लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 15 February 2016

सब मौन हैं क्यों


सब मौन क्यों हैं

बालिका भ्रूण हत्या , एक नासूर है , फिर भी

सब मौन क्यों हैं ?

चौराहों , सड़कों पर खून से लथपथ
फेंकी जा रहीं हज़ारों निर्भया देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

आधुनिक सामाजिक विचारों से
दिशाहीन होती युवा ऊर्जा , फिर भी

सब मौन क्यों हैं ?

सामाजिक बंधनों , रिश्तों को रूढ़िवादिता का
नाम देकर , सामाजिक दायित्वों से पल्ला झाड़ती
इस युवा पीढ़ी के इन आधुनिक विचारों को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

नए असामाजिक रिश्तों से पोषित होती ये युवा पीढ़ी
live – in – relationship , my body my rule  का अप्राकृतिक उदघोष करती
इस युवा पीढ़ी को इन नवीं विचारों से पोषित होता देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

नशे का बाज़ार चलाते , नशे के सौदागर
देश की युवा धरोहर को कमाई की
चक्की में पीसते , ये देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

संस्कृति, संस्कारों को रूढ़िवादिता कहकर
आदर्श की नरः से पलायन करती
इस आधुनिक विचारों से पोषित जिन्दगी देखकर भी
सब मौन क्यों हैं ?

सुविचारों पर ,आधुनिक विचारों के कुप्रभाव देखकर भी
सब मौन क्यों हैं ?

परमाणु बमों के आतंक के साए में
डरी – डरी , सहमी – सहमी सी
जिंदगियां देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

आतंक के साए में पल- पल सिसकती
मौत के साए से आशंकित जिंदगियां देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

नानक , कबीर,  गौतम, विवेकानंद के
विचारों से पल्ला झाड़ती वर्तमान जिन्दगी से परिपूर्ण  वर्तमान असामाजिक परिदृश्य
देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

“डर के बाद जीत “ को चरितार्थ करने के प्रयास में
जिन्दगी  के साथ
खेल खेलती युवा पीढ़ी का
यह आप्राकृतिक कृत्य देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का होता पतन ,
स्वयं की ही निर्मित मुश्किलों से
जूझता मानव
परम्पराओं पर से उठती श्रद्धा और विश्वास देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

कम प्रयासों से अधिक पाने की लालसा
बुजुर्गों का समाज में घटता स्थान और सम्मान देखकर भी
सब मौन क्यों हैं ?
भौतिक विश्व में जिन्दगी का चरम ढूँढने
का असफल प्रयास करते मानव को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

देवालयों को छोड़ पब और बार की ओर
पलायन करती युवा पीढ़ी को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

मानव का मानव पर से उठता विश्वास
मानव का मानव द्वारा पतन,
अप्राकृतिक कृत्यों में लिप्त
मानव को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

आध्यात्मिक शिक्षा पर लग रहे
ग्रहण को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

पल – पल हो रहे चीरहरण और
बढ़ती असुरक्षा की भावना को देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

आदर्शों पर हो रहा कुठाराघात ,
संस्कृति और संस्कारों पर हो रहा प्रहार
परम्पराओं को रूढ़िवादिता की नवीन परिभाषा से पोषित करने का असामाजिक एवं अनैतिक प्रयास

आधुनिकता की अंधी भट्टी में पककर कुंठित होता समाज
विकास के अमानवीय आयामों को स्थापित
करता आज का समाज
ये सब देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

वो कहते हैं खुद को
खुदा का बंदा और
बहा रहे हैं खून
इंसानियत के रखवालों का
इन इंसानियत को
नोच खानेवाले चरित्रों को
देखकर भी

सब मौन क्यों हैं ?

