लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Wednesday, 18 April 2012

भँवर

भँवर
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है
हो रहे हैं

दिन प्रतिदिन आसामाजिक
फिर भी
समाज में रहने का भ्रम
पाले हुए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है
हमारी चाहतों ने
हमारी जरूरतों ने
हमें एक दूसरे
से बाँध रखा है 
वरना अपने अपने अस्तित्व के लिए
जूझ रहे हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
बंद कर दिए हैं हमने
मंदिरों के दरवाजे
नेताओं के चरणों की
धूल हो गए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
चाटुकारिता से पल्ला
झाड़ा नहीं हमने
चापलूसी का दामन
छोड़ा नहीं हमने
बदनुमा जिंदगी के
मालिक हो गए हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
दर्द दूसरों का बाँटने में
पा रहे हम स्वयं को अक्षम
स्वयं की ही परेशानियों
से परेशान हो रहे हैं हम
चलना हो रहा है दूभर
सहारा किसका बन सकेंगे हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
आये दिन की घटनाओं के
पात्र हो गए हैं हम
सामाजिक अशांति के  चरित्र हो
जी रहे हैं हम
जीने की भयावहता में
राह भटके जा रहे हैं हम
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
आस है उस पल की
जो आशां  कर दे
सारी राहें
ले चले इस

अनैतिक व्यवहार से दूर
आँचल में अपने समेटे

सभी दुःख दर्द
जीने की राह दे

जीवन को अस्तित्व दे
मार्ग प्रशस्त कर
दूसरों के लिए जीने की लालसा जगा
ताकि कोई भी ये न कह सके
ये किस भँवर में
आ फंसे हैं हम
किनारे की आस तो है
पर किनारा मिलता नहीं है


                                                                                                अनिल कुमार गुप्ता   



Saturday, 7 April 2012

चरण कमल तेरे बलि – बलि जाऊं

 चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि – बलि जाऊं
मुझको पार लगा देना
गिरने लगूं तो मेरे मालिक
बाहों में अपनी उठा लेना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुष्पक वाहन हों मेरे साथी
पुष्प भी हों मेरे सहवासी
तन को मेरे उजले मन से
जीवन सार बता देना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
ध्यान तेरा हर पहर हो मालिक
मन मंदिर में बस जाना
पुण्य पुष्प बन जियूं धरा पर
मुझको तुझमे समां लेना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुष्प समर्पित चरणों में तेरे
गीता सार बता देना
पा लूं तुझको इस जीवन में
ऐसा मन्त्र बता देना
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
पुण्य कर्म विकसित कर मालिक
चरण कमल श्रृंगार धरो तुम
खिला सकूं आदर्श धरा पर
पूर्ण जीव उद्धार करो तुम
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
चरण कमल तेरे बलि बलि जाऊं
                                                    
अनिल कुमार गुप्ता

दीदार का तेरे इन्तजार है मुझको


दीदार का तेरे इन्तजार है मुझको
तू यहीं कहीं आसपास है, ये एतबार है मुझको
मै तुझको ढूंढूं , ऐसी जुर्रत मै कर नहीं सकता
तू हर एक सांस में बसता है , ये एतबार है मुझको
मक्का हो या मदीना, जहां में सब जगह
तेरे नाम का सिक्का है, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको   
किस्सा-ए-करम तेरा, बयान मै क्या करूं
हर शै में तेरा नाम, हर जुबान पे तेरा नाम
खुशबू तेरा एहसास, ये एतबार है मुझको   
पलती है जिंदगी, एक तेरी कायनात में
खिलता है तू फूल बनकर, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  
मेरे पिया तेरा करम, तेरी इनायत हो
जियूं तो तेरा नाम, मेरे साथ-साथ हो
मेरा सारा दर्द तेरा, ये एहसास है मुझको
तेरा आशियाना हो, आशियाँ मेरा   
तू रहता है साथ मेरे, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  
जीता हूँ तेरे दम से, जीता हूँ तेरे करम से
हर एक आह मेरी, करती परेशां तुझको
तू हर दुःख में साथ मेरे, ये एतबार है मुझको
कर दे तू राह आशां, कर दे तू पार मुझको
मरूं तो जुबान पे तू हो, ये एतबार है मुझको
दीदार का तेरे, एतबार है मुझको  

