लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Tuesday, 3 July 2012

बाबू की बाबूगिरी

बाबू की माया
बाबू की माया
कोई समझ नहीं पाया

काइयां जिसकी सख्सियत
अंतरात्मा से धूर्त
सारी दुनिया को यह
समझता महामूर्ख

बाबू हमारे एकदम निराले
आँखों पर चढ़ा चश्मा
कारनामे करते सारे काले
दूसरों की  बढ़ी तनख्वाह से
इन्हें हमेशा नफरत
चाहे भरा हो
इनका खुद का पर्स

सरसरी इनकी निगाहें
छोड़ती नहीं कोई आंकड़े
चश्मे के भीतर की दो आँखों से
भांप लेते हैं ये बिल का मज़मून
इनके खुद के नियमों के आगे
चलता नहीं कोई क़ानून

अच्छे – अच्छे अफसर मानते हैं
इनकी शातिर चालों का लोहा
क्योंकि उनके पास भी नहीं है पढ़ने को
बाबू चालीसा के अलावा कोई दोहा

बाबू की बाबूगिरी ने सबको हैं
नाकों चने चबवाए
इनकी लाल कलम से यारों
कोई ना बचने पाए

बाबू की कारगुजारी
हर पेन पर है पड़ती भारी
लाल पेन के आगे भैया
चलती नहीं कोई कटारी

पल नित नए तरीके खोजें
पैसे रोकन की राह खोजें
फैकें नए पेंतरे नित-दिन
पास नहीं होते हमारे बिल

बाबू से जो ना हो अंडरस्टेन्डिंग
समझो तुम्हारी फाइल पेंडिंग
पीछे के दरवाजे से तुम
बाबू के घर में घुस सकते हो

चाय चढावा देकर भैया
पूरा बिल पास करा सकते हो
हमारी जो तुम मानो भैया
बाबू से पंगा मत लेना
बड़ी गंदी कौम होती है ये
इनका ना कोई भाई और ना कोई भैया
बस इनका जो चल जाए तो
मिले ना तुमको इक रुपैया

जानो तुम बाबू की माया को
देखो मत इनकी काया को
दिल में इनके जगह बनाओ
चाय – चढावा खूब चढाओ

चाहे सामने के दरवाजे से आओ
या फिर पीछे के दरवाजे से आओ
बाबू की कौम से भैया
रहना संभल – संभल के

हमारी जो मानो तुम भैया
बाबू से पंगा मत लेना
इनके दर पर माथा टेको
थोडा झुक – झुक कर रैंगो
बाबू की खोची खिच्चड़ माया
जिससे कोई बच न पाया
हमरी बात को मन में धारो
बाबू से ये सब जग हारो
बाबू से ये सब जग हारो  
बाबू से ये सब जग हारो

Sunday, 17 June 2012

मानव मन

     मानव मन
मानव मन
एक पंछी की भाँति
उड़ता दूर गगन में
कभी ना ठहरे
एक डाल पर
रैन बसेरा
बदल  – बदल कर
बढ़ता जीवन पथ
चाह उसे
उन्मुक्त गगन की
चंचल मन
स्थिरता ठुकराए
मन उसका
विस्तृत – विस्तृत
चाल भी है
उसकी मतवाली
संयमता , आदर्श  , अनुशासन
सभी उसके मन पटल पर
अमित छाप छोड़ते
फिर भी
अस्तित्व की लड़ाई
कर्मभूमि से
पलायन न करने का
उसका स्वभाव
प्रेरित करता
लड़ो , जब तक जीवन है
संघर्ष करो
एक डाल पर बैठकर
अपने अस्तित्व को
यूं न रुलाओ
जियो और जियो
कुछ इस तरह
कि मरें तो
अफ़सोस न हो
और जियें कुछ
इस अंदाज़ में
कि बार – बार
हार कर
उठने का गम न हो
उन्मुक्त
इस तरह बढ़ें कि
राह के पत्थर
फूल बन बिछ जायें
उडें कुछ इस तरह
कि आसमान भी
साथ – साथ उड़ने को
मजबूर हो जाए
आगे बढ़ें
कुछ इस तरह
कि तूफान की रफ्तार
धीमी हो जाए
आंधियां थम जायें
मौजों को भी
राह बदलनी पड़ जाये
कुछ इस तरह
अपने मन  को
दृढ़ इच्छा को
पतवार बना
रुकना नहीं है मुझको
मन की अभिलाषा
मन के अंतर्मन में जन्म लेती
स्वयं  प्रेरणादायिनी विचारों की श्रृंखला
चीरकर  हवाओं का सीना
बढ़ चलूँगा
कभी न रुकूंगा

जीवन

जीवन
जीवन स्वयं को प्रश्न जाल में
उलझा पा रहा है

जीवन  स्वयं को एक अनजान
घुटन में असहाय पा रहा है

जीवन स्वयं के जीवन के
बारे में जानने में  असफल सा है

जीवन क्या है  इस मकड़जाल को
समझ सको तो समझो

जीवन क्या है , इससे बाहर
निकल सको तो निकलो

जीवन क्या है , एक मजबूरी है
या है कोई छलावा

कोई इसको पा जाता है
कोई पीछे रह जाता

जीवन मूल्यों की बिसात है
जितने चाहे मूल्य निखारो

जीवन आनंदित हो जाए
ऐसे नैतिक मूल्य संवारो

जीवन एक अमूल्य निधि है
हर – क्षण  इसका पुण्य बना लो
मोक्ष मुक्ति मार्ग जीवन का
हो सके तो इसे अपना लो

नाता जोड़ो सुसंकल्पों से
सुआदर्शों को निधि बना लो

जीवन विकसित जीवन से हो
पर जीवन उद्धार करो तुम

सपना अपना जीवन – जीवन
पर जीवन भी अपना जीवन

धरती पर जीवन पुष्पित हो
जीवन – जीवन खेल करो तुम

चहुँ ओर आदर्श की पूंजी
हर पल जीवन विस्तार करो तुम

जीवन अंत ,पूर्ण विकसित हो
नए नर्ग निर्मित करो तुम

नववर्ष

नववर्ष
हर दिन को नए वर्ष की
मंगल  कामना से पुष्पित करो
कुछ संकल्प लो तुम
कुछ आदर्श स्थापित करो

हर दिन यूं ही कल में
परिवर्तित हो जाएगा
तूने जो कुछ न पाया तो
सब व्यर्थ हो जाएगा

उद्योग हम नित नए करें
हम नित नए पुष्प विकसित करें
कर्म धरा को अपना लो तुम
हर- क्षण हर -पल को पा लो तुम

समय व्यर्थ जो हो जायेगा
हाथ न तेरे कुछ आएगा
मात – पिता आशीष तले
जीवन को अनुशासित कर
पुण्य संस्कार अपनाकर
अपना कुछ उद्धार करो तुम

इस पुण्य धरा के पावन पुतले
राष्ट्र प्रेम संस्कार धरो तुम
मानवता की सीढ़ी चढ़कर
संस्कृति का चोला लेकर

पुण्य लेखनी बन धरती पर 
मानव बन उपकार करो तुम
संकल्पों का बाना बुनकर
नित- नए आदर्श गढो तुम

अपनाकर जीवन में उजाला
नित – नए आयाम बनो तुम
दया पात्र बनकर ना जीना
अन्धकार को दूर करो तुम

हर दिन को नए वर्ष की
मंगल कामना से पुष्पित करो
कुछ संकल्प लो तुम
कुछ आदर्श स्थापित करो