न ही बीवी की खबर
उसकी हर खुशियाँ बोतल ने अपने नाम कर ली

घर का एक – एक सामान बिकने लगा था एक-एक कर
घर की हर एक चीज बोतल ने अपने नाम कर ली

घर की सारी खुशियाँ हो गयीं छूमंतर एक ही पल में
एक बोतल ने घर के हर सदस्य की आँखें नाम कर दी

पीता रहा वो बोतल अपने गम को कम करने के लिए
घर के हर शख्स की जिन्दगी बोतल ने अपने नाम कर ली

एक बोतल की चाह में उसने भुला दिया दुनिया को
उसकी जिन्दगी की हर एक चाह बोतल ने अपने नाम कर ली



तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे


तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

रोशन मेरी किस्मत एक करम से तेरे
तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

तेरी इबादत मेरी जिन्दगी का मकसद
तुझसे कोई शिकायत नहीं है मुझे

मेरी खुशनसीबी, मैं तेरा मुरीद
तेरा दरबार मेरा इबादतखाना

तुझसे रोशन मेरी हर एक खुशी
तुझसे रोशन मेरा आशियाना

तू फ़रिश्ता है ऐ मेरे खुदा
तेरे बन्दों की खिदमत खुशनसीबी मेरी

फलक पर बैठाया है तूने मुझको
तेरे करम से रोशन जिन्दगी मेरी

मेरी तकदीर संवार दी है तूने
मेरे गुलिस्तां को रोशन किया है तूने

अपनी परवरिश में हमेशा रखना तुमको
अपनी इबादत के काबिल बनाए रखना मुझको

मेरी जिन्दगी का हर पल कुर्बान तुझ पर
अपने दर का चिराग़ करना मुझको

तेरे बन्दों से मुहब्बत का ज़ज्बा रहे कायम
अपने गुलिस्तां का गुलाब करना मुझको

रोशन मेरी किस्मत एक करम से तेरे
तेरी परवरिश पर यकीं है मुझे

तेरी इबादत मेरी जिन्दगी का मकसद
तुझसे कोई शिकायत नहीं है मुझे


Friday, 16 August 2019

तराना - ए - हिन्द (हास्य - व्यंग्य कविता)


तराना  - ए   - हिन्द

तराना-ए- हिन्द गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे
बेजुबानों को गुनगुनाना सिखाएं तो सिखाएं कैसे

पेशानी पर बल लिए जी रहा हर एक शख्स
राष्ट्रवाद का तराना गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे

सलामत हैं नेता , बमुश्किल हो रही जनता की गुजर - बसर
जनता के दरबार में , संसद की “थाली” पहुंचाएं तो पहुंचाएं कैसे

फ़रिश्ता हूँ “अच्छे दिन लाऊंगा “  ऐसा कहते हैं नेता लोग
जनता को बेवकूफ ये बनाएं तो बनाएं कैसे

बेबसी और मुफलिसी के दौर से गुजरता हर एक शख्स
स्विट्ज़रलैंड से काला धन लायें तो लायें कैसे

देश का रुपया खाकर भी विदेशों में कर रहे हैं ऐश कुछ लोग
नीरव मोदी और विजय माल्या को पैसा लौटाने को मनाएं तो मनाएं कैसे

फितरत में जिनकी है जनता को धोखा देना
उन्हें राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाएं तो पढ़ायें कैसे

“अच्छे दिन आयेंगे “ इसी आस में जी रहा हर एक शख्स
नेता भी ये सोच रहे “अच्छे दिन लायें ” तो लायें कैसे

तराना-ए- हिन्द गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे
बेजुबानों को गुनगुनाना सिखाएं तो सिखाएं कैसे

पेशानी पर बल लिए जी रहा हर एक शख्स
राष्ट्रवाद का तराना गुनगुनाएं तो गुनगुनाएं कैसे

देवों के चरणों में


देवों के चरणों में

देवों के चरणों में मस्तक रख दूं
कल्याण मेरा हो जाएगा
जो मिला नहीं मिल जाएगा
जो खोया है पा जाऊंगा


ख़्वाबों के दरवाजे खुल जायेंगे
जीवन सफल हो जाएगा
खिल जाएगा भाग्य मेरा
जग में नाम मेरा हो जाएगा

सत्कर्म राह बढ़ चलूँगा मैं
हर कर्म पावन हो जाएगा
तेरे चरणों का करके आचमन
मैं मोक्ष राह बढ़ जाऊंगा

भक्ति के दीपक की लौ से
जीवन को दिशा दे पाऊंगा
मेरी पीर हरेंगे मेरे भगवन
कष्ट मुक्त जीवन हो जाएगा

पावनता को गहना कर लूंगा
मेरा हर कर्म पवित्र हो जाएगा
देवों के चरणों में मस्तक रख दूं
कल्याण मेरा हो जाएगा


Sunday, 7 July 2019

अंजामे - वफ़ा


अंजामे  - वफ़ा

अंजामे  - वफ़ा का सिला , मुहब्बत कर देखो
उस खुदा की नवाज़िश , खुदा से आशिक़ी कर देखो

