लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 9 May 2012

कवि हूँ

कवि हूँ
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
करोगे वाहवाही कविताओं की  झड़ी लगा दूंगा
डूबते बीच मझदार को पार लगा दूंगा
कविता करना मेरा कोई सजा नहीं है
बुराइयों से बचाकर तुझे सजा पार करा दूंगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
कविता की ताकत को  तुम क्या जानो
तुमने किया सजदा तो सर कटा दूंगा
उठाई जो तलवार तुमने प्रेम का पाठ पढ़ा दूंगा
की जो प्रेम की बातें सीने से लगा लूँगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
प्रकृति मेरा प्रिय विषय रही है
हो सका तो चारों और फूल खिला दूंगा
सुंदरता की तारीफ की बातें न पूछो मुझसे
हो सका तो इसे नायाब चीज बना दूंगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
जीता हूँ में समाज की बुराइयों में
लिखता हूँ कवितायें तनहाइयों में
अपराध बोध बुराइयों पर कर प्रहार
एक सभ्य समाज का निर्माण करा  दूंगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
सभ्यताओं ने किया कवि दिल पर प्रहार
दिए नए नए जख्म नए नए विचार
विचारों की इन नई श्रंखला में भी
जीवन अलंकार करा  दूंगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो
कवि हमेशा जिया है दूसरों के लिएकवि हमेशा लिखता है समाज के लिएदिल से बरबस आवाज ये निकलती है
हे मानव जीवन तुम सब पर वार कर दूंगा
कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो



प्रकृति

प्रकृति

सोचता हूँ
प्रकृति कितना महान है
जहां
पंखुड़ियों का खिलना
प्रातः काल मे जीवन के
पुष्पित होने  का
आभास देता है
पेड़ों पर पुष्पों का खिलना
हमारे चारों और
शुभ का संकेत देता है
पुष्प का फल मे परिवर्तित होना
हमारे आसपास किसी नए मेहमान के
आने का प्रतीक है
सोचता हूँ हवाओं से
पेड़ों का बार-बार हिलना
झुकना और फिर खड़े हो जाना
किस बात की और
संकेत देता है
निष्कर्ष से जाना कि
ये हवाएं जिंदगी के थपेड़ों का निष्कर्ष है
मुसीबतें हैं
घटनाएं हैं
जो हमें
समय समय पर  आकर
जीवन को मुश्किलों मे भी डटकर
कठिनाइयों का सामना कर
नवीन अनुभव देकर
जीवन को पुष्पित करती है

एक बात जो मुझे कचोट जाती है
टीस देती है वह है
पेड़ों से फलों का टूटकर गिरना
जो जिंदगी के अंतिम सत्य
कि और इशारा करता है
और कहता है
जीवन यहीं तक है और इसके बाद
पुनः नया जीवन
चूंकि
जब फल बीज 
बारिश का आश्रय पाकर
पुनः अंकुरित होंगे
और पुनः एक नवीन पोधे
का निर्माण होगा
यह जीवन चक्र यूँ ही चलता रहेगा
हर छण हर युग
आने वाली पीढ़ी
को पुष्पित करता रहेगा


आधुनिकता का दंभ

आधुनिकता का दंभ

आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डी पर
चल रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
वस्त्रों से हमें क्या लेना
चिथडो पर जी रहे हैं हम
मंत्र सीखे नहीं हमने
गानों से जी बहला रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
पुस्तकें पढ़ना हमें
अच्छा नहीं लगता
इन्टरनेट मोबाइल से
दिल बहला रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
अति महत्वाकांक्षा ने हमको
कहाँ ला खड़ा किया है
अपराध की अंधी दुनिया मे
जिंदगी ढूंढ रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
सत्कर्मो से हमें
हमें करना क्या
बेशर्मो की तरह जिंदगी
जिए जा रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
अर्थ के मोह ने
हमें व्याकुल किया है
तभी अपराध की शरण
हो रहे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
आवश्यकताएं रोटी कपडा और मकान से
ऊपर उठ चुकी हैं
कहीं जमीर कहीं तन
कही सत्य बेचने लगे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
शक्ति और धन की उर्जा का
दुरपयोग करने लगे हैं हम
गिरतों को और नीचे गिराने
ऊंचों को और ऊँचा उठाने लगे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
हमारे पागलपन की हद तो देखो
मानव को मानवबम बना रहे हैं हम
जानवरों की संख्या घटा दी हमने
आज आदमी का शिकार करने लगे हैं हम
आधुनिकता का दंभ भर
जी रहे हैं हम
अब तो संभलो यारों
अनैतिकता से दूरी रख जीवन  संवारो यारों
आधुनिकता की अंधी दौड से बहार आओ यारों
चारों और इंसानियत और मानवता
का मन्त्र सुनाओ यारों




