लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 21 September 2014

उन्हें इश्क़ नापसंद था , हमें मुहब्बत अज़ीज़ थी





हम चले आए तेरे दर पर माँ वैष्णो रानी

हम चले आए तेरे दर पर माँ वैष्णो रानी

हम चले आए तेरे दर पर
माँ  वैष्णो रानी

करो हम पर उपकार
माँ  वैष्णो रानी

करो जगत कल्याण
माँ  वैष्णो रानी

ऊँचे पहाड़ों वाली
माँ  वैष्णो रानी

तेरी ममता का साया
हम पर हो जाए
माँ  वैष्णो रानी

जय माँ शेरां वाली
माँ  वैष्णो रानी

पर्वत पर रहने वाली
माँ वैष्णो रानी

मनमोहिनी माँ
माँ  वैष्णो रानी

चमत्कार तेरे हैं लाखों
माँ  वैष्णो रानी

हमारा उद्धार करो
माँ  वैष्णो रानी

वंदनीया हो तुम
माँ  वैष्णो रानी

चरण – कमल बलि जाएँ हम
माँ  वैष्णो रानी

हमको भी दर्श दिखा दो
माँ  वैष्णो रानी

सरल – सहज तेरा रूप है
माँ  वैष्णो रानी

अन्धकार दूर करो
माँ  वैष्णो रानी

अनुपम छवि तुम्हारी
माँ  वैष्णो रानी

सब तुम पर जाएँ बलिहारी
माँ  वैष्णो रानी

ऐसे हमारे भाग्य करो
माँ  वैष्णो रानी

जय जगदम्बा , जय कल्याणी
माँ  वैष्णो रानी

असुरों का नाश करो
माँ  वैष्णो रानी

जय कालिका , जय सिंहवासिनी
माँ  वैष्णो रानी

कष्ट हमारे दूर करो
माँ  वैष्णो रानी

प्यार , स्नेह हमें दो
माँ  वैष्णो रानी

तकदीर संवार दो
माँ  वैष्णो रानी

छोटे और बड़े सभी
दर पर आए हैं
माँ  वैष्णो रानी

जीवन राह संवार दो
माँ  वैष्णो रानी

हम चले आए तेरे दर पर
माँ  वैष्णो रानी

करो हम पर उपकार

माँ  वैष्णो रानी 

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं
खुशनुमा – खुशनुमा सा लग रहा है आसमां

चारों तरफ फूल खिलखिलाने लगे हैं
पंक्षी भी मधुर स्वर में गुनगुनाने लगे हैं

खिली – खिली सी लग रही है फिज़ां
आसमां भी मंद – मंद पवन बहाने लगे हैं

पूछते हैं हाल मेरा वो क्यों कर
क्या वो मुझ पर तरस खाने लगे हैं

किनारा कर जो खुश हुए मुझसे
वो आज मुझ पर प्यार क्यों लुटाने लगे हैं

गली में उनकी हमने जाना छोड़ दिया
वो क्यों मेरी गली के चक्कर लगाने लगे हैं

दौलत से कभी हमने मुहब्बत थी ही नहीं
वो आज हम पर अपनी दौलत क्यों लुटाने लगे

जीने मरने की कसमें खाया करते थे वो
आज वो दूसरों का घर क्यों बसाने लगे

खुशनुमा – खुशनुमा सी लग रही है ज़मीं
खुशनुमा – खुशनुमा सा लग रहा है आसमां

चारों तरफ फूल खिलखिलाने लगे हैं
पंक्षी भी मधुर स्वर में गुनगुनाने लगे हैं


खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया

 खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया
हम भी हैं नाखुश , अपनेपन का दौर गया

नाइंसाफी  का दौर नया , नाउम्मीदी का शोर नया
नाकाबिल चरित्रों का दौर नया , नफरतों का दौर नया

