लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Tuesday, 30 June 2015

मुल्क देख रहा है

मुल्क देख रहा है

मुल्क देख रहा है मायूसी का दौर
सरे राह बिकते बदन, चीरहरण का दौर

काम प्रबल विचार, वहशीपन का दौर
टूटती सांसें , असुरक्षा का दौर

रक्षकों पर से उठते , भरोसे का दौर
असामाजिक, अनैतिक  लालसाओं का दौर

अमर्यादित , नाउम्मीदी से जूझता दौर
रिश्तों पर से विश्वास खोते, बन्धनों का दौर

शून्य में झांकती आंखें, आशंका भरे पदचापों का दौर
सामाजिक बन्धनों को “ लिव – इन रिलेशनशिप “ कहने का दौर

शारीरिक सम्मोहन में घिरे रहने का अनैतिक दौर
आध्यात्मिकता को नगण्य बता, आधुनिक विचारों में जीवन ढूँढने का दौर

एक दूसरे को संदेह भरी नज़रों से देखने का दौर
बुजुर्गों के सम्मान और प्रतिष्ठा से खेलने का दौर

आधुनिक वैज्ञानिक विचारों में जीवन स्थापित करने का असफल दौर
सद्विचारों, सद्चारित्रों, आदर्शों,अभिनन्दन मार्ग से विहीन दौर
 स्वय को असहाय बनाये रखने का दौर

क्या यह दौर युवा पीढ़ी के उज्जवल भविष्य की दस्तक है ?
या स्वयं को छलावे में फंसाए रखने का दौर

कब मुक्त होगा यह मानव, कब नींद से जागेगा यह ?
कब इसे अनैतिक प्रयासों का होगा भान ?

कब इसे अपने मानव होने का होगा बोध ?
कब यह रिश्तों के बंधन को समझेगा ?

कब इसे होगा अनैतिकता का बोध ?
कब यह मानव युवा पीढ़ी का आदर्श बन चमकेगा ?

कब यह अभिनन्दन मार्ग पर होगा प्रस्थित ?
कब इसे स्वाकार होगा उस परम तत्व का बोध ?

कब यह  टूटी साँसों का बनेगा सहारा ?
कब इसकी पदचाप शुभ का संकेत होगी ?

कब यह बुजुर्गों के आशीर्वाद तले पायेगा जीवन ?
कब यह आधुनिक विचारों को देगा तिलांजलि ?

कब यह आध्यात्मिकता के मार्ग पर होगा प्रस्थित ?
कब यह काम के वशीकरण से आएगा बाहर ?

 मानव का होना शुभ का संकेत होगा कब?
कब........? कब..........? आखिर कब .............?



Monday, 29 June 2015

शिक्षा साधनों की मोहताज नहीं होती - शिक्षा पर मेंरे विचार


१.

शिक्षा साधनों की मोहताज नहीं होती

शिक्षा हौसलों की उड़ान होती है 


२.


शिक्षा चंद सिक्कों से तौली नहीं जाती

शिक्षा संस्कृति व संस्कारों की बिसात होती है


3.



शिक्षा किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं होती

शिक्षा तो हर एक की किस्मत का नूर होती है




वो शरमाये तो लगा , चाँद भी शरमाया - मुक्तक

१.


वो शरमाये तो लगा, चाँद भी शरमाया
उनसे नज़रें मिली ,उन पर हमको प्यार आया

चूड़ियों की खनखनाहट ने, जगा दिया मुझको
सपनों में ही सही ,उनको अपने करीब पाया

२.


पाक-साफ़ नीयत से, चाहा है मैंने तुझको
त का खुदा समझा ,मैंने तुझको

रहे मुहब्बत का ,यह चश्मों - चिराग
कुछ इसी आरज़ू से ,पूजा है मैंने तुझको


3.


कौन कहता है , इश्क रुलाता है हमें

ये तो वो शै है , जो खुदा से मिलाता है हमें

4.


चाहता हूँ मेरे खुदा ,तेरी रहमत

कुछ ऐसा कर ,इंसानियत मेरा खुदा हो जाए

खुद को दूसरों के लिए ,कर सकूं कुर्बान

कुछ ऐसा कर हर एक शख्स ,मेरा भगवान हो
जाए


5.


