लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Friday, 30 March 2012

मुझे तेरे करम का एहसास हो

मुझे तेरे करम का एहसास हो


मुझे तेरे करम का एहसास हो
तू यहीं कहीं मेरे आसपास हो
थक जाऊं तो सहारा देना
गिरने जो लगूं तो संभाल लेना
तेरे  रहमत तेरे करम का साया हो
या मै यहाँ रहूँ या वहाँ रहूँ
किस्सा ए जिंदगी सुकून से चले
हर वक्त तेरा नाम मेरी जुबान पे रहे
कि जागूं तो बसर रह जुबान पे मेरी
और जुस्तजू तेरी ख्वाब में भी बरकरार रहे
तूने खिलाया है सभी को गोदी में लेकर
तेरा ये प्यार हम पर भी बरकरार रहे
एहसास -ए -करम हम पर ताउम्र रहे
हमेशा तू यहीं कहीं मेरे आसपास रहे
मंजिल मेरे खुदा तू मुझे नज़र करना
तेरे करम का चर्चा हो गली – गली
इतना रहम हम पर तासहर करना

कवि पंख हुए विस्तृत

कवि पंख हुए विस्तृत


कवि पंख हुए विस्तृत
हुए विस्तृत हुए व्यापक
सोच बदली बदले नियम
विषय हुए विस्तृत हुए व्यापक
करवटें बदलती सभ्यता
करवटें बदलता समाज
विकृत होती मानसिकता
उबाल पर काम का प्रभाव
संस्कार उभरे रूढ़ीवादी विचार बन
संस्कृति उभरी मनोरंजन का स्वर बन
सद्विचारों का प्रभाव दिख रहा
पनप रहा मनचलापन
अजीब सा बहाव है 
पसार रहा पाँव है
पुण्य छीण हो रहे
विलासिता का भाव है
धर्म पर अधर्म की मुहर
सत्य आज असहाय है
चीख – चीख पुकारती
मानवता आज है
फूलों से खुशबू  खो रही
अंगडाई आंसू – आंसू रो रही
नेत्र हुए विकराल हैं
सतीत्व को न छाँव है
देवालय  शून्य में झांकते
मानव इधर उधर भागते
अस्तित्व का पता नहीं
कि राह किधर है कहाँ
कि पुण्यात्मा कहैं किसे
कि मस्तक चरण धरें किसे
कि मोड़ जीवन का है ये कैसा
कि अब गिरे कि कब गिरे
शून्य में हम झांकते
रोशन दीये के तले
कि कैसा ये बहाव है
न कोई आसपास है
कि अंत का पता नहीं
कि अगले पल कि खबर नहीं
फिर भी मोहपाश है
कि टूटता नहीं कि छूटता नहीं
नव विचार कर रहे विव्हल
कि चूर – चूर ये जवानियाँ
प्रयोग दर प्रयोग बढ़
मिटा रहे निशानियां
कि हाथ तेरे कुछ न तेरे है
कि हाथ कुछ न मेरे है
कि हम भागते तुम भागते
कि हम भागते बस भागते
कि सुकून न मिल रहा यहाँ
क्या चैन मिलेगा वहाँ
कि दो पल को रुक सकूँ खुदा
कि खुद की खोज कर सकूं
कि राह दिखलाना मुझे
कि पनाह में अपनी तू ले मुझे
कि मै गिरूं तो तू संभाल ले
हो सके तो तू करार दे
कवि पंख हुए विस्तृत
हुए विस्तृत हुए व्यापक



असंस्कृत हुई भाषा

असंस्कृत हुई भाषा


असंस्कृत हुई भाषा
असभ्य होते विचार
असमंजस के वशीभूत जीवन
संकीर्ण होते सुविचार
अहंकार बन रहा परतंत्रता
असीम होती लालसा
जिंदगी का ठहराव भूलती
आज कि जिंदगी
‘ट्वीट’ के नाम पर
हो रही बकबक
असहिष्णु हो रहा हर पल
ये कौन सी आकाशगंगा
आडम्बर हो गया ओढनी
आवाहन हो गयी बीती बातें
मधुशाला कि ओर बढ़ते कदम
संस्कार हो गए आडम्बर
ये कैसा कुविचारों का असर
संस्कृति माध्यम गति से रेंगती
विज्ञान का आलाप होती जिंदगी
धार्मिकता शून्य में झांकती
मानवता स्वयं को
अन्धकार में टटोलती
ये कैसी कसमसाहट
ये कैसा कष्ट साध्य जीवन
कांपती हर एक वाणी
काँपता हर एक स्वर
मानव क्यों हुआ छिप्त
क्यों हुआ रक्तरंजित
समाप्त होती संवेदनाएं
फिर भी न विराम है
कहाँ होगा अंत
समाप्त होगी कहाँ ये यात्रा
न तुम जानो न हम ...........


Sunday, 22 January 2012

मातृभूमि

मातृभूमि
उसकी आँखों का पानी सूख चुका था
उसकी मरमरी बाहें आज भी
इंतजार कर रही हैं उसका
जो गया तो फिर वापस नहीं आया
ये उसका पागलपन नहीं
उसकी आत्मा की आवाज है
जो बरबस ही दरवाजे की और
ढकेल देती है उसे
इन्तजार है उसे उस पल का
जो उसे टूटने से बचा ले
ये उसका पुत्र प्रेम है जिसने
उसने अंदर तक विव्हल किया है
वो गया था कहकर
जीतूंगा और वापस लौटूंगा
सियाचिन की वादियों में
लड़ा वो वीर बनकर
दुश्मनों को पस्त कर
फिर निढाल हो शांत हो गया
पहन तिरंगा कफ़न पर
मातृभूमि पर न्योछावर
परमवीर बन गया वह ....

भजन

भजन
बोलो रे बोलो बोलो
राधे गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
कृष्ण गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
कन्हैया गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
बांसुरी गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
मुकुट गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
गिरधर गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
यशोदा गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
देवकी के लाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
नन्द के गोपाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
वासुदेव के लाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
सुदामा बाल बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
मोर मुकुट घनश्याम बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
गोवर्धन घनश्याम बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
राधा के श्याम बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
मीरा घनश्याम बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
कृष्ण चारों धाम बोलो
बोलो रे बोलो बोलो
राधे गोपाल बोलो

सत्य वचन अनमोल वचन

सत्य वचन अनमोल वचन


सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन मुखरित हो जब पुष्प खिला जाता है

सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म प्रेरणा स्रोत जब बन जाता है

सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन सत्य राह जब निर्मित कर जाता है

सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म परम कर्म जब हो जाता है

सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन परम धर्म जब बन जाता हैं

सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म जब सामाजिकता पा जाता है

सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन जब मानव मुक्ति साधन हो जाता है

सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म जब पाप कर्म को धो जाता है

सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन जब मानव मन पर छा जाता है


सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म जब धर्म प्रेरित कर्म बन जाता है


सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन जब मानव का तारक हो जाता है



सत्य कर्म अनमोल कर्म कब हो जाता है
सत्य कर्म जब मानव कल्याण हित हो जाता है


सत्य वचन अनमोल वचन कब हो जाता है
सत्य वचन साधारण को असाधारण कर जाता है


सत्य वचन अनमोल वचन हर पल होता है
सत्य कर्म अनमोल कर्म हर छण होता है
मानव पूर्ण तभी होता है
जब वह दोनों के सत्संग होता है