पी रखी है सभी ने दो घूँट , नाफ़रमानी की
नादानी कर रहे सब , कामचोरों का दौर नया

वसंत  आने के पहले पतझड़ का मौसम आया  
नामुमकिन को मुमकिन कहने का दौर नया

पसंद है  जिन्हें दूसरों पर बेइंसाफी का दौर  
इन इंसानियत के तलबगारों का दौर नया

नियाज करते हैं उस खुदा से वो “अनिल”
उस खुदा के चाहने वालों का दौर नया

निस्बत थी उस खुदा से उसके चाहनेवालों की
अब क्या कहें इन दौलत के ठेकेदारों का दौर नया

फुर्सत नहीं है उन्हें दो वक़्त इबादत कर लें
नाशुक्रों का आया है कैसा ये दौर नया

खुशियों का दौर गया , चाहतों का दौर गया
हम भी हैं नाखुश , अपनेपन का दौर गया



सादगी पर तेरी हम मर मिटे कुछ इस तरह

सादगी पर तेरी हम मर मिटे कुछ इस तरह

सादगी पर तेरी हम. मर मिटे कुछ इस तरह
खो गया दिन का चैन , रातों का करार

ख्वाहिश है तू हो. मेरी बाहों का हार
कर रहा हूँ हर पल ,तेरा इंतज़ार

मेरी तनहा रातों को जो तू ,रोशन कर दे
तेरे नयनों की छाँव में ,दो पल सुकून के गुज़ार सकूं

मेरे सपनों में आ , पल दो पल के लिए
तेरे काँधे पर सर रखकर , दो पल सुकून के गुज़ार सकूं

तारीफ़ तेरी क्या करूं, ऐ मेरी जाने जिगर
कुछ ऐसा कर छंट जाए ,काले बादलों का सफर

करम हो उस खुदा का, जो तेरा दीदार करूं
बेशक तसव्वुर में ही, तू मुझको आए नज़र

तेरे दीदार की आस में ही जी रहा हूँ मैं
ये बेरहम दुनिया तुझको मुझसे दूर करे

पा ही लूँगा तुझको एक दिन जाने जाँ
चाहे वो दिन मेरे लिए क़यामत की रात बने

सादगी पर तेरी हम. मर मिटे कुछ इस तरह
खो गया दिन का चैन , रातों का करार



Tuesday, 16 September 2014

तेरी खातिर क्या – क्या ना सुना मैंने


तेरी खातिर क्या – क्या ना सुना मैंने

तेरी खातिर क्या – क्या ना सुना मैंने
तू है कि यूं ही रुसवा कर रही मुझको
ख्वाहिश है की तेरी बाहों का सहारा मिलता
तू है कि यूं ही बदनाम कर रही मुझको

तेरी अदाओं के जलवों से रूबरू हूँ मैं
तू है कि यूं ही अनजान समझ रही मुझको
गुमसुम सी जिन्दगी का मालिक हो गया हूँ मैं
तू है कि यूं ही अजनबी समझ रही मुझको

तेरी ख़ुशी है मेरी जिन्दगी का सबब
तू है कि यूं ही परेशान कर रही मुझको
छोड़ दूंगा ये दुनिया तेरी राह में सनम
तू है कि यूं ही गुमराह कर रही मुझको

गुस्ताखी ना हो मुझसे ये चाहता हूँ मैं
तू है कि यूं ही बरगला रही मुझको
ग़मों से नाता ना हो तेरा कभी भी ए जानम
तू है कि यूं ही जख्म दे रही मुझको



मेरा दिल नादान है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों
बेवजह बदनाम है क्यों

चाहता क्या ये बताऊँ कैसे
बेवजह ये अंजाम है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों

अफसाना प्यार का इसकी चाहत
प्यार से फिर अनजान है क्यों

अजीब सी कशमकश में हूँ मैं
उसकी अदाओं से अनजान है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों

आईने में देखा है खुद को
फिर भी परेशान है क्यों

आगाज़े मुहब्बत सिखाओ इसको
उसकी नजाकत से अनजान है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों

क्यों नहीं एहसास हैं इस दिल में
अरमान इसके नादान  हैं क्यों

एहसासों से परे दुनिया इसकी
फिर भी यूं ही ये बदनाम है क्यों

मेरा दिल नादान है क्यों
मेरा दिल नादान है क्यों