                                                                   अनिल कुमार गुप्ता   

Friday, 30 March 2012

मुझे तेरे करम का एहसास हो

मुझे तेरे करम का एहसास हो


मुझे तेरे करम का एहसास हो
तू यहीं कहीं मेरे आसपास हो
थक जाऊं तो सहारा देना
गिरने जो लगूं तो संभाल लेना
तेरे  रहमत तेरे करम का साया हो
या मै यहाँ रहूँ या वहाँ रहूँ
किस्सा ए जिंदगी सुकून से चले
हर वक्त तेरा नाम मेरी जुबान पे रहे
कि जागूं तो बसर रह जुबान पे मेरी
और जुस्तजू तेरी ख्वाब में भी बरकरार रहे
तूने खिलाया है सभी को गोदी में लेकर
तेरा ये प्यार हम पर भी बरकरार रहे
एहसास -ए -करम हम पर ताउम्र रहे
हमेशा तू यहीं कहीं मेरे आसपास रहे
मंजिल मेरे खुदा तू मुझे नज़र करना
तेरे करम का चर्चा हो गली – गली
इतना रहम हम पर तासहर करना

कवि पंख हुए विस्तृत

कवि पंख हुए विस्तृत


कवि पंख हुए विस्तृत
हुए विस्तृत हुए व्यापक
सोच बदली बदले नियम
विषय हुए विस्तृत हुए व्यापक
करवटें बदलती सभ्यता
करवटें बदलता समाज
विकृत होती मानसिकता
उबाल पर काम का प्रभाव
संस्कार उभरे रूढ़ीवादी विचार बन
संस्कृति उभरी मनोरंजन का स्वर बन
सद्विचारों का प्रभाव दिख रहा
पनप रहा मनचलापन
अजीब सा बहाव है 
पसार रहा पाँव है
पुण्य छीण हो रहे
विलासिता का भाव है
धर्म पर अधर्म की मुहर
सत्य आज असहाय है
चीख – चीख पुकारती
मानवता आज है
फूलों से खुशबू  खो रही
अंगडाई आंसू – आंसू रो रही
नेत्र हुए विकराल हैं
सतीत्व को न छाँव है
देवालय  शून्य में झांकते
मानव इधर उधर भागते
अस्तित्व का पता नहीं
कि राह किधर है कहाँ
कि पुण्यात्मा कहैं किसे
कि मस्तक चरण धरें किसे
कि मोड़ जीवन का है ये कैसा
कि अब गिरे कि कब गिरे
शून्य में हम झांकते
रोशन दीये के तले
कि कैसा ये बहाव है
न कोई आसपास है
कि अंत का पता नहीं
कि अगले पल कि खबर नहीं
फिर भी मोहपाश है
कि टूटता नहीं कि छूटता नहीं
नव विचार कर रहे विव्हल
कि चूर – चूर ये जवानियाँ
प्रयोग दर प्रयोग बढ़
मिटा रहे निशानियां
कि हाथ तेरे कुछ न तेरे है
कि हाथ कुछ न मेरे है
कि हम भागते तुम भागते
कि हम भागते बस भागते
कि सुकून न मिल रहा यहाँ
क्या चैन मिलेगा वहाँ
कि दो पल को रुक सकूँ खुदा
कि खुद की खोज कर सकूं
कि राह दिखलाना मुझे
कि पनाह में अपनी तू ले मुझे
कि मै गिरूं तो तू संभाल ले
हो सके तो तू करार दे
कवि पंख हुए विस्तृत
हुए विस्तृत हुए व्यापक