लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) हैं और अभी पंजाब में रह रहे हैं |

Wednesday, 19 December 2012

अनैतिकता के पाताल के गर्त मे


अनैतिकता के पाताल के गर्त में

अनैतिकता के पाताल के गर्त में
विचरते हम मानव प्राण
जीवित तो इस एहसास में
कि एक तन को  ढोते
जो निष्प्राण विचरण कर रहा
इस धरा पर
मूल्यों की सूझती नहीं
राह हमको
जीव – जंतुओं की
श्रेणी में
ला खड़ा किया जिसने
अतिमहत्वाकांक्षा के मकड जाल में उलझे
नैतिकता व मानव मूल्यों के
महत्ता को समझने  के
एहसास  का दंभ भरते
दो गज ज़मीन भी
न छूट जाए कहीं
इस प्रण के साथ
अतिसम्प्दायुक्त
जीवन जीने का
छल साथ लिए
दौड़ते – भागते
उस अंतहीन दिशा की ओर
जो लक्ष्य के भटकाव  का
परिणाम लिए हमारे समक्ष
दृष्टिगोचर हो जाती है
संस्कृति, संस्कारों परम्पराओं
से कोसों दूर
विचरने का दुःख हमें सालता है
फिर भी मुझे द्रुतगति से
अग्रसर होना है
उस सुख की ओर
उस विलासतापूर्ण जीवन की ओर
जो वर्तमान में
असीम सुख का आभास देता है
वर्तमान में जीता यह प्राणी
भविष्य के गर्त में होने वाले  
सत्य से अनभिज्ञ सा
मूल्यों की खोज से परे
आने वाली पीढ़ी के लिए
अरंडी के बीज बोता
यह मानव
इस आशा व उम्मीद से
कि शायद
इस बीज से
वह आम या अनार का स्वाद
प्राप्त  कर सकेगा
स्थितियां भयावह
निर्मित कर दी गई हैं
आधुनिकता के चहेतों को
क्रोस ब्रीडिंग पर
कुछ ज्यादा ही विश्वास
आने वाली सभ्यता को
नासूर की  
तरह चुभने वाली
कुसंस्कृति
कुसंस्कारोंसे सिंचित आधुनिक पीढ़ी
सौंपने की तैयारी
हो गई है
कचरों के ढेर पर
फिकता  कुँवारी माओं का प्यार
दूसरों की गोद का
अपने स्वार्थ के लिए
हो रहा इस्तेमाल
बिक रहे चरित्र
गली दुकानों पर
चीरहरण पर आँखें
मूँद लेना
किसी गिरते को
संभालने का माद्दा
न होना
राष्ट्रप्रेम के प्रति मन में
लचीलापन
ये सब काफी है
मानव के अनैतिकता
के पाताल के गर्त में
विचरने के लिए 

कोई सुबह ऐसी बना दो
कोई रात मोतियों सी जगमगा दो
कोई अवतार इस धरा पर ला दो
तारे आसमान के इस धरा पर खिला दो
कोई तो राष्ट्रप्रेम की ज्योति जला दो
कोई तो भाईचारा फैला दो
कोई तो मानव मूल्यों के गीत गा दो
कोई तो मानव को मानव बना दो
कोई तो हमको राह दिखा दो
कोई तो हमको राह दिखा दो
कोई तो हमको राह दिखा दो

Monday, 3 December 2012

आओ मिल प्रण करें हम


आओ मिल प्रण करें हम

आओ मिल प्रण करें हम
नवजीवन मस्तक धरें हम
करें पुष्पित संस्कृति
करें मुखरित संस्कार
आओ मिल प्रण करें हम  
कर्म से हम धनी हों
भाग्य निर्माण करें हम
आँधियों से न दरें हम
नव आदर्श निर्मित करें  हम
आओ मिल प्रण करें हम
कलह से हों परे हम
कर्मशील धर्मशील बनाएँ हम
स्वतन्त्र मौलिक विचार धरें हम
सदाचारी सत्संग वरें  हम
आओ मिल प्रण करें हम
सर्वोत्तम कृति बनें हम
पुण्यशील आत्मा कहैं सब
सत्कीर्ति सत्यनिष्ठा मार्ग हो
कार्यसाधक स्वाभिमानी बनें हम
आओ मिल प्रण करें हम
सूरजमुखी सा दमकैं हर पल
सूर्य सा चमकें हर क्षण
सुव्यवहार सुशील सुशिक्षित
अनमोल जीवन बनें हम
आओ मिल प्रण करें हम
आओ मिल प्रण करें हम
आओ मिल प्रण करें हम

