लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 26 November 2018

इस जहां में मेरा भी नाम होता


इस जहां में मेरा भी नाम होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता
दिलों में सबके मैं राज करता
मेरा भी अपना आसमान होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता

गमगीनों का मैं सहारा होता
खिलती मुस्कानों का पैगाम होता
गिरते हुओं को मैं संभाल लेता
उनके दर्द का मैं मरहम होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता

गीत मेरे भी लब पर होते
दिलों के सुकूँ का पैगाम होता
ग़ज़ल हो जातीं कवितायें मेरी
महफ़िलों में मेरा भी नाम होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता

जो कोई मुझको दिल से याद करता
उम्मीदों का मैं समंदर होता
उस खुदा से निस्बत है मुझको
उस खुदा का मुहब्बते पैगाम होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता

अंदाज़े  - शायरी मेरी भाती सबको
सबकी जुबान पर मेरा नाम होता
करम खुदा का मुझ पर भी होता
सबके दिलों की मैं जान होता

इस जहां में मेरा भी नाम होता
मेरा भी कोई मुकाम होता

Saturday, 3 November 2018

चाँद की चांदनी सी हो रोशन शख्सियत मेरी


चाँद की चांदनी सी हो रोशन शख्सियत मेरी
चाँद की चांदनी सी रोशन शख्सियत मेरी हो जाए तो अच्छा हो

सूर्य सा तेज , मेरे यौवन की पूँजी हो जाए तो अच्छा हो

कोमल ह्रदय , मधुर वाणी मेरे चरित्र का हिस्सा हो जाए तो अच्छा हो
तुझ पर भरोसा मेरी इबादत का मर्म हो जाए तो अच्छा हो

मेरी कोशिशों पर तेरे करम का साया जो हो जाए तो अच्छा हो
मेरे अरमानों को तेरे करम  का आसमां नसीब हो जाए तो अच्छा हो

मेरे मन मंदिर में मेरेराम तेरा नाम बस जाए तो अच्छा हो
मेरी पीड़ा , मेरे कष्ट तेरे नाम से काफूर हो जाएँ तो अच्छा हो

मेरी जिन्दगी तेरे दर की अमानत हो जाए तो अच्छा हो
अपनी इबादत में मुझको जो तू गिरफ्तार कर ले तो अच्छा हो

 मेरे दिल के उपवन में तेरे नाम के दो चार फूल खिल जाएँ तो अच्छा हो
मेरी आँखों में तेरी छवि का विस्तार जो हो जाए तो अच्छा हो

मेरे हाथ उठें तो बस दुआ में तेरी , ऐसा गर हो जाए तो अच्छा हो
मेरा सर तेरी इबादत में झुके गर ऐसा हो जाए तो अच्छा हो

तेरे करम से मेरा भी अभिनन्दन हो जाए तो अच्छा हो
तेरे करम से मेरी कलम को तारीफ़ का आसमां नसीब हो जाए तो अच्छा हो

द्वारा

अनिल कुमार गुप्ता
पुस्तकालय अध्यक्ष
के वी सुबाथू 

दो गज ज़मीं की आस में


दो गज ज़मीं  की आस में

दो गज ज़मीं की आस में, जिए जा रहे हैं हम
खुद को खुदा का बंदा , किये जा रहे हैं हम

जन्नत हो नसीब हमें, ये इबादत ,किये जा रहे हैं हम
इंसानियत को मकसदे  - जिन्दगी, किये जा रहे हैं हम

अपनी कोशिशों को खुदा की अमानत , किये जा रहे हैं हम
अंदाज़ मुहब्बत के बयाँ, किये जा रहे हैं हम

खुद को खुदा की राह में निसार , किये जा रहे हैं हम
खुद को खुदा की राह में आदिल , किये जा रहे हैं हम

मुहब्बत की आस में खुदा से उम्मीद , किये जा रहे हैं हम
आहिस्ताआहिस्ता ही सही , उस खुदा के मुरीद हुए जा रहे हैं हम

इबादत को अपनी जिन्दगी का मकसद , किये जा रहे हैं हम
करम है उस खुदा का , जिये जा रहे हैं हम

खुद को उस खुदा की निगाह में, काबिल किये जा रहे हैं हम
कायदे को उस खुदा के, मकसदेजिन्दगी किये जा रहे हैं हम

खिदमत में उस खुदा के बन्दों की, निसार खुद को किये जा रहे हैं हम
चार कन्धों की आस में, जिए जा रहे हैं हम