लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Thursday, 4 April 2013

जुगाड़



जुगाड़

जुगाड़ ! जुगाड़ ! जुगाड़ !
आखिर क्या है ये जुगाड़ ?
भाई जुगाड़ तो वह चीज है
जिसके बगैर आड़ नहीं

यानी !

यदि हो जाए जुगाड़
तो समझो आपके काम को मिल जाए आड़

यानी !

हो जायें आपके काम सफल
छा जाए कुछ पलों के लिए
आपके जीवन में मंगल

भाई हमें कुछ विस्तार से
जुगाड़ की माया समझाइये !

देखो भाई
जुगाड़ एक कला है
इसके लिए कुछ विशेष
योग्यतायें अतिआवश्यक हैं

जैसे !

जैसे अन्दर से कैसे भी रहो
बाहर से शरीफ दिखो

अच्छा !

हाँ

साथ ही सामने वाले को
चाहे मन से भरपूर कोसो
पर जुबान पर से
सामने वाले की तारीफ़ जी भर बरसो

ऐसा क्या !

और नहीं तो क्या

कुछ और भी बताओ न !

ज़रूर – ज़रूर

जैसे बाबू को पटाना हो तो
चाय का भोग चढाते रहो
बॉस को पटाना हो तो
तारीफों का मलहम लगाते रहो

वाकई ! क्या बात है !

और आगे तो सुनो

जुगाड़ का समय जैसे ही नजदीक दिखे
रोनी सूरत, भिखारियों वाली हालत बना लो
जितने रोने रो सकते हो लिस्ट बना लो
जो बीमारी नहीं हो उसका भी गीत गा लो
परिवार में जो पहले से ही मर चुका हो
उसको दुबारा मार दो

क्या बात है !

-अरे ये तो कुछ भी नहीं

-कुछ और भी है क्या ?

क्यों नहीं क्यों नहीं

जुगाड़ एक ऐसा हथियार है
जो कभी फेल नहीं होता
थोड़ी बहुत एक्टिंग  
आँखों में घडियालू आंसू
मोबाइल निल बैलेंस
और पेंट की जेब बिलकुल खाली

हो सके तो साथ देने के लिए
किसी रोनी सूरत वाले
दोस्त को कमीशन पर साथ रख लो

बहुत बढ़िया | आगे !

अगर दोस्त से ही जुगाड़ बनाना हो तो
दोस्त से सीधे बात मत करो

फिर किससे !

अरे घर में भाभीजी होती हैं न
जब दोस्त घर पर न हो
घर पर हमला कर दो
रोनी सूरत बनाकर
भाभीजी का दिल जीतो
पता है
औरतें बहुत जल्दी पिघल जाती हैं

वाकई क्या आइडिया है !

अच्छा एक बात बताओ

किसी दुकानदार को टोपी पहनाना हो तो !

कोई बड़ी बात नहीं !
शुरू शुरू में एक दो बार
पेमेंट समय पर कर दो
इससे विश्वास पुख्ता हो जाता है
बाद में जितना हो सके सूखा कर दो

अच्छा बताओ जुगाड़ की जरूरत

कब और कैसे महसूस होती है ?

अरे ये महसूस करने की चीज नहीं
जब भी जेब में लानी हो हरियाली
आँखों में चमक जगाओ
दो चार को पानी पिलाओ

मान गए यार !

अरे यह तो कुछ भी नहीं
ज्यादा फंस जाओ तो
बाहर आने का रास्ता भी है

वो क्या !

कमीशन ज्यादा देकर
बैंक को लोन लेकर चूना लगाओ
पर एक बात का हमेशा ध्यान रखना

वो क्या !

जो बैंक वसूली के लिए
गुंडे पालते हैं

उन बैंकों में
गलती से भी हाथ न डालना

तुम तो कमाल हो यार !

अच्छा एक बात बताओ ?

बोलो

क्या किसी रिश्तेदार को
लपेट सकते हैं क्या ?

अरे बिलकुल नहीं

क्यों !

एक तो इससे समाज में
इज्जत का चूरा होता है

अच्छा और फिर !

