लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 30 November 2014

ईश्वर से साक्षात्कार कराता है संगीत


ईश्वर से साक्षात्कार कराता है संगीत


ईश्वर से साक्षात्कार कराता है संगीत
ख़ुदा की इबादत सिखाता है संगीत 
 
दिल के कोने में जब गुनगुनाता है संगीत
स्वयं का खुदा से परिचय कराता है संगीत


कहीं माँ की लोरियों में गुनगुनाता है संगीत
कहीं कृष्ण की बांसुरी में भाता है संगीत 
 
गायों की गले की घंटी से जन्म लेता संगीत
कहीं बैलगाड़ी की घंटियों से उपजता संगीत


कहीं प्रेयसी को प्रेमी से मिलाता संगीत
कहीं नवजात को मुस्कुराना सिखाता है संगीत 
 
संगीत का स्वयं से स्वयं का परिचय नहीं
लोगों के सोये भाग्य जगाता है संगीत


बंज़र में भी फूल खिलाता है संगीत
उदास चेहरे पर मुस्कान जगाता है संगीत 
 
कहीं खुदा की इबादत हो जाता है संगीत
कहीं कुरआन की आयत , गीता के श्लोक हो जाता है 
संगीत


कहीं दूर चरवाहे के दिल में बसता संगीत
कहीं पंक्षियों के कलरव से उपजता संगीत 
 
संगीत की कोई सीमा नहीं होती
धरती के कण – कण में बसता है संगीत




हमने देखा है हिमालय को टूटते


हमने देखा है हिमालय को टूटते 
 
हमने देखा है हिमालय को टूटते 
 
सुनी है उसकी अन्तरात्मा की टीस 
 
स्वयं के अस्तित्व को टटोलता 
 
 मानव मन को टोहता 
 
सहज अनुभूतियों के झिलमिलाते रंग फीके पड़ते 
 
एक नई सहर की दास्ताँ लिए 
 
समय के साथ संवाद करता 
 
कहीं दूर आशा की किरण के साथ 
 
फिर से पंखों पर उड़ने को बेताब 
 
 हमने देखा है हिमालय को टूटते 
 
अस्तित्व खोता विशाल बरगद जिस तरह 
 
अंतिम पड़ाव पर स्वयं के जीवन के 
 
मानव मन की भयावह तस्वीर पर 
 
चीख – चीखकर पूछ रहा हिमालय 
 
हे मानव तुम कब जागोगे 
 
क्या मैं जब मिट जाऊंगा , तब जागोगे 
 
प्रकृति से ही जन्मा मानव 
 
स्वयं को प्रकृति से भिन्न 
 
समझने की 
 
स्वयं की इच्छाओं से बंधा मानव 
 
स्वयं की इच्छाओं के अनियंत्रित प्रमाद में 
 
प्रकृति को रौंदता अविराम 
 
प्रकृति ने हम शिशुपालों को 
 
सदियों किया माफ़ 
 
अंत समय जब पाप का घड़ा भरा 
 
मानव अपने अस्तित्व को तरसता 
 
स्वयं के द्वारा मर्यादाओं की टीस झेलता 
 
हिमालय , बर्फ्र रहित बेजान पत्थरों – पहाड़ियों का 

समूह न होकर 
 
 प्रकृति निकल पड़ी है तलाश में 
 
स्वयं के अस्तित्व को गर्त में जाने से बचाने 
 
चिंचित है प्रकृति , हिमालय के अस्तित्व को लेकर 
 
हिमालय कहीं खो गया है 
 
महाकवि कालिदास की रचना 
 
ऋतुसंहार से उपजी हिमालय की अद्भुत गाथा 
 
कालिदास कृत कुमार संभव में हुआ हिमालय का गुणगान
 
विविधताओं से परिपूर्ण हिमालय 
 
भारत का ह्रदय , भारत का जीवनदाता , पालनहार 

हिमालय 
 
पर्यावरण संरक्षण रुपी संस्कृति वा संस्कारों की बाट

 जोहता हिमालय 
 
स्वयम के अस्तित्व को मानव अस्तित्व से जोड़कर 

देखता हिमालय
 
बार – बार यही चिंतन करता 
 
 क्या जागेगा मानव और जागेगा तो कब 
 
क्या मानव मेरे अस्तित्व हित स्वयं के हित का प्रयास 

करेगा
 
और यदि ऐसा नहीं हुआ तो 
 
हिमालय और मानव किस गति को प्राप्त होंगे 
 
क्या इसके प्रतिफल स्वरूप होगा 
 
एक सभ्यता का विनाश 
 
एक सभ्यता का विनाश 
 
एक सभ्यता का विनाश


Tuesday, 25 November 2014

कुदरत है बड़ी कारसाज

कुदरत है बड़ी कारसाज

कुदरत है बड़ी कारसाज, आओ करें इससे प्यार 
कुदरत के नज़ारे हज़ार , आओ करैं इससे प्यार

कुदरत के किस्से हज़ार , आओ करैं इससे प्यार
कुदरत की महिमा अपार , आओ करैं इससे प्यार

