लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम

लेखक परिचय - अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम पिछले 20 वर्षों से लेखन से जुड़े गुए हैं और अभी तक इनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | तीन लेख भी पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित हो चुके हैं | करीब 1500 से अधिक रचनाएँ, 25 से अधिक कहानियां, 30 से अधिक लेख, विचार, शायरी, भजन, गीत आदि का सृजन कर चुके हैं | जन्म से ये जबलपुर (मध्य प्रदेश ) से हैं और अभी डेराबस्सी (पंजाब) में रह रहे हैं |

Monday, 3 December 2012

धरती माँ


धरती माँ तुम पावन थीं
धरती माँ तुम निश्चल थीं
रूप रंग था सुंदर पावन
नदियाँ झरने बहते थे कल- कल
मोहक पावन यौवन था तेरा
मंदाकिनी पावन थी सखी तुम्हारी
बहती थी निर्मल मलहारी
इन्द्रपुरी सा बसता था जीवन
राकेश ज्योत्सना बरसाता था
रूप तेरा लगता था पावन
रत्नाकर था तिलक तुम्हारा
मेघ बने स्नान तुम्हारा
पंछी पशु सभी मस्त थे
पाकर तेरा निर्मल आँचल
राम कृष्ण बने साक्ष्य तुम्हारे
पैर पड़े थे जिनके तुझ पर न्यारे
चहुँ और जीवन – जीवन था
मानव – मानव सा जीता था
कोमल स्पर्श से तुमने पाला
मानिंद स्वर्ग थी छवि तुम्हारी
आज धरा क्यों डोल रही है
अस्तित्व को अपने तोल रही है
पावन गंगा रही ना पावन
धरती रूप न रहा सुहावन
अम्बर ओले बरसाता है
सागर भी सुनामी लाता है
नदियों में अब रहा ना जीवन
पुष्कर अस्तित्व को रोते हर – क्षण
मानव है मानवता खोता
संस्कार दूर अन्धकार में सोता
संस्कृति अब राह भटकती
देवालयों में अब कुकर्म होता
चाल धरा की बदल रही है
अस्तित्व को अपने लड़ रही है
आओ हम मिल  प्रण करें अब
मातु धरा को पुण्य बनाएँ 
इस पर नवजीवन बिखराएँ
प्रदूषण से करें रक्षा इसकी
इस पर पावन दीप जलायें
हरियाली बने इसका गहना
पावन हो जाए कोना - कोना 
ना रहे बाद ना कोई सुनामी
धरती माँ की हो अमर कहानी
धरती माँ की हो अमर कहानी


     




Sunday, 2 December 2012

शुभ दीवाली आई है


शुभ दीवाली आई है

शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
दीप जगमगा रहे
रोशनी है बिखरा रहे
कि तुम भी रोशन हो चलो
कि ज्ञान दीप तुम बनो
रोशन करो तुम आसमान
रोशन करो तुम ये ज़मीं
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
कि दीप मुस्करा रहे
स्याह रात रोशन कर रहे
कि तुम भी कर्म पथ बढ़ो
अज्ञान से हर पल लड़ो
कि दीप दीप जिंदगी
रोशन करो रोशन करो
कि शुभ दीवाली आई है                    
खुशियाँ हज़ार लाई है
कि राह तुम निर्मित करो
कि अविचल तुम बढे चलो
कि पग पग हो रोशनी
बेखौफ़ तुम डटे रहो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई  है 
कि मंद मंद रोशनी
बिखेरते आगे बढ़ो
कि आसमान को चूम लो
ये प्राण हर पल तुम करो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है
समाज में पीड़ित हैं जो
भूख में भी जीवित हैं जो
उनको भी साथ ले बढ़ो
जीवन को उनके रोशन करो
कि शुभ दीवाली आई है
खुशियाँ हज़ार लाई है

तुम न छेड़ो कोई बात


तुम न छेड़ो कोई बात

तुम न छेड़ो कोई बात
न सुनाओ आदशों का राग
मार्ग अब हुए अनैतिक
हर सांस अब है कांपती
कि मैं डरूं कि वो डरे
हर मोड़ अब डरा – डरा रहा
कांपते बदन सभी
कांपती है आत्मा
रिश्ते हुए सभी विफल
आँखों की शर्म खो रही
बालपन न बालपन रहा
जवानी बुढ़ापे में झांकती
ये आदर्श अब न आदर्श रहे
न मानवता मानवता रही
अब राहों की न मंजिलें रहीं
डगमगाते सभी पाँव हैं
रिश्तों की न परवाह है
संस्कृति का ना बहाव है
संस्कारों की बात व्यर्थ है
नारी न अब समर्थ है
नर पशु सा व्यर्थ जी रहा
व्यर्थ साँसों को खींच है रहा
कहीं तो अंत हो भला
कहीं तो अब विश्राम हो
कहीं तो अब विश्राम हो
कहीं तो अब विश्राम हो




गणेश वंदना


गणेश वंदना
जय गणेश गजबदन विनायक
एकदन्त गणपति गणनायक
प्रथम पूज्य तुम देव हमारे                            
विध्न हरो प्रभु करो काज हमारे
मूषक वाहन तुम्हें लगते प्यारे
लम्बोदर गौरी- शिव के प्यारे
सबसे लाड़ले तुम मात- पिता के
मंगल करता गौरीसुत तुम
प्रथम पूज्य तुम लगते प्यारे
मोदक तुमको सबसे प्यारे
कष्ट हरो सब शिव के दुलारे
जब भी घन- घन घंटा बाजे
मूषक पर तुम  दौड़ के आते
जय लम्बोदर जय एकदन्त
जय गणपति जय गौरीसुत
जय गजानन जय विघ्नेश
खत्म हैं करते सारे क्लेश
जय गजबदन जय विनायक
जय विघ्न्हर्ता जय मंगलकर्ता
जय गणेश जय – जय गणेश |



