लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Saturday, 6 September 2014

हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

पुष्पित मेरे कर्म करो तुम ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
सत्य मार्ग दिखाओ मुझको ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

निष्काम कर्म का वर दो मुझको ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
करो जीवन साकार ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

गुरु उपदेश मिले जो मुझको, हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
धन्य हो जाए मेरा जीवन ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

नाम जपूँ मैं तेरा हर क्षण ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
अपनी शरण में ले लो मुझको ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

ज्ञान मार्ग प्रस्थित हो जाऊं ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
साकार ब्रह्म को लक्ष्य बनाऊँ ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

हो जाऊं मैं तेरा साधक ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
मुझको  राह दिखाओ प्रभु ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

संसार जाल से मुक्त करो प्रभु ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
मोक्ष मार्ग दिखलाओ हे प्रभु ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

स्वयं में मुझको लीन करो तुम ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
जीवन पार लगाओ प्रभु ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी

पुष्पित मेरे कर्म करो तुम ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी
सत्य मार्ग दिखाओ मुझको ,हे अन्तर्यामी हे अन्तर्यामी





पलकों में बिठाकर तुझको

पलकों में बिठाकर तुझको

पलकों में बिठाकर तुझको , सीने से लगाकर तुझको
ए मेरी जान प्यार करूंगा, दिल में सजाकर तुझको

तू मेरी आँखों का नूर है जानम
तू मेरे दिल का शुरूर है जानम

तेरे रूप की मादकता ,लुभाती है मुझको
में अपनी बाहों में ,समाना चाहता हूँ तुझको

लोग क्यूं ना करें ,तेरे हुस्न की चर्चा
ख़ास वक़्त में खुदा ने ,तराशा है तुझको

पलकें बिछा इंतज़ार ,कर रहा हूँ तेरा
अक्सर सपनों में अपने करीब ,पाया है तुझको

तू दो कदम जो चले ,तो दिल की धडकनें बढ़ जाती हैं
हमेशा ही दिल के करीब ,महसूस किया है तुझको

तेरा दीदार मुझको ,चैन देता है ए जानम
अक्सर दिल के करीब ,मैंने पाया है तुझको

ए ख़्वाबों की मल्लिका , हुस्न की देवी
तेरे इश्क़ के समंदर में ,डुबोया है खुद को

पलकों में बिठाकर तुझको , सीने से लगाकर तुझको
ए मेरी जान प्यार करूंगा ,दिल में सजाकर तुझको


काश तुमने मुझे कुछ वक़्त दिया होता

काश तुमने मुझे कुछ वक़्त दिया होता

काश तुमने मुझे कुछ वक़्त दिया होता
मैं कुछ आदर्श चरित्रों का निर्माण कर पाता

काश तुमने मुझे लेखनी की रागिनी प्रदान की होती
मैं कुछ संस्कारों व सद्विचारों की रचना कर पाता

काश तुमने मुझे माँ शारदे की शरण में भेजा होता
मैं भी माँ के आशीर्वचन से ज्ञान की गंगा बहा पाता

काश तुम मुझे सत्मार्ग की और मुखरित करते
मैं धरा पर सद्चारित्रों को विकसित करता

काश तुमने मुझे गंगा के पावन जल से आचमन कराया होता
मैं पावन विचारों की गंगा बहाता , संस्कृति व संस्कारों को पल्लवित करता

काश मुझे माँ के आँचल का सहारा मिला होता
मैं भी माँ की लोरियों का आचमन करता ,   मातृ ऋणसे पुष्पित होता

काश तुमने मुझे ज़मीं पर तारा बनाकर भेजा होता
मैं भी धरा को तारों के समंदर में नहलाता

काश तुमने मुझे आध्यात्मिकता प्रदान की होती
मैं भी मोक्ष मार्ग प्रस्थित होता और हे परमेश्वर मैं तेरी गोद में खेल रहा होता



मुझको अपनी शरण में ले लो हे मनमोहन हे गिरधारी

मुझको अपनी शरण में ले लो हे मनमोहन हे गिरधारी

मुझको अपनी शरण में ले लो ,हे मनमोहन हे गिरधारी
चरण कमल तेरे बलि – बाले जाऊं ,हे मनमोहन हे गिरधारी

मिथ्या अभिमान से दूर रखो तुम, हे मनमोहन हे गिरधारी
पाप – पुण्य का भेद बताओ ,हे मनमोहन हे गिरधारी