परिंदों की सी उड़ान , कोशिश कर देखो
मंजिल का दीदार, समंदर की लहरों से दोस्ती  कर देखो

अंजामे  - मुहब्बत , दिल की गहराइयों में उतर कर देखो
मिलें दो चार गम , तन्हाइयों में रात गुजर कर देखो

बुझे न लौ आशिक़ी की , मुहब्बत के खुदा से रूबरू होकर देखो
अंजामे  - दीदार की आरज़ू , उसकी गलियों में बसर के देखो

रिश्तों में अजब सी कसक, गिले  शिकवे भूलकर देखो
रोशन हो मंजिल का सफ़र , कोशिशों का समंदर रोशन कर देखो

मिट जायेंगे सारे  गम , किसी के गम में हमसफ़र बनकर देखो
उस खुदा का दीदार, किसी की सिसकती साँसों का मरहम होकर देखो

खुद को गर खुदा का बन्दा कहते हो , इस कायनात से मुहब्बत कर देखो
बिताओ कुछ रातें किसी गरीब के झोपड़े में , खुदा का एहसास कर देखो

खुदा ने नवाज़ा है तुझे मुहब्बत और इंसानियत के ज़ज्बे से
खुदा के बन्दों की खिदमत में , खुद को निसार कर देखो


Saturday, 22 June 2019

मेरी कलम जो भी लिखे


मेरी कलम जो भी लिखे

मेरी कलम जो भी लिखे , इबादत समझ क़ुबूल कर मौला
अमानत हो जाए ये कलम , इतना तो करम कर मौला

अल्फाज़ों का एक समंदर दे , जो तुझे बयाँ कर सके मौला
अश्फाक हो तेरा मुझ पर , इतना तो करम कर मौला

अपनी परवरिश में ले मुझको , मेरे अल्फाज़ों को इबादत कर मौला
मेरी कलम को अपनी बंदगी अता कर , मेरे अल्फाज़ों को सदका समझ मौला

मेरी कलम को तुझसे कोई शिकवा नहं , मेरी कलम को सुकूँ अता कर मौला
तेरी इबादत का गुलिस्तां रोशन कर सकूं, इतना करम कर मौला

तेरे नूर का चर्चा मेरी कलम से हो , यह करम कर मौला
मेरी कलम को अपने दर की रौशनी अता कर मौला

मेरी आरज़ू है मेरी कलम से रोशन हो मेरी जिन्दगी का सफ़र
मेरी इस आरज़ू को अपना करम अता कर मौला


मैं खुद को संवार लूंगा


मैं खुद को संवार लूंगा


मैं खुद को संवार लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं तुम्हारी राह के कांटे चुरा लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं तेरे सपने संवार दूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं खुद को भी संभाल लूंगा , ये यकीं है मुझे

आसमां को अपनी मंज़िल कर लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपनी आवाज़ बुलंद कर लूँगा , ये यकीं है मुझे

अपनी कलम को खुदा की इबादत कर दूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरे गीत, मेरी ग़ज़ल लोगों की जुबां पर होंगे , ये यकीं है मुझे

अपना खुद का आसमां संवार लूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरी हर एक आरज़ू उस खुदा की नेमत हो जाए , ये यकीं है मुझे

मैं मना ही लूंगा उस खुदा को एक दिन , ये यकीं है मुझे
हर एक मुसीबत में खुद को संभाल लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं गीतों का एक कारवाँ सजा लूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरी हर एक उम्मीद को होगा आसमां नसीब , ये यकीं है मुझे

मेरे भी दामन में खुशियाँ बिखर आयेंगी , ये यकीं है मुझे
मैं इंसानियत का एक समंदर रोशन कर दूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं अपनी भीगी नम आँखों में मुस्कान भर दूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपने सोये मुकद्दर को जगा लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं स्वयं को मुजरिम होने से बचा लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपनी तमन्नाओं , आरजुओं का एक आसमां रोशन कर लूंगा , ये यकीं है मुझे


अपने ग़मों को सी लें


अपने ग़मों को सी लें

अपने ग़मों को सी लें, अपने गमो को पी लें
अपनी खुशियों , अपनी आरज़ू को आबाद करें फिर से

क्यूं न कर अपने जीने के ज़ज्बे को बरकरार रखें
अपने दामन को खुशियों से आबाद करें फिर से

क्यूं कर कहे कोई , हमें अपना मुजरिम
किसी की अँधेरी रातों में उजाला करें फिर से

ख़्वाब हैं कि बिखरते है कभी संवरते हैं
अपनी कोशिशों का समंदर रोशन करें फिर से

क्यूं कर किसी को गिरता हुआ देखे कोई
किसी की मरमरी बाहों को सहारा दें फिर से

आंसुओं का कतरा  - कतरा सिसकती जिन्दगी क्यूं हो
किसी के लबों पर मुस्कान बिखेरें फिर से

अजनबी  - अजनबी सा समझ घूरती आँखें
रिश्तों में अपनापन का ज़ज्बा जगाएं फिर से

किसी के दामन में दाग लगे तो क्यूं कर लगे
कोशिशों का एक कारवाँ सजाएं फिर से