कुदरत के कौतुक अजाब हैं , कुदरत के अफ़साने हज़ार
कुदरत  उस खुदा की अमानत , कुदरत के आँचल हज़ार

कुदरत के आशियाँ निराले , कुदरत के आसमान हज़ार
कुदरत खुदा का नूर है , कुदरत की इबारत हज़ार

कुदरत उस खुदा की इबादत , कुदरत के जलवे हज़ार
कुदरत से है उम्मीद सबको , कुदरत के नखरे हज़ार

कुदरत किताब की मानिंद , कुदरत के पन्ने हज़ार
कुदरत की खिदमत खुदा की खिदमत , कुदरत के खुदा हज़ार
कुदरत खुदा का करिश्मा , कुदरत की इबादत हज़ार

कुदरत है फूलों का गुलशन , कुदरत की हैं खुशबू हज़ार
कुदरत जिन्दगी का चमन है , कुदरत के चरित्र हज़ार

कुदरत जागीर नहीं किसी की, कुदरत के चाहने वाले हज़ार

कुदरत खुदा की है जन्नत , इसके इबादातगार  हज़ार 

जी रहे हैं सब इस शहर में बेज़ार से

जी रहे हैं सब इस शहर में बेज़ार से

जी रहे हैं सब इस शहर में बेज़ार से
कोई तो हो ऐसा अपना कहें जिसे

ढूद्ता फिर रहा हूँ मैं तुझसा कोई जानशीन
कोई तो हो ऐसा तुझसा कहें जिसे

हसरत है दिल में दीदार उस खुदा का हो
ऐसा कहाँ से लाऊँ खुदा कहें जिसे

गरीबी में तन्गेहाल जी रहे हैं सब
ऐसा कहाँ से पाऊँ खुदा का बन्दा कहें जिसे


है कोई शख्स कोई न कोई कमी तो है
ऐसा तो कोई हो कि सब अच्छा कहें जिसे

पालते नहीं हैं खौफ उस खुदा का  हम
ऐसा कोई शख्स दिखा दो खुदा का जानशीन कहें जिसे

पालने में रो रहा है वो बालक फूट फूटकर
कोई तो ऐसा हो हम माँ कहें जिसे

वफ़ा की राह इतनी भी आसान नहीं है
कोई तो ऐसा हो मुहब्बत का खुदा कहें जिसे

देखते हैं कई मंज़र हर रोज हम चौराहों पर  
ऐसा भी कोई हो इंसानियत का खुदा कहें जिसे




आईने में देख सूरत मुस्कुरा रहे हैं वो

आईने में देख सूरत मुस्कुरा रहे हैं वो

आईने में देख सूरत मुस्कुरा रहे हैं वो
माना कि खुद को देख लजा रहे हैं वो

अपने हुस्न का परचम लहरा रहे हैं वो
तभी तो सबकी आँखों को भा रहे हैं वो

पूछे तो कोई उनसे उनकी खूबसूरती का राज़
यूं ही नहीं अपनी खूबसूरती सबको दिखा रहे हैं वो

अंदाज़ अपना सबसे अलग बता रहे हैं वो
हल्दी की उबटन से रोज नहा रहे हैं वो

उनकी नीली नीली गहरी आँखों की बातें न पूछो
यूं ही रोज काजल नहीं लगा रहे हैं वो

उनकी मस्त चाल पर नज़र न डालो
सुबह शाम कैटवाक की प्रेक्टिस यूं ही नहीं कर रहे हैं वो

उनका अंदाज़े बयाँ कुछ ख़ास खास है
यूं ही नहीं सबको देखकर मुस्कुरा रहे हैं वो

आईने में देख सूरत मुस्कुरा रहे हैं वो
माना कि खुद को देख लजा रहे हैं वो



निराली है तेरी छवि हे कन्हाई

निराली है तेरी छवि हे कन्हाई निराली है तेरी छवि हे कन्हाई वंशी की धुन हमें दे सुनाई हे नंदनंदन हे मुरलीधर हम तुम पर जाएँ बलिहारी केवट बना हमें पार उतारो चरणों की प्रभु धूलि बना लो हम बालक नादान हैं मोहन संकट के प्रभु बादल हर लो तेरे चरणों से प्रीती हमको गिरधर पावन कर दो हमको निर्धन को प्रभु धन का वर दो हे मोहन भक्ति का रस दो ज़र्ज़र होती काया मेरी सुधि ले लो मनमोहन मेरी मुश्किल की है घड़ी है आई तन में प्राण नहीं रे कन्हाई दुर्बलता से मुक्ति दे दो मन को मेरे पावन कर दो अपने दरश दिखा दो मुझको हे बरसाने के कृष्णा मुरारी जब प्राण तन से निकलें तुम पास हो मुरारी मोहित हो गया हूँ मैं तेरी मनमोहक छवि पर सुद्बुध मेरी बिसरी तुझे अपने करीब पाकर मुझे मिल गया किनारा मोक्ष की घड़ी है आई निराली है तेरी छवि हे कन्हाई वंशी की धुन हमें दे सुनाई