जोश, ज़ज्बा, जूनून, दिल में साथ लिए

चले हैं वतन की राह , दिल में साथ लिए

मर मिटेंगे वतन पर , रोशन चिराग लिए

मिटा देंगे दुश्मनों के निशान, वतन परस्ती का

ज़ज्बा, दिल में साथ लिए






वो जो मुस्कुरा दें, तो रोशन बहार हो जाए

१. 

वो जो मुस्कुरा दें ,तो रोशन बहार हो जाए
दिल में उमंग जगे , दिल को करार आये

कौन है जो उनकी मुस्कराहट पर न मरे
हाँ कि खुद को उनकी मुस्कराहट पर निसार आये 

२.

गर सभी को चाँद नसीब हो जाए
तारों की  ओर  से फिर जायेगी नज़र सबकी

गर सभी की किस्मत में आसमां हो जाए
धरती की ओर  फिर नज़र होगी किसकी

3.


किनारों पर बैठकर अथाह समंदर का नज़ारा नहीं करते 
'\करते  हैं सैर समंदर की , यूं लहरों से किनारा नहीं करते 

 मौज़ों से खेलना है जिनकी जिन्दगी का सबब 
वो किनारों पर बैठकर , यूं जिन्दगी गुजारा  नहीं करते








Sunday, 28 June 2015

बनाकर अपना मुझको , वो कहीं गुम हो गए

१.

बनाकर अपना मुझको , वो कहीं गुम हो
गए

हम हैं कि अपनी यादों में , उनकी  तलाश
करते हैं


२.


दिल की आवाज़, दिल ही बेहतर जाने

दिल की दुनिया का अपना ही खुदा होता है 

3.

ज़ख्म दिल के भरेंगे एक दिन, उम्मीद नहीं

दिल का हर एक ज़ख्म ,लाइलाज होता है

4.


जुकाम हुआ नहीं है मुझको, जो ठीक हो जाए

ये दिल का रोग है, जिसका कोई इलाज़ नहीं








Tuesday, 21 April 2015

जब आगंतुक का सम्मान होने लगे - मुक्तक

१.

जब आगंतुक का सम्मान होने लेगे
जब याचक अन्न पाने लगें

जब धर्म का विस्तार होने लगे
समझो सामाजिकता विकसित होने लगी है


२.

जब हम अभिमान त्यागें
तब हम सम्मान पायें

जब हम क्रोध पर विजय पायें
तब हम परमेश्वर को पायें


3.

जब हमारी आकांक्षायें शांत हो जाएँ
जब हमारी कोमल भावनाएं हो जाएँ

जब हम मानवता के पुजारी हो जाएँ
हम समझें कि परमेश्वर की कृपा के हम धनी हैं


4.

जब अतिथि सत्कार होने लगे
जब गरीबों पर दया की जाने लगे

जब भिक्षुक भोजन पाने लगें
समझो मानवता अपने शिखर पर है


5.

जब अतिथि सत्कार होने लगे
जब गरीबों पर दया की जाने लगे

जब भिक्षुक भोजन पाने लगें
समझो मानवता अपने शिखर पर है




इन्द्रियों पर वश हो तेरा

१.


इन्द्रियों पर वश हो तेरा
तेरा सब अनुसरण करें ऐसा कद हो तेरा

जिसकी कल्पना न की हो किसी ने
ऐसा अलौकिक , अद्वितीय  व्यक्तित्व हो तेरा 

२.

सूरज सा तेज  , चाँद सी चांदनी दे दे 
हो सके तो  मेरे खुदा मुझे भी जिंदगानी दे दे 

कि पल रहे हैं सभी तेरे करम से 
मुझे भी इबादते - जिंदगानी दे दे 


3.


जब कालिंदी पवित्र नाद करने लगे
जब धरती हरियाली का आचमन करने लगे

जब प्राणवायु में खुशबू बहने लगे
समझो प्रकृति प्रसन्नता व्यक्त कर रही है



4.