चलो चलें
इस मौन को तोड़ें
इन चीरहरण की घटनाओं पर लगायें विराम
आधुनिक विचारों से पोषित होती युवा पीढ़ी को
राम , नानक के आदर्शों से परिचित करायें

संस्कृति और संस्कारों से पोषित परम्पराओं का
इस युवा पीढ़ी को आचमन करायें

प्रकृति हो रहे अमानवीय अत्याचार से धरती माँ को मुक्त कर
स्वच्छ पर्यावरण की ज्योति जलायें

नारी शक्ति की ऊर्जा से समाज को
पोषित करें
परमाणु मुक्त भूमंडल का विस्तार करें
विश्व शान्ति का सन्देश जन – जन तक पहुंचायें

आतंक की परिभाषा को समाप्त कर
विश्व बंधुत्व की भावना का विकास करें

भौतिक सुख से स्वयं को मुक्त कर
आध्यात्मिक सुख का बिगुल बजाएं

देवालयों को मुक्ति मार्ग की संज्ञा दे
समाज , राष्ट्र और समस्त भूमंडल को
विश्व शांति , धार्मिक एकता , विश्व बंधुत्व का केंद्र बनाएं

आओ इस मौन को तोड़ें
एक नया विश्व बनाएं
एक नया विश्व बनायें






kb , mb , gb की भेंट चढ़ती जिन्दगी

  
kb , mb , gb की भेंट चढ़ती जिन्दगी

kb , mb , gb की भेंट चढ़ती जिन्दगी
mobile पर seconds गिनती जिन्दगी

selfie के चक्रव्यूह में उलझती जिन्दगी
mobile पर balance को लेकर चिंतित जिन्दगी  

फेसबुक , ट्विटर , whatsapp , hike पर
कुर्बान होती जिन्दगी

24 घंटों की जिन्दगी में से
सोने के 8 घंटों पर
कुठाराघात करती
ये multimedia की जिन्दगी

सोचने को मजबूर करती
क्या यही अंतिम सत्य रह गया है
इस जिन्दगी का

या

इस सत्य से परे भी
और कोई सत्य है

जो हमें इस यांत्रिक मायाजाल
के इस दलदल से
बाहर ला

हमारे जीवन को प्रफुल्लित कर सके
दे सके हमारे जीवन को
एक नयी राह

हमारे जीवन के उद्देश्य की
पूर्ति का वरदान दे सके
इस भौतिक संसार से
मोहभंग कर

हमें प्रस्थित कर सके
आध्यात्म की ओर

स्वयं के उद्धार की ओर
हमें विवश कर सके

यह सोचने को
कि
जीवन का उद्देश्य क्या है ?
लक्ष्य क्या है ?

इस यांत्रिकता ने जीवन को
एक अजीब मोड़ पर
ला खड़ा किया है

दैनिक जीवन के पल – पल के
कार्यकलापों पर
पड़ रहा
इसका कुप्रभाव है

घर हो, टॉयलेट हो , बाथरूम हो
बस हो , ट्रेन हो , प्लेन हो
मंदिर हो , स्टेशन हो या फिर ..........

हर जगह केवल एक ही विषय
गुनगुनाते हुए देखा जा सकता है

ट्रेन पर सेल्फी , जीवन में adventure पैदा करने का video
whatsapp, twtitter , internet , hike ,fb आदि – आदि के

पन्नों पर उलझती आँखें

एक अनजान मनोवैज्ञानिक बीमारी
की ओर
धकेलती

ये mobile , laptop , ये internet
की दुनिया

मानव जितना सजग , उस परमात्मा के प्रति नहीं
जितना कि इन यांत्रिक गतिविधियों के लिए

एक ओर तो उस परमात्मा के लिए
मानव के पास समय का अभाव
वहीं दूसरी ओर
यदि वह दो पल के लिए

उस परमात्मा की शरण होना भी चाहे
तो
मन में

 whatsapp, twtitter , fb, hike पर
message को लेकर
मन में एक विशेष
प्रकार की चिंता

इस भूलभुलैया का कोई अंत है
भी या नहीं

या यूं ही
डूबते – उतराते हुए बीत जायेगी जिन्दगी

या फिर
इस चक्रव्यूह से मुक्त हो
उन्मुक्त गगन में विचरण कर सकेगी

ये जिन्दगी

क्या होगा इस
वर्तमान संकटपूर्ण
जीवन का

कोई तो ऐसा छोर मिले
जो मुक्त कर दे

और ले चले
उस गगन की ओर

जहां
केवल और केवल

विद्यमान हो असीम शांति
और आध्यात्मिक सुख