लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Sunday, 22 December 2013

यह कैसा लोकतंत्र


यह कैसा लोकतंत्र
यह कैसा लोकतन्त्र
यह कैसी आजादी
दिखती नहीं मानवता
खो रही सामाजिकता
मानव के चारों ओर
फैल रही भयावहता
असफल होता जीवन
सरकता , सिसकता जीवन
पनपता अपराध
करता कुठाराघात
शाम कहाँ हो पता नहीं
कल का भरोसा नहीं
तोड़ता नियमों को
आदर्शों की धज्जियां उड़ाता
चारों ओर फैलता अँधेरा
सोचने मजबूर करता
यह कैसा लोकतन्त्र
यह कैसी आजादी
शिक्षा बन गया है व्यवसाय
शिक्षक हो गए हैं पेशेवर
सरकारी अस्पताल हो गए हैं
दरिद्रों के घर
यातायात व्यवस्था चरमरा रही
आये दिन दुर्घटनायें हो रहीं
रक्षकों पर नहीं रहा विश्वास
घात लगाए बैठी है ये आस
राह दिखती नहीं
मंजिल का पता नहीं
लोग फिर भी रैंग रहे
बार – बार कह रहे
यह कैसा लोकतन्त्र
यह कैसी आजादी
लडकियां यहाँ सुरक्षित नहीं
इस असभ्य समाज में
फैलती आधुनिकता की गंदगी
चारों ओर गलियार में
छोटे कपड़ों ने स्थिति
और भी भयावह की है
युवा अपने नियंत्रण में नहीं रहा
बलात्कार इसकी परिणति हो गयी
गति पकड़ती अनैतिकता , अमानवता
असामाजिकता , छूटता भाईचारा
हर कोई कह रहा
यह कैसा लोकतन्त्र
यह कैसी आजादी
शॉर्टकट हो गया जरूरत
कल का इंतजार ख़त्म
डर के बीद जीत , कई बार
देती  जीवन से हार
ये कैसा मुक्त व्यवहार
कहीं कोई लगाम नहीं
ना ही कोई मंजिल
ना कोई ठिकाना
कहाँ है जाना
अंत नहीं अंत नहीं
दिल बरबस कह उठता
यह कैसा लोकतन्त्र
यह कैसी आजादी

वक़्त बेवक्त जिन्दगी


वक़्त बेवक्त जिन्दगी


वक़्त बेवक्त जिन्दगी के
मालिक हो गए हैं हम

खिसकती , सरकती , सिसकती जिन्दगी के
मालिक हो गये हैं हम

ध्यान से हमारा नाता नहीं है
धन की लालसा से बांध गए हैं हम

संस्कृति के पालक नहीं रहे हम
आधुनिकता के बवंडर में खो गए हैं हम

संस्कारों की बेल के फूल न होकर
कुविचारों की शरण हो गए हैं हम

योग की लालसा रही नहीं हमको
पब और जिम की शरण हो गए हैं हम

दोस्ती पर विश्वास रहा नहीं हमको
अकेलेपन के शिकार हो गए हैं हम

सत्संग की शरण न होकर
टी वी मोबाइल के पीछे भाग रहे हैं हम

मोक्ष का विचार तो था मन में
हर पल मर मरकर जी रहे हैं हम                        
वक़्त बेवक्त जिन्दगी के
मालिक हो गए हैं हम


बेख़याल



बेख़याल

बेख़याल बेअसर
किंचित विक्षिप्त
लग रहा है वो
चला जा रहा है
अपनी ही दुनिया में
लोगों के दिलों में जगाता
केवल एक ही भाव 
शायद पागल है ये
सत्य के आईने में
झाँकने के कोई
तैयार नहीं
कोई उसे बड्डा
पागल कहता है
तो कोई उसे झुमरू पागल
की संज्ञा दे आगे बढ़ जाता है 
कभी कभी उसके
तन पर अधफटे वस्त्रों
को देख अर्धनग्न
देख उसके तन को ढंकने
कहीं न कहीं
मन में एक कचोट
का अनुभव कर
उसे वस्त्राभूषित करने का प्रयास करता है 
कभी कभी वह अचानक ही
रौद्र हो उठता है
पत्थर उठा किसी की भी ओर दौड़ता है
पर पत्थर फैंककर
मारता नहीं
कभी अचानक ही
जोर जोर से
दहाड़ता है चीखता है
कभी सिसकता है 
व्यथा के पीछे का सत्य
सबसे दूर कहीं
भूतकाल के गर्त में छुपा
समाज में छुपे अमानवीय भेड़ियों
का शिकार
जिसे हम बड्डा पागल
कह आगे बढ़ जाते हैं 
एक बात और
कभी कभी तो
रक्षकों द्वारा ही
भक्षक बन
इन चरित्रों का
निर्माण किया जाता है
उन्हें पैदा किया जाता है 
हमारा सामाजिक परिवेश
हमारी क़ानून व्यवस्था,
न्यायपालिका , प्रशासन में
कुछ न कुछ तो ऐसा है
जो शक्ति , धन से संपन्न
समाज में व्याप्त
चरित्रों को विशेष महत्त्व देता है 
अर्थहीन समाज में
कोई जगह न होने पर ऐसे चरित्रों
का निर्माण होता है
जिन्हें हम पागल झुमरू कहते हैं 
हमारा दायित्व मानव समाज में
फैलती असमानता को समाप्त कर
नैतिकतापूर्ण वातावरण
का निर्माण करना होगा 
जो इन विक्षिप्त
किरदारों से
पट रही धरा को
इस भयावह त्रासदी से
बचा सके 
यहाँ न कोई बड्डा हो
न ही कोई झुमरू
यहाँ केवल मानव हो
उसका मानवपूर्ण व्यवहार हो 
शालीनता हो सुन्दरता हो
संस्कार हों संस्कृति हो
यही मानव समाज की पुकार हो
यही मानव समाज की पुकार हो
यही मानव समाज की पुकार हो