तिमिर पथगामी तुम बनो ना


तिमिर पथगामी तुम बनो ना

तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना
अहंकार पथ तुम चरण धरो ना
लालसा में तुम उलझो ना
तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना
अंधकार में तुम झांको ना
अनल मार्ग तुम धारो ना
निशिचर बन तुम जियो ना
कुटिल विचार तुम मन धारो ना
तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना
कल्पवृक्ष बन जीवन जीना
शशांक सा तुम शीतल होना
अमृत सी तुम वाणी रखना
अम्बर सा विशाल बनो ना
तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना
किंचिं सा भी तुम दरों ना
घबराहट को मन में पालो ना
क्लेश वेदना सब त्यागो तुम
पुष्कर सा तुम पावन हो ना
तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना
द्रव्य वासना तुम उलझो  ना 
दुर्जन सा हठ तुम पालो ना
सुरसरि सा तुम्हारा जीवन हो ना
पावन निर्मल मार्ग बनो तुम
चीर तिमिर प्रकाश बनो तुम
अलंकार उत्कर्ष वरो तुम
तिमिर पथगामी तुम बनो ना
कानन जीवन तुम भटको ना



अखिल विश्व तेरा गगन हो


अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो
नरेश सा तू राज करना
हर दिलों में वास करना
अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो
कोविद सा तू पावन हो
धरा सा तू अचल हो
कांति महके हर दिशा में
सम्पूर्ण धरा तेरा  आँचल हो
अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो
संघर्ष तेरा कर्मक्षेत्र हो
निर्वाण तेरा अंतिम सत्य हो
सहचर प्रकृति तेरी हो
सरस्वती का तू वन्दनीय हो
अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो
महक तेरी चहुँओर फैले
वैरागी सा तेरा जीवन हो
महेश सा रौद्र हो तुझमे
नारद सा तू चपल हो
प्रज्ञा तेरी सहचर बने
पर्वत सा तू अटल हो
अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो
नैसर्गिक ऊर्जा हो तुझमे
गजानन वरद हस्त हो तुझ पर
अद्वितीय मनाव बने तू
जगत में तू अमर हो
अखिल विश्व तेरा गगन हो
रत्नाकर सा तेरा जीवन हो   



धरती माँ


धरती माँ तुम पावन थीं
धरती माँ तुम निश्चल थीं
रूप रंग था सुंदर पावन
नदियाँ झरने बहते थे कल- कल
मोहक पावन यौवन था तेरा
मंदाकिनी पावन थी सखी तुम्हारी
बहती थी निर्मल मलहारी
इन्द्रपुरी सा बसता था जीवन
राकेश ज्योत्सना बरसाता था
रूप तेरा लगता था पावन
रत्नाकर था तिलक तुम्हारा
मेघ बने स्नान तुम्हारा
पंछी पशु सभी मस्त थे
पाकर तेरा निर्मल आँचल
राम कृष्ण बने साक्ष्य तुम्हारे
पैर पड़े थे जिनके तुझ पर न्यारे
चहुँ और जीवन – जीवन था
मानव – मानव सा जीता था
कोमल स्पर्श से तुमने पाला
मानिंद स्वर्ग थी छवि तुम्हारी
आज धरा क्यों डोल रही है
अस्तित्व को अपने तोल रही है
पावन गंगा रही ना पावन
धरती रूप न रहा सुहावन
अम्बर ओले बरसाता है
सागर भी सुनामी लाता है
नदियों में अब रहा ना जीवन
पुष्कर अस्तित्व को रोते हर – क्षण
मानव है मानवता खोता
संस्कार दूर अन्धकार में सोता
संस्कृति अब राह भटकती
देवालयों में अब कुकर्म होता
चाल धरा की बदल रही है
अस्तित्व को अपने लड़ रही है
आओ हम मिल  प्रण करें अब
मातु धरा को पुण्य बनाएँ 
इस पर नवजीवन बिखराएँ
प्रदूषण से करें रक्षा इसकी
इस पर पावन दीप जलायें
हरियाली बने इसका गहना
पावन हो जाए कोना - कोना 
ना रहे बाद ना कोई सुनामी
धरती माँ की हो अमर कहानी
धरती माँ की हो अमर कहानी