जब युवा पीढ़ी संस्कारित होने लगे
घर -घर शंखनाद बजने लगे

जब देवालयों में श्रद्धालु आने लगें
समझो संस्कार पल्लवित  होने लेगे हैं


5.

सरिता जब अपनी मस्त चाल में झूमने लगे
गिरि जब छाती चौड़ी कर गर्व महसूस करने लगें

जब कानन जीवों की हुंकार से भरने लगें
समझो प्रकृति प्रेम चरम पर है






किसी की चाहत में खुद को भुलाकर तो देखो - मुक्तक

१.


किसी की चाहत में खुद को भुलाकर तो देखो 

 किसी को मुहब्बत का खुदा बनाकर तो देखो  


इश्क इन्सान को भगवान्‌ बना देता है 

किसी हसीना से दिल लगाकर तो देखो


२.

पुस्तकों से नाता बनाकर तो देखो

चार कदम ज्ञान की राह पर जाकर तो देखो

ज्ञान इंसान को भगवान्‌ बना देता है

किताबों से दिल लगाकर तो देखो 

3.

अपने अरमानों को पंख लगाकर तो देखो

अपने सपनों को आसमान तक ले जाकर तो देखो

पूरे होते हैं ख़वाब इस जहां में ही

अपने ख़्वाबों को खुदा की इबादतगाह तक ले जाकर तो देखो




4.

गर्दिश में कोई राह खोजकर तो देखो

मुसीबत में सच का सहारा लेकर तो देखो

यूं ही नहीं फूल खिलते चमन में

उस खुदा के दर का नज़ारा करके तो देखो




किताबों से रिश्ता बनाकर तो देखो - मुक्तक

1.

किताबों से रिश्ता बनाकर तो देखो

ज्ञान के सागर में डुबकी लगाकर तो देखो

माँ शारदे के चरणों में सिर झुकाकर तो देखो

किताबों से रिश्ता बनाकर तो देखो


२.

किसी गिरते राही को उठाकर तो देखो

पालने के बालक को हंसाकर तो देखो

इंसानियत की राहें इतनी भी मुश्किल नहीं हैं

किसी की जिन्दगी बनाकर तो देखो


3.


संघर्षों के दौर से गुजरकर तो देखो 

जीवन की ऊँचाइयों को छूकर तो देखो

इतनी भी मुश्किल नहीं हैं जीवन की राहें

किसी के जीवन के आँगन का फूल बनकर तो देखो


3.

न सूनी - सूनी सी लग रही है फिजां

दो चार फूल खिलाकर तो देखो

निर्जन वन में भटक रहे हो क्यों

 किसी को अपने जीवन में बसाकर तो देखो



5.


किसी रूठते को मनाकर तो देखो 


किसी अजनबी को गले से लगाकर तो  देखो


जीवन सफल हो जाएगा एक दिन


उस प्रभु से रिश्ता बनाकर तो देखो




Tuesday, 7 April 2015

जब भी तेरी यादों में खोया तेरा ज़िक्र हो आया व अन्य मुक्तक

१.

जब भी तेरी  यादों में खोया , तेरा जिक्र हो आया 

ये एहसासे - मुहब्बत भी क्या चीज है सनम

२.


जब भी तेरे ख्यालों में खोया , तुझको करीब पाया

तसव्वुर  में ही सही , एक बार आकर तो  मिल 


3.


जहाँ भी देखूं बस तू ही तू नज़र आती है

 इस दिल को मनाने के लिए यह ख्याल काफी है 


4.


तू जहां भी रहे  मेरे दिल में बसर करती है

तेरी यादों के सहारे ही जी रहा हूँ मैं


5.


दिल को तेरे प्यार का सहारा जो मिले

राहों में चाँद - तारों को बिखेर दूंगा


६.


अलफ़ाज़ प्यार के जो तूने मुहब्बत में कहे मुझको

खुदा कसम आँखों पर बिठा कर रखता तुझको


7.


तुझको मुहब्बत का खुदा समझा जानम

तुम हो तुम्हें मेरी मुहब्बत की कद्र नहीं

8.

की हद तक है मैंने तुझको प्यार किया

आज भी मैं तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ ए  सनम