और क्या !
रिश्तेदार तो हमेशा ही
कंगाली और रोनी सूरत का
रोना रोने में माहिर होते हैं
हो सके तो
ऐसी जगह हाथ मत डालो

यार ये जुगाड़ है वाकई में बढ़िया चीज !

अरे यार ये तो आजकल का
फंडा है
थोड़ा जियो खुल के जियो
घुट घुटकर क्या जीना
जितने उच्च स्तर की
फंटूसबाजी  करोगे
जेल जाने पर उतने ही
अच्छे लेवल की सेवायें
प्रदान की जाती हैं

वाकई !
और नहीं तो क्या

और यदि पुलिस ज्यादा सताए तो ?
यदि पुलिस ज्यादा सताए !

तो दो चार घाव
शरीर पर बना लो
फिर !

फिर क्या
किसी चैनल पर
अपना घायल बदन दिखाओ
और मानवाधिकार आयोग
की शरण में जाओ
यदि इससे भी
काम न बने तो
टेंशन नहीं लेना

क्यों ?

आखरी रास्ता भी है

वो क्या !

ये वो देश है
जहां हर बात का आखिरी इलाज है
मतलब !
कोई भी स्तर का
किसी भी तरह का
काण्ड करके आओ
मेटर को आगे बढाओ

वो कैसे ?

आखिरी चाल पटको
और
राष्ट्रपति के दरबार में
गुहार लगाओ
मानवता के राग गाओ
माफ़ी के लिए कैसिट दुहराओ
सुधरने की कसमें खाओ
आराम से जेल में
जीवन बिताओ
अगर माफ़ी मिल गई तो
बाहर आकर हमको
मिठाई जरूर खिलाओ .

          

Thursday, 28 February 2013

सत्य पथ अब पथ विहीन क्यों ?


सत्य पथ अब पथ विहीन क्यों ?

सत्य पथ अब
पथ विहीन क्यों ?
सत्य राह
चंचल हुई क्यों
सत्यमार्ग
सूझता नहीं क्यों
असत्य सत्य पर
भारी है क्यों ?
कर्म धरा अब
चरित्र विहीन महसूस हो रही
शोर्टकट लगता
अब प्यारा क्यों ?
कर्महीन महसूस होता 
हर एक चरित्र क्यों ?
नारी अपनी व्यथा पर
समाज में
रोती है क्यों ?
पुरुष समाज में
अपनी छवि
खोता सा
दिखता है क्यों
धर्म पथ पर
काम पथ का
प्रभाव पड़ता सा
दिखता है क्यों ?
शर्मिंदगी की घबराहट
अब अनैतिक
चरित्रों के चहरे पर
झलकती नहीं है क्यों ?
धर्म्कांड व कर्मकांड
के नाम पर
परदे के पीछे
काम काण्ड की
महिमा गति
पकड़ रही है क्यों ?
फूलों में अब
पहली सी
खुशबू रही नहीं है क्यों ?
उलझा – उलझा
परेशान सा
हर एक चरित्र
महसूस
हो रहा है क्यों ?
मानवता
गली – गली
आज शर्मशार
हो रही है क्यों ?
आज नारी
हर दूसरे चौक पर
बलात्कार का शिकार
हो रही है क्यों ?
युवा पीढ़ी
आज की
पथभ्रष्ट
हो रही है क्यों ?
समाज में
आज
वृद्ध आश्रमों की
संख्या में
बढ़ोत्तरी
हो रही है क्यों ?
पल –पल होती लूट
और हत्याओं की
घटनाओं से
मानव रूबरू हो
रहा है क्यों ?
आज प्रकृति
अपने विकराल
रूप में
हमारे सामने
आ खड़ी हुई है क्यों ?
सुनामी – कैटरीना
भूकंप , ज्वालामुखी
के शिकार
मानव हो रहे है क्यों ?
वर्तमान सभ्यता
आज
अपने अंत के
द्वार पर खड़ी  हुई है क्यों ?
द्वार पर खड़ी  हुई है क्यों ?
द्वार पर खड़ी  हुई है क्यों ?