     




Sunday, 2 December 2012

शुभ दीवाली आई है


शुभ दीवाली आई है

शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
दीप जगमगा रहे
रोशनी है बिखरा रहे
कि तुम भी रोशन हो चलो
कि ज्ञान दीप तुम बनो
रोशन करो तुम आसमान
रोशन करो तुम ये ज़मीं
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
कि दीप मुस्करा रहे
स्याह रात रोशन कर रहे
कि तुम भी कर्म पथ बढ़ो
अज्ञान से हर पल लड़ो
कि दीप दीप जिंदगी
रोशन करो रोशन करो
कि शुभ दीवाली आई है                    
खुशियाँ हज़ार लाई है
कि राह तुम निर्मित करो
कि अविचल तुम बढे चलो
कि पग पग हो रोशनी
बेखौफ़ तुम डटे रहो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई  है 
कि मंद मंद रोशनी
बिखेरते आगे बढ़ो
कि आसमान को चूम लो
ये प्राण हर पल तुम करो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
समाज में पीड़ित हैं जो
भूख में भी जीवित हैं जो
उनको भी साथ ले बढ़ो
जीवन को उनके रोशन करो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है

तुम न छेड़ो कोई बात


तुम न छेड़ो कोई बात

तुम न छेड़ो कोई बात
न सुनाओ आदशों का राग
मार्ग अब हुए अनैतिक
हर सांस अब है कांपती
कि मैं डरूं कि वो डरे
हर मोड़ अब डरा – डरा रहा
कांपते बदन सभी
कांपती है आत्मा
रिश्ते हुए सभी विफल
आँखों की शर्म खो रही
बालपन न बालपन रहा
जवानी बुढ़ापे में झांकती
ये आदर्श अब न आदर्श रहे
न मानवता मानवता रही
अब राहों की न मंजिलें रहीं
डगमगाते सभी पाँव हैं
रिश्तों की न परवाह है
संस्कृति का ना बहाव है
संस्कारों की बात व्यर्थ है
नारी न अब समर्थ है
नर पशु सा व्यर्थ जी रहा
व्यर्थ साँसों को खींच है रहा
कहीं तो अंत हो भला
कहीं तो अब विश्राम हो
कहीं तो अब विश्राम हो
कहीं तो अब विश्राम हो




गणेश वंदना


गणेश वंदना
जय गणेश गजबदन विनायक
एकदन्त गणपति गणनायक
प्रथम पूज्य तुम देव हमारे                            
विध्न हरो प्रभु करो काज हमारे
मूषक वाहन तुम्हें लगते प्यारे
लम्बोदर गौरी- शिव के प्यारे
सबसे लाड़ले तुम मात- पिता के
मंगल करता गौरीसुत तुम
प्रथम पूज्य तुम लगते प्यारे
मोदक तुमको सबसे प्यारे
कष्ट हरो सब शिव के दुलारे
जब भी घन- घन घंटा बाजे
मूषक पर तुम  दौड़ के आते
जय लम्बोदर जय एकदन्त
जय गणपति जय गौरीसुत
जय गजानन जय विघ्नेश
खत्म हैं करते सारे क्लेश
जय गजबदन जय विनायक
जय विघ्न्हर्ता जय मंगलकर्ता
जय गणेश जय – जय गणेश |