Wednesday, 18 April 2012

भँवर

भँवर
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है
हो रहे हैं

दिन प्रतिदिन आसामाजिक
फिर भी
समाज में रहने का भ्रम
पाले हुए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है
हमारी चाहतों ने
हमारी जरूरतों ने
हमें एक दूसरे
से बाँध रखा है 
वरना अपने अपने अस्तित्व के लिए
जूझ रहे हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
बंद कर दिए हैं हमने
मंदिरों के दरवाजे
नेताओं के चरणों की
धूल हो गए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
चाटुकारिता से पल्ला
झाड़ा नहीं हमने
चापलूसी का दामन
छोड़ा नहीं हमने
बदनुमा जिंदगी के
मालिक हो गए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
दर्द दूसरों का बाँटने में
पा रहे हम स्वयं को अक्षम
स्वयं की ही परेशानियों
से परेशान हो रहे हैं हम
चलना हो रहा है दूभर
सहारा किसका बन सकेंगे हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
आये दिन की घटनाओं के
पात्र हो गए हैं हम
सामाजिक अशांति के  चरित्र हो
जी रहे हैं हम
जीने की भयावहता में
राह भटके जा रहे हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
आस है उस पल की
जो आशां  कर दे
सारी राहें
ले चले इस

अनैतिक व्यवहार से दूर
आँचल में अपने समेटे

सभी दुःख दर्द
जीने की राह दे

जीवन को अस्तित्व दे
मार्ग प्रशस्त कर
दूसरों के लिए जीने की लालसा जगा
ताकि कोई भी ये न कह सके
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है


                                                                                                अनिल कुमार गुप्ता   



Saturday, 7 April 2012

चरण कमल तेरे बलि – बलि जाऊं

 चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि – बलि जाऊं
मुझको पार लगा देना
गिरने लगूं तो मेरे मालिक
बाहों में अपनी उठा लेना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुष्पक वाहन हों मेरे साथी
पुष्प भी हों मेरे सहवासी
तन को मेरे उजले मन से
जीवन सार बता देना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
ध्यान तेरा हर पहर हो मालिक
मन मंदिर में बस जाना
पुण्य पुष्प बन जियूं धरा पर
मुझको तुझमे समां लेना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुष्प समर्पित चरणों में तेरे
गीता सार बता देना
पा लूं तुझको इस जीवन में
ऐसा मन्त्र बता देना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुण्य कर्म विकसित कर मालिक
चरण कमल श्रृंगार धरो तुम
खिला सकूं आदर्श धरा पर
पूर्ण जीव उद्धार करो तुम
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
                                                    
अनिल कुमार गुप्ता

दीदार का तेरे इन्तजार है मुझको


दीदार का तेरे इन्तजार है मुझको
तू यहीं कहीं आसपास है, ये एतबार है मुझको
मै तुझको ढूंढूं , ऐसी जुर्रत मै कर नहीं सकता
तू हर एक सांस में बसता है , ये एतबार है मुझको
मक्का हो या मदीना, जहां में सब जगह
तेरे नाम का सिक्का है, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको   
किस्सा-ए-करम तेरा, बयान मै क्या करूं
हर शै में तेरा नाम, हर जुबान पे तेरा नाम
खुशबू तेरा एहसास, ये एतबार है मुझको   
पलती है जिंदगी, एक तेरी कायनात में
खिलता है तू फूल बनकर, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  
मेरे पिया तेरा करम, तेरी इनायत हो
जियूं तो तेरा नाम, मेरे साथ-साथ हो
मेरा सारा दर्द तेरा, ये एहसास है मुझको
तेरा आशियाना हो, आशियाँ मेरा   
तू रहता है साथ मेरे, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  
जीता हूँ तेरे दम से, जीता हूँ तेरे करम से
हर एक आह मेरी, करती परेशां तुझको
तू हर दुःख में साथ मेरे, ये एतबार है मुझको
कर दे तू राह आशां, कर दे तू पार मुझको
मरूं तो जुबान पे तू हो, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  

                                                                   अनिल कुमार गुप्ता