लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 19 October 2016

रोशन हो जाए ये ज़मीं, रोशन हो जाए आसमां


रोशन हो जाए ये ज़मीं , रोशन हो जाए आसमां

रोशन हो जाए ये ज़मीं, रोशन हो जाए आसमां
मानवता हो शर्मिंदा यहाँ, रोशन हों दिल सबके यहाँ

मैं खिलाना चाहता हूँ , एक उपवन मुहब्बत का यहाँ
कोई हो तनहा यहाँ, रोशन हों सबके अरमां

दिल में बसे ,हर एक के खुदा, इबादत हो सबका मजहब यहाँ
पीरों के दर हों रोशन यहाँ, इंसानियत रहे ज़िंदा यहाँ

आँचल में सबके हों खुशियाँ, ये धरती हो गुलशन यहाँ
उस खुदा का करम नसीब हो सबको, इंसानियत रहे जिन्दा यहाँ

उस खुदा पर हो एतबार सबको, उम्मीदें सबकी रोशन हों यहाँ
तेरे आँचल का मिले सहारा खुदा, अरमां सभी के गुलज़ार हों यहाँ

मेरी आरज़ू मेरे खुदा, हर शख्स तेरा नूर बन महके यहाँ
आफतों का कोई दौर हो, आशयां हों सभी के रोशन यहाँ

आदमियत हो जिन्दगी का मकसद , आजमाइशों से कोई गुज़रे यहाँ
चंद ख़्वाब लेकर सब जियें, भागदौड़ का हो आलम यहाँ

आफताब सा रोशन हो हर एक शख्स मौला, इश्क हो मजहब यहाँ
आशिक बना सबको अपना मेरे खुदा, मुहब्बत मकसदे  - इबादत हो यहाँ

Monday, 17 October 2016

कल्पनाओं के समंदर से खुद को मुक्त कर के देख - मुक्तक

१.


कल्पनाओं के समंदर से खुद को, मुक्त कर के देख 

सच के सागर मैं उतर, एक नया जहाँ बसा के देख

सुरसरि सा हो पावन, अंतर्मन जगा के देख

उत्कर्ष को तू कर ले मंजिल ,कर्म को जीवन बना के देख

२.


अहम् को  छोड़कर तू, स्वाभिमान से रिश्ता बना के देख 
 
कामनाओं मैं न फंस तू, जीवन से रिश्ता बना के देख

आवेश  में न उबल तू, संयम से रिश्ता बना के देख 

 परछाइयों के पीछे न भाग, सच के आईने से नज़रैं मिला के देख



3.


विलासिता में  न उलझ, खुद को दिलासा दे के देख 

 संतोष को कर जीवन का गहना, तूफान से खुद को बचा के देख

दयालु  है वो कृपालु, उसकी शरण में आके देख 

मुक्ति की तू कर कामना, वेदनाओं को भुला के देख







विचारों की कलम से



विचारों की कलम से रोशन, साहित्य का संसार हो जाने दो

जाग उठें सामाजिक विषय ,
बुराइयों का अंत हो जाने दो

जिन्दगी ख़त्म होने की राह पर हो अगर,
आस के दीपक को बुझने देना

ये जिन्दगी है आँधियों का सा सफ़र ,
अपने आत्म विश्वास की लौ को बुझने देना

चंद मुसीबतों को न समझ लेना अपनी जिन्दगी का अंत

कर बुलंद खुद को और कर
अपने प्रयासों पर यकीन

किताबों ने किये
करोड़ों दिल रोशन

चलो कुछ किताबें और पढ़ें
और बढ़ चलें उजाले की ओर

जिन्दगी को संभालकर रखो
एक दीपक की तरह

किसी की स्याह जिन्दगी में
उजाला कर सके एक दिन

मुफ़लिसी का दौर भी
क्या दौर  - ए  - जिन्दगी

कभी मिली दो रोटी
कभी फांके हुए नसीब

कल्पनाओं के समंदर से खुद को, मुक्त कर के देख
सच के सागर में उतर
, एक नया जहाँ बसा के देख
सुरसरि सा हो पावन
, अंतर्मन जगा के देख
उत्कर्ष को तू कर ले मंजिल
,कर्म को जीवन बना के देख

अहं को छोड़कर तू, स्वाभिमान से रिश्ता बना के देख
कामनाओं में न फंस तू
, जीवन से रिश्ता बना के देख
आवेश में न उबल तू
, संयम से रिश्ता बना के देख
परछाइयों के पीछे न भाग
, सच के आईने से नज़रें मिला के देख

विलासिता में न उलझ, खुद को दिलासा दे के देख
संतोष को कर जीवन का गहना
, तूफ़ान से खुद को बचा के देख
दयालु है वो कृपालु
, उसकी शरण में आ के देख
मुक्ति की तू कर कामना
, वेदनाओं को भुला के देख

Sunday, 16 October 2016

मेरी कोशिशें , मेरी मंजिल का पता दो मुझको


 मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

मेरी कोशिशें मेरी मंजिल का पता दो मुझको
जी रहे हैं जो , सिसकती साँसों के संग, उनका पता दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

सो रहे हैं जो, उन्हें जगाने का सिला दो मुझको
भटक गए हैं जो, उन्हे राह दिखाने का ज़ज्बा दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

वेदनाओं से व्यथित हैं जो, उन्हें संभालने का सिला दो मुझको
धर्म की राह से विलग हो गए हैं जो, उन्हें सही राह पर लाने का ज़ज्बा दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

ग़मगीन से जी रहे हैं जो, उनका पता दो मुझको
उनके चेहरों पर मुस्कराहट लाने का ज़ज्बा दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको


 नीरस जीवन जी रहे हैं जो, उनका पता दो मुझको
कर सकूं उनका आशियाँ रोशन, ऐसा सिला दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

जी रहे हैं जो अनाथों सा जीवन, उनका पता दो मुझको
पूर्ण उनके सार स्वप्न कर सकूं मैं, ऐसा ज़ज्बा दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

खुदा पर से उठ गया है भरोसा जिनका, उनका पता दो मुझको
तेरी इबादत उनका मकसदे  - जिन्दगी कर सकूं , ऐसा ज़ज्बा दो मुझको

मेरी कोशिशें   , मेरी मंजिल  का पता  दो मुझको

इंसानियत जिनकी जिन्दगी का मकसद नहीं, उन्हें राह दिखाने का सिला दो मुझको
मेरी जिन्दगी तेरी अमानत हो जाए, अपने करम से नवाज़ दो मुझको