लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 6 June 2012

एक ही प्रश्न

     
  
एक ही प्रश्न
मै हर एक से
पूछता हूँ
केवल एक ही प्रश्न
क्या तुमको पता है
 इंसानियत का पता ठिकाना
मानवता के घर का पता
नेकी के बादलों में उड़ते
उस परिंदे के
आशियाँ की खबर

जवाब यही मिलता
इंसानियत मानव के दिल में
पलती है
इस उत्तर ने
मुझे कोई विशेष
संतुष्टि प्रदान नहीं की
मै और ज्यादा चिंचित हो गया
और स्वयं ही इसका
उत्तर खोजने लगा

मैंने पाया
कि जो मानव
अपनी कुप्रवत्तियों
पर अंकुश नहीं लगा पाता
उसके दिल में इंसानियत
किस तरह पल और बढ़ सकती है

विचारों की श्रृंखला
और मुखरित हुई

एक और विचार ने
जन्म लिया
कि यह मानव जो
मानव शरीर के
रंगों का भेद करता है
जातिवाद, धर्मवाद
को अपनी अनैतिक इच्छाओं
की पूर्ति के लिए
आतंकवाद के नाम से
 मोहरे की तरह
इस्तेमाल करता है
उसके दिल में
इंसानियत किस तरह पल
और बढ़  सकती है  

चिंतन प्रवृति ने
फिर जोर मारा
तो कुछ और ज्यादा सूत्र
हाथ आये
कि लोगों की
तरक्की की राह में रोड़ा
बनने वाला
यह मानव
शारीरिक व मानसिक हिंसा
 में लिप्त मानव
हर क्षण
नैतिक मूल्यों का
ह्रास करता मानव
विलासितापूर्ण
वैभव्य  प्राप्ति
में लिप्त मानव
कामपूर्ण प्रवृत्ति के चलते
चरित्र खोता मानव
शिक्षक से भक्षक बनता मानव
गुरु से गुरुघंटाल
होता मानव
मर्यादाओं व  सीमाओं को तोड़ता मानव
मानव से मानव को
अलग करता मानव
अहं में जीता मानव
हर पल गिरता मानव
और क्या कहूँ
और क्या लिखूं
ये दिल को कचोटने वाली
क्रियाएँ
आत्मा को झिंझोड़ने वाली घटनाएं
इन घटनाओं में लिप्त मानव
के हृदय में इंसानियत न
तो पल सकती है और न ही
बढ़ सकती है
ऐसे मानव से इंसानियत कोसों
दूर भागती है
समझ नहीं आता
क्या होगा इस मानव का
मानव रुपी इस दानव का .........................


Wednesday, 9 May 2012

धरा पर आज भी ईमान बाकी है

धरा पर आज भी ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो भोपाल त्रासदी देख
मन  सबका  रोता क्यों
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो सुनामी देख
मन  सबका  रोता क्यों
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो लातूर का विनाश देख
मन  सबका  रोता क्यों
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो म्यामार का आघात देख
मन सबका पसीजा क्यों
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो गाजापट्टी में नरसंहार देख
मन सबका व्याकुल होता क्यों
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो मंदिरों में भीड़ का
अम्बार नहीं होता
मंत्रोच्चार नहीं होता

मस्जिद में अजान
सुनाई न देती
CHURCH में घंटों की आवाज
सुनाई  न देती
गुरुद्वारों में पाठ
सुनाई न देता
मानव के हाथ
दुआ के  लिए
न उठ रहे होते
गरीबों का कोई
सहाई न होता
यदि ऐसा नहीं होता
तो धरती पर
कोई किसी की बहिन नहीं होती
कोई किसी का भाई नहीं होता   
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
गिरते को कोई
उठा रहा न होता
बहकते को कोई
संभल न रहा होता
ये मानव की नगरी है
यहाँ देवों का वास होता है
ये संतों की नगरी है
यहाँ संतों का वास होता है
धरा पर आज भी
 ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है








ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मुझे तुझे पाना है
तुझे ही ज़िन्दगी
पाने के रास्ते
मुझे बताना है
चलूँ किस राह पर
कि मानवता शर्मशार न हो
कहूँ क्या बात कि
किसी का दिल
बेजार न हो
ज़िन्दगी मुझे तुझे पाना है
तुझे ही मुझे ज़िन्दगी
पाने के रास्ते बताना है
ज़िन्दगी तुझे क्या रंग दूं
कि तारे जगमगा उठें
तुझे क्या ढंग दूं
कि सारा जग खिलखिला उठे
किस फूल का साथ लूं
कि गुलशन बहार हो जाए
ज़िन्दगी मुझे तुझे पाना है
तुझे ही मुझे ज़िन्दगी
पाने के रास्ते बताना है
क्या करूं कि
सबके दिल में उतर जाऊं
कैसा दिखूं कि
सबकी आँखों का नूर हो जाऊं
दे ऐसे अलंकरण कि
दूसरों का आदर्श बन जाऊं
बिछा दे राह में मोती
कि सब पर सर्वस्व लुटाऊँ
ज़िन्दगी मुझे तुझे पाना है
ज़िन्दगी पाने के रास्ते
तुझे ही मुझे बताना है
क्या  दूं किसी को
कि किसी कि
ज़िन्दगी में बहार आ जाए
मानवता मानवता रहे
ज़िन्दगी ज़िन्दगी रहे
मौत पतवार हो जाए
मौत पतवार हो जाए
ज़िन्दगी मैंने तुझे
पा लिया है                 
तूने मुझे ज़िन्दगी
पाने के रास्ते बता दिया है
ज़िन्दगी मैंने तुझे
पा लिया है
ज़िन्दगी मैंने तुझे
पा लिया है