Thursday, 2 August 2012

केंद्रीय विद्यालय संगठन


के वी एस
के वी एस की महिमा, लगती निराली हमें
बांधती है अपने,  बंधन में सबको

इसकी पढ़ाई देती, सम्पूर्ण ज्ञान हमें
निखारती, सभी कलाएँ बच्चों में

कभी बाल मेला ,कभी हाइक पर बच्चे
कभी पोलियो कैंप, कभी स्काउट कैंप

कभी ट्रेनिंग कैंप, कभी करिएर गाईडेंस
बच्चों को ये, ट्रैकिंग पर ले जाते हैं

कभी वाटर स्पोर्ट्स, कभी ओलम्पीआड
सभी खेलों की ,स्पोर्ट्स मीट ये कराते हैं

शिक्षकों की योग्यता ,इनकी विधा से दिखे
बच्चों को ये, इंजीनयर, डाक्टर बनाते हैं 
कभी रिफ्रेशेर, कभी ट्रेनिंग कैंप
शिक्षकों को शिक्षा के, गुर ये सिखाते हैं 

नेता अभिनेता ,सभी प्रकार के चरित्र
विद्यालय में ये ,रोज ही दिखाते हैं

कराते हैं ये पार्लियामेंट ,स्कूल प्रांगण में
बच्चों में ये ,नेतृत्व की भावना जगाते हैं

पुस्तकालय भी इनके होते हैं, नंबर वन
जहां बच्चों को, ज्ञान का भण्डार मिल जाता है

प्रोजेक्ट हो, या हो असाइनमेंट
क्षण भर में ,यहाँ पूरे हो जाते हैं

ज्ञान का प्रसार ,करते  ये लाइब्ररियन
ज्ञान के मसीहा के, रूप में जाने जाते हैं

कम फीस, अच्छी सुविधा का वादा
राष्ट्रपति ,स्काउट गाइड ये बनाते हैं

ऊँची ऊँची बिल्डिंग ,खुला मैदान देखो
धरती पर स्वर्ग ,उतार ये लाये हैं

शिक्षा पर शोध, यहाँ का नारा है
सारा विश्व ,एक परिवार हमारा है

धार्मिक एकता ,अखंडता उपरोपरि
साम्प्रदायिक एकता, उद्देश्य हमारा है

बच्चे सहयोग करें, बाद पीड़ितों के लिए
भूकंप पीड़ितों के लिए,  दंगा पीड़ितों के लिये

समाज की सेवा करना ,यहाँ बच्चों को सिखाते हैं
राष्ट्र् समर्पण की ,भावना जगाते हैं

के वी एस की महिमा, लगती निराली हमें
बांधती है अपनेबंधन में सबको

Tuesday, 3 July 2012

बाबू की बाबूगिरी

बाबू की माया
बाबू की माया
कोई समझ नहीं पाया

काइयां जिसकी सख्सियत
अंतरात्मा से धूर्त
सारी दुनिया को यह
समझता महामूर्ख

बाबू हमारे एकदम निराले
आँखों पर चढ़ा चश्मा
कारनामे करते सारे काले
दूसरों की  बढ़ी तनख्वाह से
इन्हें हमेशा नफरत
चाहे भरा हो
इनका खुद का पर्स

सरसरी इनकी निगाहें
छोड़ती नहीं कोई आंकड़े
चश्मे के भीतर की दो आँखों से
भांप लेते हैं ये बिल का मज़मून
इनके खुद के नियमों के आगे
चलता नहीं कोई क़ानून

अच्छे – अच्छे अफसर मानते हैं
इनकी शातिर चालों का लोहा
क्योंकि उनके पास भी नहीं है पढ़ने को
बाबू चालीसा के अलावा कोई दोहा

बाबू की बाबूगिरी ने सबको हैं
नाकों चने चबवाए
इनकी लाल कलम से यारों
कोई ना बचने पाए

बाबू की कारगुजारी
हर पेन पर है पड़ती भारी
लाल पेन के आगे भैया
चलती नहीं कोई कटारी

पल नित नए तरीके खोजें
पैसे रोकन की राह खोजें
फैकें नए पेंतरे नित-दिन
पास नहीं होते हमारे बिल

बाबू से जो ना हो अंडरस्टेन्डिंग
समझो तुम्हारी फाइल पेंडिंग
पीछे के दरवाजे से तुम
बाबू के घर में घुस सकते हो

चाय चढावा देकर भैया
पूरा बिल पास करा सकते हो
हमारी जो तुम मानो भैया
बाबू से पंगा मत लेना
बड़ी गंदी कौम होती है ये
इनका ना कोई भाई और ना कोई भैया
बस इनका जो चल जाए तो
मिले ना तुमको इक रुपैया

जानो तुम बाबू की माया को
देखो मत इनकी काया को
दिल में इनके जगह बनाओ
चाय – चढावा खूब चढाओ

चाहे सामने के दरवाजे से आओ
या फिर पीछे के दरवाजे से आओ
बाबू की कौम से भैया
रहना संभल – संभल के

हमारी जो मानो तुम भैया
बाबू से पंगा मत लेना
इनके दर पर माथा टेको
थोडा झुक – झुक कर रैंगो
बाबू की खोची खिच्चड़ माया
जिससे कोई बच न पाया
हमरी बात को मन में धारो
बाबू से ये सब जग हारो
बाबू से ये सब जग हारो  
बाबू से ये सब जग हारो