हाथ जोड़ तेरे मंदिर आऊँ, हे मनमोहन हे गिरधारी
पाऊँ तेरा दरश गिरधारी, हे मनमोहन हे गिरधारी

पहला ऋतुफल तुझको अर्पित, हे मनमोहन हे गिरधारी
पाछे सब पाऊँ बनवारी हे, मनमोहन हे गिरधारी

मनोहर छवि मुझे भाये तुम्हारी ,मुझको दरश दिखाओ गिरिधारी
मात- पिता की सेवा कर लूं ऐसे भाग्य जगाओ ,बनवारी हे मनमोहन हे गिरधारी

मोक्ष मार्ग बतलाओ हे प्रभु ,अपने चरणों में लाओ मुरारी
कोमल वाणी प्यारी मुझको जीवन तृष्णा मिटाओ ,गिरिधारी हे मनमोहन हे गिरधारी

माया मोह से मुझे बचाओ ,जीवन पार लगाओ बनवारी
चरण कमल तेरे बलि – बलि जाऊं, हे मनमोहन हे गिरधारी


Monday, 1 September 2014

कुछ काम करो , कुछ काम करो

कुछ काम करो , कुछ काम करो

कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में अपना नाम करो
भाग्य भरोसे मत बैठो तुम
कुछ काम करो , कुछ काम करो

आगे बढ़ना नियति तुम्हारी
कर्म राह प्रधान करो तुम
कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में अपना नाम करो

संकट जीवन में जो आए
कभी ना तू उससे घबराए
जीवन को प्रणाम करो तुम
जग में अपना नाम करो तुम

निंदा में तुम यूं ना उलझो
कठोर वचन तुम यूं ना बोलो
सबका तुम सम्मान करो
सत्कर्म मन ध्यान धरो

कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में अपना नाम करो
भाग्य भरोसे मत बैठो तुम

कुछ काम करो , कुछ काम करो 

अपने चरणों की धूलि बना लो

अपने चरणों की धूलि बना लो

अपने चरणों की धूलि बना लो
हे त्रिपुरारी हे बनवारी
अभिलाषा पूरी करो मेरी
चरण कमल जाऊं बलिहारी

निर्मल , पावन हो मेरी काया
अहंकार की पड़े ना छाया
मेरा भाग्य बनाओ बनवारी
हे त्रिपुरारी हे बनवारी

सलिला सा पावन हो जीवन
रत्नाकर सा हो मेरा मन
बैरागी सा हो अंतर्मन
राग भक्ति का जगाओ गिरिधारी

शुभचिंतक हो जाऊं सबका
दास बनूँ मैं तेरे दर का
सूर्य सा तेज भरो हे मुरारी
हे त्रिपुरारी हे बनवारी

वायु सा पावन मुझे कर दो
मुझको ज्ञान का वर दो
हंसवाहिनी कृपा करे बनवारी
हे त्रिपुरारी हे बनवारी



मेरे गीतों के सुर हो जाओ तुम

मेरे गीतों के सुर हो जाओ तुम

मेरे गीतों के सुर हो जाओ तुम
मेरे विचारों की भाषा हो जाओ तुम
बांधो मुझको प्रेम पाश में
दो तन एक  मन हो जाएँ हम

चिंतन तेरा ,  ह्रदय स्थल है मेरा 
आदर्शों की माला हो जाओ तुम
गीत मेरे ,तुझसे जीवन पाते
कुछ पल सुरबाला हो जाओ तुम

बाहों का बंधन हो जाओ तुम
रूप , लावण्य की मूर्ति हो जाओ तुम
पाकर तेरे आलिंगन का सहारा
रात की रागिनी हो जाओ तुम

मर्यादा की बेड़ी तोड़ो तुम
मुझसे प्रेम रीति जोड़ो तुम
कर दो मेरे तन को पावन
मुझ पर सब कुछ वारो तुम

मेरी वीणा के तार बनो तुम
मधुर – मधुर संवाद बनो तुम
रोशन कर दो मेरा जीवन
जीवन धन सौभाग्य बनो तुम 

मेरे गीतों के सुर हो जाओ तुम
मेरे विचारों की भाषा हो जाओ तुम
बांधो मुझको प्रेम पाश में
दो तन एक  मन हो जाएँ हम