कविता ऐसे करो

कविता ऐसे करो
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए
अक्षरों से शब्द बनें विचार अलंकार हो जाए
विचार हों ऐसे कि बुराई शर्मशार हो जाए
मिले समाज को नए विचार कि हर एक कि जिंदगी गुलजार हो जाए
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए
छोड़ो तीर शब्दों के कुविचारों पर कि धरा पुण्य हो जाए
मिटा दो आंधियां मोड़ दो रास्ते तूफानों के जिंदगी पतवार हो जाए
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए
बहा दो ज्ञान की गंगा मिटा अँधियारा भीतर का
कि जीवन जगमग हो जाए
रहे न कोई अछूता ज्ञान गंगा से कि जीवन पवित्र संगम हो जाए
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए
मिटाकर बुराई को,
मिटा मन के अँधेरे को
कि ज़िन्दगी आशा का दीपक हो जाए
बनो ऐसे बढ़ो ऐसे रहो ऐसे
कि आसमां से तारे फूल बरसाएं
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए
करो  शब्दों के प्रहार छोड़ो शब्दों की बौछार
कि ज़िन्दगी काँटों के बीच फूल कि मानिंद हो जाए
जियो ऐसे धरा पर बनो ऐसे धरा पर
कि खुदा भी जन्नत छोड़ धरा पर
तुझे आशीर्वाद देने आ जाए
तुझे गले लगाने आ जाए
कविता ऐसे करो की मन की कल्पना साकार हो जाए




मै बिन पखों के

मै बिन पंखों के
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
नै आसमां से
दुनिया देखना चाहता हूँ
सुना है  आसमां से
दुनिया सुन्दर दिखती है
खुली आँखों से
ये नज़ारे लेना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
आसमां में तारे हैं
बहुत से
मै पास जाकर
इनको  छूना चाहता हूँ
सुना है चाँद भी
दिखता है निराला
मै चाँद पर जाकर
उसे निहारना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
फूलों की  खुशबू ने
किया है मुझको कायल
मै भंवरा बन फूलों का
रस लेना  चाहता हूँ
किस्से कहानियों से
मेरा नाता पुराना
मै परी की
कहानी सुनना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
मै कोयल बन
मधुर गीत गाना चाहता हूँ
मै कवि बन जीवन में
रौशनी लाना चाहता हूँ
मै शिक्षक बन
ज्ञान विस्तार करना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
समर्पण की भावना ने
किया मुझको प्रभावित
मै पृथ्वी की तरह
महान बनना चाहता हूँ
देश भक्ति का जज्बा भी
मुझमे कम नहीं है
मै भगत,सुखदेव
और बिस्मिल बनना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
दिखने में छोटा साथ बाती
पर अँधेरे पर है बस उसका
मै अपनी जिंदगी को
दीपों की माला में पिरोना चाहता हूँ
मै दीप बन सबकी जिंदगी को
रोशन करना चाहता हूँ
मै बिन पंखों के
उड़ना चाहता हूँ
मै आसमां से
दुनिया देखना चाहता हूँ

तस्वीरें

तस्वीरें
बनाई मैंने कुछ तस्वीरें
पसंद नहीं आईं किसी को
कुछ तस्वीरों में
हाथ नहीं
कुछ में पैर नहीं
कहीं एक आँख में दृष्टव्य
आदमी
कहीं जलते हाथ को
ठंडक देने के प्रयास में
एक औरत
कहीं दहेज के नाम पर
रस्सी पर झूलती
सुंदर नारी
कुछ चरित्र
अनमने से
अपने विचारों
में खोये
शायद जीवन को
समझने की
कोशिश में
कुछ बुत बने
जीवन पाने की
लालसा में
वर्षों से बिस्तर पर
कोमा की सी
स्थिति में
कुछ कर्म के मर्म को
जानने के प्रयास में
कर्मरत दीखते हुए
कुछ तस्वीरें ऐसी
जिसमे मानव
मानव को समझाने का
असफल प्रयास करता हुआ
कहीं दूसरी और
नारी की
व्यथा
समाज पर
प्रहार करती हुई
एक तस्वीर
ऐसी
जो सदियों से
हो रहे
सामाजिक परिवर्तन
को दर्शाती
जिसमे पुरुष का  वर्चश्व
नारी की व्यथा
संस्कृति का पतन
संस्कारों की घुटन
सभ्यता के विकास का
लचर प्रदर्शन
आधुनिकता की और
बढ़ने का दंभ
ये तस्वीरें
किसी को पसंद नहीं आईं
आज का आधुनिक समाज
आधुनिक कला
समझता है
जिसका अर्थ
केवल  चित्रकार ही बेहतर समझता है
केवल  चित्रकार ही बेहतर समझता है